Sangh, Rajneeti Aur Media
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इस ग्रंथ में संगृहीत लेखों का एक भाग संघ की संघटन-साधना की सांस्कृतिक प्रेरणाओं और रचनात्मक प्रवृतियों के उजागर करताहै। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में संघ की कर्मशक्ति ने राष्ट्र-निर्माण के लिए नई संघटनात्मक रचनाएँ खड़ी की । श्रमिक, वनवासी, शिक्षा इत्यिदि क्षेत्रों के साथ-साथ राजनीति के क्षेत्र में भी संघ ने प्रवेश किया। संघ की प्रेरणओं और आदर्शें को स्पष्ट करने के लिए राजनीति के क्षेत्र में संघ के तीन प्रमुख कार्यकताओं यथा-स्व दीनदयाल उपाध्याय नानाजी देशमुख और अठल बिहारी वाजपेयी के अंतर्मन की कुछ झलकियाँ इस संग्रह में प्रस्तुत की जा रही हैं। संपूर्ण क्रांति और आपातकाल विराधी संघर्ष में संघ की रचनात्मक भुमिका के बावजूद संघ को सत्ता-राजनीति के प्रहारों से जूझना पड़ा, इसका समकालीन लेखा-जोखा भी यहाँ दिया गया है। आगे चलकर मीडिया की पूरी दृष्टि अयोध्या आंदोलन और भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक उत्कर्ष पर केंद्रित हो गई । मीडिया स्वयं ही संघ-विराधी राजनीतिक अभियान का हिस्सा बन गया। क्या सचमुच मीडिया में संघ के बारे में इतना अज्ञान था? क्या वह संघ की अभिनव कार्य-प्रणाली को समझने में पूरी तरह असमर्थ था? इस संग्रह के कई लेख मीडिया के संघ के प्रति पूर्वग्रह, अज्ञान और विद्वेष भाव की तथ्यात्मक मीमांसा प्रस्तुत करते हैं। ‘संघ, राजनीति और मीडिया’ में संगृहीत लेखों को स्वाधीन भारत के घटना प्रवाह पर एक रनिंग कमेंट्री कहा जा सकता है। —इस पुस्तक से
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इस ग्रंथ में संगृहीत लेखों का एक भाग संघ की संघटन-साधना की सांस्कृतिक प्रेरणाओं और रचनात्मक प्रवृतियों के उजागर करताहै। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में संघ की कर्मशक्ति ने राष्ट्र-निर्माण के लिए नई संघटनात्मक रचनाएँ खड़ी की । श्रमिक, वनवासी, शिक्षा इत्यिदि क्षेत्रों के साथ-साथ राजनीति के क्षेत्र में भी संघ ने प्रवेश किया। संघ की प्रेरणओं और आदर्शें को स्पष्ट करने के लिए राजनीति के क्षेत्र में संघ के तीन प्रमुख कार्यकताओं यथा-स्व दीनदयाल उपाध्याय नानाजी देशमुख और अठल बिहारी वाजपेयी के अंतर्मन की कुछ झलकियाँ इस संग्रह में प्रस्तुत की जा रही हैं।
संपूर्ण क्रांति और आपातकाल विराधी संघर्ष में संघ की रचनात्मक भुमिका के बावजूद संघ को सत्ता-राजनीति के प्रहारों से जूझना पड़ा, इसका समकालीन लेखा-जोखा भी यहाँ दिया गया है।
आगे चलकर मीडिया की पूरी दृष्टि अयोध्या आंदोलन और भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक उत्कर्ष पर केंद्रित हो गई । मीडिया स्वयं ही संघ-विराधी राजनीतिक अभियान का हिस्सा बन गया। क्या सचमुच मीडिया में संघ के बारे में इतना अज्ञान था? क्या वह संघ की अभिनव कार्य-प्रणाली को समझने में पूरी तरह असमर्थ था? इस संग्रह के कई लेख मीडिया के संघ के प्रति पूर्वग्रह, अज्ञान और विद्वेष भाव की तथ्यात्मक मीमांसा प्रस्तुत करते हैं।
‘संघ, राजनीति और मीडिया’ में संगृहीत लेखों को स्वाधीन भारत के घटना प्रवाह पर एक रनिंग कमेंट्री कहा जा सकता है।
—इस पुस्तक से
Book Details
-
ISBN9789350487860
-
Pages224
-
Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अनेक गुंतवणूकदारांना, अगदी शेअर बाजारात भरीव कामगिरी केलेल्या गुंतवणूकदारांनादेखील, हा शेअर बाजार नक्की कसे काम करतो याबद्दल सखोल माहिती नसते. म्हणूनच आपल्या अर्थव्यवस्थेच्या मूलभूत बाबी काय आहेत आणि शेअर बाजाराशी त्यांचा कसा संबंध आहे, यासारख्या गुंतवणुकीबाबतच्या प्राथमिक गोष्टी शालेय शिक्षणात शिकवल्या जाव्यात, असा आग्रह लिंच आणि रोथचाइल्ड धरतात. प्रत्येक तरुण व्यक्तीसमोर आपल्या महाविद्यालयीन शिक्षणासाठी पैसे जमा करायचे, की आपल्या वृद्धापकाळातील अर्थार्जनाची सोय करायची अशी द्विधा मनस्थिती असते, मात्र गुंतवणुकीचे मूलभूत प्रशिक्षण त्याला वेळीच मिळाले असते, तर त्याच्या पुढे असा प्रश्न उभा राहिला नसता. गुंतवणुकीच्या संधी सर्वत्र असतात, मात्र त्या शोधण्याची दृष्टी असायला हवी. शालेय शिक्षणामध्ये फारसे हुशार नसलेल्या विद्यार्थ्यालादेखील नायके, रीबॉक, मॅकडोनाल्ड्स, द गॅप आणि बॉडी शॉप यासारख्या ब्रँड्सची माहिती असते. अमेरिकेत प्रत्येक किशोरवयीन मुलाने कोका-कोला किंवा पेप्सीची चव एकदा तरी चाखलेली असते, मात्र त्यापैकी किती जणांनी या दोन्हीपैकी एका कंपनीचा समभाग विकत घेतला असेल किंवा या कंपन्यांचा समभाग विकत घेता येतो, याची किमान माहिती तरी त्याला असेल? प्रत्येक विद्यार्थी अमेरिकी इतिहासाचा अभ्यास करतो. मात्र, आपला देश हा युरोपीय वसाहतवाद्यांनी घडवला आहे, या वसाहतवाद्यांना इंग्लंड आणि हॉलंड या देशातील पब्लिक कंपन्यांनी वित्तपुरवठा केला होता आणि या पब्लिक कंपन्यांच्या मूलभूत तत्त्वांमध्ये गेल्या तीनशे साडेतीनशे वर्षात फारसा बदल झालेला नाही हे त्यातील मोजयाच विद्यार्थ्यांना ठाऊक असते. आबालवृद्धांना रस वाटेल अशा सहज सोप्या शैलीत लिंच आणि रोथचाइल्ड यांनी ‘लर्न टू अर्न’ या पुस्तकात शेअर बाजारातल्या मूलभूत बाबींचे ज्ञान उपलब्ध करून दिले आहे. वर्तमानपत्रातल्या शेअर बाजाराचे तक्ते कसे वाचावेत, कंपन्यांचे वार्षिक अहवाल कसे समजून घ्यावेत आणि प्रत्येकाने शेअर बाजार समजून घेणे का गरजेचे आहे? तसेच केवळ गुंतवणूक कशी करावी यावर भाष्य करून हे पुस्तक थांबत नाही, तर वाचकांना गुंतवणूकदारासारखा विचार करायलादेखील प्रवृत्त करते. Learn To Earn: लर्न टू अर्न पीटर लिंच आणि जॉन रोथचाइल्ड Peter Lynch and John Rothchild अनुवाद: डॉ. नितीन हांडे Translator: Dr. Nitin Hande
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Kirtishesh : Mohan Rakesh
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मोहन राकेश के समृद्ध और बहुआयामी व्यक्तित्व के अनेक पक्ष थे, जो शायद किसी एक मित्र के साथ पूरी तरह शेयर नहीं किये जा सकते थे। लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने जिस मित्र के साथ जो पहलू शेयर किया, वह पूरी ईमानदारी के साथ किया। फिर भी, आज इतने समय के बाद भी उनके दोस्त और दुश्मन, प्रशंसक और आलोचक, दर्शक, पाठक और इतिहासकार यही तय नहीं कर पाए कि वह व्यक्ति वास्तव में था क्या? उसके कृतित्व का मूल्य और महत्त्व क्या और कितना है? वह असीम भावुक था या चरम बौद्धिक? अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी अवसरवादी था या तमाम उपलब्धियों के मोहपाश को पल-भर में काटकर किसी नये, अज्ञात और बड़े लक्ष्य की ओर निर्भय आगे बढ़ जानेवाला निरासक्त संन्यासी? मोहन राकेश के अन्तर्विरोधी एवं चौंकानेवाले अप्रत्याशित-अनपेक्षित कारनामों को लेकर उनके दोस्त और दुश्मन समान रूप से सच्चे-झूठे किन्तु चकित करनेवाले क़िस्से, प्रसंग, लतीफ़े, कथा-कहानियाँ, ख़बरें और अफ़वाहें रचते रहे हैं। सत्य और कल्पना तथा हक़ीक़त और फ़सानों से उपजी इस धुंध ने राकेश के जीवनकाल में ही उन्हें एक जीवित किंवदन्ती बना दिया था। ‘कीर्तिशेष : मोहन राकेश’ पुस्तक उन्हें, उनके जटिल व्यक्तित्व को एक नये सिरे से समझने का रास्ता खोलती है। यहाँ आप उनके समकालीनों, सहकर्मियों, मित्रों, सम्पादकों, प्रकाशकों, नाट्य-निर्देशकों, अभिनेताओं, फ़िल्मकारों, आलोचकों, मीडिया-कर्मियों और शिष्यों के संस्मरण पढ़ेंगे। उम्मीद है कि इनसे हम मोहन राकेश के व्यक्तित्व को कुछ बेहतर समझ सकेंगे।
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