Mahadevi : Naya Mulyankan
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Author:
Ganpatichandra Gupt, Ganpati Chandra GuptaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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प्रस्तुत पुस्तक में कवयित्री महादेवी के व्यक्तित्व, दर्शन, जीवन-दर्शन, काव्य-दर्शन, युग-बोध आदि का पहली बार गम्भीरता से विवेचन-विश्लेषण हुआ है। साथ ही महादेवी के काव्य के विभिन्न पक्षों पर भी गम्भीरता से विचार किया गया है। कवयित्री महादेवी के जीवनवृत्त एवं व्यक्तित्व, काव्य-दर्शन, दार्शनिक मान्यताएँ, जीवन-दर्शन, युग- बोध, छायावाद और महादेवी, रहस्यवाद और महादेवी काव्य में वेदना (दुःखवाद), काव्य में प्रकृति, काव्य का शैली पक्ष, काव्य रूप : गीति काव्य का मूल्यांकन, सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से, काव्यशास्त्रीय दृष्टि से, वैज्ञानिक दृष्टि से आदि कतिपय महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं का संकेत पुस्तक में मिलता है। वस्तुत: महादेवी काव्य पर लिखा गया एक सर्वश्रेष्ठ आलोचनात्मक एवं गवेशणात्मक ग्रन्थ है जिसमें महादेवी काव्य के सभी पक्षों पर पूरी गम्भीरता से विचार किया गया है।
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प्रस्तुत पुस्तक में कवयित्री महादेवी के व्यक्तित्व, दर्शन, जीवन-दर्शन, काव्य-दर्शन, युग-बोध आदि का पहली बार गम्भीरता से विवेचन-विश्लेषण हुआ है। साथ ही महादेवी के काव्य के विभिन्न पक्षों पर भी गम्भीरता से विचार किया गया है। कवयित्री महादेवी के जीवनवृत्त एवं व्यक्तित्व, काव्य-दर्शन, दार्शनिक मान्यताएँ, जीवन-दर्शन, युग- बोध, छायावाद और महादेवी, रहस्यवाद और महादेवी काव्य में वेदना (दुःखवाद), काव्य में प्रकृति, काव्य का शैली पक्ष, काव्य रूप : गीति काव्य का मूल्यांकन, सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से, काव्यशास्त्रीय दृष्टि से, वैज्ञानिक दृष्टि से आदि कतिपय महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं का संकेत पुस्तक में मिलता है। वस्तुत: महादेवी काव्य पर लिखा गया एक सर्वश्रेष्ठ आलोचनात्मक एवं गवेशणात्मक ग्रन्थ है जिसमें महादेवी काव्य के सभी पक्षों पर पूरी गम्भीरता से विचार किया गया है।
Book Details
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ISBN9788119996254
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Pages348
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Avg Reading Time12 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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गुजराती आदि भारतीय भाषाएँ एक विस्तृत सेमिओटिक नेटवर्क अर्थात संकेतन-अनुबन्ध-व्यवस्था का अन्य-समतुल्य हिस्सा हैं। मूल बात ये है कि विशेष को मिटाए बिना सामान्य अथवा साधारण की रचना करने की, और तुल्यमूल्य संकेतकों से बुनी हुई एक संकेतन-व्यवस्था रचने की जो भारतीय क्षमता है, उसका जतन होता रहे। राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय राज्यसत्ता, उपभोक्तावाद को बढ़ावा देनेवाली, सम्मोहक वाग्मिता के छल पर टिकी हुई धनसत्ता एवं आत्ममुग्ध, असहिष्णु विविध विचारसरणियाँ/आइडियोलॉजीज़ की तंत्रात्मक सत्ता आदि परिबलों से शासित होने से भारतीय क्षमता को बचाते हुए उस का संवर्धन होता रहे। गुजराती से मेरे लेखों के हिन्दी अनुवाद करने का काम सरल तो था नहीं। गुजराती साहित्य की अपनी निरीक्षण परम्परा तथा सृजनात्मक लेखन की धारा बड़ी लम्बी है और उसी में से मेरी साहित्य तत्त्व-मीमांसा एवं कृतिनिष्ठ तथा तुलनात्मक आलोचना की परिभाषा निपजी है। उसी में मेरी सोच प्रतिष्ठित (एम्बेडेड) है। भारतीय साहित्य के गुजराती विवर्तों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने बिना मेरे लेखन का सही अनुवाद करना सम्भव नहीं है, मैं जानता हूँ। इसीलिए, इन लेखों का हिन्दी अनुवाद टिकाऊ स्नेह और बड़े कौशल्य से जिन्होंने किया है, उन अनुवादक सहृदयों का मैं गहरा ऋणी हूँ। ये पुस्तक पढ़नेवाले हिन्दीभाषी सहृदय पाठकों का सविनय धन्यवाद, जिनकी दृष्टि का जल मिलने से ही तो यह पन्ने पल्लवित होंगे। —सितांशु यशश्चन्द्र (प्रस्तावना से) ''हमारी परम्परा में गद्य को कवियों का निकष माना गया है। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम इधर सक्रिय भारतीय कवियों के गद्य के अनुवाद की एक सीरीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सीरीज़ में बाङ्ला के मूर्धन्य कवि शंख घोष के गद्य का संचयन दो खंडों में प्रकाशित हो चुका है। अब गुजराती कवि सितांशु यशश्चन्द्र के गद्य का हिन्दी अनुवाद दो जिल्दों में पेश है। पाठक पाएँगे कि सितांशु के कवि-चिन्तन का वितान गद्य में कितना व्यापक है—उसमें परम्परा, आधुनिकता, साहित्य के कई पक्षों से लेकर कुछ स्थानीयताओं पर कुशाग्रता और ताज़ेपन से सोचा गया है। हमें भरोसा है कि यह गद्य हिन्दी की अपनी आलोचना में कुछ नया जोड़ेगा।" —अशोक वाजपेयी
Premchand (Radha)
- Author Name:
Satyendra
- Book Type:

- Description:
उपन्यास सम्राट कहे जानेवाले प्रेमचन्द हमारी भाषा के कालजयी रचनाकार हैं और इनकी रचनाओं को क्लासिक का दर्जा प्राप्त है। जीवन में जनवादी, साहित्य में यथार्थवादी प्रेमचन्द ने जीवन को जैसा देखा वैसा ही उसे चित्रित किया। उन्होंने उपन्यासों के अतिरिक्त कहानियाँ, नाटक और लेख भी लिखे। उनकी रचनाओं में एक व्यावहारिक ढंग का समाजवाद हमें दिखाई पड़ता है। भारतीय पुनर्जागरण के महान लेखकों में वे ही ऐसे हैं, जो अपने सामाजिक निष्कर्षों में क्रान्तिकारी या वैज्ञानिक समाजवाद के सबसे समीप हैं। यह पुस्तक एक विशेष दृष्टि से तैयार की गई है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रेमचन्द की रचनाओं से सम्बन्धित गम्भीर, विचारोत्तेजक व अमूल्य सामग्रियों को इस उम्मीद के साथ एक जगह सुलभ कराया गया है कि पाठकों, अध्यापकों व शोधार्थियों को प्रेमचन्द के अध्ययन में विशेष सहायता मिलेगी। इसमें प्रेमचन्द के नारी-विषयक विचार, उनके पात्रों के चारित्रिक विकास, औपन्यासिक-कला के शिल्प-विधान, भाषा-शैली सम्बन्धी प्रयोगों के अध्ययन के अतिरिक्त प्रेमचन्द और तारा शंकर, प्रेमचन्द का नाट्य व कथा साहित्य तथा समस्यामूलक उपन्यास और प्रेमचन्द जैसे विषयों पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार किया गया है। आशा है कि प्रेमचन्द अध्येताओं के लिए यह पुस्तक उपयोगी व विचारोत्तेजक सिद्ध होगी।
Alochak Aur Alochana
- Author Name:
Bachchan Singh +1
- Book Type:

- Description:
पूर्व और पश्चिम के आलोचना सिद्धान्तों के बृहद् विवेचन के लिए ख्यात डॉ. बच्चन सिंह की यह कृति उनकी अपनी कुछ मूल्यवान स्थापनाओं के लिए भी पढ़ी जाती रही है। उनका मानना है कि पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्तों से हम अपनी समीक्षा-पद्धति का निर्माण नहीं कर सकते, लेकिन उनके सम्यक अध्ययन के बिना हम कुछ नवीन भी नहीं बना सकते। ‘आलोचक और आलोचना’ का उद्देश्य इसी अध्ययन को प्रस्तुत करना है। लेकिन केवल पश्चिमी सिद्धान्तों का अध्ययन नहीं, भारतीय आलोचना-पद्धतियों और अवधारणाओं का भी। वे आरम्भ में ही स्पष्ट करते हैं कि किसी भी रचना को आप बाह्य उपकरणों या फार्मूलों से नहीं समझ सकते, न ही ऐसा करना उपादेय होगा। न तो अलंकारों की गणना को आलोचना कह सकते हैं और न ही सूरदास को पुष्टिमार्गी सिद्ध करना आलोचना है। उनके मुताबिक अपने समय की मानव-स्थितियों के सन्दर्भ में भाषा-संरचना का विश्लेषण करना ही आलोचना का काम है। ऐसी ही आधारभूत मान्यताओं के साथ चलते हुए लेखक ने इस कृति में पश्चिम के प्लेटो, अरस्तू, लोंगिनुस, आई.ए. रिचर्ड्स, क्रोचे आदि के साथ अलंकार, रस, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि भारतीय आलोचना-सिद्धान्तों की सुग्राह्य विवेचना की है जो आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी व आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि के विश्लेषण तक जाती है। साहित्य के अध्येताओं और छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी।
Sanskritik Rashtravad : Hashiye Ka Samaj Aur Hindi Upanyas
- Author Name:
Rohini Aggarwal +1
- Book Type:

- Description:
‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : हाशिए का समाज और हिन्दी उपन्यास’ वरिष्ठ आलोचक रोहिणी अग्रवाल की महत्त्वपूर्ण पुस्तक है जहाँ इतिहास-चेतना, राजनीतिक-दृष्टि और सामाजिक प्रतिबद्धता को आलोचनात्मक विश्लेषण की अनिवार्य दृष्टि बनाकर सत्ता-संरचना की जटिलताओं से वैचारिक मुठभेड़ की गई है। इस प्रक्रिया में वे जिस वैचारिक सजगता के साथ मुख्यधारा बनाम हाशिया, वर्चस्व बनाम प्रतिरोध, दमन बनाम संघर्ष की अपरिहार्य द्वन्द्वात्मक टकराहट की बारीकियों को पकड़ती हैं, उतनी ही प्रखरता के साथ विचार एवं अस्तित्व की गतिशील निर्मितियों को समय की सांस्कृतिक विकास-यात्रा के प्रमुख पड़ावों की तरह परखती हैं। यही कारण है कि उनकी आलोचना-दृष्टि का वितान सभ्यता-समीक्षा के गहन नैतिक दायित्व का दृष्टान्त बन जाता है। हिन्दी व हिन्दीतर उपन्यासों के विखंडनपरक विश्लेषण के क्रम में यह पुस्तक किसानों, आदिवासियों, स्त्रियों, थर्ड जेंडर और झोंपड़पट्टी समाज के संघर्ष की विडम्बनात्मक ध्वनियों के समानान्तर सत्ता-संरचना के विविध उपकेन्द्रों की कूटनीतिक रणनीतियों को ही उजागर नहीं करती, साहित्य को सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का सक्रिय और जवाबदेह उपकरण भी बनाती है। इसलिए यहाँ उपन्यास कंटेंट के मालगोदाम की तरह नहीं, बल्कि एक समग्र वैचारिक कलाकृति की तरह विश्लेषित किये गए हैं। ‘पाठ’ के रूप में उभरते विश्लेषण को अर्थ-निर्माण की रचनात्मक प्रविधि का रूप देना, भाषा में बहुव्यंजक अर्थध्वनियों को भरना, और संवाद की सहभागिता में पाठक की सक्रियता को शामिल करना इसकी सबसे बड़ी ताकत है। ज़ाहिर है कि इस पुस्तक को पढ़ना हमारे समय की प्रश्नाकुल बेचैनियों को आलोचनात्मक विवेक के साथ जाँचना है।
Sanskritik Rashtravad : Hashiye Ka Samaj Aur Hindi Upanyas
Rohini Aggarwal
20% off₹ 499
₹ 399.2
Available
Soordas
- Author Name:
Nandkishore Naval +1
- Book Type:

- Description:
तुलसीदास पर पुस्तक लिखने के बाद हिन्दी के जाने-पहचाने ही नहीं, माने हुए आलोचक डॉ. नवल ने अन्तःप्रेरणा से सूरदास के पदों पर यह आस्वादनपरक पुस्तक लिखी है, जिसमें आवश्यक स्थानों पर अत्यन्त संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणियाँ भी हैं। उन्होंने कृष्ण और राधा की संकल्पना तथा वैष्णव भक्ति के उद्भव और विकास पर भी काफ़ी शोध किया, लेकिन पुस्तक की पठनीयता बरकरार रखने के लिए उससे प्राप्त तथ्यों का संकेत भूमिका में ही करके आगे बढ़ गए हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा सम्पादित ‘भ्रमरगीत सार’ की भूमिका उनकी आलोचना का उत्तमांश है, जिसमें उनकी शास्त्रज्ञता और रसज्ञता दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण हुआ है। लेकिन यह भी सही है कि उनकी लोकमंगल और कर्म-सौन्दर्य की कसौटी, जो उन्होंने ‘रामचरितमानस’ से प्राप्त की थी, सूर के लिए अपर्याप्त है। कारण यह कि उक्त दोनों ही शब्द बहुत व्यापक हैं, जिनका अभिलषित अर्थ ही आचार्य ने लिया है। तुलसी मूलतः प्रबन्धात्मक कवि थे और क्लासिकी, जबकि सूर आद्यन्त गीतात्मक और स्वच्छन्द, इसलिए पहले महाकवि के निकष पर दूसरे महाकवि को चढ़ाकर दूसरे के साथ न्याय नहीं किया जा सकता। डॉ. नवल प्रगीतात्मकता के सम्बन्ध में एडोर्नो की इस उक्ति के क़ायल हैं कि ‘प्रगीत-काव्य इतिहास की ‘दार्शनिक धूपघड़ी’ है।’ इस कारण उसकी छाया को उस तरह नहीं पकड़ा जा सकता, जिस तरह इतिवृत्तात्मक शैली में लिखनेवाले किसी कवि की कविता में हम यथार्थ को ठोस रूप में पकड़ लेते हैं। दूसरी बात यह कि उन्होंने सूर की कविता से सीधा साक्षात्कार किया है।
Chuppiyaan Aur Daraarein : Stree Aatmakatha : Paath Aur Saiddhantiki
- Author Name:
Garima Shrivastava
- Book Type:

- Description:
Literary Criticism on Feminism ‘चुप्पियाँ और दरारें’ भारत की अनेक भाषाओं में लिखी गई स्त्री आत्मकथाओं की न सिर्फ शिनाख्त करती है बल्कि इन आत्मकथाओं में विन्यस्त वैचारिकी का गहन विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है। यह न सिर्फ हिन्दी बल्कि किसी भी भारतीय भाषा में अभूतपूर्व कही जाएगी। एक सर्वथा अनूठी पुस्तक। - अशोक वाजपेयी ध्वनि प्रदूषण पर तो आज बहुत चर्चा होती है, लेकिन चुप्पी के प्रदूषण पर नहीं। सच यह है कि जाति, लिंग और धर्म की बंदिशों से घिरे अवर्ण समाज और स्त्रियों की आत्माभिव्यक्ति बहुत कम सामने आती है। इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक में गरिमा श्रीवास्तव ने यह तथ्य पहचाना है और चुप्पी की कारा तोड़ते हुए लिखी गई विभिन्न वर्गों और जातियों से निकली औरतों की आपबीती के मर्म को एक गम्भीर अन्तर्दृष्टि से परखा है। पठनीय और सरस। —मृणाल पांडेय गरिमा श्रीवास्तव की यह किताब ‘चुप्पियाँ और दरारें’ हमारा ध्यान स्त्री आत्मकथाओं की ओर ले जाती है, जहाँ मनुष्य जाति के स्त्री पक्ष के तनिक भिन्न अनुभव से हमारा साक्षात्कार होता है। यह स्त्रियों की अपनी अनुभूति है, उनकी अपनी आत्मस्वीकृतियाँ, पीड़ा और उल्लास है। कभी सिमोन द बोउआर ने ‘द सेकंड सेक्स’ के माध्यम से जेंडर का हाल सुनाया था, कुछ उसी अन्दाज में गरिमा श्रीवास्तव की यह किताब हमें भारतीय स्त्रियों की अनसुनी कहानी बताती है। निःसंदेह पठनीय और संग्रहणीय। —प्रेमकुमार मणि >गरिमा श्रीवास्तव की निगाह हिन्दी पर तो है ही, वे इस बहुभाषी, बहुधार्मिक, बहुजातीय और बहुसामुदायिक महादेश में हिन्दू, मुसलमान, दलित, सवर्ण, बांग्ला, मलयालम और कन्नड़ दायरों में स्त्री आत्मकथाओं के एक ऐसे बहुलतावादी संसार में प्रवेश करती हैं जिसका संधान अभी तक एक साथ एक जगह नहीं किया गया है। अश्वेत स्त्री-आत्मकथाओं पर उनका काम इस बृहद कृति में पाठकों को बोनस की तरह उपलब्ध है। —अभय कुमार दुबे
Chuppiyaan Aur Daraarein : Stree Aatmakatha : Paath Aur Saiddhantiki
Garima Shrivastava
20% off₹ 599
₹ 479.2
Available
Naya Sahitya, Nai Sambhavanayein
- Author Name:
Radhavallabh Tripathi
- Book Type:

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‘अज्ञेय अपनी विलक्षण मेधा के साथ पारम्परिक प्रज्ञा से संवाद और विसंवाद दोनों का सिलसिला रचते हैं। इसके द्वारा पुरानी अवधारणाएँ पुनरीक्षित और पुनःपरिभाषित भी हो जाती हैं।’ और, ‘शमशेर अमूर्त उपमा के जितने प्रकार अपनी कविता में रचते हैं, उतने अन्यत्र कम मिलते हैं। वे अमूर्त से मूर्त को उपमित करते हैं, मूर्त से अमूर्त को उपमित करते हैं, तो अमूर्त से अमूर्त को भी उपमित करते हैं।’ हिन्दी के दो विशिष्ट कवियों के विषय में ये टिप्पणियाँ हैं वरिष्ठ साहित्य-चिन्तक एवं संस्कृति-चेता राधावल्लभ त्रिपाठी की, जो ‘नया साहित्य, नई सम्भावनाएँ’ पुस्तक में संकलित आलेखों का हिस्सा हैं। इनके अलावा इस पुस्तक में धर्मवीर भारती, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, हरिशंकर परसाई, नामवर सिंह, अष्टभुजा शुक्ल, अनामिका और गगन गिल की पुस्तकों और उनके रचनात्मक आयामों पर विवेचनात्मक आलेख भी शामिल हैं। कुछ वे निबन्ध भी इस पुस्तक में संकलित हैं जिनमें वे विमर्श के ऐसे सैद्धान्तिक आधारों की तलाश करते हैं जो समकालीन रचनात्मकता के अनुशीलन के लिए आलोचना की भूमि बन सकें। राधावल्लभ त्रिपाठी हिन्दी के वर्तमान परिदृश्य में उपस्थित ऐसे कुछ आलोचक-चिन्तकों में से एक हैं जिनकी विवेचना हमें सोचने और बरतने के लिए एक समृद्ध भाषा देती है और भारतीय चिन्तन के लम्बे इतिहास में गढ़े गए सैद्धान्तिक उपकरणों से परिचित कराती है। उनके इधर के चिन्तन से उपजे इन निबन्धों से साहित्य के अध्येता और सर्जक, दोनों ही निस्सन्देह लाभान्वित होंगे।
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