Kirtishesh : Mohan Rakesh
(1)
Author:
Jaidev TanejaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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मोहन राकेश के समृद्ध और बहुआयामी व्यक्तित्व के अनेक पक्ष थे, जो शायद किसी एक मित्र के साथ पूरी तरह शेयर नहीं किये जा सकते थे। लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने जिस मित्र के साथ जो पहलू शेयर किया, वह पूरी ईमानदारी के साथ किया। फिर भी, आज इतने समय के बाद भी उनके दोस्त और दुश्मन, प्रशंसक और आलोचक, दर्शक, पाठक और इतिहासकार यही तय नहीं कर पाए कि वह व्यक्ति वास्तव में था क्या? उसके कृतित्व का मूल्य और महत्त्व क्या और कितना है? वह असीम भावुक था या चरम बौद्धिक? अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी अवसरवादी था या तमाम उपलब्धियों के मोहपाश को पल-भर में काटकर किसी नये, अज्ञात और बड़े लक्ष्य की ओर निर्भय आगे बढ़ जानेवाला निरासक्त संन्यासी? मोहन राकेश के अन्तर्विरोधी एवं चौंकानेवाले अप्रत्याशित-अनपेक्षित कारनामों को लेकर उनके दोस्त और दुश्मन समान रूप से सच्चे-झूठे किन्तु चकित करनेवाले क़िस्से, प्रसंग, लतीफ़े, कथा-कहानियाँ, ख़बरें और अफ़वाहें रचते रहे हैं। सत्य और कल्पना तथा हक़ीक़त और फ़सानों से उपजी इस धुंध ने राकेश के जीवनकाल में ही उन्हें एक जीवित किंवदन्ती बना दिया था। ‘कीर्तिशेष : मोहन राकेश’ पुस्तक उन्हें, उनके जटिल व्यक्तित्व को एक नये सिरे से समझने का रास्ता खोलती है। यहाँ आप उनके समकालीनों, सहकर्मियों, मित्रों, सम्पादकों, प्रकाशकों, नाट्य-निर्देशकों, अभिनेताओं, फ़िल्मकारों, आलोचकों, मीडिया-कर्मियों और शिष्यों के संस्मरण पढ़ेंगे। उम्मीद है कि इनसे हम मोहन राकेश के व्यक्तित्व को कुछ बेहतर समझ सकेंगे।
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मोहन राकेश के समृद्ध और बहुआयामी व्यक्तित्व के अनेक पक्ष थे, जो शायद किसी एक मित्र के साथ पूरी तरह शेयर नहीं किये जा सकते थे। लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने जिस मित्र के साथ जो पहलू शेयर किया, वह पूरी ईमानदारी के साथ किया।
फिर भी, आज इतने समय के बाद भी उनके दोस्त और दुश्मन, प्रशंसक और आलोचक, दर्शक, पाठक और इतिहासकार यही तय नहीं कर पाए कि वह व्यक्ति वास्तव में था क्या? उसके कृतित्व का मूल्य और महत्त्व क्या और कितना है? वह असीम भावुक था या चरम बौद्धिक? अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी अवसरवादी था या तमाम उपलब्धियों के मोहपाश को पल-भर में काटकर किसी नये, अज्ञात और बड़े लक्ष्य की ओर निर्भय आगे बढ़ जानेवाला निरासक्त संन्यासी?
मोहन राकेश के अन्तर्विरोधी एवं चौंकानेवाले अप्रत्याशित-अनपेक्षित कारनामों को लेकर उनके दोस्त और दुश्मन समान रूप से सच्चे-झूठे किन्तु चकित करनेवाले क़िस्से, प्रसंग, लतीफ़े, कथा-कहानियाँ, ख़बरें और अफ़वाहें रचते रहे हैं। सत्य और कल्पना तथा हक़ीक़त और फ़सानों से उपजी इस धुंध ने राकेश के जीवनकाल में ही उन्हें एक जीवित किंवदन्ती बना दिया था।
‘कीर्तिशेष : मोहन राकेश’ पुस्तक उन्हें, उनके जटिल व्यक्तित्व को एक नये सिरे से समझने का रास्ता खोलती है। यहाँ आप उनके समकालीनों, सहकर्मियों, मित्रों, सम्पादकों, प्रकाशकों, नाट्य-निर्देशकों, अभिनेताओं, फ़िल्मकारों, आलोचकों, मीडिया-कर्मियों और शिष्यों के संस्मरण पढ़ेंगे। उम्मीद है कि इनसे हम मोहन राकेश के व्यक्तित्व को कुछ बेहतर समझ सकेंगे।
Book Details
-
ISBN9789348157607
-
Pages416
-
Avg Reading Time14 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘हवाओं की दस्तक’ यादों से भरी ऐसी आत्मकथात्मक किताब है जो बदलते समय की दास्तान अपने तरीक़े से सुनाती है। बदलाव की आहट देती हवाओं की दस्तक आपको बरास्ता उदयपुर, दिल्ली, मुम्बई और बिहार ले जाती है, जहाँ समय बदल रहा है, शताब्दी बदल रही है। यह समाजवादी मन वाले परिवार की मोहक दुनिया से जुड़ी वह कथा है जो समाजवादी सपने के टूट जाने की त्रासदी से जुड़ी है। इस यात्रा में लेखक न केवल पत्रकारिता के हिमालय के पिघलते चले जाने का गवाह बनता है बल्कि पूरी हिन्दी पत्रकारिता के ही अप्रासंगिक होने को महसूस करता है, उसे ख़त्म होते देखता है। मुम्बई जैसे शहर के सतरंगे मिज़ाज के बदलने की कथा कहती यह किताब आपके मन को कमजोर नहीं करती, उसे संकल्प और उम्मीद की शक्ति देती है। दुनिया को अलग रंग से उकेरती यह किताब समय का दस्तावेज है।
Smritiyon Ki Basti
- Author Name:
Abdul Bismillah
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‘स्मृतियों की बस्ती’ कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह के संस्मरणों का संग्रह है। इन संस्मरणों के केन्द्र में हैं हिन्दी के वे महान व्यक्तित्व जिनसे उनकी भेंट-मुलाक़ात हुई, जिनसे उन्होंने सीखा और जिन्हें उन्होंने अपने ढंग से समझा। संस्मरणों की विशेषता यह है कि वे उनके व्यक्तित्व को ही नहीं, उनकी रचनात्मकता, उनके अवदान को रेखांकित करते हुए उनका चित्र पाठक के सामने रखते हैं। बहुभाषाविद् त्रिलोचन के बारे में लिखते हुए उनकी इस मान्यता पर विशेष ज़ोर देते हैं कि शब्द का अर्थ शब्दकोश से नहीं बोध से खुलता है, प्रत्यक्ष अनुभव से खुलता है। इसी तरह अमृतलाल नागर से जुड़े संस्मरण में वे उनके साथ लखनऊ शहर के कुछ सजीव चित्र भी आँकते हैं जो नागर जी के व्यक्तित्व को और अच्छे ढंग से समझने में सहायक होते हैं। उनकी तुलना वे बरगद से करते हैं, तो अमरकान्त की अशोक वृक्ष से। बताते हैं कि अमरकान्त हिन्दू-मुस्लिम समस्या पर बहुत सोचते थे। कहते थे कि ‘विभाजन सिर्फ़ वही नहीं जो भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ, यह एक सार्वभौम प्रक्रिया है। इस पर गम्भीरतापूर्व सोचा नहीं गया।’ इसी प्रकार हजारीप्रसाद द्विवेदी, नागार्जुन, केदारनाथ सिंह, हरिवंश राय बच्चन, हरिशंकर परसाई, दूधनाथ सिंह, सोमदत्त, काशीनाथ सिंह, चित्रकार भाऊ समर्थ तथा फ़िराक़ गोरखपुरी, अलग-अलग समय पर हुई मुलाक़ातों-वार्ताओं को जोड़कर उन्होंने इनमें से हर किसी को हमारे और नज़दीक ला दिया है। ज़ाहिर है इनके साथ इन संस्मरणों में हम उस दौर के साहित्यिक वातावरण और उनके समकालीन अन्य लोगों को भी देखते हैं। एक संग्रहणीय पुस्तक।
Tumi Chir Sarathi
- Author Name:
Taranand Viyogi
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Memories based on Nagarjun
Nainitala Nainitala
- Author Name:
Pushpesh Pant
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आदमी ही शहर में नहीं बसता, शहर भी आदमियों में बसते हैं। दरअसल, हरेक आदमी की अपनी ज़मीन और जड़ें होती हैं, जिनसे वह ताउम्र आज़ाद नहीं होना चाहता; भले ही ज़िन्दगी की भागमभाग—उसकी मर्ज़ी से या उसके चाहे बिना—उसे उनसे कितना भी दूर कर दे। बेदख़ली के बावजूद वह अपनी ज़मीन को दिल में आबाद कर लेता है और इस तरह अपनी जड़ों को ज़िन्दा रखता है। ‘नैनीताला नैनीताला’ किताब इस सचाई का शिद्दत से अहसास कराती है, जिसमें पुष्पेश पन्त ने नैनीताल का ऐसा रससिक्त बखान किया है जो इस पहाड़ी शहर से उनके अपने रिश्ते का बयान तो है ही; अनगिनत लोगों, इमारतों, दुकानों, सड़कों, ढलानों, चढ़ाइयों, गाड़ियों, सूर्योदय, सूर्यास्त समेत तमाम तरह के नज़ारों के हवाले से उतना ही पुख़्ता शहरनामा भी है। उनका निजी भी इस किताब में जाने-देखे-सुने लोगों के क़िस्सों के साथ मिलकर एकमेक हो गया है। गागर में सागर की मानिन्द नैनीताल का भूगोल, इतिहास, संस्कृति, समाज, आर्थिकी सब कुछ अपने भीतर समेटे हुए; जितना संस्मरण उतनी ही शहरगाथा! ग़ौर से देखें तो इसमें एक झलक उस हिन्दुस्तान की भी दिख जाएगी जिसकी बुनियाद बेशक सुदूर अतीत में पड़ गई थी लेकिन जो आज़ादी के आसपास शक्ल ले रहा था और उसके बाद के एक-दो दशक में मुकम्मल हुआ। यादों का सफ़रनामा!
Diddi : Shivani Ki Kahani
- Author Name:
Ira Pande
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‘दिद्दी : शिवानी की कहानी’ में हम हिन्दी की अत्यन्त लोकप्रिय कथाकार शिवानी को उनकी बेटी की निगाहों से देखते हैं। यह भी कह सकते हैं कि यहाँ हमें वह शिवानी दिखती हैं जिन्हें हम उनकी साहित्यिक छवि में अक्सर नहीं पाते। हाँ, उनकी कहानियों और उनके पात्रों में हम ज़रूर उस स्त्री को पहचान सकते हैं जो एक ख़ास वातावरण में एक ख़ास दृष्टि से संसार को देख रही थी। यह किताब उनके इस वातावरण को भी प्रकाशित करती है, और उसके बीच बनती एक कथाकार की यात्रा को भी। एक भारतीय घर-परिवार की संस्तरीकृत संरचना में मानवीय संवेदना के अनेकानेक रंगों के साथ उन्होंने उसकी विडम्बनाओं को कैसे समझा और फिर उसे अपनी कथा ऋचाओं में अंकित किया, यह वृत्तान्त हमें यह जानने में भी मदद करता है। शिवानी के साथ इस पुस्तक में कुमाऊँनी समाज की संस्कृति और समाज के विभिन्न पक्षों से भी हमारा परिचय होता है, और उनकी कुछ चर्चित रचनाओं और उनकी पृष्ठभूमि से भी।
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Book
17/05/2025
safwan sumra
sac