Darshanshastra Ke Srot
(0)
Author:
Deviprasad ChattopadhyayPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
250
₹ 200 (20% off)
Available
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Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
विश्व-दर्शन की मुख्य धारा में विभिन्न कालों के विभिन्न लोगों ने सकारात्मक या नकारात्मक<strong>, </strong>अपने-अपने तरीक़े से योगदान किया है। इस मुख्य धारा में अनेक धाराएँ मिली हुई हैं<strong>, </strong>जिनसे सामान्य पाठकों का परिचय कराने के लिए आठ पुस्तकों की यह शृंखला तैयार की गई है। प्रो. देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय की प्रस्तुत पुस्तक इसी शृंखला की पहली कड़ी है।</p> <p>श्री चट्टोपाध्याय इस पुस्तकमाला के प्रधान सम्पादक हैं और साथ ही <strong>‘</strong>दर्शनशास्त्र के स्रोत<strong>’ </strong>शीर्षक प्रस्तुत पुस्तक के लेखक भी। अत: उनकी यह पुस्तक एक प्रकार से पूरी शृंखला की पूर्व-पीठिका है। इस पुस्तक में उन्होंने<strong>, </strong>जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है<strong>, </strong>दर्शन के स्रोतों की खोज की है<strong>, </strong>और शृंखला की अगली पुस्तकों को पढ़ने-समझने का संस्कार पैदा करने की आधारशिला का निर्माण भी किया है। <strong>‘</strong>दर्शनशास्त्र की आवश्यकता क्यों है<strong>’ </strong>से प्रारम्भ करके वे आदि-मानव के क्रमिक विकास पर विचार करते हैं और फिर समाज में कर्म-विभाजन की शुरुआत<strong>, </strong>नगर क्रान्ति<strong>, </strong>जीवन में धर्म की भूमिका आदि को रेखांकित करते हुए इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि दर्शन का जन्म और विकास कैसे हुआ। इस समस्त विवेचन के क्रम में विश्व की प्राचीन चिन्तन-पद्धतियों का संक्षिप्त परिचय भी पाठकों को मिल जाता है।</p> <p>प्रो. चट्टोपाध्याय ने यहाँ थेल्स के बारे में किए गए इस दावे पर प्रश्न-चिह्न लगाया है कि वह पहला वैज्ञानिक था। ऐसा उन्होंने <strong>‘</strong>छान्दोग्य उपनिषद<strong>’ </strong>के उद्दालक आरुणि से सम्बन्धित अंश का विवेचन करते हुए किया है। उनके अनुसार<strong>, </strong>उद्दालक आरुणि के विज्ञान के प्रति सुस्पष्ट रुझान को देखते हुए विश्व विज्ञान के इतिहास का गम्भीर पुनरीक्षण आवश्यक है।</p> <p>कहना न होगा कि प्रो. चट्टोपाध्याय की सामाजिक दृष्टि और बौद्धिक तटस्थता से अनुप्राणित यह पुस्तक दर्शन के अध्येताओं के साथ-साथ उन पाठकों के लिए भी रुचिकर होगी<strong>, </strong>जो दर्शन के अध्ययन की शुरुआत ही कर रहे हैं।
Read moreAbout the Book
विश्व-दर्शन की मुख्य धारा में विभिन्न कालों के विभिन्न लोगों ने सकारात्मक या नकारात्मक<strong>, </strong>अपने-अपने तरीक़े से योगदान किया है। इस मुख्य धारा में अनेक धाराएँ मिली हुई हैं<strong>, </strong>जिनसे सामान्य पाठकों का परिचय कराने के लिए आठ पुस्तकों की यह शृंखला तैयार की गई है। प्रो. देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय की प्रस्तुत पुस्तक इसी शृंखला की पहली कड़ी है।</p>
<p>श्री चट्टोपाध्याय इस पुस्तकमाला के प्रधान सम्पादक हैं और साथ ही <strong>‘</strong>दर्शनशास्त्र के स्रोत<strong>’ </strong>शीर्षक प्रस्तुत पुस्तक के लेखक भी। अत: उनकी यह पुस्तक एक प्रकार से पूरी शृंखला की पूर्व-पीठिका है। इस पुस्तक में उन्होंने<strong>, </strong>जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है<strong>, </strong>दर्शन के स्रोतों की खोज की है<strong>, </strong>और शृंखला की अगली पुस्तकों को पढ़ने-समझने का संस्कार पैदा करने की आधारशिला का निर्माण भी किया है। <strong>‘</strong>दर्शनशास्त्र की आवश्यकता क्यों है<strong>’ </strong>से प्रारम्भ करके वे आदि-मानव के क्रमिक विकास पर विचार करते हैं और फिर समाज में कर्म-विभाजन की शुरुआत<strong>, </strong>नगर क्रान्ति<strong>, </strong>जीवन में धर्म की भूमिका आदि को रेखांकित करते हुए इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि दर्शन का जन्म और विकास कैसे हुआ। इस समस्त विवेचन के क्रम में विश्व की प्राचीन चिन्तन-पद्धतियों का संक्षिप्त परिचय भी पाठकों को मिल जाता है।</p>
<p>प्रो. चट्टोपाध्याय ने यहाँ थेल्स के बारे में किए गए इस दावे पर प्रश्न-चिह्न लगाया है कि वह पहला वैज्ञानिक था। ऐसा उन्होंने <strong>‘</strong>छान्दोग्य उपनिषद<strong>’ </strong>के उद्दालक आरुणि से सम्बन्धित अंश का विवेचन करते हुए किया है। उनके अनुसार<strong>, </strong>उद्दालक आरुणि के विज्ञान के प्रति सुस्पष्ट रुझान को देखते हुए विश्व विज्ञान के इतिहास का गम्भीर पुनरीक्षण आवश्यक है।</p>
<p>कहना न होगा कि प्रो. चट्टोपाध्याय की सामाजिक दृष्टि और बौद्धिक तटस्थता से अनुप्राणित यह पुस्तक दर्शन के अध्येताओं के साथ-साथ उन पाठकों के लिए भी रुचिकर होगी<strong>, </strong>जो दर्शन के अध्ययन की शुरुआत ही कर रहे हैं।
Book Details
-
ISBN9789394902923
-
Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: उत्क्रांतीचा सिद्धान्त ही मानवी इतिहासातील सर्वांत महत्त्वपूर्ण संकल्पना आहे. जीवनाच्या जवळपास प्रत्येक क्षेत्रात मूलभूत परिवर्तन घडवून आणणारा हा सिद्धान्त डार्विनने मांडला, त्याला आता दीडशे वर्षे झाली आहेत. आजच्या गतिमान जगात ह्या सिद्धान्ताचं स्थान काय? आज तो कालबाह्य ठरला आहे का? त्याची पुनर्मांडणी करायला हवी का? माणसाच्या विकासात अधिक महत्त्वाचे काय, नैसर्गिक प्रकृती, की पालनपोषण? मार्क्सवाद आणि स्त्रीवाद या विसाव्या शतकातल्या महत्त्वाच्या विचारप्रणालींवर या सिद्धान्ताने काय प्रभाव पाडला? भारतीय विचारपरंपरेवर डार्विनचा काही परिणाम झाला का? जातिव्यवस्था आणि शेतीवरील अरिष्ट या भारताच्या दृष्टीनं कळीच्या मुद्यांबाबत हा सिद्धान्त काय सांगतो? रंगभेद आणि जातिभेद यांचं तो समर्थन करतो का? वैज्ञानिक शेती ही उत्क्रांतीविरोधी आणि पर्यायानं निसर्गविरोधी आहे का? गेल्या वीस-पंचवीस वर्षांत उदयाला आलेल्या मेंदूजैवविज्ञानाच्या अनेक अंगांना हा सिद्धान्त कसा काय लागू पडू शकतो ? अशा अनेक प्रश्नांची उत्तरं शोधणारा ग्रंथ. महाराष्ट्रातल्या नव्या पिढीतल्या बारा विद्वान आणि व्यासंगी लेखकांनी सिद्ध केलेला. - सुबोध जावडेकर Darvin Aani Jivsrushtiche Rahasya : Nanda Khare,Ravindra Rukmini Pandharinath डार्विन आणि जीवसृष्टीचे रहस्य : संपादक : रवीन्द्र रुक्मिणी पंढरीनाथ । नंदा खरे
Europe Mein Darshanshastra : Bacon Se Marx Tak
- Author Name:
Satinath Chakravorty
- Book Type:

- Description: ‘दर्शनशास्त्र : पूर्व और पश्चिम’ शृंखला की यह पुस्तक पुनर्जागरण एवं आधुनिक विज्ञान के उदय की चर्चा से प्रारम्भ होती है, और उस कालखंड की दार्शनिक प्रवृत्तियों का विवेचन प्रस्तुत करती है, जो आधुनिक यूरोपीय दर्शनशास्त्र के इतिहास में अत्यन्त विचारोत्तेजक माना जाता है। यह विचित्र बात है कि उस समय के दर्शनशास्त्री एक तरफ़ तो विज्ञान से प्रतिबद्ध थे और दूसरी तरफ़ वे आधुनिक विज्ञान को सामने लानेवाली बूर्ज्वाजी के अन्तर्विरोधों की पड़ताल कर रहे थे। साथ ही, क्रान्ति के जो बीज स्वयं आधुनिक विज्ञान में निहित हैं, उनके प्रतिकार के लिए वे धर्म और आस्था का अन्ध-समर्थन भी कर रहे थे। लेखक ने इस पूरी प्रक्रिया पर विस्तार से विचार करते हुए दर्शनशास्त्रियों की मूलभूत विशेषताओं को उजागर किया है। बीच-बीच में इतिहास के कुछ प्रसंगों की चर्चा से यह पुस्तक और अधिक रोचक तथा पठनीय बन गई है। इसमें कई ऐसे विषयों पर भी विचार किया गया है, जिन पर अभी तक यूरोपीय दर्शनशास्त्र के अध्ययन में या तो ध्यान नहीं दिया गया था, और अगर ध्यान दिया गया तो उनसे कतरा जाने की प्रवृत्ति रही। संक्षेप में, यह पुस्तक वैज्ञानिक विचारधारा और विज्ञान एवं समाज के अन्तस्सम्बन्धों को समझने के लिए आवश्यक रूप से पठनीय है।
Nastikasobat Gandhi
- Author Name:
G. Ramchandra Rao +1
- Book Type:

- Description: काळ आहे 1944-1948.आंध्रप्रदेशात गांधी विचारांचा कार्यक्रम राबविणारे नास्तिकवादी कार्यकर्ते गोरा आणि महात्मा गांधी यांच्यामध्ये चर्चा होतात. विषय आहे : आस्तिकता आणि नास्तिकतादोन परस्पर विरोधी मताची माणसे एकमेकांशी चर्चा करत आहेत. परस्परांना तपासून बघत आहेत. मात्र या चर्चेत खंडनमंडन किंवा वादावादीचा खणखणाट नाही. चर्चेच्या ओघात दोघेही एकमेकाला समजून घेतात आणि दोघांमधील नाते अधिकाधिक दृढ होत जाते.गांधीजींच्या निधनानंतर तीन वर्षांनी गोरांनी या आठवणी लिहिल्या आणि तत्कालीन गांधीवादी विचारवंत किशोरीलाल मश्रुवाला यांनी प्रस्तावनेत या आगळ्यावेगळ्या संबंधाची वैचारिक उकल केली.सत्तर वर्षांपूर्वी इंग्रजीत प्रकाशित झालेल्या ‘An atheist with Gandhi' या पुस्तकाचा हा मराठी अनुवाद. सोबत ज्येष्ठ अभ्यासक किशोर बेडकिहाळ यांनी ‘पुस्तकासंबंधी' या प्रदीर्घ टिपणात या पुस्तकाचे आजच्या संदर्भात महत्त्व विशद केले आहे. Nastikasobat Gandhi | Gora (G. Ramchandra Rao)Translated By : Vijay Tambe नास्तिकासोबत गांधी | गोरा (जी. रामचंद्र राव)अनुवाद : विजय तांबे
Kathghare Mein Loktantra
- Author Name:
Arundhati Roy
- Book Type:

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Description:
अपने जनवादी सरोकारों और ठोस तथ्यपरक तार्किक गद्य के बल पर अरुन्धति रॉय ने आज एक प्रखर चिन्तक और सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपना ख़ास मुक़ाम हासिल कर लिया है। उनके सरोकारों का अन्दाज़ा उनके चर्चित उपन्यास, ‘मामूली चीज़ों का देवता’ ही से होने लगा था, लेकिन इसे उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता की निशानी ही माना जाएगा कि अपने विचारों और सरोकारों को और व्यापक रूप से अभिव्यक्त करने के लिए, अरुन्धति रॉय ने अपने पाठकों की उम्मीदों को झुठलाते हुए, कथा की विधा का नहीं, बल्कि वैचारिक गद्य का माध्यम चुना और चूँकि वे स्वानुभूत सत्य पर विश्वास करती हैं, उन्होंने न सिर्फ़ नर्मदा आन्दोलन के बारे में अत्यन्त विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित किया, बल्कि उस आन्दोलन में सक्रिय तौर पर शिरकत भी की। यही सिलसिला आगे परमाणु प्रसंग, अमरीका की एकाधिपत्यवादी नीतियों और ऐसे ही दूसरे ज्वलन्त विषयों पर लिखे गए लेखों की शक्ल में सामने आया।
‘कठघरे में लोकतंत्र’ इसी सिलसिले की अगली कड़ी है। इस पुस्तक में संकलित लेखों में अरुन्धति रॉय ने आम जनता पर राज्य-तंत्र के दमन और उत्पीड़न का जायज़ा लिया है, चाहे वह हिन्दुस्तान में हो या तुर्की में या फिर अमरीका में। जैसा कि इस किताब के शीर्षक से साफ़ है, ये सारे लेख ऐसी तमाम कार्रवाइयों पर सवाल उठाते हैं जिनके चलते लोकतंत्र–यानी जनता द्वारा जनता के लिए जनता का शासन–मुट्ठी-भर सत्ताधारियों का बँधुआ बन जाता है।
अपनी बेबाक मगर तार्किक शैली में अरुन्धति रॉय ने तीखे और ज़रूरी सवाल उठाए हैं, जो नए विचारों ही को नहीं, नई सक्रियता को भी प्रेरित करेंगे। और यह सच्चे लोकतंत्र के प्रति अरुन्धति की अडिग निष्ठा का सबूत हैं।
–नीलाभ
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