Bhartiya darshan : saral Parichaya
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भारत जैसे बहुभाषी, सामासिक समाज में राष्ट्रीय मानस को समझने के लिए भारतीय दर्शन का अनुशीलन आवश्यक है। यह और भी जरूरी है क्योंकि भारतीय दर्शन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। इसमें आस्था, विश्वास, अंधविश्वास, धर्म जैसे अवयव भी घुले-मिले हैं। मोटे तौर पर दर्शन में दो परस्पर विरोधी धाराएँ तो सक्रिय रही ही हैं। विविधता इतनी विपुल है कि कुछ पंक्तियों में भारतीय दर्शन को परिभाषित करना कठिन है। इसीलिए तर्कसंगत, वैज्ञानिक, दार्शनिक दृष्टिकोण का विकास जरूरी हो जाता है। हम अक्सर अपने दार्शनिक सिद्धांतों, प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के प्रति मोहवादी अतिवाद के शिकार हो जाते हैं। पुस्तक के लेखक विख्यात मनीषी देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने इस संदर्भ में न केवल संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है बल्कि जहाँ आवश्यक हुआ, वहाँ अवैज्ञानिक और अतार्किक मान्यताओं का खंडन भी किया है। दर्शन हवा में नहीं बल्कि यथार्थ के ठोस धरातल पर जन्म लेते हैं। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय भारतीय आदर्शवाद तथा मायावाद के पीछे सक्रिय सामाजिक शक्तियों, कर्मवाद के बजाय परलोकवाद का पाठ पढ़ानेवाले निहित स्वार्थों और भारतीय विज्ञान के विकास में बाधा बननेवाले हितों पर विमर्श करते हैं तथा वहीं सकारात्मक शक्तियों को चिह्नित भी करते हैं। इस तरह पुस्तक में भारतीय दर्शन सही परिपे्रक्ष्य में उपस्थित होता है। 'भारतीय दर्शन : सरल परिचय न केवल सामान्य बल्कि सुविज्ञ पाठकों के लिए बहुविध उपयोगी पुस्तक है।
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भारत जैसे बहुभाषी, सामासिक समाज में राष्ट्रीय मानस को समझने के लिए भारतीय दर्शन का अनुशीलन आवश्यक है। यह और भी जरूरी है क्योंकि भारतीय दर्शन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। इसमें आस्था, विश्वास, अंधविश्वास, धर्म जैसे अवयव भी घुले-मिले हैं। मोटे तौर पर दर्शन में दो परस्पर विरोधी धाराएँ तो सक्रिय रही ही हैं। विविधता इतनी विपुल है कि कुछ पंक्तियों में भारतीय दर्शन को परिभाषित करना कठिन है। इसीलिए तर्कसंगत, वैज्ञानिक, दार्शनिक दृष्टिकोण का विकास जरूरी हो जाता है।
हम अक्सर अपने दार्शनिक सिद्धांतों, प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के प्रति मोहवादी अतिवाद के शिकार हो जाते हैं। पुस्तक के लेखक विख्यात मनीषी देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने इस संदर्भ में न केवल संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है बल्कि जहाँ आवश्यक हुआ, वहाँ अवैज्ञानिक और अतार्किक मान्यताओं का खंडन भी किया है।
दर्शन हवा में नहीं बल्कि यथार्थ के ठोस धरातल पर जन्म लेते हैं। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय भारतीय आदर्शवाद तथा मायावाद के पीछे सक्रिय सामाजिक शक्तियों, कर्मवाद के बजाय परलोकवाद का पाठ पढ़ानेवाले निहित स्वार्थों और भारतीय विज्ञान के विकास में बाधा बननेवाले हितों पर विमर्श करते हैं तथा वहीं सकारात्मक शक्तियों को चिह्नित भी करते हैं। इस तरह पुस्तक में भारतीय दर्शन सही परिपे्रक्ष्य में उपस्थित होता है।
'भारतीय दर्शन : सरल परिचय न केवल सामान्य बल्कि सुविज्ञ पाठकों के लिए बहुविध उपयोगी पुस्तक है।
Book Details
-
ISBN9788126715268
-
Pages232
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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