Sampoorn Rachnayen : Rahim
(0)
Author:
Ramkishor SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
325
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रहीम मध्यकाल के ऐसे विलक्षण कवि हैं, जिनके अनुभव बहुआयामी हैं। इन्होंने जीवन में वैभव, सम्पन्नता तथा प्रतिष्ठा प्राप्त की और विपन्नता, तिरस्कार तथा बर्बर व्यवहार की पीड़ा भी झेली। इन्होंने धर्मनीति, राजनीति तथा लोकनीति से सम्बन्धित अपने अनुभूत विचारों को छन्दबद्ध करके जन-साधारण को चमत्कृत कर दिया। तुलसीदास, कबीरदास आदि भक्तों की तरह यदि किसी की उक्ति सामान्य शिक्षित व्यक्ति के द्वारा समय-समय पर उद्धृत की जाती है तो वह है रहीम की नीति सम्बन्धी उक्ति का कथन। रहीम की रचनाओं को सही ढंग से समझने के लिये उनका सटीक संस्करण प्रस्तुत किया जा रहा है। इनमें उनकी हिन्दी, संस्कृत तथा ज्योतिष सम्बन्धित सभी रचनाओं को समाहित किया गया है। एक लम्बी भूमिका में उनकी रचना की विशेषताओं को उद्घाटित किया गया है। भारतीय सांस्कृतिक उदारता, आस्था, विश्वास तथा सहिष्णुता आदि रहीम को उसी आलोक में परखने की चेष्टा इस कृति की विशेषता है। पूर्ण विश्वास है कि प्रस्तुत ग्रन्थ रहीम की रचनाओं के मूल अभिप्राय को समझने में अध्येताओं, छात्रों तथा प्राध्यापकों के लिए उपयोगी होगा।
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रहीम मध्यकाल के ऐसे विलक्षण कवि हैं, जिनके अनुभव बहुआयामी हैं। इन्होंने जीवन में वैभव, सम्पन्नता तथा प्रतिष्ठा प्राप्त की और विपन्नता, तिरस्कार तथा बर्बर व्यवहार की पीड़ा भी झेली। इन्होंने धर्मनीति, राजनीति तथा लोकनीति से सम्बन्धित अपने अनुभूत विचारों को छन्दबद्ध करके जन-साधारण को चमत्कृत कर दिया।
तुलसीदास, कबीरदास आदि भक्तों की तरह यदि किसी की उक्ति सामान्य शिक्षित व्यक्ति के द्वारा समय-समय पर उद्धृत की जाती है तो वह है रहीम की नीति सम्बन्धी उक्ति का कथन। रहीम की रचनाओं को सही ढंग से समझने के लिये उनका सटीक संस्करण प्रस्तुत किया जा रहा है। इनमें उनकी हिन्दी, संस्कृत तथा ज्योतिष सम्बन्धित सभी रचनाओं को समाहित किया गया है। एक लम्बी भूमिका में उनकी रचना की विशेषताओं को उद्घाटित किया गया है। भारतीय सांस्कृतिक उदारता, आस्था, विश्वास तथा सहिष्णुता आदि रहीम को उसी आलोक में परखने की चेष्टा इस कृति की विशेषता है।
पूर्ण विश्वास है कि प्रस्तुत ग्रन्थ रहीम की रचनाओं के मूल अभिप्राय को समझने में अध्येताओं, छात्रों तथा प्राध्यापकों के लिए उपयोगी होगा।
Book Details
-
ISBN9789349180444
-
Pages270
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Literary Criticism on Feminism ‘चुप्पियाँ और दरारें’ भारत की अनेक भाषाओं में लिखी गई स्त्री आत्मकथाओं की न सिर्फ शिनाख्त करती है बल्कि इन आत्मकथाओं में विन्यस्त वैचारिकी का गहन विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है। यह न सिर्फ हिन्दी बल्कि किसी भी भारतीय भाषा में अभूतपूर्व कही जाएगी। एक सर्वथा अनूठी पुस्तक। - अशोक वाजपेयी ध्वनि प्रदूषण पर तो आज बहुत चर्चा होती है, लेकिन चुप्पी के प्रदूषण पर नहीं। सच यह है कि जाति, लिंग और धर्म की बंदिशों से घिरे अवर्ण समाज और स्त्रियों की आत्माभिव्यक्ति बहुत कम सामने आती है। इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक में गरिमा श्रीवास्तव ने यह तथ्य पहचाना है और चुप्पी की कारा तोड़ते हुए लिखी गई विभिन्न वर्गों और जातियों से निकली औरतों की आपबीती के मर्म को एक गम्भीर अन्तर्दृष्टि से परखा है। पठनीय और सरस। —मृणाल पांडेय गरिमा श्रीवास्तव की यह किताब ‘चुप्पियाँ और दरारें’ हमारा ध्यान स्त्री आत्मकथाओं की ओर ले जाती है, जहाँ मनुष्य जाति के स्त्री पक्ष के तनिक भिन्न अनुभव से हमारा साक्षात्कार होता है। यह स्त्रियों की अपनी अनुभूति है, उनकी अपनी आत्मस्वीकृतियाँ, पीड़ा और उल्लास है। कभी सिमोन द बोउआर ने ‘द सेकंड सेक्स’ के माध्यम से जेंडर का हाल सुनाया था, कुछ उसी अन्दाज में गरिमा श्रीवास्तव की यह किताब हमें भारतीय स्त्रियों की अनसुनी कहानी बताती है। निःसंदेह पठनीय और संग्रहणीय। —प्रेमकुमार मणि >गरिमा श्रीवास्तव की निगाह हिन्दी पर तो है ही, वे इस बहुभाषी, बहुधार्मिक, बहुजातीय और बहुसामुदायिक महादेश में हिन्दू, मुसलमान, दलित, सवर्ण, बांग्ला, मलयालम और कन्नड़ दायरों में स्त्री आत्मकथाओं के एक ऐसे बहुलतावादी संसार में प्रवेश करती हैं जिसका संधान अभी तक एक साथ एक जगह नहीं किया गया है। अश्वेत स्त्री-आत्मकथाओं पर उनका काम इस बृहद कृति में पाठकों को बोनस की तरह उपलब्ध है। —अभय कुमार दुबे
Chuppiyaan Aur Daraarein : Stree Aatmakatha : Paath Aur Saiddhantiki
Garima Shrivastava
20% off₹ 599
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Namvar Sanchayita
- Author Name:
Namvar Singh
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यह है हिन्दी के ख्यातिप्राप्त आलोचक डॉ. नामवर सिंह के आलोचनात्मक लेखन का उत्तमांश। नामवर जी हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचक के रूप में स्वीकृत हैं, लेकिन मूलत: वे एक लोकवादी आलोचक हैं। जिस ‘लोक’ को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने काव्य के प्रतिमान के रूप में व्यवहृत किया था और जिसे आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने क्रान्तिकारी अर्थ प्रदान किया, उसे वे मार्क्सवाद की सहायता से ‘वर्ग’ तक ले गए हैं। लेकिन यह उनकी बहुत बड़ी विशेषता है कि उन्होंने मार्क्सवाद को विदेशी, संकीर्ण और रूढ़िबद्ध विचार प्रणाली के रूप में ग्रहण नहीं किया है। सच्चाई तो यह है कि साहित्य के नए मूल्य के लिए उन्होंने प्रत्येक मोड़ पर लोक की तरफ़ देखा है। अकारण नहीं कि हिन्दी में वे साहित्य की दूसरी परम्परा के अन्वेषक हैं, जो उस लोक की परम्परा है, जो असंगतियों और अन्तर्विरोधों का पुंज होते हुए भी विद्रोह की भावना से युक्त होता है। नामवर जी की आलोचना हिन्दी में ग़ैर-अकादमिक आलोचना का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। ‘कहानी : नई कहानी’ में उन्होंने व्यक्तिगत निबन्ध की शैली में आलोचना लिखी, जिसमें बात से बात निकलती चलती है और अत्यन्त सार्थक। ‘कविता के नए प्रतिमान’ उनके विलक्षण परम्परा–बोध, गहन विश्लेषण और पारदर्शी अभिव्यक्ति का स्मारक है। इसी तरह ‘दूसरी परम्परा की खोज’ में उन्होंने ऐसी आलोचना प्रस्तुत की है, जो एक तरफ़ अतिशय ज्ञानात्मक है और दूसरी तरफ़ अतिशय संवेदनात्मक। यह सर्जनात्मकता आचार्य द्विवेदी के साहित्य से उनके निजी लगाव के कारण सम्भव हुआ है। नामवर जी की पचहत्तरवीं वर्षगाँठ पर प्रकाशित यह संचयिता महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की ओर से हिन्दी जगत् को दिया गया एक उपहार है, जो उसे पिछली शती के उत्तरार्ध के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी आलोचक के अवदान से परिचित कराएगा।
Kahani Se Samwad
- Author Name:
Rashmi Rawat
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कहानी से संवाद शास्त्रीय आलोचना नहीं है। जैसाकि नाम से ही ज़ाहिर है, यह कहानी के साथ चलते हुए, उससे बतियाने और उसे समझने की एक रचनात्मक प्रक्रिया है। रश्मि रावत रचना को उसकी समग्रता में देखती हैं, अपने समय और समाज के आलोड़न से उपजी एक जैविक इकाई के रूप में; जो उन मूल्यों को भी वहन करती है, जिन्हें रचनाकार जान रहा होता है, और उन चीजों को भी जो उसके अदेखे स्वयमेव रचना में आ जाती हैं, और कई बार लेखक की सचेत अभिव्यक्तियों से ज्यादा कुछ बता जाती हैं—कहानी के ही बारे में नहीं, लेखक के बारे में भी, और उस सामाजिक-नैतिक पर्यावरण के बारे में भी जिसमें उस रचना ने आकार लिया। यह आलोचना की उस परिपाटी से आगे जाना है जो दी गई कसौटियों पर कहानी या किसी भी रचना को विश्लेषित करके अपने काम को पूरा मान लेती है। इस पुस्तक में शामिल कथा-समीक्षाएँ, हर कहानी को पढ़ते हुए अपनी कुछ कसौटियाँ बनाती हैं; जिनकी जड़ें केवल साहित्य-चिन्तन में नहीं होतीं, बल्कि समाज और उन मूल्यों से जुड़ी चिन्ताओं में होती हैं, जिनकी खोज वे कहानी के घोषित उद्देश्यों के अलावा पात्रों की गठन, लेखकीय भाषा की बुनावट और उसके शब्द-चयन तक में करती हैं। यही वह विशेषता है जिसके चलते ये समीक्षाएँ सिर्फ सम्बद्ध कहानियों की समीक्षाएँ नहीं रह जातीं, बल्कि वृहत्तर पैमाने पर अपने समय, समाज और संस्कृति की समीक्षा हो जाती हैं।
Chandrakanta (Santati) Ka Tilism
- Author Name:
Wagish Shukla
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कई बार क्लैसिक कृतियाँ भी आलोचनात्मक ध्यान में गहनता से नहीं आतीं, भले उनकी लोकप्रियता व्यापक और असंदिग्ध हो। 'चन्द्रकान्ता’ और 'चन्द्रकान्ता सन्तति’ ऐसे ही क्लैसिक हैं जिन पर आलोचना और अनुसन्धान का ध्यान ख़ासी देर से, लगभग बीसवीं शताब्दी के अन्त पर, गया। गहरे विद्वान् और अनूठे आलोचक वागीश शुक्ल ने इस छोटी-सी पुस्तक में अध्यवसाय और सूक्ष्मता से इन दो कृतियों का विश्लेषण और आकलन किया है। रज़ा फ़ाउंडेशन उनकी 'मनमानी बातों’ को पुस्तकाकार प्रस्तुत करते हुए आश्वस्त है कि अब योग्य विचार और विश्लेषण की शुरुआत हो रही है। —अशोक वाजपेयी
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