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विश्वविख्यात फ्रेंच लेखक अल्बैर कामू की यह नाट्यकृति मनुष्य की अछोर, लेकिन अपूर्ण सुखाकांक्षाओं से उपजी क्रूरता का ऐसा दृश्यालेख है, जो हमें हतप्रभ कर देता है।</p> <p>नाटक की नायिका मार्था अपनी बूढ़ी माँ के साथ एक सराय में एक छोटा होटल चलाती है। लेकिन उस स्थान की अनाकर्षक और असुविधाजनक स्थिति उसे पसन्द नहीं। वह कहीं सुदूर समुद्र तट पर जाकर रहना और जीवन के तमाम सुख पाना चाहती है—उबरना चाहती है अपने चुकते हुए उबाऊ और नीरस जीवन से। किन्तु इसके लिए बहुत-सा धन चाहिए, इसलिए वह अपने यहाँ कभी-कभार ठहरनेवाले मुसाफिरों को जहर देकर मार डालती है। इस काम में वह अपनी बूढ़ी माँ को भी साथ रखती है। एक दिन जब बीस साल पहले घर से गया उसका भाई, जॉन, एक मुसाफिर की ही तरह आकर वहाँ ठहरता है, तो माँ के साथ मिलकर वह उसकी भी हत्या कर देती है। सचाई सामने आने पर माँ की व्यथा, विलाप और पश्चात्ताप का उसे कोई मूल्य नहीं दिखता, क्योंकि सिर्फ अपने बेटे की हत्या पर सदय और मानवीय हो उठना दूसरी तमाम हत्याओं के अपराध को कम नहीं कर सकता।</p> <p>यही वह कठोर जीवन-यथार्थ है, जिसे झेलने के लिए वह जॉन की पत्नी मारिया को पत्थर हो जाने की सलाह देती है, ताकि इस अमानवीय समाज का सामना किया जा सके।</p> <p>कहने की जरूरत नहीं कि अपने ही सुख की तलाश और परिस्थितिवश उसमें असफल रहने के कारण हद दर्जे तक क्रूर हो चुकी मार्था जैसी स्त्री भी अर्थदोष से ग्रस्त इस पत्थरदिल समाज पर एक तीखा व्यंग्य बनकर उभरती है।
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विश्वविख्यात फ्रेंच लेखक अल्बैर कामू की यह नाट्यकृति मनुष्य की अछोर, लेकिन अपूर्ण सुखाकांक्षाओं से उपजी क्रूरता का ऐसा दृश्यालेख है, जो हमें हतप्रभ कर देता है।</p>
<p>नाटक की नायिका मार्था अपनी बूढ़ी माँ के साथ एक सराय में एक छोटा होटल चलाती है। लेकिन उस स्थान की अनाकर्षक और असुविधाजनक स्थिति उसे पसन्द नहीं। वह कहीं सुदूर समुद्र तट पर जाकर रहना और जीवन के तमाम सुख पाना चाहती है—उबरना चाहती है अपने चुकते हुए उबाऊ और नीरस जीवन से। किन्तु इसके लिए बहुत-सा धन चाहिए, इसलिए वह अपने यहाँ कभी-कभार ठहरनेवाले मुसाफिरों को जहर देकर मार डालती है। इस काम में वह अपनी बूढ़ी माँ को भी साथ रखती है। एक दिन जब बीस साल पहले घर से गया उसका भाई, जॉन, एक मुसाफिर की ही तरह आकर वहाँ ठहरता है, तो माँ के साथ मिलकर वह उसकी भी हत्या कर देती है। सचाई सामने आने पर माँ की व्यथा, विलाप और पश्चात्ताप का उसे कोई मूल्य नहीं दिखता, क्योंकि सिर्फ अपने बेटे की हत्या पर सदय और मानवीय हो उठना दूसरी तमाम हत्याओं के अपराध को कम नहीं कर सकता।</p>
<p>यही वह कठोर जीवन-यथार्थ है, जिसे झेलने के लिए वह जॉन की पत्नी मारिया को पत्थर हो जाने की सलाह देती है, ताकि इस अमानवीय समाज का सामना किया जा सके।</p>
<p>कहने की जरूरत नहीं कि अपने ही सुख की तलाश और परिस्थितिवश उसमें असफल रहने के कारण हद दर्जे तक क्रूर हो चुकी मार्था जैसी स्त्री भी अर्थदोष से ग्रस्त इस पत्थरदिल समाज पर एक तीखा व्यंग्य बनकर उभरती है।
Book Details
-
ISBN9788119835027
-
Pages112
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: भवभूति 8वीं शताब्दी के भारतीय विद्वान थे, जो संस्कृत में लिखे गए अपने नाटकों और कविताओं के लिए विख्यात थे। उनके नाटकों को कालिदास की रचनाओं के बराबर माना जाता है। उन्हें उत्तररामचरित नामक उनकी रचना के लिए "करुणा रस के कवि" के रूप में जाना जाता है। भवभूति का जन्म महाराष्ट्र के गोंदिया जिले के पद्मपुरा, आमगांव में हुआ था। उनका जन्म विद्वानों के एक औदुंबर/उदुंबर ब्राह्मण[1] परिवार में हुआ था।[2][3] उन्हें यायावर परिवार का वंशज बताया जाता है, जिनका उपनाम उदुंबर था। उनके कश्यप ब्राह्मण पूर्वज काले यजुर्वेद का पालन करते थे और पाँच पवित्र अग्नि रखते थे।[4] उनका असली नाम श्रीकंठ औदुंबर था। वे नीलकंठ औदुंबर और जतुकर्णी औदुंबर के पुत्र थे। उन्होंने ग्वालियर से लगभग 42 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में पद्मपवाया में अपनी शिक्षा प्राप्त की। दयाननिधि परमहंस को उनका गुरु माना जाता है। उन्होंने यमुना नदी के तट पर कालपी में अपने ऐतिहासिक नाटकों की रचना की। माना जाता है कि वे कन्नौज के राजा यशोवर्मन के दरबारी कवि थे। 12वीं सदी के इतिहासकार कल्हण ने उन्हें राजा के दल में शामिल किया है। 736 ई. में, राजा को कश्मीर के राजा ललितादित्य मुक्तपीड़ ने पराजित किया था।
Prem Aur Patthar
- Author Name:
Varsha Das
- Book Type:

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Description:
इस लघु-नाटक संकलन में वर्षा दास द्वारा किए गए चार कहानियों के नाट्य-रूपान्तरण हैं जिनमें उन्होंने कहानी के मूल मन्तव्य को बिना कोई हानि पहुँचाए उसे नाट्य-रूप दिया है। पहला नाटक डॉ. लोकनाथ भट्टाचार्य की बांग्ला कहानी ‘प्रेम ओ पाथर’ पर आधारित है। इसके केन्द्र में शिव की एक प्राचीन प्रस्तर-मूर्ति है जो कथा-नायक के लिए एक बड़े नैतिक निर्णय का आधार बनती है। वह उस मूर्ति की चोरी करनेवाले एक तथाकथित संस्कृति-प्रेमी द्वारा दी जानेवाली नौकरी को भी ठुकरा देता है और आगे हमेशा के लिए उससे सम्बन्ध समाप्त कर लेता है।
दूसरा नाटक लाभुबहन मेहता की गुजराती कहानी ‘बिन्दी’ पर आधारित है जिसमें एक युवती के आकस्मिक वैधव्य और फिर उसके जीवन के एक नए मोड़ की कहानी को रूपायित किया गया है। नाटक ‘मरा हुआ’ डॉ. लोकनाथ भट्टाचार्य की ही बांग्ला दिलचस्प नाटक है जिसमें एक कुत्ते की मौत और मनुष्यों से उसके सम्बन्ध को बहुत मनोरंजक ढंग से प्रकाश डाला गया है।
‘जेसल-तोरल’ एक गुजराती लोककथा पर आधारित नाटक है जिसमें एक किंवदन्ती के माध्यम से हमें एक नैतिक सबक मिलता है। कहानी एक लुटेरे की है जो अन्त में अपने किए पर पश्चात्ताप करता है और बदल जाता है।
Shadi Ka Album
- Author Name:
Girish Karnad
- Book Type:

- Description: गिरीश कारनाड के नाटकों में मन की तहें खुलती हैं। उनके पौराणिक कथा-सूत्रों पर आधारित नाटकों में पाठकों-दर्शकों ने मनुष्य की आदिम वृत्तियों, उसकी अकुंठ जिजीविषा, वासना, नैतिक वर्जनाओं में कुलबुलाते और उनके सच को उघाड़ते आत्म को अनेक रूपों में देखा है।यह उनका आधुनिक परिवेश में घटित नाटक है। इसमें इक्कीसवीं सदी के भारत की एकदम नई पीढ़ी और उसके पीछे अब भी खड़े पुराने भारत की छवियाँ हैं। इस लिहाज़ से इस नाटक में वह एक भिन्न आस्वाद की रचना करते हैं। लेकिन व्यक्ति के भीतर और बाहर तथा समाज के दैनिक व्यवहारों और नैतिक प्रतिज्ञाओं के बीच की फाँक को प्रकाशित करने की उनकी लेखकीय शपथ यहाँ भी उतनी ही तीव्र है।यह नाटक हमें बताता है कि अब भी हमारा जीवन दो समानान्तर यथार्थों के साथ ही सम्भव है, कि आज इंटरनेट और ग्लोबल गाँव के वातावरण में भी हम वह पारदर्शिता प्राप्त नहीं कर पाए जिसका सपना हमारा वास्तविक आत्म अपने सबसे स्वच्छ क्षणों में देखता है, और जिसका आकर्षक चित्रांकन हमारे सब धर्म और नीति-संहिताएँ करती हैं।कहानी एक परिवार की है जहाँ दो शादियाँ होनी हैं। किसी भी भारतीय परिवार में शादी के आसपास जैसा वातावरण होता है, उसे संवादों और दृश्यों के रूप में जिस तरह यहाँ गिरीश कारनाड ने रूपायित किया है, वह अद्भुत है और उसके साथ-साथ, परिवार के अतीत में बिंधी अब तक अनकही सच्चाइयों और भावी पीढ़ी के सुविधावादी समझौतों को जितने बारीक नश्तर से उकेरा है, वह भी।नाटक में कहीं भी ऐसे किसी दृश्य का आयोजन नहीं है जिसे मंच पर उतारना कठिन हो, और न ही कहीं इतना शिथिल कि पढ़नेवाला पढ़ता न चला जाए।
Sakharam Binder
- Author Name:
Vijay Tendulkar
- Book Type:

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Description:
सरोजिनी वर्मा द्वारा मराठी के प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंदुलकर की अत्यन्त विवादास्पद और बहुचर्चित कृति ‘सखाराम बाइंडर’ का सशक्त और प्राणवान अनुवाद, जिसने रंगमंच पर दाम्पत्य जीवन की गोपनीय नैतिकता का साहसपूर्ण ढंग से पर्दाफ़ाश किया है। सरकारी नियंत्रण को चुनौती देकर उच्चतम न्यायालय से लेखकीय अभिव्यक्ति के आधार पर मान्यता पानेवाला यह अपने ढंग का अकेला और अनूठा नाटक है।
‘सखाराम बाइंडर’ को इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि वह ग़लाज़त से भरी दिखावटी सम्भ्रान्तता को पहली बार इतने सक्षम ढंग से चुनौती देता है। रटे-रटाए मूल्यों को सखाराम ही नहीं, इस नाटक के सारे पात्र अपनी पात्रता की खोज में ध्वस्त करते चले जाते हैं। जिन नक़ली मूल्यों को हम अपने ऊपर आडम्बर की तरह थोपकर चिकने-चुपड़े बने रहना चाहते हैं, उसे सही-सही इस आईने में निर्ममता से उघड़ता हुआ देखते हैं। ‘सखाराम बाइंडर’ वही आईना है।
भाषा के स्तर पर सारे पात्र बड़ी खुली और ऐसी बाज़ारूपन से संयुक्त भाषा का प्रयोग करते हैं जिन्हें हमने अकेले-दुकेले कभी सुना ज़रूर होगा, किन्तु उसे अपने संस्कारिता का अंश मानने में सदैव कतराते रहे हैं।
पूरे नाटक में कथावस्तु की विलक्षणता न होते हुए भी पात्रों का आपसी संयोजन भाषा के जिस स्तर पर नाटककार ने किया है, वही नाटकीयता को उभारने में अद्भुत रूप से सफल हुआ है।
Rang Saptak
- Author Name:
Kavalam Narayana Panicker
- Book Type:

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Description:
‘रंग सप्तक’—पणिक्कर जी के बहुआयामी सात नाटकों का संकलन है। मान लीजिए उनके सात सुरों के समान सात मोतियों को एक धागे में पिरोकर, एक सरगम-धुन रूपी माला बनाने का प्रयास।
इसमें दो खंड हैं। खंड-1 में मूलत: संस्कृत के महान नाटकों के चयनित अंशों को आधार बनाकर पुनर्रचित नाट्यालेखों का समावेश किया गया है। इसकी पुनर्रचना में पणिक्कर जी और नाट्य-लेखक दोनों का सम्मिलित योगदान है। इस खंड में स्वप्नकथा, उत्तररामचरितम् एवं माया समाविष्ट हैं। खंड-2 में पणिक्कर जी के मौलिक, मलयालम में रचित नाटकों के हिन्दी अनुवादों का समावेश किया गया है। इसमें 'तैया-तैयम', 'कलिवेषम्', 'अपना-अपना कडम्बा' एवं 'स्थित है सूर्य' समाविष्ट हैं।
पणिक्कर जी के नाटकों में मिथकों, धार्मिक अनुष्ठानों, पारम्परिक एवं लोककथाओं और सामाजिक-राजनैतिक भूमिकाओं का पुनर्व्याख्यान, पुनरोद्धार एवं रूपान्तरण होता है, जो अपने वर्तमान को भूतकाल के माध्यम से खोजने का एक नितान्त मौलिक संसाधन बनता है। पणिक्कर जी इन भूमिकाओं का, परम्परा से लेकर आधुनिक विस्फोटक संक्रमणों पर सटीक टिप्पणी करने के लिए तत्पर रहते हैं। साथ ही वह इन भूमिकाओं के ज़रिए समाज में हो रही घटनाओं के बारे में प्रश्न उठाते हैं, जिसे विशिष्ट वातावरण में प्रस्तुत करके बहुआयामी नाट्यालोक (वैश्विक नाट्य) का परिचय देते हैं, किन्तु अन्तत: नैतिक उत्तर खोजने के लिए दर्शक को उत्प्रेरित कर देते हैं।
पणिक्कर जी की रंग-यात्रा कविता से रंगमंच तक और रंगमंच से कविता तक की एक अन्तर्यात्रा है। वह अपने नाटकों को सही मायने में दृश्यकाव्य के रूप में ढालते हैं। वे अपने गाँव के निजी अनुभवों को काव्यात्मक बनाकर, नाटक के माध्यम से विषयानुरूप दृश्यात्मकता प्रदान कर सौन्दर्यमूलक बनाते हैं। मान लो कि गाँव ही पूर्ण रूप से उनकी रंग-यात्रा का प्रमुख गोमुख है।
Anjo Didi
- Author Name:
Upendra Nath Ashk
- Book Type:

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Description:
अंजो दीदी मनोविकारों के घात-प्रतिघात और उनकी प्रतिक्रिया की कहानी है। कोई दैवी घटना वहाँ नहीं है, आकस्मिक रूप से बदलने वाली परिस्थितियाँ वहाँ नहीं हैं, जो जीवन को अँधेरे या उजेले मोड़ पर डाल देती हैं। उसकी कथा की प्रेरक शक्ति है—मनोविज्ञान, जो उस विशिष्ट परिवार की वास्तविक स्थिति से प्रभावित होकर निरन्तर विकसित होता जाता है और नाटकीय सूत्र को बढ़ाता जाता है। केवल व्यक्तियों और मान्यताओं के संघर्ष से वर्गीय यथार्थ की आत्मा जैसे मुखर हो उठी है और उनके रहन-सहन, अतिशय पाबन्दी, नियंत्रण और मशीनी-सोच की सारी विषमता साकार हो उठती है। तॉल्स्तॉय के उपन्यास ‘अन्ना कैरेनिना’ की प्रथम पंक्ति सहसा यहाँ याद हो आती है—“Happy families are all alike, every unhappy family is unhappy in its own way.”
सब तरह से सम्पन्न अंजो का परिवार इस तरह भी दुखी हो सकता है, यह सत्य अनायास ही उभरकर सामने आ जाता है।
इसी यथार्थ को अंजो की सनक और परिवार की ट्रैजिडी में गूँथकर अश्क जी ने निश्चय ही एक कलात्मक सिद्धि प्राप्त की है।
बीस वर्ष के लम्बे समय को इस निपुणता से बाँध लेना हिन्दी नाटकों के लिए सर्वथा नवीन अनुभव है। इतने बड़े काल-क्रम को बिना स्थान बदले मुखर कर देना अश्क जी की अद्वितीय उपलिब्ध है, जिसका श्रेय केवल उन्हीं को है। नाटक-रचना के इस नवीन प्रयोग के लिए हिन्दी का पाठक और दर्शक उनका ऋणी रहेगा।
—भूमिका से
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