Gudia Bhitar Gudiya
(0)
Author:
Maitreyi PushpaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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यह है मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा का दूसरा भाग। ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ के बाद ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’। आत्मकथाएँ प्रायः बेईमानी की अभ्यास-पुस्तिकाएँ लगती हैं क्योंकि कभी सच कहने की हिम्मत नहीं होती तो कभी सच सुनने की। अक्सर लिहाज़ में कुछ बातें छोड़ दी जाती हैं तो कभी उन्हें बचा-बचाकर प्रस्तुत किया जाता है। मैत्रेयी ने इसी तनी रस्सी पर अपने को साधते हुए कुछ सच कही हैं—अक्सर लक्ष्मण-रेखाओं को लाँघ जाने का ख़तरा भी उठाया है। मैत्रेयी ने डॉ. सिद्धार्थ और राजेन्द्र यादव के साथ अपने सम्बन्धों को लगभग आत्महंता बेबाकी के साथ स्वीकार किया है। यहाँ सबसे दिलचस्प और नाटकीय सम्बन्ध हैं पति और मैत्रेयी के बीच, जो पत्नी की सफलताओं पर गर्व और यश को लेकर उल्लसित हैं मगर सम्पर्कों को लेकर ‘मालिक’ की तरह सशंकित। घर-परिवार के बीच मैत्रेयी ने वह सारा लेखन किया है जिसे साहित्य में बोल्ड, साहसिक और आपत्तिजनक इत्यादि न जाने क्या-क्या कहा जाता है और हिन्दी की बदनाम मगर अनुपेक्षणीय लेखिका के रूप में स्थापित हैं। ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ एक स्त्री के अनेक परतीय व्यक्तित्व और एक लेखिका की ऐसी ईमानदार आत्म-स्वीकृतियाँ हैं जिनके साथ होना शायद हर पाठक की मजबूरी है। हाँ, अब आप सीधे मुलाक़ात कीजिए ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ यानी साहित्य की अल्मा कबूतरी के साथ।
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यह है मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा का दूसरा भाग। ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ के बाद ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’। आत्मकथाएँ प्रायः बेईमानी की अभ्यास-पुस्तिकाएँ लगती हैं क्योंकि कभी सच कहने की हिम्मत नहीं होती तो कभी सच सुनने की। अक्सर लिहाज़ में कुछ बातें छोड़ दी जाती हैं तो कभी उन्हें बचा-बचाकर प्रस्तुत किया जाता है। मैत्रेयी ने इसी तनी रस्सी पर अपने को साधते हुए कुछ सच कही हैं—अक्सर लक्ष्मण-रेखाओं को लाँघ जाने का ख़तरा भी उठाया है।
मैत्रेयी ने डॉ. सिद्धार्थ और राजेन्द्र यादव के साथ अपने सम्बन्धों को लगभग आत्महंता बेबाकी के साथ स्वीकार किया है। यहाँ सबसे दिलचस्प और नाटकीय सम्बन्ध हैं पति और मैत्रेयी के बीच, जो पत्नी की सफलताओं पर गर्व और यश को लेकर उल्लसित हैं मगर सम्पर्कों को लेकर ‘मालिक’ की तरह सशंकित।
घर-परिवार के बीच मैत्रेयी ने वह सारा लेखन किया है जिसे साहित्य में बोल्ड, साहसिक और आपत्तिजनक इत्यादि न जाने क्या-क्या कहा जाता है और हिन्दी की बदनाम मगर अनुपेक्षणीय लेखिका के रूप में स्थापित हैं।
‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ एक स्त्री के अनेक परतीय व्यक्तित्व और एक लेखिका की ऐसी ईमानदार आत्म-स्वीकृतियाँ हैं जिनके साथ होना शायद हर पाठक की मजबूरी है।
हाँ, अब आप सीधे मुलाक़ात कीजिए ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ यानी साहित्य की अल्मा कबूतरी के साथ।
Book Details
-
ISBN9788126722426
-
Pages352
-
Avg Reading Time12 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम’ ने कहा है—लोक पर जब कोई विपत्ति आती है तब वह त्राण पाने के लिए मेरी अभ्यर्थना करता है परन्तु जब मुझ पर कोई संकट आता है तब मैं उसके निवारणार्थ पवनपुत्र का स्मरण करता हूँ। अवतार श्रीराम का यह कथन हनुमानजी के महान व्यक्तित्व का बहुत सुन्दर प्रकाशन कर देता है। श्रीराम का कितना अनुग्रह है उन पर कि वे अपने लौकिक जीवन के संकटमोचन के श्रेय का सौभाग्य सदैव उन्हीं को प्रदान करते हैं और कैसे शक्तिपुंज हैं हनुमान कि जो श्रीराम तक के कष्ट का तत्काल निवारण कर सकते हैं। भगवान श्रीराम के प्रति अपनी अपूर्व, अद्भुत, अप्रतिम, एकान्त भक्ति के कारण अन्य की इसी प्रकार की भक्ति का आलम्बन बन जानेवाला हनुमान जैसा कोई अन्य उदाहरण विश्व में नहीं। यही कारण है कि संस्कृत से लेकर समस्त मध्यकालीन और आधुनिक भारतीय भाषाओं में श्री हनुमान में परम पावन चरित्र का गान किया गया है और उनके मन्दिर भारतवर्ष के प्रत्येक कोने में पाए जाते हैं। इस पुस्तक की रचना में ‘वाल्मीकीय रामायण’, ‘अध्यात्म रामायण’ तथा ‘आनन्द रामायण’ से विशेष सहायता ली गई है। ‘स्कंदपुराण’, ‘पद्मपुराण’ आदि एवं ‘महाभारत’ (वनपर्व) भी रचना में सहायक सिद्ध हुए हैं। गोस्वामी तुलसीदास की कृतियों—‘रामचरितमानस’, ‘विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’, ‘कवितावली’ एवं ‘कम्बन’ रचित ‘कम्ब रामायण’ (तमिल रचना) से भी यत्र-तत्र सहायता ग्रहण की गई है। इनके अतिरिक्त श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ रचित ‘आंजनेय' कल्याण पत्रिका के ‘हनुमानांक’ (1975 ई.) तथा डॉ. गोविन्दचन्द्र राय की पुस्तक ‘हनुमान के देवत्व और मूर्ति का विकास’ आदि से भी यथावसर सामग्री प्राप्त की गई है।
Boskiyana
- Author Name:
Gulzar +1
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गुलज़ार से बातें...'माचिस' के, 'हू-तू' के, 'ख़ुशबू', 'मीरा' और 'आँधी' के बहुरंगी लेकिन सादा गुलज़ार से बातें...फ़िल्मों में अहसास को एक किरदार की तरह उतारनेवाले और गीतों-नज़्मों में ज़िंदगी के जटिल सीधेपन को अपनी विलक्षण उपमाओं और बिम्बों में खोलनेवाले गुलज़ार से उनकी फ़िल्मों, उनकी शायरी, उनकी कहानियों और उस मुअम्मे के बारे में बातें जिसे गुलज़ार कहा जाता है। उनके रहन-सहन, उनके घर, उनकी पसंद-नापसंद और वे इस दुनिया को कैसे देखते हैं और कैसे देखना चाहते हैं, इस पर बातें...यह बातों का एक लम्बा सिलसिला है जो एक मुलायम आबोहवा में हमें समूचे गुलज़ार से रू-ब-रू कराता है। यशवंत व्यास गुलज़ार-तत्त्व के अन्वेषी रहे हैं। वे उस लय को पकड़ पाते हैं जिसमें गुलज़ार रहते और रचते हैं। इस लम्बी बातचीत से आप उनके ही शब्दों में कहें तो 'गुलज़ार से नहाकर' निकलते हैं।
Aamne-Saamne
- Author Name:
Namvar Singh +2
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नामवर सिंह अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनका बोला-बताया अब भी ऐसा बहुत कुछ है जो सामने आना बाकी है। लम्बे समय तक उन्होंने व्यवस्थित ढंग से कुछ नहीं लिखा था; व्याख्यानों और वक्तव्यों के रूप में ही उन्होंने आलोचना के नए-नए पैमाने तोड़े और बनाए। युवाओं, वरिष्ठों, छात्रों-पत्रकारों और समकालीन रचनाकारों को दिए साक्षात्कारों में भी उन्होंने सदैव एक उत्तरदायी आलेचकीय चेतना को अभिव्यक्ति दी। उनकी आश्चर्यजनक स्मृति, वैचारिक स्पष्टता और आस्वादपरक समीक्षा के चलते व्याख्यानों की तरह उनके साक्षात्कार भी सदैव चर्चित रहे। इस पुस्तक में उनके ऐसे साक्षात्कारों को संकलित किया गया है जो अब तक किसी और पुस्तक में नहीं आए थे। कई वरिष्ठ और कनिष्ठ रचनाकारों और सम्पादकों के साथ हुए ये वार्तालाप उनकी आलोचना-दृष्टि, समकालीन रचनात्मकता पर उनके विचारों और सरोकारों को रेखांकित करते हैं। इनमें से कुछ साक्षात्कार इसलिए और भी दिलचस्प है कि इनमें उन्होंने किसी एक ही रचनाकार या कृति पर केन्द्रित प्रश्नों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। मसलन स्वयं प्रकाश, त्रिलोचन, काशीनाथ सिंह का ‘काशी का अस्सी’ आदि पर केन्द्रित बातचीत। साक्षात्कारकर्ताओं में भी अलग-अलग पीढ़ियों के लोग हैं; जिन्होंने अपने-अपने ढंग से उनसे अपनी जिज्ञासाओं पर विचार-विनिमय किया है।
Chaitanya Mahaprabhu
- Author Name:
Amritlal Nagar
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चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव वैष्णव धर्म के विकास में एक चमत्कारी घटना है। एक गहरे आवेश और भावनात्मकता के साथ सारे जनसामान्य तक वैष्णव धर्म को पहुँचाने का काम पहले बंगाल में और बाद में सम्पूर्ण देश में, चैतन्य महाप्रभु ने किया। मधुर भाव की नाम–संकीर्तन पद्धति चैतन्य की देन है। इसी के साथ वैष्णव धर्म ने एक नए युग में प्रवेश किया। प्रस्तुत पुस्तक में पहली बार चैतन्य के व्यक्तित्व के इस योगदान को सम्पूर्णता के साथ उजागर किया गया है।
लेकिन इस पुस्तक का उद्देश्य मात्र इतना ही नहीं है। विद्वान लेखक ने चैतन्य के व्यक्तित्व को तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों में भी रखकर देखा है। अपने समय के इतिहास में चैतन्य का व्यक्तित्व एक चुनौती की तरह उभरा और पराजित हिन्दू जाति को एक नई आस्था और नए आलोक से संयुक्त करने का काम भी चैतन्य ने किया।
उपन्यासकार नागर जी की लेखनी से प्रस्तुत चैतन्य की यह जीवनी पढ़ने पर एक उपन्यास का मज़ा तो देती है, साथ ही वैष्णव धर्म के उदार पथ के विकास में उनका महत्त्वपूर्ण और अद्वितीय योगदान भी सामने लाती है।
Khamosh Logon Ki Or Se By Dalai Lama
- Author Name:
Dalai Lama
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परम पूज्य दलाई लामा – खामोश लोगों की ओर से यह पुस्तक परम पूज्य दलाई लामा की आत्मकथात्मक कृति Voice for the Voiceless का हिंदी अनुवाद है। इसमें उन्होंने तिब्बत और तिब्बती लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए चीन के विरुद्ध अपने सात दशकों के शांतिपूर्ण संघर्ष को आत्मीयता से वर्णित किया है। पुस्तक में उन प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं जो चीन द्वारा तिब्बत और तिब्बतीयों को लेकर खड़े किए जाते हैं- और जो पाठकों के मन में भी स्वाभाविक रूप से उठते हैं। इसके साथ ही, अगली दलाई लामा की घोषणा और उससे जुड़ी जटिलताओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई है, जो वर्तमान में चीन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में गंभीर बहस का विषय बना हुआ है। इसकी भाषा और शैली प पू दलाई लामा के व्यक्तित्व की तरह ही सहज और सरल है।
Jeete Jee Allahabad
- Author Name:
Mamta Kaliya +1
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जीते जी इलाहाबाद सिर्फ संस्मरणात्मक कृति नहीं है, एक यात्रा है जिसमें हमें अनेक उन लोगों के शब्दचित्र मिलते हैं जिनके बिना आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास नहीं लिखा जा सकता और जो उस समय के इलाहाबाद के मन-प्राण होते थे।
Joothan-2
- Author Name:
Omprakash Valmiki
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जूठन’ ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा है। इसका पहला भाग बरसों पहले प्रकाशित होकर, आज हिन्दी दलित साहित्य और खासकर आत्मकथाओं की शृंखला में एक विशेष स्थान प्राप्त कर चुका है। वाल्मीकि जी अब हमारे बीच नहीं हैं, अपने जीवन-काल में उन्होंने 'जूठन’ के बाद साहित्य, समाज और संवेदना के दायरों में एक लम्बी यात्रा पूरी की। कई कथात्मक और आलोचनात्मक कृतियों के साथ उनके काव्य-संग्रह भी आए। 'जूठन’ का यह दूसरा भाग उनके उसी दौर का आख्यान है। आत्मकथा के इस दूसरे भाग की शुरुआत उन्होंने देहरादून की आर्डिनेंस फैक्ट्री में अपनी नियुक्ति से की है। नई जगह पर अपनी पहचान को लेकर आई समस्याओं के साथ-साथ यहाँ मजदूरों के साथ जुड़ी अपनी गतिविधियों का जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी साहित्यिक सक्रियता का भी विस्तार से उल्लेख किया है। सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय भाषा में लिखी गई यह पुस्तक देहरादून से जबलपुर और वहाँ से पुन: देहरादून की यात्रा करती हुई शिमला उच्च अध्ययन संस्थान और फिर उनके अस्वस्थ होने तक जाती है। दलित साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में 'जूठन’ के इस दूसरे भाग को पढ़ना एक अलग अनुभव है।
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