Idannamam
(0)
Author:
Maitreyi PushpaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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बऊ (दादी), प्रेम (माँ) और मन्दा...तीन पीढ़ियों की यह बेहद सहज कहानी तीनों को समानान्तर भी रखती है और एक-दूसरे के विरुद्ध भी। बिना किसी बड़बोले वक्तव्य के मैत्रेयी ने गहमागहमी से भरपूर इस कहानी को जिस आयासहीन ढंग से कहा है, उसमें नारी-सुलभ चित्रात्मकता भी है और मुहावरेदार आत्मीयता भी। हिन्दी कथा-रचनाओं की सुसंस्कृत, सटीक और बेरंगी भाषा के बीच गाँव की इस कहानी को मैत्रेयी ने लोक-कथाओं के स्वाभाविक ढंग से लिख दिया है, मानो मन्दा और उसके आसपास के लोग खुद अपनी बात कह रहे हों—अपनी भाषा और अपने लहजे में, बुंदेलखंडी लयात्मकता के साथ...अपने आसपास घरघराते क्रेशरों और ट्रैक्टरों के बीच।</p> <p>मिट्टी-पत्थर के ढोकों या उलझी डालियों और खुरदुरी छाल के आसपास की सावधान छँटाई करके सजीव आकृतियाँ उकेर लेने की अद्भुत निगाह है मैत्रेयी के पास—लगभग ‘रेणु’ की याद दिलाती हुई। गहरी संवेदना और भावनात्मक लगाव से लिखी गई यह कहानी बदलते, उभरते ‘अंचल’ की यातनाओं, हार-जीतों की एक निर्व्याज गवाही है...पठनीय और रोचक।</p> <p>—राजेन्द्र यादव
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बऊ (दादी), प्रेम (माँ) और मन्दा...तीन पीढ़ियों की यह बेहद सहज कहानी तीनों को समानान्तर भी रखती है और एक-दूसरे के विरुद्ध भी। बिना किसी बड़बोले वक्तव्य के मैत्रेयी ने गहमागहमी से भरपूर इस कहानी को जिस आयासहीन ढंग से कहा है, उसमें नारी-सुलभ चित्रात्मकता भी है और मुहावरेदार आत्मीयता भी। हिन्दी कथा-रचनाओं की सुसंस्कृत, सटीक और बेरंगी भाषा के बीच गाँव की इस कहानी को मैत्रेयी ने लोक-कथाओं के स्वाभाविक ढंग से लिख दिया है, मानो मन्दा और उसके आसपास के लोग खुद अपनी बात कह रहे हों—अपनी भाषा और अपने लहजे में, बुंदेलखंडी लयात्मकता के साथ...अपने आसपास घरघराते क्रेशरों और ट्रैक्टरों के बीच।</p>
<p>मिट्टी-पत्थर के ढोकों या उलझी डालियों और खुरदुरी छाल के आसपास की सावधान छँटाई करके सजीव आकृतियाँ उकेर लेने की अद्भुत निगाह है मैत्रेयी के पास—लगभग ‘रेणु’ की याद दिलाती हुई। गहरी संवेदना और भावनात्मक लगाव से लिखी गई यह कहानी बदलते, उभरते ‘अंचल’ की यातनाओं, हार-जीतों की एक निर्व्याज गवाही है...पठनीय और रोचक।</p>
<p>—राजेन्द्र यादव
Book Details
-
ISBN9788126703562
-
Pages424
-
Avg Reading Time14 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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निर्मल वर्मा हिन्दी के उन गिने-चुने साहित्यकारों में से हैं जिन्हें अपने जीवनकाल में ही अपनी कृतियों को क्लासिक बनते देखने का दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त हुआ है। प्रायः सभी आलोचक इस बात पर सहमत हैं कि हिन्दी में कहानी कहने की कला को एक निर्णायक मोड़ देने का श्रेय उन्हें है। उन्होंने भाषा को भी बदला और उसके प्रयोग की विधि को भी। उनके गद्य को पढ़ते हुए अपनी ही भाषा की सम्प्रेषणीयता हमें चकित कर देती है।
‘लाल टीन की छत’ उनका बेहद चर्चित उपन्यास है। यह उपन्यास उन्होंने 1970 में लिखना आरम्भ किया और अप्रैल 1974 में पूर्ण किया। दिल्ली, लन्दन और शिमला में लिखे गये इस उपन्यास में निर्मल वर्मा की रचनात्मकता अपने पूर्ण उत्कर्ष पर दिखाई देती है।
‘लाल टीन की छत’ एक ऐसी अकेली लड़की की गाथा है जो अपने छोटे भाई के साथ एक पहाड़ी शहर में रहती है। सर्दी की लम्बी, सूनी छुट्टियों में वह इधर-उधर भटकती रहती है। उसने अपने इर्द-गिर्द एक मायावी जाल-सा बुन लिया है जिसमें वह अधिकांश समय खुद अपनी सच्ची-झूठी स्मृतियों से खेलती रहती है। वह एक ऐसी सीमा पर खड़ी है, जिसके पीछे बचपन छूट चुका है और आनेवाला समय अनेक संकेतों और सन्देशों से भरा है। एक छोर पर अजीब-सा आतंक है, दूसरे छोर पर एक असहनीय सम्मोहन, और इन दोनों के बीच जो अँधेरी भूलभुलैया फैली है, यह उपन्यास उसके कोनों को छूता, पकड़ता, छोड़ता हुआ चलता है।
Samar Shesh Hai
- Author Name:
Abdul Bismillah
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Description:
अब्दुल बिस्मिल्लाह बहुचर्चित और बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न रचनाकार हैं। ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास के लिए इन्हें ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' से भी सम्मानित किया जा चुका है।
‘समर शेष है’ अब्दुल बिस्मिल्लाह का आत्म-कथात्मक उपन्यास है। कथा-नाटक है, सात-आठ साल का मातृविहीन एक बच्चा, जो कि पिता के साथ-साथ स्वयं भी भारी विषमता से ग्रसित है। लेकिन पिता का असामयिक निधन तो उसे जैसे एक विकट जीवन-संग्राम में अकेला छोड़ जाता है। पिता के सहारे उसने जिस सभ्य और सुशिक्षित जीवन के सपने देखे थे, वे उसे एकाएक ढहते हुए दिखाई दिए। फिर भी उसने साहस नहीं छोड़ा और पुरुषार्थ के बल पर अकेले ही अपने दुर्भाग्य से लड़ता रहा। इस दौरान उसे यदि तरह-तरह के अपमान झेलने पड़े तो किशोरावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ते हुए एक युवती के प्रेम और उसके ह्रदय की समस्त कोमलता का भी अनुभव हुआ। लेकिन इस प्रक्रिया में न तो वह कभी टूटा या पराजित हुआ और न ही अपने लक्ष्य को भूल पाया। कहने की आवश्यकता नहीं कि विपरीत स्थितियों के बावजूद संकल्प और संघर्ष के गहरे तालमेल से मनुष्य जिस जीवन का निर्माण करता है, यह कृति उसी की सार्थक अभिव्यक्ति है।
Mithila
- Author Name:
Amrit Tripathi
- Book Type:

- Description: मिथिला और कुसुमाकर के अधूरे प्रेम की कहानी है। उनमें भी मिथिला की ज़्यादा, कुसुमाकर की कम। एक पारम्परिक, संस्कारी परिवार की संगीत-प्रेमी मिथिला अन्तत: इस संसार से उस प्रेम के बिना ही विदा हो गई जिस प्रेम की प्यास उसकी आत्मा तक भरी हुई थी। संगीत में गहरी रुचि का धनी कुसुमाकर जीवन की आवश्यकताओं के मद्देनज़र पहले उससे दूर चला जाता है, उसे ख़्याल भी नहीं आता कि जिस मिथिला को वह अपने ऑटोग्राफ़ देकर चला आया है, वही एक दिन उसके जीवन में लौटेगी। वह लौटी और उसकी अतृप्त रूह का एकमात्र आसरा बन गई, पर तब तक वह किसी और की हो चुकी थी। कोई ऐसा व्यक्ति उसके जीवन का कर्णधार हो गया था जो उसके मन को नहीं समझता था। लेकिन जो उसे आपादमस्तक समझता-जानता था, क्या वह उसका हो सकता था? नहीं। अन्तत: वही हुआ। मृत्यु-शैया पर लेटी हुई मिथिला ने उसे अपना अन्तिम पत्र लिखा, और उसके प्रति अपनी आत्मा में बसे प्यार को स्वीकार करते हुए बताया कि वह जा रही है, उस अज्ञात की ओर जहाँ हो सकता है वे कभी मिलें, या हो सकता है कभी नहीं मिलें। गहरे प्रेम से पगी इस प्रेम-कथा को पढ़ना अधूरी और अतृप्त रूहों से भरे हमारे वर्तमान को एक राहत देता है, और हमें सोचने पर भी विवश करता ह
Mera Daghestan
- Author Name:
R. Hamzatov
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- Description: प्रगीतात्मक शैली में लिखे गए इस उपन्यास में कथानक का कोई सुनिश्चित ढाँचा नहीं है। क़िस्सागोई की शैली को एक नया आयाम देनेवाली यह अनूठी कृति एक हद तक आत्मकथात्मक है, यह जीवनानुभवों का संस्मरणात्मक ब्योरा है, कहीं यह एकालाप जैसी है तो कहीं-कहीं आत्मस्वीकृतियों का रूप ले लेती है। ...धीरे-धीरे, और मानो अनजाने ही, रसूल हमजातोव की प्रस्तावित पुस्तक की ‘प्रस्तावना’ मातृभूमि, उसे प्यार करनेवाले बेटे के रवैये, कवि के दिलचस्प और कठिन कर्तव्य, उससे कुछ कम कठिन और कम दिलचस्प न होनेवाले नागरिक के कर्तव्य से सम्बन्धित अपने में सम्पूर्ण और सारगर्भित पुस्तक का रूप ले लेती है।
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