Mahiyasi Mahadevi
(0)
Author:
Ganga Prasad PandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
350
280 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
पाण्डेय जी की इस कृति का महत्त्व मैं कई दृष्टियों से मानता हूँ। महादेवी साहित्य के सम्बन्ध में हिन्दी–पाठकों की रुचि अब पहले से कई गुना अधिक बढ़ चुकी है, पर उसके कुतूहल के उपशय की सामग्री हिन्दी में अभी प्राय: नहीं के बराबर पाई जाती है। महादेवी के काव्य और गीत साहित्य की व्याख्या अभी तक यदि किसी ने ढंग से की है तो वह केवल पाण्डेय जी ने ही। महादेवी जी की एक–एक कविता, एक–एक गीत केवल अपने–आप में अनमोल मोती नहीं है, वरन् वह एक–एक मोती अपने–आप में अनेक अनमोल मोतियों को छिपाए हैं। और उनमें से प्रत्येक मोती को मोती बनने में जिन अपार साधनाओं और बाधाओं का सामना करना पड़ा है, उनकी व्याख्या किसी भी हालत में सहज–साधारण नहीं है। किसी भी सीप की मोती बनने की प्रक्रिया साधारण नहीं होती, फिर महादेवी मानस के मोती तो साहित्य–संसार में दुर्लभतम और अमूल्य निधि हैं। उनकी प्रक्रिया और भी जटिल है कि उनके लिए केवल स्वाति–नक्षत्र की ही आवश्यकता नहीं है, वरन् स्वाति–नक्षत्र के भी कुछ विशिष्ट ही दुर्लभ क्षणों या सुदुर्लभ संयोग की अत्यन्त आवश्यकता है और वह एक–एक क्षण भी अपने भीतर अन्तर्जीवन की किन रहस्यानुभूतियों का अधियोग सँजोए है, इसका ठीक–ठीक हिसाब लगा सकना आज किसी विद्वत्तम साहित्यालोचकों के लिए भी सहज–सम्भव नहीं रह गया है। इसके लिए चाहिए अन्तरतम की निगूढ़तम अनुभूति और सहज तादात्म्य, जो केवल पाण्डेय जी जैसे आलोचकों में ही सम्भव पाया जा सकता है। अतएव इस ग्रन्थ के भावी समीक्षकों से मेरा नम्र निवेदन है कि यदि वे समीक्षा के पूर्व उपरोक्त सभी तथ्यों पर विशेष ध्यान दिए बिना समीक्षा करने बैठ जाएँगे तो कभी इस अमूल्य रचना के साथ न्याय नहीं कर पाएँगे। महादेवी जी की रचनाओं को आज एक बिलकुल ही नई दृष्टि से देखने व परखने की आवश्यकता आ पड़ी है। महादेवी जी जैसी कवयित्री का कोई उदाहरण विश्व–साहित्य के इतिहास के किसी भी युग में, किसी भी देश में शायद ही पाया गया है। उनके समान मौलिक चिन्तनशीलता और अछूती कल्पना का कोई उदाहरण कहीं भी सहज–सुलभ नहीं है, केवल भावना के क्षेत्र में ही उन्होंने निराली रसमयता का प्लावन नहीं बहाया है, वरन् वैचारिकता और चिन्तन के क्षेत्र में भी उनके समान प्रौढ़ और आत्मविश्वास–परायण नारी का जोड़ मिलना कठिन है। यह उपलब्धि केवल एक ही जन्म की साधना द्वारा सम्भव नहीं है, इसके लिए युग–युग की सांस्कृतिक चेतना के जन्म–जन्मान्तरीण विकास की अनिवार्य आवश्यकता है। पाण्डेय जी ने इसी कारण ‘सांस्कृतिक पृष्ठभूमि’ नाम से एक अलग अध्याय अपने गहन अध्ययन के फलस्वरूप इस ग्रन्थ में दिया है, जिसकी बहुत बड़ी आवश्यकता थी, साथ ही ‘महादेवी काव्य की पृष्ठभूमि’ शीर्षक से एक दूसरे महत्त्वपूर्ण अध्याय में उन्होंने महादेवी जी के सांस्कृतिक चेतना के विकास पर अतिरिक्त प्रकाश डालने का स्तुत्य प्रयास किया है। मुझे पूरा विश्वास है कि महादेवी साहित्य के अध्ययन के लिए जिस प्रकार की रचना के नितान्त अभाव का अनुभव पिछले कुछ दशकों में किया जा रहा था, उसकी पूर्ण पूर्ति इस ग्रन्थ द्वारा हो जाएगी। केवल इसी युग के साहित्य–श्रद्धेताओं के लिए नहीं, आनेवाली पीढ़ियों के लिए भी। यह ग्रन्थ वास्तव में पाण्डेय जी की महत्त्वाकांक्षा के अनुरूप ही तैयार हुआ है और हिन्दी आलोचना–क्षेत्र में यह निश्चय ही एक विशिष्ट स्थान प्राप्त करके रहेगा, ऐसा मेरा विश्वास है। —इलाचन्द्र जोशी
Read moreYou pay ₹999/Year
You will be auto-charged ₹999 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Prime Plus
Author-signed copy
25% off on all MRP of books
Book Recomendation Per Year
Delivery is free for the entire year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
पाण्डेय जी की इस कृति का महत्त्व मैं कई दृष्टियों से मानता हूँ। महादेवी साहित्य के सम्बन्ध में हिन्दी–पाठकों की रुचि अब पहले से कई गुना अधिक बढ़ चुकी है, पर उसके कुतूहल के उपशय की सामग्री हिन्दी में अभी प्राय: नहीं के बराबर पाई जाती है। महादेवी के काव्य और गीत साहित्य की व्याख्या अभी तक यदि किसी ने ढंग से की है तो वह केवल पाण्डेय जी ने ही। महादेवी जी की एक–एक कविता, एक–एक गीत केवल अपने–आप में अनमोल मोती नहीं है, वरन् वह एक–एक मोती अपने–आप में अनेक अनमोल मोतियों को छिपाए हैं। और उनमें से प्रत्येक मोती को मोती बनने में जिन अपार साधनाओं और बाधाओं का सामना करना पड़ा है, उनकी व्याख्या किसी भी हालत में सहज–साधारण नहीं है। किसी भी सीप की मोती बनने की प्रक्रिया साधारण नहीं होती, फिर महादेवी मानस के मोती तो साहित्य–संसार में दुर्लभतम और अमूल्य निधि हैं। उनकी प्रक्रिया और भी जटिल है कि उनके लिए केवल स्वाति–नक्षत्र की ही आवश्यकता नहीं है, वरन् स्वाति–नक्षत्र के भी कुछ विशिष्ट ही दुर्लभ क्षणों या सुदुर्लभ संयोग की अत्यन्त आवश्यकता है और वह एक–एक क्षण भी अपने भीतर अन्तर्जीवन की किन रहस्यानुभूतियों का अधियोग सँजोए है, इसका ठीक–ठीक हिसाब लगा सकना आज किसी विद्वत्तम साहित्यालोचकों के लिए भी सहज–सम्भव नहीं रह गया है। इसके लिए चाहिए अन्तरतम की निगूढ़तम अनुभूति और सहज तादात्म्य, जो केवल पाण्डेय जी जैसे आलोचकों में ही सम्भव पाया जा सकता है। अतएव इस ग्रन्थ के भावी समीक्षकों से मेरा नम्र निवेदन है कि यदि वे समीक्षा के पूर्व उपरोक्त सभी तथ्यों पर विशेष ध्यान दिए बिना समीक्षा करने बैठ जाएँगे तो कभी इस अमूल्य रचना के साथ न्याय नहीं कर पाएँगे।
महादेवी जी की रचनाओं को आज एक बिलकुल ही नई दृष्टि से देखने व परखने की आवश्यकता आ पड़ी है। महादेवी जी जैसी कवयित्री का कोई उदाहरण विश्व–साहित्य के इतिहास के किसी भी युग में, किसी भी देश में शायद ही पाया गया है। उनके समान मौलिक चिन्तनशीलता और अछूती कल्पना का कोई उदाहरण कहीं भी सहज–सुलभ नहीं है, केवल भावना के क्षेत्र में ही उन्होंने निराली रसमयता का प्लावन नहीं बहाया है, वरन् वैचारिकता और चिन्तन के क्षेत्र में भी उनके समान प्रौढ़ और आत्मविश्वास–परायण नारी का जोड़ मिलना कठिन है। यह उपलब्धि केवल एक ही जन्म की साधना द्वारा सम्भव नहीं है, इसके लिए युग–युग की सांस्कृतिक चेतना के जन्म–जन्मान्तरीण विकास की अनिवार्य आवश्यकता है। पाण्डेय जी ने इसी कारण ‘सांस्कृतिक पृष्ठभूमि’ नाम से एक अलग अध्याय अपने गहन अध्ययन के फलस्वरूप इस ग्रन्थ में दिया है, जिसकी बहुत बड़ी आवश्यकता थी, साथ ही ‘महादेवी काव्य की पृष्ठभूमि’ शीर्षक से एक दूसरे महत्त्वपूर्ण अध्याय में उन्होंने महादेवी जी के सांस्कृतिक चेतना के विकास पर अतिरिक्त प्रकाश डालने का स्तुत्य प्रयास किया है। मुझे पूरा विश्वास है कि महादेवी साहित्य के अध्ययन के लिए जिस प्रकार की रचना के नितान्त अभाव का अनुभव पिछले कुछ दशकों में किया जा रहा था, उसकी पूर्ण पूर्ति इस ग्रन्थ द्वारा हो जाएगी। केवल इसी युग के साहित्य–श्रद्धेताओं के लिए नहीं, आनेवाली पीढ़ियों के लिए भी।
यह ग्रन्थ वास्तव में पाण्डेय जी की महत्त्वाकांक्षा के अनुरूप ही तैयार हुआ है और हिन्दी आलोचना–क्षेत्र में यह निश्चय ही एक विशिष्ट स्थान प्राप्त करके रहेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
—इलाचन्द्र जोशी
Book Details
-
ISBN9788180312533
-
Pages352
-
Avg Reading Time12 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Mahapran Nirala
- Author Name:
Ganga Prasad Pandey
- Book Type:

- Description:
निराला हमारे उन कालजयी कवियों में से हैं जिनके जीवन और कृतित्व के बारे में जानने-समझने की हमारी जिज्ञासा लगातार बनी रहती है। 'महाप्राण निराला' बहुत पहले प्रकाशित हुई थी जिसमें महादेवी की प्रस्तावना है और स्वयं निराला की हस्तलिपि में उनकी एक टिप्पणी। पुस्तक में आत्मीय संस्मरण और आलोचना का मोहक और सार्थक समन्वय है। यह बरसों से अप्राप्य थी और हमें उसका पुनर्प्रकाशन करते हुए प्रसन्नता है कि उन पर पहली पुस्तकों में से एक हम फिर उपलब्ध करा पा रहे हैं। यह याद करना ज़रूरी है कि निराला को उनकी कठिन ज़िन्दगी और जटिल कविता को समझने की कोशिश हिन्दी आलोचना काफ़ी पहले से करती रही है।
—अशोक वाजपेयी
Upanyas Ki Pahchan : Maila Aanchal
- Author Name:
Gopal Ray
- Book Type:

- Description:
गोपाल राय द्वारा ‘उपन्यास की पहचान’ शृंखला में व्यावहारिक आलोचना को आधार बनाकर फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की अप्रतिम रचना ‘मैला आँचल’ को परखने की प्राथमिक कोशिश की गई है। कहते हैं कि ‘मैला आँचल’ के प्रकाशन के बाद हिन्दी में आंचलिक उपन्यासों का आन्दोलन-सा चल पड़ा। ऐसा नहीं है कि भारतीय ग्रामीण जीवन को केन्द्र रखकर उपन्यास न रचे गए हों; किन्तु आंचलिक उपान्यासालोचना का मानदंड रचने में ‘मैला आँचल’ की महत्ती भूमिका रही है। गोपाल राय ने ‘उपन्यास की पहचान’ शृंखला की कड़ी में इन्हीं तथ्यों का उद्घाटन करने के साथ, उपन्यास की व्यावहारिक आलोचना की सैद्धान्तिक पहचान का आधार ‘मैला आँचल’ के कथ्य और शिल्प में तराशने की समग्र कोशिश की है। यह पुस्तक आंचलिक उपन्यास की अवधारणा और हिन्दी उपन्यास की परम्परा को रेखांकित करने के साथ-साथ फणीश्वरनाथ रेणु की उपन्यास-यात्रा पर भी अपनी बात रखती है। ‘मैला आँचल’ के कथ्य, शिल्प, पात्र-योजना, भाषा आदि के रचनात्मक तत्त्वों पर प्राथमिक बयान दर्ज करती है। कह सकते हैं कि उपन्यास के रचनात्मक मानकों की व्यावहारिक परख करते हुए ‘मैला आँचल’ की पढ़त को यह पुस्तक नये आयाम प्रदान करेगी।
Ajneya Aur Unke Upanyas
- Author Name:
Gopal Ray
- Book Type:

- Description:
उपन्यास की रचना-प्रक्रिया तो सैद्धान्तिकी गढ़ती ही है लेकिन एक आलोचक का दायित्व होता है कि वह रचना को व्यावहारिक मनोभूमि पर परखे। गोपाल राय ने अज्ञेय के उपन्यासों को उपन्यास की सैद्धान्तिकी के आधार पर देखते हुए उसके विश्लेषण को व्यावहारिक धरातल पर उकेरा है। यह पुस्तक वस्तुत: अज्ञेय के उपन्यासों की व्याख्या के क्रम में एक आरम्भिक मूल्यांकन का प्रयास है। अज्ञेय का उपन्यास-संसार मूल रूप में ‘शेखर : एक जीवनी’ (भाग-एक 1940 एवं भाग-दो 1944), ‘नदी के द्वीप’ (1951) और ‘अपने-अपने अजनबी’ (1961) तक विस्तृत है। आलोचक गोपाल राय ने इन्हीं उपन्यासों की रचना-भूमि पर अपनी लेखनी चलाई है। इस पुस्तक में अज्ञेय की जीवनी-रेखा, रचना परिवेश, साहित्य सम्बन्धी विचार का परिचयात्मक मूल्यांकन करते हुए; अज्ञेय के औपन्यासिक-संसार की व्यावहारिक समीक्षा लिखी गई है। ‘हिन्दी उपन्यास साहित्य में अज्ञेय का स्थान’ शीर्षक अध्याय उपन्यासकार अज्ञेय के लिए मूल्यांकन के प्रतिमान बनाने का कार्य भी करता है। इस तरह यह पुस्तक अज्ञेय के उपन्यासों के रूप और वस्तु की संरचना पर मूल्यांकन की प्राथमिक पहल करती जान पड़ती है। आशा है कि गोपाल राय की यह आलोचना कृति रचनकार अज्ञेय और उनके उपन्यासों की पड़ताल में पाठकों के बीच एक सेतु-निर्माण का कार्य करेगी।
Aacharya Shukla Ka Itihas Padhte Huye
- Author Name:
Bachchan Singh +1
- Book Type:

- Description:
‘आचार्य शुक्ल का इतिहास पढ़ते हुए’ साहित्यालोचना की श्रेणी में एक अलग ढंग की पुस्तक है। हिन्दी साहित्य के मानक इतिहास के रूप में प्रतिष्ठित आचार्य शुक्ल की पुस्तक को ‘साहित्येतिहास-लेखन की अत्यन्त प्रौढ़ और प्रगतिशील विरासत’ मानते हुए डॉ. बच्चन सिंह यह भी कहते हैं कि अभी भी अनेक प्रश्न हैं जो उत्तर की माँग करते हैं, बहुत-से बिन्दु है जिन पर विचार किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि शुक्ल जी पहले व्यक्ति हैं जिनके हाथों हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए एक सुसंगत आधार और उसका पैटर्न तैयार हुआ। इसके लिए उन्होंने जो केन्द्रीय बिन्दु रखा, वह है ‘लोक प्रवृत्ति’, जिसे उन्होंने जनता की चित्तवृत्ति कहा। लेकिन वे इस तथ्य के प्रति भी सजग थे कि जिस चित्तवृत्ति का प्रतिफलन साहित्य में हुआ, उसका सरोकार शिक्षित जन से है। डॉ. बच्चन सिंह आचार्य शुक्ल के बाद आचार्य द्विवेदी के काम को ही उल्लेखनीय मानते हैं, इसलिए इस पुस्तक में दोनों ही विद्वानों के इतिहास-सम्बन्धी कामों पर अकसर साथ में बात करते हैं, जिससे पाठक के रूप में हम और भी लाभान्वित होते हैं। यह पुस्तक आचार्य शुक्ल लिखित इतिहास को पढ़ने के लिए वृहत्तर भूमि तैयार करती है, और अन्य उपलब्ध साहित्येतिहास-ग्रंथों का भी परिचय देती चलती है।
Upanyas Ki Pahchan : Divya
- Author Name:
Gopal Ray
- Book Type:

- Description:
यशपाल के उपन्यास ‘दिव्या’ का प्रकाशन 1945 में हुआ था। उपन्यास के प्रकाशन के साथ ही यह ऐतिहासिक कथानक का उपन्यास होने के कारण उसी रूप में अपनी पैठ बना रहा था। कई बार इसके कथ्य को ध्यान में रखते हुए इसे बौद्धकालीन उपन्यास कहा गया है। जैसा कि ऐतिहासिक उपन्यासों के साथ अक्सर होता है 'दिव्या' के साथ भी वही परम्परा चल पड़ी अर्थात् उपन्यास के कथानक को बौद्धकालीन प्रामाणिकता पर परखना आलोचकों ने समीचीन समझा। बहरहाल। गोपाल राय की ‘उपन्यास की पहचान’ शृंखला में ‘दिव्या’ पाँचवीं पुस्तक है। आलोचक ने अपने स्तर पर न केवल कथानक की समीचीनता की पड़ताल की है बल्कि ‘अतीत, इतिहास और उपन्यास’ पर एक अध्याय भी इस पुस्तक के आरम्भ में रख दिया है। मूलत: मूल रचनाओं की पड़ताल करते हुए आलोचक मूल पाठ की व्यावहारिक आलोचना को भी प्राथमिकता देते हैं। ‘दिव्या’ के मूल पाठ पर गोपाल राय ने इन्हीं कड़ियों को सूत्रबद्ध करने का कार्य किया है। जैसे कि ‘दिव्या’ का कथा-संसार और उसके मार्मिक प्रसंग, पात्र, ऐतिहासिकता की कसौटी, दिव्या में चित्रित समाज और भारतीय संस्कृति अस्मितामूलक नारी-विमर्श की झलक, शिल्प और भाषा आदि-आदि की रचनात्मकता के स्तर पर गोपाल राय ने उपन्यास को खँघालने का महत्ती कार्य पूरा किया है। अत: उक्त आयामों की विविधता में उपन्यास की दृष्टि से दिव्या का मूल्यांकन गोपाल राय का इस आलोचनात्मक पुस्तक में प्राथमिक ध्येय रहा है। इस कार्य में वे कितनी उत्कृष्टता प्राप्त कर पाए हैं यह इस पुस्तक के अध्ययन से स्पष्ट होगा। यह भी ज्ञान होगा कि पाठ्यक्रमों की सीमाओं को पार करते हुए कोई आलोच्य कृति कितनी समयानुकूल और प्रासंगिक ठहरती है।
Upanyas Ki Pahchan : Mahabhoj
- Author Name:
Gopal Ray
- Book Type:

- Description:
No Description
Sampoorn Rachnayen : Rahim
- Author Name:
Ramkishor Sharma +1
- Book Type:

- Description:
रहीम मध्यकाल के ऐसे विलक्षण कवि हैं, जिनके अनुभव बहुआयामी हैं। इन्होंने जीवन में वैभव, सम्पन्नता तथा प्रतिष्ठा प्राप्त की और विपन्नता, तिरस्कार तथा बर्बर व्यवहार की पीड़ा भी झेली। इन्होंने धर्मनीति, राजनीति तथा लोकनीति से सम्बन्धित अपने अनुभूत विचारों को छन्दबद्ध करके जन-साधारण को चमत्कृत कर दिया। तुलसीदास, कबीरदास आदि भक्तों की तरह यदि किसी की उक्ति सामान्य शिक्षित व्यक्ति के द्वारा समय-समय पर उद्धृत की जाती है तो वह है रहीम की नीति सम्बन्धी उक्ति का कथन। रहीम की रचनाओं को सही ढंग से समझने के लिये उनका सटीक संस्करण प्रस्तुत किया जा रहा है। इनमें उनकी हिन्दी, संस्कृत तथा ज्योतिष सम्बन्धित सभी रचनाओं को समाहित किया गया है। एक लम्बी भूमिका में उनकी रचना की विशेषताओं को उद्घाटित किया गया है। भारतीय सांस्कृतिक उदारता, आस्था, विश्वास तथा सहिष्णुता आदि रहीम को उसी आलोक में परखने की चेष्टा इस कृति की विशेषता है। पूर्ण विश्वास है कि प्रस्तुत ग्रन्थ रहीम की रचनाओं के मूल अभिप्राय को समझने में अध्येताओं, छात्रों तथा प्राध्यापकों के लिए उपयोगी होगा।
Bhartiya Sahityashatra
- Author Name:
Brahma Dutt Sharma +1
- Book Type:

- Description:
प्रस्तुत पुस्तक में डॉ. ब्रह्मदत्त शर्मा ने हिन्दी समीक्षा के मूल तक जाने का प्रयत्न किया है और अग्निपुराणकार, भरत, दंडी, आनन्दवर्द्धन, वामन, कुन्तक एवं क्षेमेन्द्र की मान्यताओं और मतों को बोधगम्य बनाने का प्रयास किया है। भारतीय चित्त एवं मानस में ये मान्यताएँ इतनी रची-बसी हैं कि सामान्य पाठक भी कविता पढ़ते समय स्वभावतः यह प्रश्न करता है कि कविता किस रस की है, इसमें कौन से अलंकार हैं, कौन-सी वक्रता है तथा उससे क्या व्यंजित हो रहा है। प्रस्तुत पुस्तक में सभी भारतीय सम्प्रदायों की मान्यताओं का विवेचन उपरोक्त प्रश्नों के सन्दर्भ में किया गया है। किस प्रकार का लेखन साहित्य है और उसकी क्या विशेषताएँ हैं? साहित्यकार किस प्रकार चमत्कारपूर्ण भाषा का प्रयोग कर अपनी अनुभूति को सार्वजनीन व सार्वकालिक बनाता है? किस प्रकार वह अपने भावावेगों का सम्प्रेषण कर उनका साधारणीकरण कर देता है? किस प्रकार अपने विषयों को चुनता है व उनमें अपनी अनुभूति का संचार करता है? उसे साहित्य रचना की प्रेरणा कहाँ से मिलती है तथा उसमें उसकी प्रतिभा का क्या योगदान है? काव्य-सृजन का हेतु एवं प्रयोजन क्या है? इन गम्भीर प्रश्नों का विवेचन भी सभी भारतीय साहित्य सम्प्रदायों के परिप्रेक्ष्य में इस पुस्तक में पाठकों को मिलेगा।
Kabeer aur Bhakti Andolan
- Author Name:
Gyantosh Kumar Jha
- Book Type:

- Description:
Criticism
Sun Mere Bandhu re
- Author Name:
Narayan Singh
- Book Type:

- Description:
'सुन मेरे बंधु रे' नारायण सिंह की नव्यतम कृति है। यहाँ उपस्थित अलग-अलग आलेख आपस में गुम्फित हैं, एक-दूसरे के साथ आबद्ध हैं। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है; क्योंकि लेखक किसी कहानी-उपन्यास में उपस्थित घटना, रंग-ढंग और दृष्टि को महज आलोचकीय दृष्टि से नहीं देख रहा, बल्कि तत्कालीन समय में उनकी उपस्थिति को, कहानी के पीछे मौजूद जीवन को भी देखना-दिखाना चाहता है। ये आलेख किसी कहानी, उपन्यास के ज़रिये शुरू तो होते हैं लेकिन उक्त कहानी उपन्यास या सिनेमा से बाहर आकर हमारी दृष्टि का आयतन विस्तारित करते मिलते हैं। एक दृष्टि सम्पन्न कथाकार अपने पूर्वज कथाकारों, सृजनशील व्यक्तित्वों के जीवन, उनके अन्तर्विरोध और मनुष्य के दुख को, सामाजिक विभेदकारी दृष्टि की जाँच-पड़ताल करते हुए उन मूल्यों को सामने लाने की कोशिश करता है जिन वजहों ने रचना को रचना बनाये रखा है। नारायण सिंह स्वयं एक कथाकार-उपन्यासकार हैं लेकिन यहाँ कथाकार अपने कथा प्रतिमान के आलोक में किसी रचना की व्याख्या नहीं करता, बल्कि रचना की केन्द्रीय समस्या को उठाते हुए सिंहावलोकन और विहंगावलोकन दोनों आयामों का भरपूर इस्तेमाल करता है। यह सिफत ही इन आलेखों को परंपरागत समीक्षकीय पद्धति से इतर पहचान लिये पाठकों से मुखातिब है। चेखव की कहानी के ज़रिये प्रेम को पुनर्परिभाषित करती बात हो या 'सुजाता' में उपस्थित अकुंठ प्रेम गीत में उपस्थित पुरुष बोध को सामने लाती आलोचकीय निगाह हो; हर जगह लेखक कलात्मकता, बुनावट और ध्वनि सौंदर्य के पीछे दबे जा रहे या दबाये जा रहे मनुष्य की पीड़ा से सहानुभूति प्रकट करता मिलता है। इसीलिए यहाँ उपस्थित रचनाओं का पाठ नये सिरे से पढ़े जाने की माँग करता मिलता है। —आशीष सिंह
Kavya-Pustak Samiksha Ka Swaroop
- Author Name:
Ramkishor Sharma +1
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Kahani Se Samwad
- Author Name:
Rashmi Rawat
- Book Type:

- Description:
कहानी से संवाद शास्त्रीय आलोचना नहीं है। जैसाकि नाम से ही ज़ाहिर है, यह कहानी के साथ चलते हुए, उससे बतियाने और उसे समझने की एक रचनात्मक प्रक्रिया है। रश्मि रावत रचना को उसकी समग्रता में देखती हैं, अपने समय और समाज के आलोड़न से उपजी एक जैविक इकाई के रूप में; जो उन मूल्यों को भी वहन करती है, जिन्हें रचनाकार जान रहा होता है, और उन चीजों को भी जो उसके अदेखे स्वयमेव रचना में आ जाती हैं, और कई बार लेखक की सचेत अभिव्यक्तियों से ज्यादा कुछ बता जाती हैं—कहानी के ही बारे में नहीं, लेखक के बारे में भी, और उस सामाजिक-नैतिक पर्यावरण के बारे में भी जिसमें उस रचना ने आकार लिया। यह आलोचना की उस परिपाटी से आगे जाना है जो दी गई कसौटियों पर कहानी या किसी भी रचना को विश्लेषित करके अपने काम को पूरा मान लेती है। इस पुस्तक में शामिल कथा-समीक्षाएँ, हर कहानी को पढ़ते हुए अपनी कुछ कसौटियाँ बनाती हैं; जिनकी जड़ें केवल साहित्य-चिन्तन में नहीं होतीं, बल्कि समाज और उन मूल्यों से जुड़ी चिन्ताओं में होती हैं, जिनकी खोज वे कहानी के घोषित उद्देश्यों के अलावा पात्रों की गठन, लेखकीय भाषा की बुनावट और उसके शब्द-चयन तक में करती हैं। यही वह विशेषता है जिसके चलते ये समीक्षाएँ सिर्फ सम्बद्ध कहानियों की समीक्षाएँ नहीं रह जातीं, बल्कि वृहत्तर पैमाने पर अपने समय, समाज और संस्कृति की समीक्षा हो जाती हैं।
Krantikari Kavi Nirala
- Author Name:
Bachchan Singh +1
- Book Type:

- Description:
‘क्रान्तिकारी कवि निराला’ हिन्दी के महाप्राण कवि निराला के काव्यगत विकास-क्रम को उनके वैयक्तिक संघर्ष के सन्दर्भ में देखते हुए उनके जीवन, तत्कालीन परिस्थितियों और उनकी कविता की विशिष्टताओं का विवेचन करती है। गौरतलब है कि यह पुस्तक उस समय लिखी गई थी, जब हिन्दी आलोचना में निराला के कृतित्व को लेकर कोई सुसंयोजित काम नहीं हुआ था। गिराला और उनके समय के साथ-साथ यह पुस्तक छायावाद तथा उससे पहले की काव्य-प्रवृत्तियों पर भी टिप्पणी करती चलती है, विशेषतया छायावाद पर। डॉ. बच्चन सिंह कहते हैं कि छायावादी काव्य-सर्जना का सम्बन्ध कवि की निजी प्रेरणा से रहा और यह पारम्परिक कवि-प्रतिभा से भिन्न चीज थी। छायावादी या रोमैंटिक कवि के लिए उसके रचनात्मक क्षणों का महत्त्व सर्वोपरि होता है। इसीलिए निराला की कविता को समझने के लिए भी उनके व्यक्ति को जानना जरूरी है। इसी से हम यह जान पाते हैं कि प्रगतिवादी नहीं होते हुए भी उनकी कविता इतनी प्रगतिपरक कैसे है, और प्रयोगवादी न होते हुए भी कविताओं में इतने रूपात्मक प्रयोग वे कैसे कर सके। निराला के परिचय से लेकर यह पुस्तक उनकी कविता के निर्णायक पड़ावों से होती हुई उनकी रचना-प्रक्रिया के विश्लेषण तक जाती है। संलग्न परिशिष्ट में संकलित ‘राम की शक्तिपूजा’ और निराला की अंतिम कविता की समीक्षा इसे और संग्रहणीय बना देती है। निराला और उनकी कविता को जानने-समझने के लिए इस पुस्तक का विशेष महत्व है।
Meghdoot : Ek Antaryatra
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
- Book Type:

- Description:
‘मेघदूत’ एक कालजयी कृति ही नहीं प्रेम, प्रकृति और निसर्ग के प्रति कालिदास की अनन्य प्रपत्ति भी है। अपने विशिष्ट स्वर, स्वरूप और न्यास में यह काव्य एक अप्रतिम एवं इन्द्रधनुषी भाव-वितान है, जिसमें कृतिकार की अपूर्व परिकल्पना, मौलिक उद्भावना तथा बिम्बों और वर्णों की जीवन्त छवियाँ सहज ही देखी जा सकती हैं। कालिदास ने अपनी यशस्वी कृति ‘मेघदूत’ के द्वारा जिस रूपक-राज्य का निर्माण किया था—पिछली दो सहस्राब्दियों से उसका निरन्तर विकास और विस्तार होता रहा है। विरही यक्ष के मनोजगत में विद्यमान एक आर्तप्रेमी के प्रणयोत्सुक प्रार्थी भाव को अनुषंग बनाकर—अपनी प्राण-प्रियतमा को भेजे जानेवाले विरहातुर सन्देश को कई रचनाकारों, भाष्यकारों और रूपान्तरकारों और चित्रकारों ने अपने-अपने ढंग से, अलग-अलग शैलियों में निरूपित किया है। प्रसंगानुरूप और प्रसंगान्तर परिदृश्य को अपने विरहकातर निवेदन से मुखर करनेवाली इस कालातीत रचना का अनुगायन और अनुकीर्तन न केवल सदियों से होता रहा है, बल्कि आधुनिक और समकालीन पीढ़ियाँ भी इसमें अपनी रचनात्मक भावांजलि लिए खड़ी रही हैं। अपनी सर्जनात्मक समग्रता के नाते और ‘क्लासिकी’ के गुणों से समृद्ध एवं समादृत ‘मेघदूत’ ने काव्य और काव्येतर माध्मयों के द्वारा सहृदय पाठकों, प्रेक्षकों, गायकों और समीक्षकों की क्षमता और आकांक्षाओं के अनुरूप सुदीर्घ रचना-प्रकिया एवं परम्परा को जीवित रखा है। इसी अनुक्रम में हिन्दी के सुपरिचित विद्वान, आलोचक, कवि एवं रचनाकार प्रभाकर श्रोत्रिय ने ‘मेघदूत’ के मार्मिक प्रसंगों, अछूते अनुषंगों—और सबसे बढ़कर—रचनाकार की विराट मनोभूमि का स्पर्श एवं अनुभावन अपनी विदग्ध रचना मनीषा के द्वारा किया है। ‘मेघदूत : एक अन्तर्यात्रा’ पुस्तक प्रेमी और प्रकृति के शाश्वत एवं चिरन्तन आधान को सुललित और सर्जनात्मक आयाम प्रदान करेगी—इसमें सन्देह नहीं।
Ghar Ka Bhedi
- Author Name:
Salman Akhtar
- Book Type:

- Description:
डॉक्टर सलमान अख़्तर के दादा मुज़्तर ख़ैराबादी, मामू मजाज़ लखनवी, वालिद जाँ निसार अख़्तर और भाई जावेद अख़्तर पर लिखे ये लेख साहित्यिक दुनिया में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। ‘घर का भेदी’ उर्दू शायरी की सोच-समझ और आलोचना की ऐसी पहली किताब है जिसमें लेखक ख़ुद अपने ख़ानदान के मशहूर और लोकप्रिय शोअरा के कलाम का विवेचन करता है और साथ ही उनके साहित्यिक ख़ज़ाने की तुलना तत्कालीन सम्माननीय शोअरा के साहित्य से भी करता है। बात की गहराई और बढ़ जाती है जब हमको ये पता चलता है कि इस किताब का लेखक न सिर्फ़ ख़ुद एक विश्वसनीय शायर और साहित्यकार है बल्कि अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त एक मनोवैज्ञानिक भी है। नतीजे के तौर पर ‘घर का भेदी’ किताब हमें कला के प्रतीकों और बिंबों से भी परिचित कराती है और उसमें निहित व्यक्तिगत पीड़ा और द्वंद्व से भी।
Kavita Mein Jantantra
- Author Name:
Apoorvanand
- Book Type:

- Description:
कविता स्वभावतः ही लोकतांत्रिक मूल्यों की पैरोकार होती है, वह उनकी तरफ़ हमारा ध्यान भी खींचती है, उनकी कमी को रेखांकित भी करती है, और कई बार नए मूल्यों, नई समझदारी, एक ज़्यादा महीन संवेदना की ओर भी लेकर जाती है। कविता उन परिस्थितियों की गहरी आलोचना भी करती है, जो व्यक्ति की, मनुष्य की स्वतंत्रता के विरुद्ध हैं, और इस तरह लोकतंत्र के भविष्य के लिए ख़तरा पैदा करती है। ‘कविता में जनतंत्र’ पुस्तक में कुछ कविताओं के पाठ के साथ भारतीय जनतंत्र की वर्तमान दशा और दिशा पर चिन्तन किया गया है, यह समझने की कोशिश की गई है कि एक देश और एक समाज के रूप में बहैसियत एक जनतंत्र हमने क्या खोया और क्या पाया है, और इस समय हम कहाँ हैं? ग़ौरतलब है कि इन टिप्पणियों की पृष्ठभूमि में 2024 का लोकसभा चुनाव है, यह वह समय था जब हम जनतंत्र और बहुमत को आमने-सामने खड़ा पा रहे थे; स्वतंत्रता और सर्वसमावेशी उदारता के पक्षधर आशंकित थे, और अल्पसंख्यक भयभीत। जिन कविताओं के बहाने यह गहन जनतंत्र-चर्चा संभव हुई है उनमें नागार्जुन, रघुवीर सहाय, धूमिल, श्रीकान्त वर्मा, विजयदेव नारायण साही, केदारनाथ सिंह, जैसे वरिष्ठों से लेकर अनुज लुगुन, अदनान कफ़ील दरवेश और जसिंता केरकेट्टा तक कई महत्त्वपूर्ण रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। अत्यन्त समीचीन यह पुस्तक कविता को पढ़ने की एक नई पद्धति तो हमें देती ही है, एक विचार, एक शासन-पद्धति और एक सम्भावना के रूप में जनतंत्र की परिभाषा, उसकी आधारभूत शर्तों, चुनौतियों और प्रतिबद्धताओं पर सोचना भी सिखाती है।
Shri Ramcharitmanas : Saptam Sopan Uttar Kand
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
- Book Type:

- Description:
Shri Ramcharitmanas : Saptam Sopan Uttar Kand Literary Criticism Ram Sahitya
Aatmkatha Ke Elake Mein
- Author Name:
Bharat Singh +1
- Book Type:

- Description:
बनारसीदास जैन ने 'अर्धकथा' (1641) में लिखा कि 'गर्भित कथा कहाँ हिय खोल।' छिपाए जानेवाले या कहें कि गोपन प्रसंगों को भी दिल खोलकर अथवा खुलकर बताना आत्मकथा को प्रसिद्धि दिलाता है, निवैयक्तिक बनाता है। आत्मकथा चर्चित विधा है और आत्मकथा- लेखन की एक समृद्ध परम्परा है, लेकिन यह आलोचना से परे विधा हो, ऐसा भी नहीं है। बाबू बनारसीदास चतुर्वेदी ने आत्मकथा लेखक की पात्रता का सवाल उठाया था। चतुर्वेदी जी ने 'जागरण' में यह सवाल उठाया था कि आत्मकथा किसे लिखनी चाहिए। भाव यह था कि आत्मकथा किसे नहीं लिखनी चाहिए। हालाँकि उनके द्वारा तय की गई शर्तों पर आगे लोगों ने आत्मकथा लिखी, ऐसा भी नहीं है। जब प्रेमचन्द ने 'हंस' का आत्मकथांक (1932) निकाला तो नन्ददुलारे वाजपेयी ने यह कहकर विरोध किया था कि इससे आत्म-विज्ञापन का भाव बढ़ेगा जो कि हिन्दी के हित में नहीं होगा।
लेखिकाओं की आत्मकथा में स्त्री-वेदना के विविध स्वर सुनाई पड़ते हैं। इनकी वेदना समस्त स्त्रियों को शोषण के खिलाफ विरोध की ताकत देती है। इन्होंने अपने आत्मकथा-साहित्य के द्वारा जहाँ स्त्री करुणा, शोक, वेदना, विवशता को व्यक्त किया वहीं उसे हिंसा, शोषण, अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने की शक्ति भी प्रदान की। इन्होंने स्त्री स्वतन्त्रता, समानता, सम्मान, सहभागिता इत्यादि जैसे प्रश्नों पर विचार करते हुए पितृसत्तात्मक व्यवस्था से स्त्री-मुक्ति की भी वकालत की।
आत्मकथाओं में अपने भीतर की यात्रा के जरिये बाहर का जो सफ़र तय होता है उसमें केवल अपनी दुनिया की ही बात नहीं होती है पूरा सामयिक सन्दर्भ आ जाना स्वाभाविक है। दलित आत्मकथाओं को आत्मकथात्मक उपन्यास यूँ ही नहीं कहा जाता है। जीवन का पूरा विस्तार है यथार्थ को देखने की एक नई दृष्टि के साथ ये आत्मकथाएँ हिन्दी साहित्य के मुख्य धारा के साहित्य की चेतना को झकझोरती हैं और उसकी चली आ रही परम्परा में एक तरह की वैचारिक हलचल पैदा करती हैं, दलित आत्मकथाएँ, साहित्य की दुनिया में निर्मित 'औदात्य' की धारणा को बदलकर रख देती हैं और जीवन के नए-नए मुहावरों के बीच अपने पाठकों को ले जाकर खड़ा करती हैं।
Aurat Ki Duniya
- Author Name:
Nasera Sharma
- Book Type:

- Description:
औरतों, अल्पसंख्यकों और देश-दुनिया के दमित-उत्पीड़ितों के पक्ष में हमेशा अपनी आवाज़ बुलन्द रखनेवाली कथाकार नासिरा शर्मा ने अपने सरोकारों और चिन्ताओं को अपनी कहानियों, उपन्यासों, निबन्धों और साक्षात्कारों में लगातार स्वर दिया है। यह उनके स्तम्भों का संकलन है जो उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर लिखे। स्त्री और उसकी सामाजिक-पारिवारिक स्थिति तो उनके चिन्तन में प्राथमिक रही ही है, पर्यावरण, साम्प्रदायिक सौहार्द, नए पुरुष और स्त्री के आपसी सम्बन्ध, पारिवारिक रिश्ते और हमारे आसपास का तेज़ी से बदलता हुआ परिवेश भी उनकी संवेदना के दायरे में रहा है। इस पुस्तक में संकलित स्तम्भ-लेखन में उन्होंने सम-सामयिक घटनाओं के हवाले से अनेक उन समस्याओं पर अपनी क़लम चलाई है जो समाज और इनसान के वर्तमान और भविष्य से, उसकी नियति से गहरे जुड़े हैं। उल्लेखनीय यह कि वे जो देखती हैं, जो लिखती हैं, उसमें अपनी स्त्री-दृष्टि को पहले रखती हैं। स्त्री, जिसका न सिर्फ़ दुनिया को देखने का तरीक़ा अलग है, बल्कि उसे बरतने और समझने का सलीका भी पुरुष के मुक़ाबले ज़्यादा मानवीय और करुणार्द्र है। इन आलेखों में उनकी यह विस्तृत और संवेदनशील दृष्टि साफ़ दिखाई देती है।
Mahadevi : Naya Mulyankan
- Author Name:
Ganpatichandra Gupt +1
- Book Type:

- Description:
प्रस्तुत पुस्तक में कवयित्री महादेवी के व्यक्तित्व, दर्शन, जीवन-दर्शन, काव्य-दर्शन, युग-बोध आदि का पहली बार गम्भीरता से विवेचन-विश्लेषण हुआ है। साथ ही महादेवी के काव्य के विभिन्न पक्षों पर भी गम्भीरता से विचार किया गया है। कवयित्री महादेवी के जीवनवृत्त एवं व्यक्तित्व, काव्य-दर्शन, दार्शनिक मान्यताएँ, जीवन-दर्शन, युग- बोध, छायावाद और महादेवी, रहस्यवाद और महादेवी काव्य में वेदना (दुःखवाद), काव्य में प्रकृति, काव्य का शैली पक्ष, काव्य रूप : गीति काव्य का मूल्यांकन, सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से, काव्यशास्त्रीय दृष्टि से, वैज्ञानिक दृष्टि से आदि कतिपय महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं का संकेत पुस्तक में मिलता है। वस्तुत: महादेवी काव्य पर लिखा गया एक सर्वश्रेष्ठ आलोचनात्मक एवं गवेशणात्मक ग्रन्थ है जिसमें महादेवी काव्य के सभी पक्षों पर पूरी गम्भीरता से विचार किया गया है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book