Jharkhand Ki Adivasi Kala Parampara
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Author:
Manoj Kumar KapardarPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
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प्राकृतिक संपदाओं और सौंदर्य से परिपूर्ण झारखंड कला की दृष्टि से एक समृद्ध राज्य है। दशकों पहले जब हजारीबाग के पास इसको के शैलचित्रों की खोज हुई थी, तब दुनिया ने जाना कि हमारे पूर्वज कितने कुशल चितेरे थे । ऐसी अनेक आकृतियों एवं निशानों से पटी पड़ी है झारखंड की धरती अब शोधकर्ता भी प्रकृति की इस अद्भ्रुत रचना का मर्म समझने में लगे हैं। संताल समाज के लोगों द्वारा सदियों से 'जादोपटिया कला' के प्रति खासा रुझान देखा गया है। इनके चित्रों में जीवन का जितना गहरा सार है, उतना ही गहरा रेखाओं का विस्तार है । यह कला संताली समाज में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती रही है। झारखंड का जनजातीय समाज इतना हुनरमंद है कि अपनी जरुरत की चीज से लेकर अन्य समाज की जरुरतों को भी पूरा करने में वह सक्षम है। शिल्पकला, चित्रकला और देशी उत्पादों से जरूरत के असंख्य सामान तैयार करने में जनजातीय समाज के कौशल का कोई सानी नहीं है। इनके घरों की दीवारों पर इतनी अद्भ्रुत चित्रकारी होती है कि उसकी मिसाल दुर्लभ है | मिट्टी, गेरू और पत्तों से बने रंण इतने सजीव तरीके से दीवारों पर उभरते हैं कि लगता है, सारा गाँव ही कलाकारों का गाँव है । इनकी कलाकृतियों में सिर्फ हुनर ही नहीं दिखता, बल्कि विभिन्न आकृतियों के माध्यम से समाज को संदेश भी देते हैं कि देखो, हमारा जीवन फूल, पत्ती, पशु-पक्षी और प्रकृति से कितनी गहराई से जुड़ा है।
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प्राकृतिक संपदाओं और सौंदर्य से परिपूर्ण झारखंड कला की दृष्टि से एक समृद्ध राज्य है। दशकों पहले जब हजारीबाग के पास इसको के शैलचित्रों की खोज हुई थी, तब दुनिया ने जाना कि हमारे पूर्वज कितने कुशल चितेरे थे । ऐसी अनेक आकृतियों एवं निशानों से पटी पड़ी है झारखंड की धरती अब शोधकर्ता भी प्रकृति की इस अद्भ्रुत रचना का मर्म समझने में लगे हैं। संताल समाज के लोगों द्वारा सदियों से 'जादोपटिया कला' के प्रति खासा रुझान देखा गया है। इनके चित्रों में जीवन का जितना गहरा सार है, उतना ही गहरा रेखाओं का विस्तार है । यह कला संताली समाज में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती रही है।
झारखंड का जनजातीय समाज इतना हुनरमंद है कि अपनी जरुरत की चीज से लेकर अन्य समाज की जरुरतों को भी पूरा करने में वह सक्षम है। शिल्पकला, चित्रकला और देशी उत्पादों से जरूरत के असंख्य सामान तैयार करने में जनजातीय समाज के कौशल का कोई सानी नहीं है। इनके घरों की दीवारों पर इतनी अद्भ्रुत चित्रकारी होती है कि उसकी मिसाल दुर्लभ है | मिट्टी, गेरू और पत्तों से बने रंण इतने सजीव तरीके से दीवारों पर उभरते हैं कि लगता है, सारा गाँव ही कलाकारों का गाँव है । इनकी कलाकृतियों में सिर्फ हुनर ही नहीं दिखता, बल्कि विभिन्न आकृतियों के माध्यम से समाज को संदेश भी देते हैं कि देखो, हमारा जीवन फूल, पत्ती, पशु-पक्षी और प्रकृति से कितनी गहराई से जुड़ा है।
Book Details
-
ISBN9789355213938
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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डॉ. लोहिया का समाजवादी चिन्तन देश-प्रेम एवं जन-कल्याण की भावनाओं से ओतप्रोत है, उसका दर्शन नितान्त मौलिक है। जहाँ वे मार्क्स या गांधी से असहमत हैं, उन्होंने अत्यन्त निर्भीकता एवं ईमानदारी से अपनी असहमति व्यक्त की है। उन्होंने समाजवाद पर अत्यन्त गहराई से सोचा-समझा है। उनके समर्थकों का दावा है कि समाजवाद का अस्थिपंजर तो बहुत पहले से तैयार हो गया था, डॉ. लोहिया ने इसमें ‘फ्लैश एंड ब्लड’ डालकर इसको एक नया जीवन दिया है। उनका समाजवादी दर्शन मानवतावाद की पूर्ण अभिव्यक्ति है। उनके सिद्धान्त और कर्म वे आधार हैं जिन पर एक नवीन विश्व-व्यवस्था, नवीन संस्कृति और नवीन सभ्यता के कल्याणकारी भवन निर्मित हो सकते हैं और उनमें सम्पूर्ण मानवता जाति, धर्म, वंश, लिंग, संस्कृति, सम्पत्ति आदि की भिन्नता (कटुता) से मुक्त हो निवास कर सकती है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि लोहिया जी भारत के ही नहीं, अपितु विश्व के मौलिक राजनीतिक विचारकों में प्रतिष्ठित स्थान रखते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में न तो डॉ. लोहिया की अन्धविश्वास के साथ प्रशंसा की गई है और न ही किसी पूर्वग्रह के साथ आलोचना। जहाँ उनकी प्रशंसा अपेक्षित है वहाँ प्रशंसा की गई है और जहाँ आलोचना आवश्यक है वहाँ आलोचना। इस प्रकार इस दृष्टि को सामने रखकर डॉ. लोहिया के सम्बन्ध में सम्यक् विचार प्रस्तुत किए गए हैं।
इस पुस्तक में डॉ. लोहिया के कृतित्व और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने के अतिरिक्त समाजवाद की विशिष्टताओं को देते हुए डॉ. लोहिया द्वारा चलाए गए समाजवादी आन्दोलन का भी उल्लेख किया गया है। डॉ. लोहिया की सामाजिक साधना, समाजवादी राज्य का स्वरूप एवं उसके प्रशासनिक ढाँचे का तुलनात्मक ढंग से उल्लेख किया गया है। भाषा-विषयक विचारों और लोहिया की मौलिक अधिकार-सम्बन्धी धारणा का विश्लेषण भी किया गया है। विश्व की समाजवादी विचारधारा को डॉ. लोहिया की देन, विश्व-समाजवाद का नवदर्शन, संयुक्त राष्ट्रसंघ का पुनर्गठन, विश्व सरकार, विश्व विकास समिति, अन्तरराष्ट्रीय जाति-प्रथा उन्मूलन, साक्षात्कार का सिद्धान्त, निशस्त्रीकरण आदि विषयों से सम्बन्धित उनकी विचारधाराएँ स्पष्ट की गई हैं। मार्क्स, गांधी और डॉ. लोहिया के समाजवादी दर्शनों का तुलनात्मक विवेचन कर यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार मार्क्स और गांधी-दर्शनों का संशोधन एवं समन्वय कर डॉ. लोहिया ने उन्हें पूर्ण किया और एक नया सन्तुलन और सम्मिलन का दर्शन जन-मानस को दिया।
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- Description: नशे का इतिहास चाहे आदमी के इतिहास से कुछ कम पुराना हो पर इसे सुव्यवस्थित आर्थिक स्रोत का रूप औपनिवेशिक काल में मिला। इतिहास में अपने धर्म और समाज के लिए मरने वालों की अपेक्षा बहुत अधिक अपने पीने की आदत और अफीम से मरे हैं। एल्डस हक्सले ने इस उत्कंठा को मुक्ति या मृत्यु के लिए नहीं, दासता को अंगीकार कर मृत्यु की ओर बढ़ना बताया है। नशे के इस तंत्र ने औपनिवेशिक व्यवस्था को अर्थाधार दिया और नशे से अपरिचित समाजों में भी इसका रोपण किया। औपनिवेशिक आबकारी के जन्म से पूर्व उत्तराखंड में शराबखोरी और इससे उत्पन्न सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक विकृतियों व बिखराव की समस्या नहीं जन्मी थीं। जिन स्थानीय लघु समाजों में शराब का प्रचलन था उसे भोजन पद्धति का सदियों से विकसित रूप माना जा सकता है, पर जिन बड़े सामाजिक हिस्सों में इसका फैलाव पिछली एक सदी में हुआ, वह औपनिवेशिक विकास से सम्बद्ध है। औपनिवेशिक सत्ता के विस्तार के साथ नशीले पदार्थों का असाधारण प्रचलन हुआ और औपनिवेशिक सत्ता के अस्त होने के बाद इसे देशी त्वरा मिली जिसने पहाड़ी सामाजिक, आर्थिक ढाँचे को ही विकृत और ध्वस्त कर दिया। वन, खनन, बड़े बाँधों, विकृत पर्यटन की तरह नशा सिर्फ एक विषय नहीं, पहाड़ी जनजीवन को नष्ट करने का एक नियोजित षड्यंत्र है। नशे के विरुद्ध, आज़ादी से पूर्व और बाद में उठे प्रतिरोधों की पृष्ठभूमि का पहली बार इतनी गहनता और तत्परता से अध्ययन किया गया है ताकि आज की समस्या की जड़ों तक जाया जा सके। यह अध्ययन न सिर्फ अतीत के बारे में हमारी आँखें खोलता है बल्कि वह आज के नशा-परिदृश्य समझने की पृष्ठभूमि भी प्रस्तुत करता है।
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