Uttar-Poorva Bharat Ke Vikas Mein Neist Ki Praudyogikiyan
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Dr. D.D. Ojha, Dr. Mohan LalPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
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"किसी भी राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधन न केवल उसका गौरव होते हैं, वरन् उसकी वास्तविक संपत्ति भी होते हैं। ऐसे संसाधनों में मुख्य रूप से महत्त्वपूर्ण पौधे, पशु, पारंपरिक संपदाएँ और खनिज शामिल हैं। देश की 38 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में से उत्तर- पूर्वी क्षेत्र में स्थित एक महत्त्वपूर्ण प्रयोगशाला है- उत्तर-पूर्व विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (नॉर्थ- ईस्ट इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी - निस्ट)। यह प्रयोगशाला पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय प्रयोगशाला के रूप में अपनी विशेषज्ञताओं और क्षमताओं को बढ़ाते हुए विकास की ओर अग्रसर रही है। वस्तुतः इस संस्थान का उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत में उपलब्ध विपुल प्राकृतिक संपदाओं का दोहन करते हुए स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को विकसित करना, संबंधित क्षेत्र में विशिष्टता हासिल करना एवं आवश्यक क्षेत्र में अवसंरचना सुविधा प्रदान करना है। यह हर्ष का विषय है कि इस लब्धप्रतिष्ठ संस्थान ने अपनी स्थापना से अभी तक 125 से अधिक जनोपयोगी स्वदेशी प्रौद्योगिकियाँ विकसित की हैं जो कृषि, औषध, वी.एस. के. सीमेंट, तेल से संबंधित रसायनों, जैव-चिकित्सा, पेट्रो रसायनों से संबंधित हैं। इन कार्यों द्वारा देश के सामाजिक- आर्थिक एवं वैज्ञानिक क्षेत्र में अतुलनीय अवदान कर करोड़ों रुपयों का राजस्व भी प्राप्त किया है। 'उत्तर-पूर्व भारत के विकास में निस्ट की प्रौद्योगिकियाँ' विषयक बहुरंगी पुस्तक में निस्ट का परिचयात्मक विवेचन, अनुसंधान समूह, विकसित प्रौद्योगिकियों का विहंगावलोकन, नूतन प्रौद्योगिकियाँ, उद्यमिता एवं अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों पर रोचक हिंदी भाषा में सचित्र तकनीकी जानकारी प्रदान करने का सुप्रयास किया गया है, जिससे सभी वर्गों के सुधी पाठकगण लाभान्वित हो सकें।"
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"किसी भी राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधन न केवल उसका गौरव होते हैं, वरन् उसकी वास्तविक संपत्ति भी होते हैं। ऐसे संसाधनों में मुख्य रूप से महत्त्वपूर्ण पौधे, पशु, पारंपरिक संपदाएँ और खनिज शामिल हैं। देश की 38 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में से उत्तर- पूर्वी क्षेत्र में स्थित एक महत्त्वपूर्ण प्रयोगशाला है- उत्तर-पूर्व विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (नॉर्थ- ईस्ट इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी - निस्ट)। यह प्रयोगशाला पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय प्रयोगशाला के रूप में अपनी विशेषज्ञताओं और क्षमताओं को बढ़ाते हुए विकास की ओर अग्रसर रही है।
वस्तुतः इस संस्थान का उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत में उपलब्ध विपुल प्राकृतिक संपदाओं का दोहन करते हुए स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को विकसित करना, संबंधित क्षेत्र में विशिष्टता हासिल करना एवं आवश्यक क्षेत्र में अवसंरचना सुविधा प्रदान करना है। यह हर्ष का विषय है कि इस लब्धप्रतिष्ठ संस्थान ने अपनी स्थापना से अभी तक 125 से अधिक जनोपयोगी स्वदेशी प्रौद्योगिकियाँ विकसित की हैं जो कृषि, औषध, वी.एस. के. सीमेंट, तेल से संबंधित रसायनों, जैव-चिकित्सा, पेट्रो रसायनों से संबंधित हैं। इन कार्यों द्वारा देश के सामाजिक- आर्थिक एवं वैज्ञानिक क्षेत्र में अतुलनीय अवदान कर करोड़ों रुपयों का राजस्व भी प्राप्त किया है।
'उत्तर-पूर्व भारत के विकास में निस्ट की प्रौद्योगिकियाँ' विषयक बहुरंगी पुस्तक में निस्ट का परिचयात्मक विवेचन, अनुसंधान समूह, विकसित प्रौद्योगिकियों का विहंगावलोकन, नूतन प्रौद्योगिकियाँ, उद्यमिता एवं अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों पर रोचक हिंदी भाषा में सचित्र तकनीकी जानकारी प्रदान करने का सुप्रयास किया गया है, जिससे सभी वर्गों के सुधी पाठकगण लाभान्वित हो सकें।"
Book Details
-
ISBN9789355621443
-
Pages120
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Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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लोग श्रद्धा रखते हैं, देवाचार माननेवाले हैं, इसका यह मतलब नहीं कि लोग मूर्ख हैं और इसी कारण वे श्रद्धा, देवाचार, नैतिकता, पवित्रता आदि से सम्बन्धित बन्धनों का पालन करते हैं। हम देवताओं की ओर जाते हैं, वह चमत्कार के डर से नहीं बल्कि प्रेमभाव के कारण होता है। लेकिन प्रेम में भय और दहशत का कोई स्थान नहीं है। इस श्रद्धा में जो चीज़ें ग़ैरज़रूरी और अतार्किक हैं, उनका परीक्षण क्यों न किया जाए? कालबाह्य मूल्यों के प्रभावहीन होने से तथा नवविचारों के प्रभावी व्यवहार से लोग परिवर्तन चाहते हैं। हम जब ऐसा कहते हैं कि हिन्दू धर्म की बुनियादी मूल्य-व्यवस्था ही असमानता पर आधारित है, तो वास्तव में यह विधान भूतकाल को सम्बोधित करके किया गया होता है। जन्म से जातीय वरीयता का पुनरुज्जीवन आज कोई नहीं चाहता। प्रत्येक धर्म में मूल नीति तत्त्व बहुतांश रूप में समान हैं। प्रखर नास्तिक भी इसे स्वीकार करेगा। धर्म जब कर्मकांड मात्र रह जाता है, तब उसका विकृतिकरण होता है। क्या चमत्कार धर्मश्रद्धा का हिस्सा है?
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, "जिस शुद्ध हिन्दू धर्म का सम्मान मैं करता हूँ, वह चमत्कार पर आधारित नहीं है। चमत्कार एवं गूढ़ता के पीछे मत पड़ो। चमत्कार सत्य-प्राप्ति के मार्ग में आनेवाला सबसे बड़ा रोड़ा है। चमत्कारों का पागलपन हमें नादान और कमज़ोर बनाता है।"
इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में 'महाराष्ट्र अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति' विगत 24 वर्षों से कार्यरत है। अपने नि:स्वार्थ कार्यकर्ताओं के साथ उसने इस दौरान अनेक बार आन्दोलन किए हैं, अनेक बार अपनी जान जोखिम में डालकर और अपनी जेब से पैसा ख़र्च करके समाज में चल रहे अन्धविश्वासों के व्यापार का विरोध किया है। इस पुस्तक में ऐसे ही कुछ आन्दोलनों की रपट है। इन घटनाओं का विवरण पढ़कर पाठक स्वयं ही समझ सकता है कि अन्धविश्वासों से यह जंग कितनी ख़तरनाक लेकिन कितनी ज़रूरी है।
Mahila Lekhan Ke Sau Varsh
- Author Name:
Mamta Kaliya +1
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लेखन में बीसवीं सदी से आज तक का समय यदि एक प्रस्थान-बिन्दु के रूप में लिया जाए तो यह स्पष्ट है कि इन सौ वर्षों में स्त्रियों की लेखनी में सबसे अधिक परिवर्तन की प्रक्रिया दिखी। पुरुष-लेखन में मात्र एक पात्र होने की भूमिका से निकलकर स्त्री-लेखक ने स्वयं अपनी क़लम से अस्तित्व, व्यक्तित्व और विचार को अभिव्यक्ति देना अभीष्ट समझा। प्रस्तुत संकलन में स्त्री-रचनाकारों के कोमल संवेगों के साथ-साथ आत्मसजग सृजन और विकास-प्रक्रिया का परिचय मिलता है। राजेन्द्र बाला घोष (बंग महिला) से लेकर अलका सरावगी तक एक लम्बी परम्परा तैयार हुई है जहाँ क़लम की साँकलें कहीं अनायास तो कहीं सायास खुली हैं। हर्ष और गर्व का विषय है कि महिला-लेखन अब हिन्दी साहित्य में एक सशक्त सचेत और संवेदनायुक्त धारा है। आनेवाला समय यह याद रखे कि अपने इर्द-गिर्द खड़े किए समस्त चौखटे और कोष्ठक तोड़कर इक्कीसवीं सदी की स्त्री अपने पूरे तेवर के साथ हर क्षेत्र में उठ खड़ी हुई है। प्रस्तुत संकलन में हमें कहानी और निबन्ध, जीवनी और संस्मरण, आलोचना और विमर्श, गोया हर विधा और विषय पर स्त्री की तेजस्विता का परिचय मिलेगा। महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी से लेकर गीतांजलि श्री, मधु कांकरिया, सारा राय और अलका सरावगी तक अपने पूरे तेवर के साथ यहाँ मौजूद हैं। पृष्ठ सीमा के चलते कई विधाओं का मात्र उल्लेख ही कर पाये हैं। यहीं से अगले खंड की सम्भावना नज़र आती है।
Andhavishwas Unmoolan : Vol. 1 : Vichar
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
- Book Type:

- Description:
अंधविश्वास उन्मूलन और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। निरन्तर 25 वर्षों की मेहनत का फल है यह। अंधविश्वास उन्मूलन का कार्य महाराष्ट्र में विचार, उच्चार, आचार, संघर्ष, सिद्धान्त जैसे पंचसूत्र से होता आ रहा है। भारतवर्ष में ऐसा कार्य कम ही नज़र आता है।
'अंधविश्वास उन्मूलन : विचार' पुस्तक में अंधविश्वास उन्मूलन से सम्बन्धित बुनियादी बातों का ज़िक्र है। इसमें 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण', 'विज्ञान की कसौटी पर फलित ज्योतिष', 'वास्तुशास्त्र नहीं वास्तुश्रद्धाशास्त्र', 'छद्म विज्ञान अर्थात् स्यूडो साइंस', 'मनोविकार', 'भूतप्रेत बाधा या भूतावेश', 'सम्मोहन', 'देवी सवारना' जैसे विषयों पर विचार और विवेचन किया गया है जिससे यथार्थ और भ्रम का सदियों पुराना अन्तर स्पष्ट होता है।
लेखक के आत्मप्रत्यय और चेतना की नींव पर खड़ी यह पुस्तक अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जानेवाली परम्परा का तिमिर-भेद भी है और विज्ञान का लक्ष्य भी।
Vidhyarthiyon Ke Liye Gita
- Author Name:
Acharya Mayaram 'Patang'
- Book Type:

- Description:
‘गीता’ कालजयी ग्रंथ है। यह भक्ति के साथ-साथ कर्म की ओर प्रवृत्त करती है। अपने कर्तव्य-पथ से भटक रहे अर्जुन को श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान देकर ही कर्म-पथ पर प्रवृत्त किया। इसलिए हमारे जीवन में गीता का बहुत व्यावहारिक उपयोग है, महती योगदान है। विद्यार्थी काल में ही गीता का भाव समझ गए तो यह जीवन में पग-पग पर काम आएगा। जीने की कला आ जाएगी। आपत्तियों तथा कष्टकर परिस्थितियों में निराशा नहीं घेरेगी। अपने-पराए और मित्र-शत्रु के मोह से मुक्त होने का ज्ञान हो जाएगा। अधिकांश लोग सेवानिवृत्त होकर गीता पढ़ते हैं। जब सारा जीवन मोह, लोभ, काम, क्रोध और अहंकार की भेंट चढ़ गया, दुःख और संतापों का ताप सह लिया, तिल-तिल कर मरते रहे, फिर गीता पढ़ी तो क्या लाभ हुआ? पाप और पुण्य कर्मों का फल तो भोगना निश्चित ही हो गया! इस पुस्तक को विशेष रूप से छात्रों-विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। गीता के हर अध्याय में जो महत्त्वपूर्ण श्लोक हैं, जिन्हें स्मरण किया जा सके, गाया जा सके, उन्हें संकलित किया गया है। स्पष्ट है कि यह संपूर्ण गीता नहीं है, बल्कि मात्र प्रेरणा है। इसे पढ़कर छात्र सन्मति पाएँ, नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए सन्मार्ग पर चलकर जीवन में सफलता के शिखर पर पहुँचें, यही इस पुस्तक के लेखन का उद्देश्य है। विद्यार्थियों के चरित्र-निर्माण तथा कर्तव्य-पथ पर सतत चलने की प्रेरणा देनेवाली एक अनुपम पुस्तक।
Jharkhand Ki Adivasi Kala Parampara
- Author Name:
Manoj Kumar Kapardar
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प्राकृतिक संपदाओं और सौंदर्य से परिपूर्ण झारखंड कला की दृष्टि से एक समृद्ध राज्य है। दशकों पहले जब हजारीबाग के पास इसको के शैलचित्रों की खोज हुई थी, तब दुनिया ने जाना कि हमारे पूर्वज कितने कुशल चितेरे थे । ऐसी अनेक आकृतियों एवं निशानों से पटी पड़ी है झारखंड की धरती अब शोधकर्ता भी प्रकृति की इस अद्भ्रुत रचना का मर्म समझने में लगे हैं। संताल समाज के लोगों द्वारा सदियों से 'जादोपटिया कला' के प्रति खासा रुझान देखा गया है। इनके चित्रों में जीवन का जितना गहरा सार है, उतना ही गहरा रेखाओं का विस्तार है । यह कला संताली समाज में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती रही है। झारखंड का जनजातीय समाज इतना हुनरमंद है कि अपनी जरुरत की चीज से लेकर अन्य समाज की जरुरतों को भी पूरा करने में वह सक्षम है। शिल्पकला, चित्रकला और देशी उत्पादों से जरूरत के असंख्य सामान तैयार करने में जनजातीय समाज के कौशल का कोई सानी नहीं है। इनके घरों की दीवारों पर इतनी अद्भ्रुत चित्रकारी होती है कि उसकी मिसाल दुर्लभ है | मिट्टी, गेरू और पत्तों से बने रंण इतने सजीव तरीके से दीवारों पर उभरते हैं कि लगता है, सारा गाँव ही कलाकारों का गाँव है । इनकी कलाकृतियों में सिर्फ हुनर ही नहीं दिखता, बल्कि विभिन्न आकृतियों के माध्यम से समाज को संदेश भी देते हैं कि देखो, हमारा जीवन फूल, पत्ती, पशु-पक्षी और प्रकृति से कितनी गहराई से जुड़ा है।
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