Sindhu
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‘सिंधु’ एक उपन्यास है जो सिंधु घाटी की प्राचीन सभ्यता का एक काल्पनिक वर्णन सामने लाता है। 'सिंधु' की कहानी का तानाबाना लेखक ने बहुत क़ायल करने वाले अन्दाज़ में सहज ढंग से ऐतिहासिक तथ्यों के इर्द-गिर्द बुना है। मोअनजो-दड़ो (या लोकप्रिय मोहन जोदड़ो) के उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों से अवांछित आज़ादी नहीं ली है। सिंधु के साहिली इलाक़े में पनपने वाले सामाजिक जीवन (परंपराएँँ, रहन-सहन) और रोज़गार (खेती-बाड़ी, ईंट-भट्टे) का आपस में तार्किक संबंध है। खुदाई में मिलने वाली मोहरों, बर्तनों, मूर्तियों आदि की बुनियााद पर इस इलाक़े की मान्यताएँँ , रीति-रिवाज और सामाजिक और प्रारंभिक राजनैतिक व्यवस्थाओं की एक दिलकश और मोहक दुनिया इस उपन्याास में उकेरी गई है। जीम अब्बासी (असली नाम मुहम्मद जमील) का जन्म सिंध में नवाबशाह ज़िले के कंडियारो में हुआ था। उनकी प्राथमिक कहानियाँ 2015 में कराची से प्रकाशित होने वाली उर्दू पत्रिका ‘आज’ में प्रकाशित हुईं। कहानियों का एक संग्रह, ‘ज़र्द हथेली’ और पहला उपन्यास ‘रक़्स-नामा’ 2020 में किताबी शक्ल में, ‘आज की किताबें’ के ज़ेर-ए-एहतिमाम प्रकाशित हुए। जीम अब्बासी ने अपनी धार्मिक शिक्षा कंडियारो में हासिल की और वहीं पले-बढ़े, बाद में वो हैदराबाद चले गए। अब वो कराची में ही मुस्तक़िल तौर से रहते हैं।
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‘सिंधु’ एक उपन्यास है जो सिंधु घाटी की प्राचीन सभ्यता का एक काल्पनिक वर्णन सामने लाता है। 'सिंधु' की कहानी का तानाबाना लेखक ने बहुत क़ायल करने वाले अन्दाज़ में सहज ढंग से ऐतिहासिक तथ्यों के इर्द-गिर्द बुना है। मोअनजो-दड़ो (या लोकप्रिय मोहन जोदड़ो) के उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों से अवांछित आज़ादी नहीं ली है। सिंधु के साहिली इलाक़े में पनपने वाले सामाजिक जीवन (परंपराएँँ, रहन-सहन) और रोज़गार (खेती-बाड़ी, ईंट-भट्टे) का आपस में तार्किक संबंध है। खुदाई में मिलने वाली मोहरों, बर्तनों, मूर्तियों आदि की बुनियााद पर इस इलाक़े की मान्यताएँँ , रीति-रिवाज और सामाजिक और प्रारंभिक राजनैतिक व्यवस्थाओं की एक दिलकश और मोहक दुनिया इस उपन्याास में उकेरी गई है। जीम अब्बासी (असली नाम मुहम्मद जमील) का जन्म सिंध में नवाबशाह ज़िले के कंडियारो में हुआ था। उनकी प्राथमिक कहानियाँ 2015 में कराची से प्रकाशित होने वाली उर्दू पत्रिका ‘आज’ में प्रकाशित हुईं। कहानियों का एक संग्रह, ‘ज़र्द हथेली’ और पहला उपन्यास ‘रक़्स-नामा’ 2020 में किताबी शक्ल में, ‘आज की किताबें’ के ज़ेर-ए-एहतिमाम प्रकाशित हुए। जीम अब्बासी ने अपनी धार्मिक शिक्षा कंडियारो में हासिल की और वहीं पले-बढ़े, बाद में वो हैदराबाद चले गए। अब वो कराची में ही मुस्तक़िल तौर से रहते हैं।
Book Details
-
ISBN9788197855702
-
Pages137
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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—कृष्णमोहन
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चिरन्तन नारी युग-युग के अन्धकार में, उसे तुच्छ करके चिरकाल से आगे बढ़ती जा रही है, दु:ख और विपत्ति के अँधियारे पथ को पददलित करती हुई। उसे कोई भय नहीं है, कोई चिन्ता नहीं है। यही वह भाव है, यही वह मूल-मंत्र है, जिसके इर्द-गिर्द प्रसिद्ध उपन्यासकार सियारामशरण गुप्त जी ने इस उपन्यास का ताना-बाना बुना है, जो रोचक है, उत्कृष्ट मनोरंजन प्रदान करनेवाला है, और दिशाहीन होते समाज को सही दिशा दिखानेवाला भी है।
नारी सहित प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की सृष्टि है। इसी कारण ईश्वर की तरह वह गहन भी है। ईश्वर की तरह ही कष्ट सहन करके ही उसे ईश्वरीय शक्ति उपलब्ध करना होगा। उचित यही है, करणीय यही है। यही वह मान्यता है, यही वह सिद्धान्त है, जिसे इस उपन्यास में निरूपित किया गया है, स्थापित किया गया है। उपन्यास के पात्र जैसे सजीव होकर इन सर्वोच्च मान्यताओं को अपने क्रिया-कलापों और संवादों से इस प्रकार पूर्णता से स्थापित करते चलते हैं कि पाठक के मन-मस्तिष्क पर उसका स्थायी प्रभाव पड़े।
Alama Kabutari
- Author Name:
Maitreyi Pushpa
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मंसाराम कज्जा है और कदमबाई कबूतरी। नाजायज़ सन्तान है राणा—न कबूतरा न कज्जा। दोनों के बीच भटकता त्रिशंकु—संवेदनशील और स्वप्नदर्शी किशोर। अल्मा और राणा के बीच पनपते रागात्मक संबंधों की यह कहानी सिर्फ़ इतनी ही नहीं है कि राणा कल्पनालोक में रहता है और अल्मा जि़ंदगी के कठोर अनुभवों में पक रही है—वह हर स्थिति को सीढ़ी बनाकर दीवारें फाँदती कबूतरी है। 'अल्मा कबूतरी’ उस वास्तविक यथार्थ की जटिल नाटकीय कहानी है जो हमारे अनजाने ही आस-पास घटित हो रही है। अपनी उपस्थिति से हमें बेचैन करती है...
कभी-कभी सड़कों, गलियों में घूमते या अख़बारों की अपराध-सुर्ख़ियों में दिखाई देनेवाले कंजर, साँसी, नट, मदारी, सँपेरे, पारदी, हाबूड़े, बनजारे, बावरिया, कबूतरे—न जाने कितनी जन-जातियाँ हैं जो सभ्य समाज के हाशियों पर डेरा लगाए सदियाँ गुज़ार देती हैं—हमारा उनसे चौकन्ना सम्बन्ध सिर्फ़ कामचलाऊ ही बना रहता है। उनके लिए हम हैं कज्जा और 'दिकू’—यानी सभ्य-संभ्रांत परदेसी’, उनका इस्तेमाल करनेवाले शोषक—उनके अपराधों से डरते हुए, मगर उन्हें अपराधी बनाए रखने के आग्रही। हमारे लिए वे ऐसे छापामार गुरिल्ले हैं जो हमारी असावधानियों की दरारों से झपट्टा मारकर वापस अपनी दुनिया में जा छिपते हैं। कबूतरा पुरुष या तो जंगल में रहता है या जेल में...स्त्रियाँ शराब की भट्टियों पर या हमारे बिस्तरों पर...
अंग्रेज़ों के गज़टों-गज़ेटियरों में उनके नाम हैं 'अपराधी कबीले’ या सरकश जन-जातियाँ। मगर रामसिंह की माँ भूरी कबूतरी अपना सम्बन्ध जोड़ती है रानी पद्मिनी और राणा प्रताप से, शिवाजी और झाँसी की प्रति-रानी झलकारी बाई से—यानी उन सबसे जिन्होंने किसी साम्राज्य के आगे सिर नहीं झुकाया, भले ही इसके लिए वनवास की गुमनामी का ही वरण क्यों न करना पड़ा हो।
स्वतंत्र भारत में समाज की मुख्यधारा के किनारे फेंक दिए गए इन 'अदृश्य’ लोगों की लड़ाई आज भी जारी है, आज भी वे कमंद और सीढ़ियाँ लगाकर हमारी दुर्ग-दीवारों पर चढ़ते हें तो ऊपर बैठे हम तीर-कमान साधे उनका शिकार करने का सुख पाते हैं।
इन्हीं 'अपरिचित’ लोगों की कहानी इस बार उठाई है कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने 'अल्मा कबूतरी’ में। यह 'बुंदेलखंड की विलुप्त होती जनजातीय का समाज-वैज्ञानिक अध्ययन’ बिलकुल नहीं है, हालाँकि कबूतरा समाज का लगभग सम्पूर्ण ताना-बाना यहाँ मौजूद है—यहाँ के लोग-लुगाइयाँ, उनके प्रेम-प्यार, झगड़े, शौर्य इस क्षेत्र को गुंजान किए हैं।
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