Mediyaya Namah
About the book
मीडिया की आधुनिक दुनिया निश्चित रूप से अनेक विकृतियों से भरी हुई है। कुछ अखबारी चेहरे भले ही नायक जैसी लगें, लेकिन उनके पीछे एक खलनायक छुपा होता है। गिरीश पंकज ने मीडिया की कुछ खामियों को उजागर करने का सार्थक प्रयास किया है। गिरीश पिछले तीस वर्षों से मीडिया से जुड़े हैं। इससे पहले, उन्होंने 'मिठलबरा की आत्मकथा’ नामक उपन्यास लिखा, जो तेलुगु और ओडिया भाषाओं में भी अनूदित हुआ है। यह व्यंग्य उपन्यास इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ कहने का व्यंग्य नहीं है, बल्कि शुरू से अंत तक उसमें व्यंग्य का तत्व निरंतर रहता है। इसकी भाषा रंजक, व्यंग्यपूर्ण, बेबाक और पाठक को बांधे रखने वाली है। कभी-कभी भाषा कुछ खुली-खुली भी लग सकती है, पर पूरी तरह से मर्यादित है। इस तरह के व्यंग्य उपन्यासों में अक्सर व्यंग्य खोजना पड़ता है, लेकिन ‘मीडियाय नमः’ में कहीं- कहीं व्यंग्य का समावेश हर कदम पर है। मुझे पूरा भरोसा है कि गिरीश का यह नया व्यंग्य उपन्यास बाजारवादी मीडिया के संकीर्ण, समझौता-प्रधान चेहरे को जानने में मदद करेगा।
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मीडिया की आधुनिक दुनिया निश्चित रूप से अनेक विकृतियों से भरी हुई है। कुछ अखबारी चेहरे भले ही नायक जैसी लगें, लेकिन उनके पीछे एक खलनायक छुपा होता है। गिरीश पंकज ने मीडिया की कुछ खामियों को उजागर करने का सार्थक प्रयास किया है। गिरीश पिछले तीस वर्षों से मीडिया से जुड़े हैं। इससे पहले, उन्होंने 'मिठलबरा की आत्मकथा’ नामक उपन्यास लिखा, जो तेलुगु और ओडिया भाषाओं में भी अनूदित हुआ है। यह व्यंग्य उपन्यास इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ कहने का व्यंग्य नहीं है, बल्कि शुरू से अंत तक उसमें व्यंग्य का तत्व निरंतर रहता है। इसकी भाषा रंजक, व्यंग्यपूर्ण, बेबाक और पाठक को बांधे रखने वाली है। कभी-कभी भाषा कुछ खुली-खुली भी लग सकती है, पर पूरी तरह से मर्यादित है। इस तरह के व्यंग्य उपन्यासों में अक्सर व्यंग्य खोजना पड़ता है, लेकिन ‘मीडियाय नमः’ में कहीं- कहीं व्यंग्य का समावेश हर कदम पर है। मुझे पूरा भरोसा है कि गिरीश का यह नया व्यंग्य उपन्यास बाजारवादी मीडिया के संकीर्ण, समझौता-प्रधान चेहरे को जानने में मदद करेगा।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Prabhat Prakashan
- Weight
- 350 grams
- ISBN-13
- 9789380186955
- Pages
- 192
- Reading time
- ~6 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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Mediyaya Namah arrives not as an outsider's critique but as an insider's confession. Girish Pankaj, a journalist with three decades spent navigating Indian newsrooms, writes a vyangya upanyas — a satirical novel — that sustains its ironic gaze from the first page to the last. Where most satire strikes and retreats, Pankaj embeds his critique within the very structure of the narrative, revealing how editorial heroism often masks entrepreneurial villainy. This is not the idealism of a young reporter but the disillusionment of someone who has watched compromise become currency. Following his earlier novel Mithlabara Ki Aatmakatha, which found audiences in Telugu and Odia translations, Pankaj here turns his lens on the profession that shaped him, offering readers a portrait of contemporary Indian media that refuses easy consolation or convenient villains.
मीडियाया नमः पढ़ते समय पाठक को किस तरह का अनुभव मिलेगा?
यह उपन्यास शुरू से अंत तक व्यंग्य की एक सुसंगत धारा बनाए रखता है। पाठक को कड़वी हंसी का अनुभव होगा — वह हंसी जो असहजता से भरी है क्योंकि यह उन चेहरों को बेनकाब करती है जिन्हें हम रोज़ विश्वास करते हैं। यह तीस वर्षों के पत्रकारिता अनुभव से उपजा व्यंग्य है, इसलिए इसमें भोलापन नहीं बल्कि मोहभंग की तीक्ष्णता है।
Mediyaya Namah किताब किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?
- जो पाठक मीडिया के पर्दे के पीछे की सच्चाइयों को समझना चाहते हैं
- हिंदी व्यंग्य साहित्य के प्रेमी जो तीखे सामाजिक आलोचना की परतें खोलना पसंद करते हैं
- पत्रकारिता या मीडिया अध्ययन में रुचि रखने वाले जो व्यावहारिक नैतिक द्वंद्वों को देखना चाहते हैं
- जो आदर्शवादी नहीं बल्कि यथार्थवादी कथाएं पढ़ने के लिए तैयार हैं
भारतीय मीडिया की विकृतियों पर यह उपन्यास आज के पाठकों के लिए क्यों प्रासंगिक है?
आज जब सोशल मीडिया और 24×7 न्यूज़ चैनलों का दबदबा है, तब मीडिया की नैतिक जवाबदेही पर सवाल उठाना और भी ज़रूरी हो गया है। यह उपन्यास उस समय लिखा गया जब पेड न्यूज़, कॉर्पोरेट नियंत्रण और पत्रकारीय समझौते भारतीय समाज में गहरे उतर रहे थे। आज भी जब हम किसी खबर पर भरोसा करते हैं, तो यह किताब हमें याद दिलाती है कि नायक के चेहरे के पीछे क्या छुपा हो सकता है।
गिरीश पंकज की मीडिया पर टिप्पणी को अन्य आलोचनाओं से क्या अलग बनाता है?
गिरीश पंकज तीस वर्षों से मीडिया के भीतर रहे हैं, इसलिए उनका व्यंग्य बाहरी आलोचना नहीं बल्कि आंतरिक साक्ष्य है। वे उन समझौतों को जानते हैं जो न्यूज़रूम में रोज़ होते हैं। मीडियाया नमः में व्यंग्य सिर्फ संवाद में नहीं बल्कि कथा की संरचना में बुना गया है, जिससे यह एक निरंतर व्यंग्यात्मक अनुभव बन जाता है।
Mediyaya Namah उपन्यास पढ़कर पाठक के मन में क्या छाप बची रहेगी?
Mediyaya Namah किताब पाठक को मीडिया को देखने की एक नई, सजग और आलोचनात्मक दृष्टि प्रदान करती है। भावनात्मक रूप से, यह मोहभंग की अनुभूति छोड़ती है लेकिन साथ ही व्यंग्य की वह समझ भी देती है जो समाज की विसंगतियों को पहचानने में मदद करती है।
