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Shri Ramcharitmanas : Saptam Sopan Uttar Kand Literary Criticism Ram Sahitya
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About the Book
Shri Ramcharitmanas : Saptam Sopan Uttar Kand
Literary Criticism Ram Sahitya
Book Details
-
ISBN9789390625222
-
Pages209
-
Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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‘मेघदूत’ एक कालजयी कृति ही नहीं प्रेम, प्रकृति और निसर्ग के प्रति कालिदास की अनन्य प्रपत्ति भी है। अपने विशिष्ट स्वर, स्वरूप और न्यास में यह काव्य एक अप्रतिम एवं इन्द्रधनुषी भाव-वितान है, जिसमें कृतिकार की अपूर्व परिकल्पना, मौलिक उद्भावना तथा बिम्बों और वर्णों की जीवन्त छवियाँ सहज ही देखी जा सकती हैं। कालिदास ने अपनी यशस्वी कृति ‘मेघदूत’ के द्वारा जिस रूपक-राज्य का निर्माण किया था—पिछली दो सहस्राब्दियों से उसका निरन्तर विकास और विस्तार होता रहा है। विरही यक्ष के मनोजगत में विद्यमान एक आर्तप्रेमी के प्रणयोत्सुक प्रार्थी भाव को अनुषंग बनाकर—अपनी प्राण-प्रियतमा को भेजे जानेवाले विरहातुर सन्देश को कई रचनाकारों, भाष्यकारों और रूपान्तरकारों और चित्रकारों ने अपने-अपने ढंग से, अलग-अलग शैलियों में निरूपित किया है। प्रसंगानुरूप और प्रसंगान्तर परिदृश्य को अपने विरहकातर निवेदन से मुखर करनेवाली इस कालातीत रचना का अनुगायन और अनुकीर्तन न केवल सदियों से होता रहा है, बल्कि आधुनिक और समकालीन पीढ़ियाँ भी इसमें अपनी रचनात्मक भावांजलि लिए खड़ी रही हैं। अपनी सर्जनात्मक समग्रता के नाते और ‘क्लासिकी’ के गुणों से समृद्ध एवं समादृत ‘मेघदूत’ ने काव्य और काव्येतर माध्मयों के द्वारा सहृदय पाठकों, प्रेक्षकों, गायकों और समीक्षकों की क्षमता और आकांक्षाओं के अनुरूप सुदीर्घ रचना-प्रकिया एवं परम्परा को जीवित रखा है। इसी अनुक्रम में हिन्दी के सुपरिचित विद्वान, आलोचक, कवि एवं रचनाकार प्रभाकर श्रोत्रिय ने ‘मेघदूत’ के मार्मिक प्रसंगों, अछूते अनुषंगों—और सबसे बढ़कर—रचनाकार की विराट मनोभूमि का स्पर्श एवं अनुभावन अपनी विदग्ध रचना मनीषा के द्वारा किया है। ‘मेघदूत : एक अन्तर्यात्रा’ पुस्तक प्रेमी और प्रकृति के शाश्वत एवं चिरन्तन आधान को सुललित और सर्जनात्मक आयाम प्रदान करेगी—इसमें सन्देह नहीं।
Aurat Ki Duniya
- Author Name:
Nasera Sharma
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औरतों, अल्पसंख्यकों और देश-दुनिया के दमित-उत्पीड़ितों के पक्ष में हमेशा अपनी आवाज़ बुलन्द रखनेवाली कथाकार नासिरा शर्मा ने अपने सरोकारों और चिन्ताओं को अपनी कहानियों, उपन्यासों, निबन्धों और साक्षात्कारों में लगातार स्वर दिया है। यह उनके स्तम्भों का संकलन है जो उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर लिखे। स्त्री और उसकी सामाजिक-पारिवारिक स्थिति तो उनके चिन्तन में प्राथमिक रही ही है, पर्यावरण, साम्प्रदायिक सौहार्द, नए पुरुष और स्त्री के आपसी सम्बन्ध, पारिवारिक रिश्ते और हमारे आसपास का तेज़ी से बदलता हुआ परिवेश भी उनकी संवेदना के दायरे में रहा है। इस पुस्तक में संकलित स्तम्भ-लेखन में उन्होंने सम-सामयिक घटनाओं के हवाले से अनेक उन समस्याओं पर अपनी क़लम चलाई है जो समाज और इनसान के वर्तमान और भविष्य से, उसकी नियति से गहरे जुड़े हैं। उल्लेखनीय यह कि वे जो देखती हैं, जो लिखती हैं, उसमें अपनी स्त्री-दृष्टि को पहले रखती हैं। स्त्री, जिसका न सिर्फ़ दुनिया को देखने का तरीक़ा अलग है, बल्कि उसे बरतने और समझने का सलीका भी पुरुष के मुक़ाबले ज़्यादा मानवीय और करुणार्द्र है। इन आलेखों में उनकी यह विस्तृत और संवेदनशील दृष्टि साफ़ दिखाई देती है।
Chandrakanta (Santati) Ka Tilism
- Author Name:
Wagish Shukla
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कई बार क्लैसिक कृतियाँ भी आलोचनात्मक ध्यान में गहनता से नहीं आतीं, भले उनकी लोकप्रियता व्यापक और असंदिग्ध हो। 'चन्द्रकान्ता’ और 'चन्द्रकान्ता सन्तति’ ऐसे ही क्लैसिक हैं जिन पर आलोचना और अनुसन्धान का ध्यान ख़ासी देर से, लगभग बीसवीं शताब्दी के अन्त पर, गया। गहरे विद्वान् और अनूठे आलोचक वागीश शुक्ल ने इस छोटी-सी पुस्तक में अध्यवसाय और सूक्ष्मता से इन दो कृतियों का विश्लेषण और आकलन किया है। रज़ा फ़ाउंडेशन उनकी 'मनमानी बातों’ को पुस्तकाकार प्रस्तुत करते हुए आश्वस्त है कि अब योग्य विचार और विश्लेषण की शुरुआत हो रही है। —अशोक वाजपेयी
Ghar Ka Bhedi
- Author Name:
Salman Akhtar
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डॉक्टर सलमान अख़्तर के दादा मुज़्तर ख़ैराबादी, मामू मजाज़ लखनवी, वालिद जाँ निसार अख़्तर और भाई जावेद अख़्तर पर लिखे ये लेख साहित्यिक दुनिया में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। ‘घर का भेदी’ उर्दू शायरी की सोच-समझ और आलोचना की ऐसी पहली किताब है जिसमें लेखक ख़ुद अपने ख़ानदान के मशहूर और लोकप्रिय शोअरा के कलाम का विवेचन करता है और साथ ही उनके साहित्यिक ख़ज़ाने की तुलना तत्कालीन सम्माननीय शोअरा के साहित्य से भी करता है। बात की गहराई और बढ़ जाती है जब हमको ये पता चलता है कि इस किताब का लेखक न सिर्फ़ ख़ुद एक विश्वसनीय शायर और साहित्यकार है बल्कि अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त एक मनोवैज्ञानिक भी है। नतीजे के तौर पर ‘घर का भेदी’ किताब हमें कला के प्रतीकों और बिंबों से भी परिचित कराती है और उसमें निहित व्यक्तिगत पीड़ा और द्वंद्व से भी।
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