Jirah Ajudhia
(0)
Author:
Rakesh TewariPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
499
₹ 399.2 (20% off)
Available
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‘रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद’ को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। ‘जिरह अजुधिया : एक पुरातत्त्ववेत्ता की कलम से’ उन सबसे इस मामले में अलग है कि इसे उस व्यक्ति ने लिखा है जो इस विवाद के सबसे निर्णायक मोड़ पर विवादित स्थल के सबसे निकट था। न सिर्फ वहाँ मौजूद बल्कि उस प्रक्रिया में शामिल भी जो उस जगह की सदियों पुरानी मिट्टी को छानकर वास्तविकता के प्रमाण जुटाने के लिए की जा रही थी। न्यायालय द्वारा विवादित स्थल के पुरावशेषों की जाँच और संग्रह का काम जब पुरातत्त्व विभाग को सौंपा गया, राकेश तिवारी उस समय इस विभाग के निदेशक थे। उन्हीं के नेतृत्व में वह अभिलेखीकरण हुआ जो न्यायालय के अन्तिम फैसले का भी आधार बना। इस पुस्तक में उन्होंने उस पूरी प्रक्रिया और उससे सम्बन्धित अदालती जिरह का ब्योरेवार विवरण दिया है, इस विवाद की पूरी राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ। निष्पक्ष और तथ्यों-साक्ष्यों पर आधारित वह पूरा घटनाक्रम भी इस पुस्तक में उपलब्ध है जो तमाम बहसों और विवादों के घटाटोप में इस तरह सामने नहीं आ सकता था। लेखक ने पुरातत्त्ववेत्ताओं और इतिहासकारों के उन मतों का भी संक्षिप्त लेकिन सारभूत रूप में उल्लेख किया है जो अयोध्या और राम की ऐतिहासिकता को लेकर बीच-बीच में सामने आते रहे।
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‘रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद’ को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। ‘जिरह अजुधिया : एक पुरातत्त्ववेत्ता की कलम से’ उन सबसे इस मामले में अलग है कि इसे उस व्यक्ति ने लिखा है जो इस विवाद के सबसे निर्णायक मोड़ पर विवादित स्थल के सबसे निकट था। न सिर्फ वहाँ मौजूद बल्कि उस प्रक्रिया में शामिल भी जो उस जगह की सदियों पुरानी मिट्टी को छानकर वास्तविकता के प्रमाण जुटाने के लिए की जा रही थी।
न्यायालय द्वारा विवादित स्थल के पुरावशेषों की जाँच और संग्रह का काम जब पुरातत्त्व विभाग को सौंपा गया, राकेश तिवारी उस समय इस विभाग के निदेशक थे। उन्हीं के नेतृत्व में वह अभिलेखीकरण हुआ जो न्यायालय के अन्तिम फैसले का भी आधार बना।
इस पुस्तक में उन्होंने उस पूरी प्रक्रिया और उससे सम्बन्धित अदालती जिरह का ब्योरेवार विवरण दिया है, इस विवाद की पूरी राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ। निष्पक्ष और तथ्यों-साक्ष्यों पर आधारित वह पूरा घटनाक्रम भी इस पुस्तक में उपलब्ध है जो तमाम बहसों और विवादों के घटाटोप में इस तरह सामने नहीं आ सकता था। लेखक ने पुरातत्त्ववेत्ताओं और इतिहासकारों के उन मतों का भी संक्षिप्त लेकिन सारभूत रूप में उल्लेख किया है जो अयोध्या और राम की ऐतिहासिकता को लेकर बीच-बीच में सामने आते रहे।
Book Details
-
ISBN9789360863975
-
Pages374
-
Avg Reading Time12 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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लाखो/करोडो प्रेक्षकांच्या मनाला दशकानुदशकं भुरळ पाडणारं माध्यम म्हणजे चित्रपट. मनोरंजनातून लोकांना सजग आणि जागरूक करणारं सशक्त माध्यम म्हणजेही चित्रपटच. अगदी सर्वसामान्यांपासून ते दिग्गज बुद्धिवंतांपर्यंत आपली स्वप्नं रंगवण्याची, घटकाभर वास्तवाचा विसर पाडण्याची ताकद या माध्यमात आहे. चित्रपट बघताना कधी आपण आपलंच प्रतिबिंब बघतो आहोत असं वाटतं. चित्रपटातल्या पात्रांच्या सुखदु:खांशी, वेदनांशी, परिस्थितीशी आपण एकरूप होतो. कधी आपण भारावून जातो, तर कधी अंतर्मुख होऊन विचार करू लागतो. चित्रपट निर्मिती ही एक सांघिक कृती आहे, तिच्यामागे अनेकांचे परिश्रम असतात असं आपण म्हणत असलो, तरी ‘कॅप्टन ऑफ द शीप' हा त्या चित्रपटाचा दिग्दर्शक असतो हेच खरं. हा दिग्दर्शक किती तरल आहे, किती सर्जनशील आहे यावर त्या चित्रपटाची परिणामकारकता अवलंबून असते. दीपा देशमुख लिखित आणि मनोविकास प्रकाशन प्रकाशित ‘डायरेक्टर्स' या पुस्तकामध्ये सत्यजीत रे, व्ही. शांताराम, राज कपूर, बिमल रॉय, गुरू दत्त, हृषिकेश मुखर्जी आणि श्याम बेनेगल अशा काही निवडक दिग्दर्शक मंडळींचा अंतर्भाव केला आहे. ‘डायरेक्टर्स' हे पुस्तक चित्रपटांबद्दल बोलतं, तेव्हा वाचकाला त्यात रमवून टाकतं. दिग्दर्शकांबद्दल बोलतं, तेव्हा प्रतिकूल परिस्थितीशी कसा सामना करावा ते सांगतं. यातल्या कलंदरांबद्दल बोलतं, तेव्हा आपलं जगणं अधिक समृद्ध आणि अर्थपूर्ण कसं करायचं हे सांगतं. ज्याप्रमाणे दृश्यानुभवातून प्रेक्षकांना खिळवून ठेवण्याची ताकद चित्रपटांमध्ये असते, त्याचप्रमाणे अक्षरानुभवातून ते कथानक, ते प्रसंग, तो काळ आणि त्या व्यक्तींना जिवंत करण्याची लेेखिकेची ताकद या पुस्तकामधून प्रकर्षाने जाणवते. त्यामुळे काळाच्या पुढे बघायला लावणारे, मानवता हाच खरा धर्म असं सांगणारे, सत्य, अहिंसा आणि प्रेम यांचा विचार रुजवणारे चित्रपट आणि त्यांचे दिग्दर्शक यांची ओळख रसाळ, ओघवत्या आणि सोप्या भाषेत एक रसिक आणि आस्वादक म्हणून लेखिकेने करून दिली आहे. डायरेक्टर्स । दीपा देशमुख Directors । Deepa Deshmukh
Mathematics Wizard Srinivasa Ramanujan
- Author Name:
Narendra Govil +1
- Book Type:

- Description:
Mathematics Wizard Srinivasa Ramanujan The book depicts the interesting story of a mysterious Indian mathematician, Srinivasa Ramanujan, with no college education, whose mathematics in a series of letters to a Cambridge Mathematician, G.H. Hardy, shook the entire mathematics community. It is an exciting journey of a poor, self-taught and god-gifted mathematician who by the age of 31 became the youngest Fellow of Royal Society of London. Even after almost 100 years of his death at the age of 32, his results mysteriously find applications in modern world such as in the study of black holes, quantum gravity, cryptography and many others. Ramanujan’s life story and work has inspired numerous people and generations of mathematicians around the globe and continue to excite even today. We hope that the book will reach the current generation and generate interest in mathematics.
Life Without Principle
- Author Name:
Henry David Thoreau
- Book Type:

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Hum Bheed Hain
- Author Name:
Raghuvansh
- Book Type:

- Description:
रघुवंश ने 'आधुनिकता’ को केवल 'व्यक्ति’ की विशिष्टता के रूप में नहीं, बल्कि अपने समाज के गतिशील होने की सांस्कृतिक आकांक्षा के वैशिष्ट्य के रूप में समझने की चेष्टा की। दरअसल वे सांस्कृतिक चिन्तक थे। संस्कृति को परम्परा की रूढ़ियों से मुक्त करके उन्होंने अपने समय के समाज को विभिन्न समस्याओं से सन्दर्भित किया। राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक दृष्टि से भारतीय समाज के लिए क्या ग्राह्य है और किस रूप में ग्राह्य है, इसके विश्लेषण में पूर्वग्रह-रहित होकर रघुवंश जी ने समय-समय पर जो लेख-निबन्ध इत्यादि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखे, उनका संकलन उनकी इस पुस्तक में किया गया है। राजनीति, धर्म, शिक्षा और विकास के नए मॉडलों पर रघुवंश जी के क्या विचार थे, उनको जानने में इस पुस्तक की उपयोगिता असन्दिग्ध है।
रघुवंश ‘मनुष्य की सांस्कृतिक उपलब्धियों’ की कसौटी पर अपने समय और समाज की स्थितियों को परखने के हिमायती थे। इस पुस्तक में संकलित लेखों से यह भी पता चलता है कि उन्होंने अपने चिन्तन का फलक कितना व्यापक रखा। इसीलिए वे शिक्षा, राजनीतिक व्यवस्थाओं और साम्प्रदायिक संकटों को समझने और समझाने में निरन्तर संलग्न रहे।
यह पुस्तक 'हम भीड़ हैं’ हमें बताती है कि उनमें आधुनिकता और विकास का एक ऐसा स्वरूप पहचानने की व्याकुलता थी, जो काल की दृष्टि से 'नया’ हो और देश की दृष्टि से 'भारतीय’ हो। यही आकांक्षा रघुवंश जी को आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ. लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे चिन्तकों की ओर आकृष्ट करती रही।
Ha Desh Amacha Aahe
- Author Name:
Shrimant Mane
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2024 च्या लोकसभा निवडणुकीत कोणताही राजकीय पक्ष स्पष्टपणे जिंकला नाही आणि कोणाचा पूर्ण पराभवदेखील झाला नाही. हे नेमके झाले तरी कसे आणि मग जिंकले तरी कोण? अर्थातच, भारतीय मतदार जिंकले. कोट्यवधी मतदारांनी चारशे जागांचे स्वप्न पाहणाऱ्या सत्ताधारी पक्षाला ‘आस्ते कदम` चा इशारा दिला, तर आधीच्या दोन निवडणुकांमध्ये हतोत्साही झालेल्या विरोधकांना मतदारांनी नवी उमेद व उर्जा दिली. या समतोल जनादेशातून मतदार जिंकले हा निष्कर्ष, हे अनुमान किंवा विधान भाबडेपणातून केले आहे का? अर्थातच नाही. खंडप्राय भारतातील या लोकसभा निवडणूक निकालाचा लघुत्तम साधारण विभाज्य म्हणजे लसावि सांगतो की, मोठा निर्णायक राष्ट्रीय मुद्दा निवडणुकीत नसल्यामुळे देशातील 28 राज्ये व 8 केंद्रशासित प्रदेश मिळून छत्तीस प्रांतांमध्ये स्थानिक समीकरणेच प्रभावी ठरली. सोबतच, राज्यघटना बदलण्याची भीती, शेतकरी व तरुण मतदारांमधील नाराजी, गरिबी व महागाई अशा जगण्यामरण्याच्या मुद्द्यांवर लोकांनी सत्ताधाऱ्याांच्या विरोधात मतदान केले. या मतदानाचे, निकालाचे हे तर्कशास्त्र, संख्याशास्त्राच्या आधारे विश्लेषण सांगते की, ही लढाई निवडणूक जिंकण्याचे तंत्र आणि लोक यांच्यात झाली. निवडणूक जिंकण्याचे तंत्र बदलले, सुधारले तरी लोकांचे पाय जमिनीवरच आहेत. लोकशाहीचा उत्सव असे ज्याचे वर्णन केले जाते त्या देशाच्या अठराव्या सार्वत्रिक निवडणुकीत मतदारांनी दिलेल्या संदेशाचा सार हा की, आम्हाला गृहीत धरू नका. हा देश, हे प्रजासत्ताक आमचे आहे. - श्रीमंत माने
Cyber Kathayein : Digital Suraksha Ki Raah
- Author Name:
Sushil Kumar
- Book Type:

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साइबर-जगत यानी इंटरनेट ने बहुत सारी सहूलियतें दी हैं तो कई खतरे भी खड़े किये हैं। आए दिन लोगों के साइबर-अपराधियों से ठगे जाने की खबरें सुनने-देखने में आती हैं। और, उन अपराधियों की तरकीबें अक्सर इतनी अप्रत्याशित और अकल्पनीय होती हैं कि हैरत में डाल देती हैं। ऐसे में ‘साइबर कथाएँ : डिजिटल सुरक्षा की राह’ बतलाती है कि साइबर अपराध का शिकार बनने से कैसे बचा जा सकता है। इसके लेखक ने साइबर अपराध से सम्बन्धित प्रभाग का सात वर्ष तक नेतृत्व किया है और यह किताब उस दौरान प्राप्त अनुभवों और किए गये काम पर आधारित है। वे विभिन्न मंचों पर साइबर-सुरक्षा और साइबर-अपराध सम्बन्धी जागरूकता पर लगातार व्याख्यान और अनुभव साझा करते हैं। इस किताब में उन्होंने साइबर-अपराध के तौर-तरीकों के बारे में किस्सों के माध्यम से बताया है और उनसे बचने और मुकाबला करने के टिप्स भी दिये हैं। आज के डिजिटल हेराफेरी के दौर में एक आवश्यक किताब!
Bebond the Misty Veil
- Author Name:
Aradhana Johri
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Uttarakhand is the land where magnificent temples are dedicated not only to Brahmanical deities but also to folk Gods who are as colourful as they are revered. These grand edifices are virtually poetry in stone where every stone tells a story. Their ornamental exuberance and intricate craftsmanship can be compared to the handiwork of a gem setter as they stand in timeless harmony with centuries settling softly on their shoulders. Encompassing the faith of millions of people they are also the windows to the past of this proud land where there is little recorded history. But most fascinating are the manifold legends that they clasp to their bosoms as they stand tall at the cusp of heaven and earth. Here mythology merges into reality. These temples talk. The Himalayas speak. The author has listened to them and attempted to lift the misty veil to capture some of the fascinating stories of Gods and Men, as seen through the eyes of these temple. This book is perhaps, one of the first such documentations of the temples of Uttarakhand.
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