Dharma Ki Sadhana
Author:
Swami VivekanandPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Unavailable
स्वामी विवेकानंद ने भारत में उस समय अवतार लिया, जब यहाँ हिंदू धर्म के अस्तित्व पर संकट के बादल मँडरा रहे थे। पंडित-पुरोहितों ने हिंदू धर्म को घोर आडंबरवादी और अंधविश्वासपूर्ण बना दिया था। ऐसे में स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म को एक अलग पहचान दिलाई।
स्वामीजी का विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं तथा ऋषियों का जन्म हुआ; यह संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है।
प्रस्तुत पुस्तक ' धर्म की साधना' में स्वामीजी ने भारत के प्राचीन गौरव का उल्लेख करते हुए देश के युवकों का आह्वान किया है कि यही उचित समय है, जब वे हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना में जुट जाएँ और भारतीय पुनर्जागरण में सहभागी बनें। सही अर्थों में धर्म की साधना करना, उस पर चलना सिखाने वाली प्रेरणादायी पुस्तक!
ISBN: 9789355213648
Pages: 175
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
विश्वास क्या है? कब वह अन्धविश्वास का रूप ले लेता है? हमारे संस्कार हमारे विचारों और विश्वासों पर क्या असर डालते हैं? समाज में प्रचलित धारणाएँ कैसे धीरे-धीरे सामूहिक श्रद्धा और विश्वास का रूप ले लेती हैं। टेलीविज़न जैसे आधुनिक आविष्कार के सामने मोबाइल साथ में लेकर बैठा व्यक्ति भी चमत्कारों, भविष्यवाणियों और भूत-प्रेतों से सम्बन्धित कहानियों पर क्यों विश्वास करता रहता है? क्यों कोई समाज लौट-लौटकर धार्मिक जड़तावाद और प्रतिक्रियावादी-पश्चमुखी राजनीतिक और सामाजिक धारणाओं की तरफ़ जाता रहता है?
क्या यह संसार किसी ईश्वर द्वारा की गई रचना है? या अपने कार्य-कारण के नियमों से चलनेवाला एक यंत्र है? ईश्वर के होने या न होने से हमारी सोच तथा जीवन-शैली पर क्या असर पड़ेगा? वह हमारे लिए क्या करता है और क्या नहीं करता? क्या वह ख़ुद ही हमारी रचना है? मन क्या है, उसके रहस्य हमें कैसे प्रकाशित या दिग्भ्रमित करते हैं? फल-ज्योतिष और भूत-प्रेत हमारे मन के किस ख़ाली और असहाय कोने में सहारा बनकर आते हैं? क्या अन्धविश्वासों का विरोध नैतिकता का विरोध है? क्या धार्मिक जड़ताओं पर कुठाराघात करना सामाजिक व्यक्ति को नीति से स्खलित करता है? या इससे वह ज्यादा स्वनिर्भर, स्वायत्त, स्वतंत्र और सुखी होता है?
स्त्रियों के जीवन में अन्धविश्वासों और अन्धश्रद्धा की क्या भूमिका होती है? वे ही क्यों अनेक अन्धविश्वासों की कर्ता और विषय दोनों हो जाती हैं? इस पुस्तक की रचना इन तथा इन जैसे ही अनेक प्रश्नों को लेकर की गई है। नरेंद्र दाभोलकर के अन्धविश्वास या अन्धश्रद्धा आन्दोलन की वैचारिक-सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक पृष्ठभूमि इस पुस्तक में स्पष्ट तौर पर आ गई है जिसकी रचना उन्होंने आन्दोलन के दौरान उठाए जानेवाले प्रश्नों और आशंकाओं का जवाब देने के लिए की।
Bharat Ke Madhya Varg Ki Ajeeb Dastan
- Author Name:
Pawan Kumar Verma
- Book Type:

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भारत 1991 में जैसे ही आर्थिक सुधारों और भूमंडलीकरण की डगर पर चला, वैसे ही इस देश के मध्यवर्ग को एक नया महत्त्व प्राप्त हो गया। नई अर्थनीति के नियोजकों ने मध्यवर्ग को ‘शहरी भारत’ के रूप में देखा जो उनके लिए विश्व के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक था। एक सर्वेक्षण ने घोषित कर दिया कि यह ‘शहरी भारत अपने आप में दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देश के बराबर है।’ लेकिन, भारतीय मध्यवर्ग कोई रातोंरात बन जानेवाली सामाजिक संरचना नहीं थी। उपभोक्तावादी परभक्षी के रूप में इसकी खोज किए जाने से कहीं पहले इस वर्ग का एक अतीत और एक इतिहास भी था। भारत के मध्यवर्ग की अजीब दास्ताँ में पवन कुमार वर्मा ने इसी प्रस्थान बिन्दु से बीसवीं शताब्दी में मध्यवर्ग के उद्भव और विकास की विस्तृत जाँच-पड़ताल की है। उन्होंने आज़ादी के बाद के पचास वर्षों को ख़ास तौर से अपनी विवेचना का केन्द्र बनाया है। वे आर्थिक उदारीकरण से उपजे समृद्धि के आशावाद को इस वर्ग की मानसिकता और प्रवृत्तियों की रोशनी में देखते हैं। उन्होंने रातोंरात अमीर बन जाने की मध्यवर्गीय स्वैर कल्पना को नितान्त ग़रीबी में जीवन-यापन कर रहे असंख्य भारतवासियों के निर्मम यथार्थ की कसौटी पर भी कसा है।
मध्यवर्ग की यह अजीब दास्ताँ आज़ादी के बाद हुए घटनाक्रम का गहराई से जायज़ा लेती है। भारत-चीन युद्ध और नेहरू की मृत्यु से लेकर आपातकाल व मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने की घोषणा तक इस दास्ताँ में मध्यवर्ग एक ऐसे ख़ुदग़र्ज़ तबक़े के रूप में उभरता है जिसने बार-बार न्यायपूर्ण समाज बनने के अपने ही घोषित लक्ष्यों के साथ ग़द्दारी की है। लोकतंत्र और चुनाव-प्रक्रिया के प्रति मध्यवर्ग की प्रतिबद्धता दिनोंदिन कमज़ोर होती जा रही है। मध्यवर्ग ऐसी किसी गतिविधि या सच्चाई से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता जिसका उसकी आर्थिक ख़ुशहाली से सीधा वास्ता न हो। आर्थिक उदारीकरण ने उसके इस रवैये को और भी बढ़ावा दिया है।
पुस्तक के आख़िरी अध्याय में पवन कुमार वर्मा ने बड़ी शिद्दत के साथ दलील दी है कि कामयाब लोगों द्वारा समाज से अपने-आपको काट लेने की यह परियोजना भारत जैसे देश के लिए ख़तरनाक ही नहीं, बल्कि यथार्थ से परे भी है। अगर भारत के मध्यवर्ग ने दरिद्र भारत की ज़रूरतों के प्रति अपनी संवेदनहीनता ज़ारी रखी तो इससे वह भरी राजनीतिक उथल-पुथल की आफ़त को ही आमंत्रित करेगा। किसी भी राजनीतिक अस्थिरता का सीधा नुकसान मध्यवर्ग द्वारा पाली गई समृद्धि की महत्त्वाकांक्षाओं को ही झेलना होगा।
Pakistani Aurat : Ajmayish Ki Aadhi Sadi
- Author Name:
Zaheda Hina
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक में जाहेदा हिना ने पाकिस्तान में औरतों की दशा-दिशा का प्रामाणिक विवरण दिया है। हमारे एशियाई मुल्कों में रंग-भेद, नस्ल-भेद आदि की समस्याओं पर जिस तरह मिलकर सोचने की प्रक्रिया शुरू हुई, उसके परिणामस्वरूप बहुत परिवर्तन आया है। लेकिन औरत की ज़िन्दगी के प्रति जो दृष्टि रही है, उसमें अपेक्षाकृत अभी वांछित परिवर्तन ने गति नहीं पकड़ी है। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान, दोनों मुल्कों की स्त्रियों को यदि समान रूप से चेतनावान बनाया जाए तो यह भी दोनों मुल्कों को नज़दीक लाने की एक सार्थक कोशिश साबित हो सकती है। इसलिए डॉ. ताहिरा परवीन ने जाहेदा हिना की किताब का हिन्दी में यह जो अनुवाद किया है, उससे हमारा हिन्दी समाज यह जान सकेगा कि औरतों के प्रति नज़रिए के मामले में दोनों देशों की दशा एक-सी है। यह किताब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की औरतों को मिलकर अपने आज़ाद वजूद के प्रति जागरूक बनाने के लिए बहुत उपयोगी साबित होगी।
Uttar-Poorva Bharat Ke Vikas Mein Neist Ki Praudyogikiyan
- Author Name:
Dr. Mohan Lal +1
- Book Type:

- Description: "किसी भी राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधन न केवल उसका गौरव होते हैं, वरन् उसकी वास्तविक संपत्ति भी होते हैं। ऐसे संसाधनों में मुख्य रूप से महत्त्वपूर्ण पौधे, पशु, पारंपरिक संपदाएँ और खनिज शामिल हैं। देश की 38 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में से उत्तर- पूर्वी क्षेत्र में स्थित एक महत्त्वपूर्ण प्रयोगशाला है- उत्तर-पूर्व विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (नॉर्थ- ईस्ट इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी - निस्ट)। यह प्रयोगशाला पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय प्रयोगशाला के रूप में अपनी विशेषज्ञताओं और क्षमताओं को बढ़ाते हुए विकास की ओर अग्रसर रही है। वस्तुतः इस संस्थान का उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत में उपलब्ध विपुल प्राकृतिक संपदाओं का दोहन करते हुए स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को विकसित करना, संबंधित क्षेत्र में विशिष्टता हासिल करना एवं आवश्यक क्षेत्र में अवसंरचना सुविधा प्रदान करना है। यह हर्ष का विषय है कि इस लब्धप्रतिष्ठ संस्थान ने अपनी स्थापना से अभी तक 125 से अधिक जनोपयोगी स्वदेशी प्रौद्योगिकियाँ विकसित की हैं जो कृषि, औषध, वी.एस. के. सीमेंट, तेल से संबंधित रसायनों, जैव-चिकित्सा, पेट्रो रसायनों से संबंधित हैं। इन कार्यों द्वारा देश के सामाजिक- आर्थिक एवं वैज्ञानिक क्षेत्र में अतुलनीय अवदान कर करोड़ों रुपयों का राजस्व भी प्राप्त किया है। 'उत्तर-पूर्व भारत के विकास में निस्ट की प्रौद्योगिकियाँ' विषयक बहुरंगी पुस्तक में निस्ट का परिचयात्मक विवेचन, अनुसंधान समूह, विकसित प्रौद्योगिकियों का विहंगावलोकन, नूतन प्रौद्योगिकियाँ, उद्यमिता एवं अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों पर रोचक हिंदी भाषा में सचित्र तकनीकी जानकारी प्रदान करने का सुप्रयास किया गया है, जिससे सभी वर्गों के सुधी पाठकगण लाभान्वित हो सकें।"
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