Chhavigriha Mein Andhera Hai
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Author:
Sushil Gupta, Sunil GangopadhyayPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
299
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बंगला-साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार सुनील गंगोपाध्याय की यह कृति उनके महत्त्वपूर्ण औपन्यासिक रचनाओं में शुमार है। इसमें दो परिवारों की कहानी समानान्तर धाराओं में चलती है। एक परिवार पूँजीपति शिवशंकर लाहिड़ी का है जिसने अपने एक सिनेमा हॉल को अपनी ज़िद के कारण बन्द कर दिया है और हड़ताली कर्मचारियों के आगे झुकने को किसी भी हालत में तैयार नहीं है। दूसरी कहानी उसी सिनेमा हॉल के एक कर्मचारी रमेश मुखर्जी के परिवार की है जो इस हड़ताल के कारण खाने-पीने की बुनियादी सुविधाओं के लिए मोहताज है। लेकिन विडम्बना यह है कि दोनों के बेटे अपने-अपने पिताओं से झगड़ा करके अलग रह रहे हैं। लेखक ने इस दोनों परिवारों की स्थितियों के तनाव को इतने संवेदनशील रूप से रचा है कि वह पाठकों में एक रचनात्मक बेचैनी भर देता है। इन दोनों परिवारों की कहानियों के बीच धीमी मगर विरल लय में एक प्रेम कहानी की अन्तःसलिल धारा बढ़ रही है जो मीठी आँच की तरह प्यारी और सुखद लगती है। स्थितियों, चरित्रों और घटनाओं का रचनात्मक संयोजन पाठकों को अपने बहाव में इस तरह लिए चलता है कि पाठक इस कृति को एक ही बैठक में पूरा पढ़ जाना चाहेंगे, ऐसा हमारा विश्वास है।
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About the Book
बंगला-साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार सुनील गंगोपाध्याय की यह कृति उनके महत्त्वपूर्ण औपन्यासिक रचनाओं में शुमार है। इसमें दो परिवारों की कहानी समानान्तर धाराओं में चलती है। एक परिवार पूँजीपति शिवशंकर लाहिड़ी का है जिसने अपने एक सिनेमा हॉल को अपनी ज़िद के कारण बन्द कर दिया है और हड़ताली कर्मचारियों के आगे झुकने को किसी भी हालत में तैयार नहीं है। दूसरी कहानी उसी सिनेमा हॉल के एक कर्मचारी रमेश मुखर्जी के परिवार की है जो इस हड़ताल के कारण खाने-पीने की बुनियादी सुविधाओं के लिए मोहताज है। लेकिन विडम्बना यह है कि दोनों के बेटे अपने-अपने पिताओं से झगड़ा करके अलग रह रहे हैं। लेखक ने इस दोनों परिवारों की स्थितियों के तनाव को इतने संवेदनशील रूप से रचा है कि वह पाठकों में एक रचनात्मक बेचैनी भर देता है।
इन दोनों परिवारों की कहानियों के बीच धीमी मगर विरल लय में एक प्रेम कहानी की अन्तःसलिल धारा बढ़ रही है जो मीठी आँच की तरह प्यारी और सुखद लगती है।
स्थितियों, चरित्रों और घटनाओं का रचनात्मक संयोजन पाठकों को अपने बहाव में इस तरह लिए चलता है कि पाठक इस कृति को एक ही बैठक में पूरा पढ़ जाना चाहेंगे, ऐसा हमारा विश्वास है।
Book Details
-
ISBN9788126710317
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘राह दर बदर’ गोविन्द मिश्र का नया उपन्यास है जिसे हम उपन्यास विधा के सन्दर्भ में भी एक ‘नया उपन्यास’ कह सकते हैं। जो चीज़ इसे एक औपन्यासिक कृति बनाती है वह किसी एक पात्र की केन्द्रीय अथवा आद्योपान्त उपस्थिति नहीं बल्कि एक ‘थीम’ का क्रमशः विकास है। इस थीम का ताल्लुक़ भारतीय स्त्री से, उसके अस्मिता-बोध की पिछली आधी सदी से भी ज़्यादा लम्बी यात्रा से है। गोविन्द मिश्र स्वयं इसे ‘मध्यवर्गीय भारतीय नारी की अन्तश्चेतना का 1940 से 2020 तक का क्रमिक विकास’ कहते हैं और यह भी कि इसी के चलते यह कृति जितनी साहित्यिक है, उतनी ही समाजशास्त्रीय भी। भारतीय स्त्री ने पिछली सदी के उत्तरार्द्ध और मौजूदा सदी के अब तक के वर्षों में एक लम्बा सफ़र अपने भीतर भी किया है, और समाज के सार्वजनिक स्पेस में भी। परिवार और विवाह के स्वरूप में भी काफ़ी बदलाव आया है, लेकिन शायद उतना नहीं, जितना गुणात्मक परिवर्तन भारतीय स्त्री की प्राथमिकताओं में आया है। यह उपन्यास इस परिवर्तन की धारा को रेखांकित करते हुए भविष्य के विषय में भी कुछ प्रश्न छोड़ता है, जो स्त्री के साथ समाज के लिए भी विचारणीय हैं, और पुरुष के लिए भी। एक दिलचस्प और विचारोत्तेजक कथा-कृति!
Mantra-Viddh
- Author Name:
Rajendra Yadav
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‘मंत्र-विद्ध’ प्यार की खुरदरी कहानी है—आज की मूर्तिकला की तरह... तारक और सुरजीत कौर के बीच एक तीसरा ‘व्यक्ति’ और है, और वह है प्यार! तारक अपने को समझाते हुए, दूसरे आदमी की निग़ाह से सारी स्थिति को देखता है और स्वयं आतंकित रहता है कि क्या सचमुच वीरता का वह क्षण उसी ने धारण किया था...क्षण अथवा आवेश-भरे दबाव का शायद एक ऐसा विस्फोट, जिसका अनुभव केवल कायर ही कर सकता है। यानी परम वीरता के काम पक्के कायर के सिवा कोई दूसरा नहीं कर सकता! प्यार जैसे रिश्ते और मानवीय आशा-आकांक्षा के साथ प्रायः ही उठ खड़े होने वाले द्वन्द्व का एक अलग ही कोण दिखाती है यह कथाकृति। तारक स्वयं को जिस रूप में प्रस्तुत करता है, वास्तव में वह उसके विपरीत है अर्थात भीरु, शंकालु और जिम्मेदारियों से भागने वाला। उसके विपरीत स्वाभिमानी और जिम्मेदार सुरजीत सामन्ती घुटन से मुक्ति के लिए तारक का साथ स्वीकार करती है और अपनी शक्ति और अभावों की तरफ से आँखें मूँदकर प्रेम को हासिल कर लेने का स्वप्न देखती है। परस्पर विपरीत ध्रुवों की नजदीकी का यह त्रासद यथार्थ इस उपन्यास को प्रेम और व्यक्ति-सम्बन्धों के बारे में एक भिन्न ही कोण से सामने लाता है। अपने समय का एक चर्चित उपन्यास।
Mediyaya Namah
- Author Name:
Girish Pankaj
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मीडिया की आधुनिक दुनिया निश्चित रूप से अनेक विकृतियों से भरी हुई है। कुछ अखबारी चेहरे भले ही नायक जैसी लगें, लेकिन उनके पीछे एक खलनायक छुपा होता है। गिरीश पंकज ने मीडिया की कुछ खामियों को उजागर करने का सार्थक प्रयास किया है। गिरीश पिछले तीस वर्षों से मीडिया से जुड़े हैं। इससे पहले, उन्होंने 'मिठलबरा की आत्मकथा’ नामक उपन्यास लिखा, जो तेलुगु और ओडिया भाषाओं में भी अनूदित हुआ है। यह व्यंग्य उपन्यास इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ कहने का व्यंग्य नहीं है, बल्कि शुरू से अंत तक उसमें व्यंग्य का तत्व निरंतर रहता है। इसकी भाषा रंजक, व्यंग्यपूर्ण, बेबाक और पाठक को बांधे रखने वाली है। कभी-कभी भाषा कुछ खुली-खुली भी लग सकती है, पर पूरी तरह से मर्यादित है। इस तरह के व्यंग्य उपन्यासों में अक्सर व्यंग्य खोजना पड़ता है, लेकिन ‘मीडियाय नमः’ में कहीं- कहीं व्यंग्य का समावेश हर कदम पर है। मुझे पूरा भरोसा है कि गिरीश का यह नया व्यंग्य उपन्यास बाजारवादी मीडिया के संकीर्ण, समझौता-प्रधान चेहरे को जानने में मदद करेगा।
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