Bharatiya Bhakti-Chetna

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भारतीय भक्ति-चेतना के सम्बन्ध में उपनिवेशकालीन पश्चिमी ज्ञानमीमांसा और उसके वर्चस्व में पली-बढ़ी आरम्भिक भारतीय मनीषा ने यह मान लिया है कि यह ईसाइयत और इस्लाम से सम्पर्क की देन है, यह यूरोपीय ‘रेनेसाँ’ के समान ‘बिजली की कौंध’ की तरह प्रकट हुई, इसमें एकरूपता और संगति नहीं है, इसके सरोकार और चिन्ताएँ पारलौकिक हैं, यह अपने चरित्र में एकवचन है और इसकी रचनाएँ श्रुत और स्मृत हैं, इसलिए अप्रामाणिक हैं। ‘भारतीय भक्ति-चेतना’ पुस्तक विमर्श में लगभग मान्य हो गईं इन धारणाओं का पुनरावलोकन है। भारत में भक्ति प्राग्वैदिककाल से निरन्तर है और इसमें कभी कोई व्यवधान और विच्छेद नहीं हुआ। यह कोई आन्दोलन, जागरण और पुनर्जागरण नहीं है, जैसा कि मान लिया गया है। इस्लाम और ईसाई धर्म से यह प्रभावित हुई, लेकिन यह उनके कारण पैदा हुई, यह धारणा निराधार है। रामानुजाचार्य ने भक्ति को सैद्धान्तिक आधार दिया, लेकिन उनसे पहले इसकी मौजूदगी आलवारों और नायनारों की रचनाओं में सदियों से थी। यह सही है कि भक्ति और उसके साहित्य में लोकोत्तर की चिन्ता है, लेकिन यह लोकोत्तर पार्थिव का ही विस्तार है। देशभाषाओं में भक्ति का होना भारतीय साहित्य के इतिहास की बड़ी परिघटना है। देशभाषाओं में आने से पहले भक्ति की नागरिकता सीमित थी, लेकिन अब इसका दायरा बहुत बढ़ गया। यह भी सही है कि इन रचनाओं में इस-उस ज़रूरत और आग्रह से उलट-फेर और रद्दोबदल हुए हैं, जिनको कुछ विद्वान ‘एप्रोप्रिएशन’ कहते हैं। यह प्रक्रिया असाधारण नहीं है—यह किसी भी जीवन्त और गतिशील समाज में चलने वाली स्वाभाविक प्रक्रिया है। भक्ति-चेतना और उसका अधिकांश साहित्य स्वतंत्रचेता सन्त-भक्तों का साहित्य है, इसलिए यह अपनी प्रकृति में ही बहुवचन है। अधिकांश भक्ति-चेतना का साहित्य ‘श्रुत’ और ‘स्मृत’ पर निर्भर है, लेकिन इस कारण यह अप्रामाणिक या सन्दिग्ध नहीं हो जाता। भारतीय भक्ति-चेतना और उसके साहित्य की पहचान सदियों के सुनियोजित और निरन्तर झूठ में कहीं खो गई है। यह किताब उस तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करने में सहायक सिद्ध होगी, ऐसी आशा है।

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ISBN
9789377372439
Pages
208
Avg Reading Time
7 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

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भारतीय भक्ति-चेतना के सम्बन्ध में उपनिवेशकालीन पश्चिमी ज्ञानमीमांसा और उसके वर्चस्व में पली-बढ़ी आरम्भिक भारतीय मनीषा ने यह मान लिया है कि यह ईसाइयत और इस्लाम से सम्पर्क की देन है, यह यूरोपीय ‘रेनेसाँ’ के समान ‘बिजली की कौंध’ की तरह प्रकट हुई, इसमें एकरूपता और संगति नहीं है, इसके सरोकार और चिन्ताएँ पारलौकिक हैं, यह अपने चरित्र में एकवचन है और इसकी रचनाएँ श्रुत और स्मृत हैं, इसलिए अप्रामाणिक हैं। ‘भारतीय भक्ति-चेतना’ पुस्तक विमर्श में लगभग मान्य हो गईं इन धारणाओं का पुनरावलोकन है।
भारत में भक्ति प्राग्वैदिककाल से निरन्तर है और इसमें कभी कोई व्यवधान और विच्छेद नहीं हुआ। यह कोई आन्दोलन, जागरण और पुनर्जागरण नहीं है, जैसा कि मान लिया गया है। इस्लाम और ईसाई धर्म से यह प्रभावित हुई, लेकिन यह उनके कारण पैदा हुई, यह धारणा निराधार है। रामानुजाचार्य ने भक्ति को सैद्धान्तिक आधार दिया, लेकिन उनसे पहले इसकी मौजूदगी आलवारों और नायनारों की रचनाओं में सदियों से थी। यह सही है कि भक्ति और उसके साहित्य में लोकोत्तर की चिन्ता है, लेकिन यह लोकोत्तर पार्थिव का ही विस्तार है। देशभाषाओं में भक्ति का होना भारतीय साहित्य के इतिहास की बड़ी परिघटना है। देशभाषाओं में आने से पहले भक्ति की नागरिकता सीमित थी, लेकिन अब इसका दायरा बहुत बढ़ गया। यह भी सही है कि इन रचनाओं में इस-उस ज़रूरत और आग्रह से उलट-फेर और रद्दोबदल हुए हैं, जिनको कुछ विद्वान ‘एप्रोप्रिएशन’ कहते हैं। यह प्रक्रिया असाधारण नहीं है—यह किसी भी जीवन्त और गतिशील समाज में चलने वाली स्वाभाविक प्रक्रिया है। भक्ति-चेतना और उसका अधिकांश साहित्य स्वतंत्रचेता सन्त-भक्तों का साहित्य है, इसलिए यह अपनी प्रकृति में ही बहुवचन है। अधिकांश भक्ति-चेतना का साहित्य ‘श्रुत’ और ‘स्मृत’ पर निर्भर है, लेकिन इस कारण यह अप्रामाणिक या सन्दिग्ध नहीं हो जाता।
भारतीय भक्ति-चेतना और उसके साहित्य की पहचान सदियों के सुनियोजित और निरन्तर झूठ में कहीं खो गई है। यह किताब उस तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करने में सहायक सिद्ध होगी, ऐसी आशा है।

Book Details

  • ISBN
    9789377372439
  • Pages
    208
  • Avg Reading Time
    7 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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