Baandi
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Author:
Bhairavprasad GuptPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
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प्रस्तुत उपन्यास ह्रासशील सामन्तवाद को उसके सम्पूर्ण घिनौने पहलुओं के साथ, बड़ी बारीकी से हमारे समक्ष पेश करता है। इस ह्रासशील सामन्तवाद को उसकी सारी सड़ांध के साथ हम बड़े सरकार के चरित्र, उनके क्रियाकलापों, जो उनके अन्तःपुर से लेकर बाहर के परिवेश तक फैले हुए हैं, सामन्ती साम्राजी साँठ-गाँठ और उसके शिकार साधारण जनों की ज़िन्दगी तथा नरक की इस ज़िन्दगी से मुक्त होने की उनकी कोशिशों तथा मुक्त न हो पाने की स्थिति में उनकी छटपटाहट, प्रतिहिंसा आदि में देखते हैं। भैरव जी ने इस सारे परिदृश्य को यथार्थ के सही आलोक में बारीकी के साथ देखा और चित्रित किया है।
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About the Book
प्रस्तुत उपन्यास ह्रासशील सामन्तवाद को उसके सम्पूर्ण घिनौने पहलुओं के साथ, बड़ी बारीकी से हमारे समक्ष पेश करता है। इस ह्रासशील सामन्तवाद को उसकी सारी सड़ांध के साथ हम बड़े सरकार के चरित्र, उनके क्रियाकलापों, जो उनके अन्तःपुर से लेकर बाहर के परिवेश तक फैले हुए हैं, सामन्ती साम्राजी साँठ-गाँठ और उसके शिकार साधारण जनों की ज़िन्दगी तथा नरक की इस ज़िन्दगी से मुक्त होने की उनकी कोशिशों तथा मुक्त न हो पाने की स्थिति में उनकी छटपटाहट, प्रतिहिंसा आदि में देखते हैं।
भैरव जी ने इस सारे परिदृश्य को यथार्थ के सही आलोक में बारीकी के साथ देखा और चित्रित किया है।
Book Details
-
ISBNBaandiPaperBack
-
Pages255
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रेम की न कोई भाषा होती है, न परिभाषा, न सीमाएँ उसे सीमित करती हैं, न दूरियाँ उसे ओझल करती हैं, वह दूरी जीवन और मृत्यु भी क्यों न हों! ‘पूर्णमिदम्’ के बाद सरोज कौशिक का यह उपन्यास ‘पूर्णमदः’; अलग-अलग होते हुए भी ये दोनों उपन्यास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। वह अध्यात्म के आलोक में प्रकाशमान, तो यह जीवन के संघर्षों ने बीच के पवित्र दीप को अपने सचेत आत्मबोध की ओट में बचाते हुए एक सघन यात्रा। ‘पूर्णमदः’ में पीड़ा है, अतीत के दुखते घाव हैं, स्मृति में कौंधती विविधवर्णी छवियाँ हैं, चहुँओर व्याप्त कालिमा में अपने अन्तस की पवित्रता को निष्कलंक रखते अपने मूल्यों को बचाने का संघर्ष है; और जीवन तथा समाज में मनुष्य की आत्मा को कचोटतीं, खोखला करतीं अपूर्णताओं के बरक्स पूर्ण को बचाने और अगली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखने की कामना है। भावनाओं के सघन चित्रों से परिपूर्ण एक पठनीय औपन्यासिक कृति।
Chaturang (Raj)
- Author Name:
Ravindranath Thakur +1
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‘चतुरंग’ मूलत: जीवन के प्रयोजनों और उनकी उपलब्धि के बीच अनिर्णीत संघर्ष का कथा-प्रयोग है। अब तक हुई तमाम बौद्धिक व्याख्याओं की पहुँच के परे इस संघर्ष का प्रारम्भ कहीं भौतिक परिवेश में दिखाई देता है, कहीं तर्क और विवेक की जुगलबन्दी में और कहीं मनो-जगत में पलती आत्म-प्रताड़णा में; और तीनों ही स्रोतों से यह हमारे आधुनिक विचार-जगत में प्रवेश करता दिखता है। शचीश, श्रीविलास, दामिनी और लीलानन्द स्वामी इसे अपने-अपने स्तर पर जीते हैं—अध्यात्म और भक्ति के दिशाहारा आवेग में, दैहिक प्रेम की तृषार्त-भीरु गुफाओं में, जीवन के भीतर, जीवन के बाहर, प्रभंजन के व्यामोह से घिरे-घिरे। ताऊ जी (जगमोहन) इस कथा को रवीन्द्रनाथ की तत्कालीन सामाजिक चिन्ताओं से जोड़ते हैं, देहरी लाँघने की व्याकुलता तक।
Mediyaya Namah
- Author Name:
Girish Pankaj
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मीडिया की आधुनिक दुनिया निश्चित रूप से अनेक विकृतियों से भरी हुई है। कुछ अखबारी चेहरे भले ही नायक जैसी लगें, लेकिन उनके पीछे एक खलनायक छुपा होता है। गिरीश पंकज ने मीडिया की कुछ खामियों को उजागर करने का सार्थक प्रयास किया है। गिरीश पिछले तीस वर्षों से मीडिया से जुड़े हैं। इससे पहले, उन्होंने 'मिठलबरा की आत्मकथा’ नामक उपन्यास लिखा, जो तेलुगु और ओडिया भाषाओं में भी अनूदित हुआ है। यह व्यंग्य उपन्यास इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ कहने का व्यंग्य नहीं है, बल्कि शुरू से अंत तक उसमें व्यंग्य का तत्व निरंतर रहता है। इसकी भाषा रंजक, व्यंग्यपूर्ण, बेबाक और पाठक को बांधे रखने वाली है। कभी-कभी भाषा कुछ खुली-खुली भी लग सकती है, पर पूरी तरह से मर्यादित है। इस तरह के व्यंग्य उपन्यासों में अक्सर व्यंग्य खोजना पड़ता है, लेकिन ‘मीडियाय नमः’ में कहीं- कहीं व्यंग्य का समावेश हर कदम पर है। मुझे पूरा भरोसा है कि गिरीश का यह नया व्यंग्य उपन्यास बाजारवादी मीडिया के संकीर्ण, समझौता-प्रधान चेहरे को जानने में मदद करेगा।
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