Chaturang (Raj)
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‘चतुरंग’ मूलत: जीवन के प्रयोजनों और उनकी उपलब्धि के बीच अनिर्णीत संघर्ष का कथा-प्रयोग है। अब तक हुई तमाम बौद्धिक व्याख्याओं की पहुँच के परे इस संघर्ष का प्रारम्भ कहीं भौतिक परिवेश में दिखाई देता है, कहीं तर्क और विवेक की जुगलबन्दी में और कहीं मनो-जगत में पलती आत्म-प्रताड़णा में; और तीनों ही स्रोतों से यह हमारे आधुनिक विचार-जगत में प्रवेश करता दिखता है। शचीश, श्रीविलास, दामिनी और लीलानन्द स्वामी इसे अपने-अपने स्तर पर जीते हैं—अध्यात्म और भक्ति के दिशाहारा आवेग में, दैहिक प्रेम की तृषार्त-भीरु गुफाओं में, जीवन के भीतर, जीवन के बाहर, प्रभंजन के व्यामोह से घिरे-घिरे। ताऊ जी (जगमोहन) इस कथा को रवीन्द्रनाथ की तत्कालीन सामाजिक चिन्ताओं से जोड़ते हैं, देहरी लाँघने की व्याकुलता तक।
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‘चतुरंग’ मूलत: जीवन के प्रयोजनों और उनकी उपलब्धि के बीच अनिर्णीत संघर्ष का कथा-प्रयोग है। अब तक हुई तमाम बौद्धिक व्याख्याओं की पहुँच के परे इस संघर्ष का प्रारम्भ कहीं भौतिक परिवेश में दिखाई देता है, कहीं तर्क और विवेक की जुगलबन्दी में और कहीं मनो-जगत में पलती आत्म-प्रताड़णा में; और तीनों ही स्रोतों से यह हमारे आधुनिक विचार-जगत में प्रवेश करता दिखता है। शचीश, श्रीविलास, दामिनी और लीलानन्द स्वामी इसे अपने-अपने स्तर पर जीते हैं—अध्यात्म और भक्ति के दिशाहारा आवेग में, दैहिक प्रेम की तृषार्त-भीरु गुफाओं में, जीवन के भीतर, जीवन के बाहर, प्रभंजन के व्यामोह से घिरे-घिरे। ताऊ जी (जगमोहन) इस कथा को रवीन्द्रनाथ की तत्कालीन सामाजिक चिन्ताओं से जोड़ते हैं, देहरी लाँघने की व्याकुलता तक।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2025
- Weight
- 140 grams
- ISBN-13
- 9789360865016
- Pages
- 128
- Reading time
- ~4 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 13 × 20 cm
- Language
- Hindi
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‘मंत्र-विद्ध’ प्यार की खुरदरी कहानी है—आज की मूर्तिकला की तरह... तारक और सुरजीत कौर के बीच एक तीसरा ‘व्यक्ति’ और है, और वह है प्यार! तारक अपने को समझाते हुए, दूसरे आदमी की निग़ाह से सारी स्थिति को देखता है और स्वयं आतंकित रहता है कि क्या सचमुच वीरता का वह क्षण उसी ने धारण किया था...क्षण अथवा आवेश-भरे दबाव का शायद एक ऐसा विस्फोट, जिसका अनुभव केवल कायर ही कर सकता है। यानी परम वीरता के काम पक्के कायर के सिवा कोई दूसरा नहीं कर सकता! प्यार जैसे रिश्ते और मानवीय आशा-आकांक्षा के साथ प्रायः ही उठ खड़े होने वाले द्वन्द्व का एक अलग ही कोण दिखाती है यह कथाकृति। तारक स्वयं को जिस रूप में प्रस्तुत करता है, वास्तव में वह उसके विपरीत है अर्थात भीरु, शंकालु और जिम्मेदारियों से भागने वाला। उसके विपरीत स्वाभिमानी और जिम्मेदार सुरजीत सामन्ती घुटन से मुक्ति के लिए तारक का साथ स्वीकार करती है और अपनी शक्ति और अभावों की तरफ से आँखें मूँदकर प्रेम को हासिल कर लेने का स्वप्न देखती है। परस्पर विपरीत ध्रुवों की नजदीकी का यह त्रासद यथार्थ इस उपन्यास को प्रेम और व्यक्ति-सम्बन्धों के बारे में एक भिन्न ही कोण से सामने लाता है। अपने समय का एक चर्चित उपन्यास।
Rah Dar Badar
- Author Name:
Govind Mishra
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‘राह दर बदर’ गोविन्द मिश्र का नया उपन्यास है जिसे हम उपन्यास विधा के सन्दर्भ में भी एक ‘नया उपन्यास’ कह सकते हैं। जो चीज़ इसे एक औपन्यासिक कृति बनाती है वह किसी एक पात्र की केन्द्रीय अथवा आद्योपान्त उपस्थिति नहीं बल्कि एक ‘थीम’ का क्रमशः विकास है। इस थीम का ताल्लुक़ भारतीय स्त्री से, उसके अस्मिता-बोध की पिछली आधी सदी से भी ज़्यादा लम्बी यात्रा से है। गोविन्द मिश्र स्वयं इसे ‘मध्यवर्गीय भारतीय नारी की अन्तश्चेतना का 1940 से 2020 तक का क्रमिक विकास’ कहते हैं और यह भी कि इसी के चलते यह कृति जितनी साहित्यिक है, उतनी ही समाजशास्त्रीय भी। भारतीय स्त्री ने पिछली सदी के उत्तरार्द्ध और मौजूदा सदी के अब तक के वर्षों में एक लम्बा सफ़र अपने भीतर भी किया है, और समाज के सार्वजनिक स्पेस में भी। परिवार और विवाह के स्वरूप में भी काफ़ी बदलाव आया है, लेकिन शायद उतना नहीं, जितना गुणात्मक परिवर्तन भारतीय स्त्री की प्राथमिकताओं में आया है। यह उपन्यास इस परिवर्तन की धारा को रेखांकित करते हुए भविष्य के विषय में भी कुछ प्रश्न छोड़ता है, जो स्त्री के साथ समाज के लिए भी विचारणीय हैं, और पुरुष के लिए भी। एक दिलचस्प और विचारोत्तेजक कथा-कृति!
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