Sanatan Sang Bharat
(0)
Author:
Ashwini Kumar Choubey, Kumar SushantPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
600
₹ 480 (20% off)
Available
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"‘सनातन संग भारत...’’ यह एक ऐसा विषय था, जिसकी असली परीक्षा वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान होनी थी। इस आलेख का उद्देश्य किसी राजनीतिक परिदृश्य की ओर ले जाना नहीं, बल्कि यह बताना है कि आज का भारत सनातन और सनातनी व्यवस्था को मानने वाले राजनीतिक दलों के साथ खड़ा है। गत छह दशक में यह पहली बार हुआ कि कोई प्रधानमंत्री लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटा है। 1962 के बाद कि सी प्रधानमंत्री को पहली बार तीसरा कार्यकाल मिला है। वर्ष 2014 से चल रही एन.डी.ए. नेतृत्व की केंद्र सरकार के दो टर्म पूरा करने के बावजूद वर्ष 2024 में एन.डी.ए. को जनता ने पूर्ण समर्थन दिया, तो वहीं नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 240 सीटों के साथ भारतीय जनता पार्टी देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में पुनः उभरी। फिर से कह दें कि यह तब था, जब दस वर्ष की केंद्र सरकार का टर्म पूरा हो चुका था। अमूमन इतने समय में सत्ता विरोधी लहर उठनी शुरू हो जाती है, सरकार पर कई तरह से आरोप लग चुके होते हैं, जनता परिवर्तन का मन बनाने लगती है। सरकार बदल दी जाती है; विशेषकर संचार के इस युग में, जहाँ एक क्लिक मात्र से व्यक्ति लोकप्रिय और बदनामी के दायरे में आ जाता है, वहाँ बेदाग होकर सरकार चला लेना और फिर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बना लेना, यह सनातन के संस्कार की ताकत है। इस जनादेश ने बता दिया कि आज देश सनातन के विषय पर कोई समझौता नहीं करेगा। देश सनातन के साथ खड़ा है। एन.डी.ए. के घटक दल यह मानने लगे कि भारत में राजनीति करनी है तो सनातनी सोच और कार्य-पद्धति को मन-मस्तिष्क में रखना होगा।"
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"‘सनातन संग भारत...’’ यह एक ऐसा विषय था, जिसकी असली परीक्षा वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान होनी थी। इस आलेख का उद्देश्य किसी राजनीतिक परिदृश्य की ओर ले जाना नहीं, बल्कि यह बताना है कि आज का भारत सनातन और सनातनी व्यवस्था को मानने वाले राजनीतिक दलों के साथ खड़ा है। गत छह दशक में यह पहली बार हुआ कि कोई प्रधानमंत्री लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटा है।
1962 के बाद कि सी प्रधानमंत्री को पहली बार तीसरा कार्यकाल मिला है। वर्ष 2014 से चल रही एन.डी.ए. नेतृत्व की केंद्र सरकार के दो टर्म पूरा करने के बावजूद वर्ष 2024 में एन.डी.ए. को जनता ने पूर्ण समर्थन दिया, तो वहीं नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 240 सीटों के साथ भारतीय जनता पार्टी देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में पुनः उभरी। फिर से कह दें कि यह तब था, जब दस वर्ष की केंद्र सरकार का टर्म पूरा हो चुका था। अमूमन इतने समय में सत्ता विरोधी लहर उठनी शुरू हो जाती है, सरकार पर कई तरह से आरोप लग चुके होते हैं, जनता परिवर्तन का मन बनाने लगती है।
सरकार बदल दी जाती है; विशेषकर संचार के इस युग में, जहाँ एक क्लिक मात्र से व्यक्ति लोकप्रिय और बदनामी के दायरे में आ जाता है, वहाँ बेदाग होकर सरकार चला लेना और फिर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बना लेना, यह सनातन के संस्कार की ताकत है। इस जनादेश ने बता दिया कि आज देश सनातन के विषय पर कोई समझौता नहीं करेगा। देश सनातन के साथ खड़ा है। एन.डी.ए. के घटक दल यह मानने लगे कि भारत में राजनीति करनी है तो सनातनी सोच और कार्य-पद्धति को मन-मस्तिष्क में रखना होगा।"
Book Details
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ISBN9789355627124
-
Pages280
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIN
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मोहन राकेश के समृद्ध और बहुआयामी व्यक्तित्व के अनेक पक्ष थे, जो शायद किसी एक मित्र के साथ पूरी तरह शेयर नहीं किये जा सकते थे। लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने जिस मित्र के साथ जो पहलू शेयर किया, वह पूरी ईमानदारी के साथ किया। फिर भी, आज इतने समय के बाद भी उनके दोस्त और दुश्मन, प्रशंसक और आलोचक, दर्शक, पाठक और इतिहासकार यही तय नहीं कर पाए कि वह व्यक्ति वास्तव में था क्या? उसके कृतित्व का मूल्य और महत्त्व क्या और कितना है? वह असीम भावुक था या चरम बौद्धिक? अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी अवसरवादी था या तमाम उपलब्धियों के मोहपाश को पल-भर में काटकर किसी नये, अज्ञात और बड़े लक्ष्य की ओर निर्भय आगे बढ़ जानेवाला निरासक्त संन्यासी? मोहन राकेश के अन्तर्विरोधी एवं चौंकानेवाले अप्रत्याशित-अनपेक्षित कारनामों को लेकर उनके दोस्त और दुश्मन समान रूप से सच्चे-झूठे किन्तु चकित करनेवाले क़िस्से, प्रसंग, लतीफ़े, कथा-कहानियाँ, ख़बरें और अफ़वाहें रचते रहे हैं। सत्य और कल्पना तथा हक़ीक़त और फ़सानों से उपजी इस धुंध ने राकेश के जीवनकाल में ही उन्हें एक जीवित किंवदन्ती बना दिया था। ‘कीर्तिशेष : मोहन राकेश’ पुस्तक उन्हें, उनके जटिल व्यक्तित्व को एक नये सिरे से समझने का रास्ता खोलती है। यहाँ आप उनके समकालीनों, सहकर्मियों, मित्रों, सम्पादकों, प्रकाशकों, नाट्य-निर्देशकों, अभिनेताओं, फ़िल्मकारों, आलोचकों, मीडिया-कर्मियों और शिष्यों के संस्मरण पढ़ेंगे। उम्मीद है कि इनसे हम मोहन राकेश के व्यक्तित्व को कुछ बेहतर समझ सकेंगे।
Dosti
- Author Name:
Amarkant
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‘दोस्ती’ कथाकार अमरकान्त के संस्मरणों का संग्रह है। इसकी शुरुआत ही एक ऐसे संस्मरण से होती है जिसमें हमें बाद में अत्यन्त प्रतिष्ठित हुए रचनाकारों के शुरुआती दिनों और उनके संघर्षों का विवरण प्राप्त होता है। ‘लेखक की दोस्ती’ शीर्षक इस वृत्तान्त में कमलेश्वर, मार्कण्डेय, भैरवप्रसाद गुप्त, दुष्यन्त कुमार और अन्य समकालीनों की मित्रताओं और निजी व सामाजिक-रचनात्मक द्वन्द्वों का लेखा-जोखा पढ़ते ही बनता है। संस्मरण विधा में प्रवेश करते ही अमरकान्त जी की लेखनी इतनी चुटीली और चुस्त हो जाती है कि उनकी एक-एक पंक्ति आपको पकड़कर रखती है। उपरोक्त के अलावा इस पुस्तक में महादेवी वर्मा, नागार्जुन, रेणु, रवीन्द्र कालिया, मोहन राकेश आदि से सम्बन्धित संस्मरणों के अलावा कुछ यात्रा-वृत्तान्त भी शामिल हैं। ‘मेरा बचपन कब समाप्त हुआ’ शीर्षक लम्बे संस्मरण में अमरकान्त अपने जीवन के उन दिनों को याद करते हैं जब उनकी किशोर चेतना अलग-अलग दिशाओं से समझ और संस्कार ग्रहण कर रही थी। इस आलेख में कई बेहद मनोरंजक घटनाओं के विवरण भी उन्होंने दिए हैं और उस समय के सामाजिक-राजनीतिक हालात के भी। अमरकान्त और उनके समय को जानने-समझने में उनके ये संस्मरण साहित्य के अध्येताओं और पाठकों, दोनों को रुचिकर तथा सार्थक प्रतीत होंगे।
Upyogi Vastuon Ke Aavishkar
- Author Name:
Laxman Prasad +1
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कल्पना कीजिए कि हमारे पास साबुन न होता, शौचालय का फ्लश न होता, कपड़े न होते, बिजली न होती, थर्मामीटर न होता तो हमें कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता । हम अपने दैनिक जीवन में अनेक छोटी-बड़ी चीजों का उपयोग करते हैं । देखने में इन अत्यंत साधारण वस्तुओं के पीछे अनेक आविष्कारकों का परिश्रम छिपा है, जिन्होंने पिछले सैकड़ों-हजारों वर्षों में इन्हें तैयार किया और हमारे उपयोग लायक बनाया । आविष्कारों की यह प्रक्रिया हजारों वर्षों से चल रही है और भविष्य में भी चलती ही रहेगी ।प्रस्तुत पुस्तक के लेखन के दौरान लेखक द्वय ने अनेक पुस्तकों व प्रामाणिक स्रोतों से सामग्री जुटाई है और तथ्यों को हू-ब-हू प्रस्तुत किया है । इसमें विश्व के महान् युग- प्रवर्तक आविष्कारकों के जीवन-पहलुओं को तो उजागर किया ही गया है, साथ ही उनके आविष्कार की प्रक्रिया को भी सरल और सुबोध भाषा में वर्णित किया गया है । हमें विश्वास है, यह पुस्तक पाठकों को पसंद आएगी और उनके बुद्धि-विकास तथा ज्ञान-कोष को बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध होगी ।
Sagar Vigyan
- Author Name:
Shyam Sunder Sharma
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पढ़ने या सुनने में यह बात भले ही अटपटी लगे, पर यह सत्य है कि अब वह समय आ गया है जब हमें खाद्य, आवास, ऊर्जा, प्रदूषण आदि की बढ़ती हुई समस्याओं के समाधान के लिए थल के सीमित संसाधनों से हटकर सागर की ओर उन्मुख होना चाहिए। सागर पृथ्वी के केवल 71% भाग को ही घेरे हुए नहीं है, उसमें कुल जल का 97% भाग ही नहीं हैं, वरन् उसमें अपार खनिज संपदा, असंख्य जीव-जंतु और ऊर्जा का असीम भंडार भी है।
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Book
Sanatan Sang Bharat examines the 2024 Lok Sabha elections not as a political playbook, but as a cultural inflection point—the year Indian voters aligned with parties espousing Sanatan values in numbers unseen for six decades. The book opens with a rare historical fact: 2024 produced India's first third-term Prime Minister since 1962, a continuity that the author reads as voter endorsement of a civilizational worldview rather than mere policy preference.
Written as analysis rather than advocacy, the text frames this electoral outcome as the surfacing of a deeper cultural current—one where Sanatan identity and governance philosophy have moved from the margins to the mainstream of Indian political life. For readers seeking to understand why contemporary India votes the way it does, this book offers a lens grounded in cultural rather than purely partisan logic.
यह पुस्तक पढ़ने पर मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?
यह पुस्तक आपको राजनीतिक नारेबाजी से परे ले जाकर एक सांस्कृतिक विश्लेषण की ओर ले जाती है। यह शांत, तथ्यात्मक स्वर में लिखी गई है जो मतदाता व्यवहार को सनातन मूल्यों के प्रति बदलते दृष्टिकोण से जोड़ती है। पाठक को यह समझने में मदद मिलती है कि 2024 का चुनाव परिणाम केवल नीतियों का नहीं, बल्कि सभ्यतागत पहचान का प्रतिबिंब क्यों था।
यह पुस्तक किस तरह के पाठकों के लिए उपयुक्त है?
- जो भारतीय राजनीति को सांस्कृतिक संदर्भ में समझना चाहते हैं
- जो पक्षपात रहित विश्लेषण की तलाश में हैं
- जो सनातन विचारधारा और समकालीन मतदाता व्यवहार के बीच संबंध जानना चाहते हैं
- जो हिंदी में गंभीर राजनीतिक चिंतन पढ़ना पसंद करते हैं
इस पुस्तक का विषय आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
आज का भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों को राजनीतिक पहचान के रूप में पुनर्परिभाषित कर रहा है। यह पुस्तक उस बदलाव को दर्ज करती है जब सनातन मूल्य हाशिए से मुख्यधारा में आए। यह धर्मनिरपेक्षता, पहचान की राजनीति, और सभ्यतागत गौरव के बीच के तनाव को समझने का एक दस्तावेज़ है—जो आज हर भारतीय बहस का केंद्र है।
इस विषय पर लेखक का दृष्टिकोण क्या विशिष्ट है?
लेखक ने इस विषय को राजनीतिक प्रचार नहीं बल्कि सांस्कृतिक घटना के रूप में देखा है। वे यह नहीं कहते कि किसे वोट देना चाहिए, बल्कि यह विश्लेषण करते हैं कि मतदाता ने क्यों वोट दिया। छह दशक बाद पहली बार तीसरे कार्यकाल को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत कर, वे इसे सनातन विचारधारा की स्वीकृति से जोड़ते हैं।
यह पुस्तक पढ़ने के बाद पाठक के मन में क्या बचता है?
पाठक यह समझ लेकर जाता है कि भारत की मतदाता पसंद अब केवल आर्थिक नीतियों से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान से भी संचालित होती है। यह पुस्तक एक सवाल छोड़ती है: क्या यह बदलाव स्थायी है, या एक चरण? पाठक भविष्य की राजनीति को सनातन मूल्यों के प्रिज्म से देखने लगता है।