Fighter Ki Diary
(0)
Author:
Maitreyi PushpaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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वर्दी क्या होती है, जानती हो? वह क्या महज़ कोई पोशाक होती है, जैसा कि समझा जाता है। सुनो वह पोशाक के रूप में ‘ताक़त’ होती है। उसी ताक़त को तुम चाहती हो। जिसको कमज़ोर मान लिया गया है, उसे ताक़त की तमन्ना हर हाल में होगी। हाँ, वह वर्दी तुम पर फबती है। ताक़त या शक्ति हर इनसान पर फबती है। लेकिन फबती तभी है जब वर्दीरूपी ताक़त का उपयोग नाइंसाफ़ी से लड़ने के लिए होता है। यह मनुष्यता को बचाने के लिए तुम्हें सौंपी गई वह ताक़त है, जो तुम्हारे स्वाभिमान की रक्षा करती है। सच मानो वर्दी तुम्हारी शख़्सियत का आईना है। स्त्री की कोशिश में अगर ज़िद न मिलाई जाए तो उसका मुक़ाम दूर ही रहेगा। सच में औरत की अपनी ज़िद ही वह ताक़त है जो उसे रूढ़ियों, जर्जर मान्यताओं के जंजाल से खींचकर खुली दुनिया में ला रही है। नहीं तो सुमन जैसी लड़कियों की पढ़ाई छुड़वाकर उसे घर बिठा दिया जाता। मेरे ख़याल में आप त्रियाहठ का अर्थ उस तरह समझ रही हैं कि जो दृढ़ संकल्प हमारे जीवन को उन्नति की ओर ले जाए। ‘नहीं, शादी नहीं। मैं घर से भाग जाऊँगी’ अम्मी के सामने यह कहा तो अम्मी की आँखें कौड़ी की तरह खुली रह गर्इं। उनके होंठों में हरकत थी, जैसे कह रही हों—भाग जाएगी! भाग जाएगी!!—उन्होंने जो साफ़ तौर पर कहा, वह तीर की तरह चुभा हिना को—‘भाग जा, रंडियों के कोठे पर बैठ जाना और तू करेगी क्या?’ —इसी पुस्तक से।
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वर्दी क्या होती है, जानती हो? वह क्या महज़ कोई पोशाक होती है, जैसा कि समझा जाता है। सुनो वह पोशाक के रूप में ‘ताक़त’ होती है। उसी ताक़त को तुम चाहती हो।
जिसको कमज़ोर मान लिया गया है, उसे ताक़त की तमन्ना हर हाल में होगी। हाँ, वह वर्दी तुम पर फबती है। ताक़त या शक्ति हर इनसान पर फबती है। लेकिन फबती तभी है जब वर्दीरूपी ताक़त का उपयोग नाइंसाफ़ी से लड़ने के लिए होता है। यह मनुष्यता को बचाने के लिए तुम्हें सौंपी गई वह ताक़त है, जो तुम्हारे स्वाभिमान की रक्षा करती है। सच मानो वर्दी तुम्हारी शख़्सियत का आईना है।
स्त्री की कोशिश में अगर ज़िद न मिलाई जाए तो उसका मुक़ाम दूर ही रहेगा। सच में औरत की अपनी ज़िद ही वह ताक़त है जो उसे रूढ़ियों, जर्जर मान्यताओं के जंजाल से खींचकर खुली दुनिया में ला रही है। नहीं तो सुमन जैसी लड़कियों की पढ़ाई छुड़वाकर उसे घर बिठा दिया जाता। मेरे ख़याल में आप त्रियाहठ का अर्थ उस तरह समझ रही हैं कि जो दृढ़ संकल्प हमारे जीवन को उन्नति की ओर ले जाए।
‘नहीं, शादी नहीं। मैं घर से भाग जाऊँगी’ अम्मी के सामने यह कहा तो अम्मी की आँखें कौड़ी की तरह खुली रह गर्इं। उनके होंठों में हरकत थी, जैसे कह रही हों—भाग जाएगी! भाग जाएगी!!—उन्होंने जो साफ़ तौर पर कहा, वह तीर की तरह चुभा हिना को—‘भाग जा, रंडियों के कोठे पर बैठ जाना और तू करेगी क्या?’
—इसी पुस्तक से।
Book Details
-
ISBN9788126722877
-
Pages232
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पियर बेरजे फ़्रांस के प्रसिद्ध उद्योगपति थे और कला, फ़ैशन तथा अन्य सामाजिक-राजनीतिक कार्यों के प्रोत्साहन के लिए अपने संसाधनों का प्रयोग करते थे। ईव सांलौरां (1 अगस्त, 1936—1 जून, 2008) के साथ मिलकर उन्होंने एक फ़ैशन-लेबल की स्थापना की। ईव बीसवीं सदी के अग्रणी फ़ैशन डिजाइनरों में गिने जाते हैं और माना जाता है कि उन्होंने फ़ैशन उद्योग को ही नहीं, फ़ैशन कला को भी एक नई दिशा दी। रेडी-टू-वियर परिधानों की ईजाद का श्रेय उन्हें ही जाता है। यह पुस्तक इन दोनों के प्रेम की मार्मिक दास्तान है। ईव की मृत्यु ब्रेन कैंसर से हुई थी और उससे पहले उनका कलाकार-मन अपने व्यक्ति-सत्य और आन्तरिक सुख की तलाश में कुछ ख़तरनाक रास्तों पर भी भटका था। पियर बेरजे से ईव की मुलाक़ात 1958 में हुई थी और पहली ही निगाह में बेरजे उनसे आत्मा की गहराइयों से प्यार करने लगे थे। बीच में वे अलग भी हुए लेकिन जो रिश्ता बेरजे के हृदय की शिराओं में बिंध चुका था, उसे उन्होंने न सिर्फ़ ईव के जीवन के अन्त तक बल्कि अपने जीवन के अन्त तक निभाया। पत्र-शैली में लिखी इस किताब के पत्र बेरजे ने ईव के निधन के उपरान्त लिखने शुरू किए। गहन शोक और अन्तरंगता के हृदय-द्रावक उद्गारों से सम्पन्न इन पत्रों में हम प्रेम के हर उस रंग को देख सकते हैं जो किसी भी सच्चे प्रेम में सम्भव है और ज़ाहिर है, उनकी जीवन-कथा के सूत्र तो इसमें शामिल हैं ही। साथ ही फ़ैशन के इतिहास के कुछ महत्त्वपूर्ण क्षणों से भी हमारा साक्षात्कार यहाँ होता है।
Shakuntal
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Kalidas +1
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महाभारत के आदिपर्व में उपलब्ध एक छोटे-से आख्यान पर आधारित महाकवि कालिदास का नाटक ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ संस्कृत रंगमंच की शास्त्रीय नाट्य-परम्परा का अप्रतिम उदाहरण है, जिसका हिन्दी रूपान्तर सुप्रसिद्ध कहानीकार और नाटककार मोहन राकेश ने 'शाकुंतल' के नाम से वर्षों पहले किया था। संस्कृत की सम्पूर्ण नाट्य-परम्परा में ‘शाकुंतल’ अपने कथ्य एवं संरचना की दृष्टि से एक बेजोड़ नाटक इस अर्थ में भी है कि इसे पढ़कर प्राय: यह भ्रम हो जाता है कि भरत ने अपने 'नाट्यशास्त्र' के लिए इस नाटक को आधार बनाया अथवा कालिदास ने ‘नाट्यशास्त्र’ से प्रेरणा ग्रहण करके इस नाटक की रचना की। वास्तव में यहाँ शास्त्र और रचनात्मक लेखन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। प्रेम जैसे शाश्वत कथ्य पर आश्रित होकर भी 'शाकुंतल' में प्रेम की जिस परिणति एवं पराकाष्ठा का चित्रण किया गया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। मानवीय सम्बन्धों के बेहद मार्मिक, सूक्ष्म और गहरे प्रसंगों के लिए ‘शाकुंतल’ सदैव अपना सर्वोपरि स्थान बनाए रखेगा। डेढ़-दो हज़ार वर्षों के लम्बे अन्तराल की अग्निपरीक्षा से गुज़रकर भी ‘शाकुंतल’ उतना ही नया और ताज़ा लगता है। हमें विश्वास है कि अपने रूपान्तर में पाठकों, अध्येताओं और रंगकर्मियों के बीच ‘शाकुंतल’ का पुन: वैसा ही स्वागत होगा, जैसा कि पहले संस्करण के समय हुआ था।
Sanlap
- Author Name:
Bhagwandas Morwal +2
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अपनी साफ़गोई, कथा-विषयों की विविधता और अपनी रचनाओं के लिए श्रम-साध्य शोध और उद्यमिता के लिए सुपरिचित कथाकार भगवानदास मोरवाल इस पुस्तक में उन मुद्दों पर बात कर रहे हैं, जिनका ताल्लुक उनके लेखन, उनकी पुस्तकों, और पात्रों के अलावा हमारे समय, समाज और हिन्दी साहित्य के परिदृश्य से भी है। इस पुस्तक में उनके साक्षात्कार संकलित हैं। ये साक्षात्कार न सिर्फ़ उनके बारे में बताते हैं, बल्कि इन प्रश्नोत्तरों के माध्यम से भारतीय समाज के विरोधाभासों, उसकी बेचैनियों और बतौर एक नागरिक लेखक की ज़िम्मेदारियों पर भी रौशनी डालते हैं। ‘काला पहाड़’ जैसे चर्चित उपन्यास से हिन्दी क्षितिज पर उभरे मोरवाल यहाँ इसके अलावा अन्य उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया और उनके साथ जुड़े अपने सरोकारों को भी रेखांकित करते हैं। अपने समाज और ख़ासतौर पर, मेवात क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक बनावट से उनका गहरा परिचय रहा है, जो उनके कई उपन्यासों में भी प्रकट हुआ है, यहाँ इस बारे में वे और विस्तार से बात करते हैं; समाज और साहित्य के विभिन्न मुद्दों पर उनकी बेलाग अभिव्यक्ति तो इन साक्षात्कारों का आकर्षण है ही।
Meghdoot : Ek Antaryatra
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
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‘मेघदूत’ एक कालजयी कृति ही नहीं प्रेम, प्रकृति और निसर्ग के प्रति कालिदास की अनन्य प्रपत्ति भी है। अपने विशिष्ट स्वर, स्वरूप और न्यास में यह काव्य एक अप्रतिम एवं इन्द्रधनुषी भाव-वितान है, जिसमें कृतिकार की अपूर्व परिकल्पना, मौलिक उद्भावना तथा बिम्बों और वर्णों की जीवन्त छवियाँ सहज ही देखी जा सकती हैं। कालिदास ने अपनी यशस्वी कृति ‘मेघदूत’ के द्वारा जिस रूपक-राज्य का निर्माण किया था—पिछली दो सहस्राब्दियों से उसका निरन्तर विकास और विस्तार होता रहा है। विरही यक्ष के मनोजगत में विद्यमान एक आर्तप्रेमी के प्रणयोत्सुक प्रार्थी भाव को अनुषंग बनाकर—अपनी प्राण-प्रियतमा को भेजे जानेवाले विरहातुर सन्देश को कई रचनाकारों, भाष्यकारों और रूपान्तरकारों और चित्रकारों ने अपने-अपने ढंग से, अलग-अलग शैलियों में निरूपित किया है। प्रसंगानुरूप और प्रसंगान्तर परिदृश्य को अपने विरहकातर निवेदन से मुखर करनेवाली इस कालातीत रचना का अनुगायन और अनुकीर्तन न केवल सदियों से होता रहा है, बल्कि आधुनिक और समकालीन पीढ़ियाँ भी इसमें अपनी रचनात्मक भावांजलि लिए खड़ी रही हैं। अपनी सर्जनात्मक समग्रता के नाते और ‘क्लासिकी’ के गुणों से समृद्ध एवं समादृत ‘मेघदूत’ ने काव्य और काव्येतर माध्मयों के द्वारा सहृदय पाठकों, प्रेक्षकों, गायकों और समीक्षकों की क्षमता और आकांक्षाओं के अनुरूप सुदीर्घ रचना-प्रकिया एवं परम्परा को जीवित रखा है। इसी अनुक्रम में हिन्दी के सुपरिचित विद्वान, आलोचक, कवि एवं रचनाकार प्रभाकर श्रोत्रिय ने ‘मेघदूत’ के मार्मिक प्रसंगों, अछूते अनुषंगों—और सबसे बढ़कर—रचनाकार की विराट मनोभूमि का स्पर्श एवं अनुभावन अपनी विदग्ध रचना मनीषा के द्वारा किया है। ‘मेघदूत : एक अन्तर्यात्रा’ पुस्तक प्रेमी और प्रकृति के शाश्वत एवं चिरन्तन आधान को सुललित और सर्जनात्मक आयाम प्रदान करेगी—इसमें सन्देह नहीं।
J. Krishnamurti Ke Darshnik Vichar
- Author Name:
Swati Gautam
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प्रसिद्ध दार्शनिक, आध्यात्मिक विषयों के लेखक एवं प्रवचनकार जे. कृष्णमूर्ति ने विभिन्न स्थानों पर विभिन्न वार्त्ताओं में अनगिनत विषयों पर बात की। उन्हीं विषयों में से कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों पर उनके विचारों को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। हमारे रिश्ते, दुःख का जन्म कैसे होता है? हमारी व्यवस्थाएँ कैसी हैं? हमारा मन कैसे काम करता है? ध्यान, प्रेम, मृत्यु। अपने जीवन में हम कैसे संबंध स्थापित करें ? भले ही हम इस अत्यधिक समाज में रह रहे हैं, परंतु यही आधुनिकता हमें अपना दास बना रही है। यदि हम दास हैं तो हम स्वतंत्र कैसे हुए ? हम पूरी दुनिया को अपने नए-नए आविष्कारों से अचंभित कर रहे हैं, परंतु हमारा मन अब तक हमारी बात नहीं मानता। हमारे रिश्ते बस एक-दूसरों से अपेक्षा पर ही टिके हुए हैं; क्या हो अगर हमारी अपेक्षाएँ खत्म हो जाएँ? मृत्यु कैसे हमारे जीवन का ही एक पहलू है, वह हमसे भिन्न नहीं है। कैसे हम अपने जीवन में सुख की तलाश में अनगिनत दुःखों का कारण बनते हैं। क्या सुख कोई ऐसी वस्तु है, जिसे बाहरी रूप से प्रकट किया जा सकता है? या फिर वह हमारे मन की एक अवस्था है, जहाँ सुख से जन्म लेता है। क्या प्रेम एक-दूसरे के प्रति आकर्षण और एक-दूसरे के लेन-देन पर ही संबंधित है या प्रेम एक भिन्न अवस्था है? जो किसी पुष्प-खुशबू की भाँति है, सबके लिए और सभी जगह। प्रेम की असली परिभाषा क्या है ? और अंतिम विषय जिसकी इस पुस्तक में चर्चा की गई है, वह है ध्यान; ध्यान क्या है, ध्यान क्यों आवश्यक है ? आध्यात्मिक और दार्शनिक उन्नयन के लिए एक आवश्यक पुस्तक ।
Jirah Ajudhia
- Author Name:
Rakesh Tewari
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‘रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद’ को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। ‘जिरह अजुधिया : एक पुरातत्त्ववेत्ता की कलम से’ उन सबसे इस मामले में अलग है कि इसे उस व्यक्ति ने लिखा है जो इस विवाद के सबसे निर्णायक मोड़ पर विवादित स्थल के सबसे निकट था। न सिर्फ वहाँ मौजूद बल्कि उस प्रक्रिया में शामिल भी जो उस जगह की सदियों पुरानी मिट्टी को छानकर वास्तविकता के प्रमाण जुटाने के लिए की जा रही थी। न्यायालय द्वारा विवादित स्थल के पुरावशेषों की जाँच और संग्रह का काम जब पुरातत्त्व विभाग को सौंपा गया, राकेश तिवारी उस समय इस विभाग के निदेशक थे। उन्हीं के नेतृत्व में वह अभिलेखीकरण हुआ जो न्यायालय के अन्तिम फैसले का भी आधार बना। इस पुस्तक में उन्होंने उस पूरी प्रक्रिया और उससे सम्बन्धित अदालती जिरह का ब्योरेवार विवरण दिया है, इस विवाद की पूरी राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ। निष्पक्ष और तथ्यों-साक्ष्यों पर आधारित वह पूरा घटनाक्रम भी इस पुस्तक में उपलब्ध है जो तमाम बहसों और विवादों के घटाटोप में इस तरह सामने नहीं आ सकता था। लेखक ने पुरातत्त्ववेत्ताओं और इतिहासकारों के उन मतों का भी संक्षिप्त लेकिन सारभूत रूप में उल्लेख किया है जो अयोध्या और राम की ऐतिहासिकता को लेकर बीच-बीच में सामने आते रहे।
Smriti Aur Dansh : Vibhajan, Nirantarata Aur Teesri Pirhi
- Author Name:
Balwant Kaur
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जैसे-जैसे मैं जीवन में आगे बढ़ती गई, मैंने कट्टरपन्थियों के पागलपन का विरोध करने की हमेशा कोशिश की, चाहे वे किसी भी समुदाय के हों।...मुझे पता था कि मेरे बचपन के सपनों का भारत बिखर गया था। शायद बलवन्त का भारत भी बिखर गया इसीलिए मैं और वह इस असामान्य प्रस्तावना के ज़रिये एक सह-अनुभूति रखते हैं, जिसे मैं पेश कर रही हूँ क्योंकि जब मैं इस अशान्त राष्ट्र के इतिहास को याद करती हूँ तो मेरा मन इसी तरह भटकता है। -उमा चक्रवर्ती इतिहासकार क्या बलवन्त कौर की यह कृति आत्मकथा, साहित्य-अध्ययन, इतिहास और समाजशास्त्र के बीच आवाजाही करती है? नहीं; यह इन सबको एक साथ लाकर बल्कि मिलाकर अन्दरूनी सरहदों से मुक्त एक अवकाश बनाती है जिसमें आप किसी अनुशासन के प्रति आत्मसजग हुए बगैर घूम-फिर सकते हैं। आपको पता नहीं चलता कि कब व्यक्तिगत संस्मरण सुनते-सुनते साहित्यिक कृतियों के साथ आपका संवाद शुरू हो गया और कब इतिहासकारों तथा समाजशास्त्रियों के हवाले से आप हिंसा, पहचान, अन्यीकरण, विभाजन-विस्थापन के सवालों से दो-चार होने लगे। विभाजन और उसकी निरन्तरता पर यह निस्सन्देह एक अनोखी किताब है। —संजीव कुमार आलोचक
Smriti Aur Dansh : Vibhajan, Nirantarata Aur Teesri Pirhi
Balwant Kaur
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