Europe Mein Darshanshastra : Marx Ke Baad
Author:
Shankari Prasad BandyopadhyayPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
Awating description for this book
ISBN: 9789394902978
Pages: 112
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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ऋग्वैदिक काल से लेकर ईसा की पहली शताब्दी तक लगभग डेढ़ हज़ार वर्ष के दौरान भारतीय दर्शन में ईश्वरवादी-विचारवादी चिन्तन से लेकर लोकायत जैसी भौतिकवादी दर्शनिक धाराएँ देखने को मिलती हैं। प्रस्तुत पुस्तक में विद्वान लेखक ने इन समस्त धाराओं का मन्थन करते हुए भारतीय दर्शन की प्रकृति और अन्तर्वस्तु का यथार्थवादी परिचय दिया है।
पुस्तक की प्रस्तावना में भारतीय दर्शन की कुछ मूलभूत विशेषताओं की सामान्य विवेचना की गई है, और उसके पश्चात् प्रमुख सम्प्रदायों—उनके प्रणेताओं और ग्रंथों के साथ-साथ उनके बुनियादी सिद्धान्तों की चर्चा की गई है। भारतीय विचारकों ने दर्शन की महत्त्वपूर्ण समस्याओं पर अपने-अपने तरीक़े से जो तर्क-वितर्क किया था, उसकी विवेचना भी प्रस्तुत पुस्तक में है।
निस्सन्देह इस विषय पर अनेक पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध हैं, परन्तु डॉ. गंगोपाध्याय ने वस्तुनिष्ठता बनाए रखने के लिए पुरानी लीक पीटने के स्थान पर विवेचना की नई विधि अपनाई है और भारतीय दर्शन को, पांडित्य का प्रदर्शन किए बिना, ऐसे सरल शब्दों में प्रस्तुत किया है कि यह पुस्तक उन सामान्य पाठकों के लिए भी उपयोगी हो गई है, जिनमें से कुछ के लिए, सम्भव है, यह अपने विषय की पहली पुस्तक हो। तथापि, हम आशा करते हैं कि दर्शन के विद्यार्थियों के लिए भी यह पुस्तक विचारोत्तेजक और ज्ञानवर्द्धक सिद्ध होगी।
Aurat Ki Aawaz
- Author Name:
Nasira Sharma
- Book Type:

- Description: यह सदी जिस आवाज़ में बोल रही है वह औरत की आवाज़ है, यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है। सदियों जिसकी पीड़ा पुरुष-शासित समाज के तमाम आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक ढाँचों की नींव में बिना किसी शिकायत के अपनी बलि देती रही, जिसकी ख़ामोशी पर पुरुषों की वाचाल सभ्यता मानवता की अकेली और स्वयम्भू प्रतिनिधि बनी रही, वह औरत अब बोल रही है। सृष्टि में अपनी हिस्सेदारी का दावा कर रही है। और कहना न होगा कि इससे एक बड़ा बदलाव मनुष्यता के लैंडस्केप में दिखाई देने लगा है। अनेक औरतें हैं जिन्होंने इस बिन्दु तक आने के लिए अपनी क़ुर्बानी दी है, अनेक हैं जिन्होंने अकेले आगे बढ़कर बाक़ी औरतों के लिए लिए कितने ही बन्द दरवाज़ों को खोला है। अनेक हैं जिनका नाम भी हम नहीं जानते। और अनेक हैं जिनके नाम इतिहास के निर्णायक मोड़ों पर उत्कीर्ण हो गए हैं। इस किताब में अलग-अलग देशों की उन औरतों से वार्ताएँ शामिल हैं जिन्होंने अपने दम-ख़म से, अपने इरादों और हिम्मत से ज़िन्दगी में एक मुकाम हासिल किया है, जिनका एक स्पष्ट नज़रिया है, और यह नज़रिया उन्होंने अपने संघर्षों से, अपनी खुली निगाह से कमाया है। इन्हें पढ़ते हुए हमें मालूम होता है कि आज उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ है। पूरी दुनिया और उसके निज़ाम की गहरी समझ भी उनके पास है और उसकी मरम्मत के लिए व्यावहारिक सुझाव भी। वे जानती हैं कि आने वाले समय को कैसा होना चाहिए और कैसा वह नहीं है। पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, इराक़, सीरिया और टर्की से लेकर जापान, रूस, फ़िलिस्तीन, इस्रायल, फ़्रांस, मलेशिया और लन्दन तक की विभिन्न राजनीतिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आने वाली इन महिलाओं से बातचीत की है नासिरा शर्मा ने जिन्हें हम एक सामर्थ्यवान रचनाकार के रूप में जानते हैं, विभिन्न भाषाओं के स्त्री-संवेदी और मानवतावादी साहित्य से भी वे हमें परिचित कराती रही हैं। ये वार्ताएँ साक्षात्कार के प्रचलित फ़्रेम से आगे बढ़कर दरअसल सरोकारों के समान और वैश्विक धरातल पर जाकर किए गए संवाद हैं—इस सदी की औरत की एक मुकम्मल आवाज़।
Bastar Ki Aadivasi Evam Lok Hastshilp Parampara
- Author Name:
Harihar Vaishnav
- Book Type:

- Description: कोई भी शिल्प या कला केवल शिल्प या कला नहीं होती, वह इतिहास को भी अपने भीतर समेटे होती है और वर्तमान को भी उसी तरह सामने रखती है, उसे प्रतिबिम्बित करती है। इतना ही नहीं, हम उसमें सम्बन्धित समाज का भविष्य भी देख-पढ़ सकते हैं। कहना ग़लत न होगा कि आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्पों में उनका कल्पना-लोक बहुत ही प्रभावशाली ढंग से रूपायित होता और अहम् भूमिका निभाता दिखलाई पड़ता है। बस्तर अंचल के हस्तशिल्प, चाहे वे आदिवासी हस्तशिल्प हों या लोक हस्तशिल्प, दुनिया-भर के कलाप्रेमियों का ध्यान आकृष्ट करने में सक्षम रहे हैं! कारण, इनमें इस आदिवासी बहुल अंचल की आदिम संस्कृति की सोंधी महक बसी रही है। यह शिल्प-परम्परा और उसकी तकनीक बहुत पुरानी है। शिल्प का यह ज्ञान बहुत पुराना और पारम्परिक है, किन्तु इस ज्ञान का लिखित स्वरूप अब तक नहीं मिल पाया था। यही कारण है कि बस्तर अंचल में जन्मे, पले, बढ़े और सतत जिज्ञासु साहित्यकार-लेखक और संस्कृतिकर्मी हरिहर वैष्णव को यह लगा कि न केवल बस्तर, अपितु देश के अन्य भागों में विभिन्न हस्तशिल्प विधाओं से जुड़े शिल्पियों के पास शिल्प और उसकी परम्परा से सम्बन्धित जो मौखिक ज्ञान है, वह किसी-न-किसी तरह अगली पीढ़ी तक हस्तान्तरित होना चाहिए। श्री वैष्णव के पास यहाँ के आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्पियों से सम्बद्ध विभिन्न लोगों से बातचीत के दौरान पहले से एकत्र थोड़ी-बहुत सामग्री तो थी और कच्ची भी। अपनी इस नहीं के बराबर और कच्ची जानकारी को उन्होंने सम्बन्धित शिल्पियों से कई-कई बार मिलकर तथा सहभागी अवलोकन आदि के द्वारा और अधिक समृद्ध करने का प्रयास किया। विश्वास है कि बस्तर के आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्प तथा इसकी परम्परा में रुचि रखनेवाले कलाप्रेमियों तथा अध्येताओं के लिए यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी।
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