Mahatma Jotiba Phule Rachanawali : Vols. 1-2
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यह किताब जोतिबा फुले (जोतिराव गोविन्दराव फुले : 1827-1890) की सम्पूर्ण रचनाओं का संग्रह है। सन् 1855 से सन् 1890 तक उन्होंने जितने ग्रन्थों की रचना की, सभी को इसमें संगृहीत किया गया है। उनकी पहली किताब ‘तृतीय रत्न’ (नाटक) सन् 1855 में और अन्तिम ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ सन् 1891 में उनके परिनिर्वाण के बाद प्रकाशित हुई थी। जोतिराव फुले की कर्मभूमि महाराष्ट्र रही है। उन्होंने अपनी सारी रचनाएँ जनसाधारण की बोली मराठी में लिखीं। उनका कार्य और रचनाएँ अपने समय में भी विवादास्पद रहीं और आज भी हैं। लेकिन उनका लेखन हर पीढ़ी में सामाजिक क्रान्ति की चेतना जगाता रहेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं। उनकी यह रचनावली उनके कार्य और चिन्तन का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।
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यह किताब जोतिबा फुले (जोतिराव गोविन्दराव फुले : 1827-1890) की सम्पूर्ण रचनाओं का संग्रह है। सन् 1855 से सन् 1890 तक उन्होंने जितने ग्रन्थों की रचना की, सभी को इसमें संगृहीत किया गया है। उनकी पहली किताब ‘तृतीय रत्न’ (नाटक) सन् 1855 में और अन्तिम ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ सन् 1891 में उनके परिनिर्वाण के बाद प्रकाशित हुई थी।
जोतिराव फुले की कर्मभूमि महाराष्ट्र रही है। उन्होंने अपनी सारी रचनाएँ जनसाधारण की बोली मराठी में लिखीं। उनका कार्य और रचनाएँ अपने समय में भी विवादास्पद रहीं और आज भी हैं। लेकिन उनका लेखन हर पीढ़ी में सामाजिक क्रान्ति की चेतना जगाता रहेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।
उनकी यह रचनावली उनके कार्य और चिन्तन का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।
Book Details
-
ISBN9788171197323
-
Pages695
-
Avg Reading Time23 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘नौकर की कमीज़’ भारतीय जीवन के यथार्थ और आदमी की कशमकश को प्रस्तुत करनेवाला उपन्यास है। इस उपन्यास की सबसे बड़े ख़ासियत यह है कि इसके पात्र मायावी नहीं बल्कि दुनियावी हैं, जिनमें कल्पना और यथार्थ के स्वर एक साथ पिरोए हुए हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि किसी पात्र को अनावश्यक रूप से महत्त्व दिया गया हो। हर पैरे और हर पात्र की अपनी महत्ता है। केन्द्रीय पात्र संतू बाबू एक ऐसा दुनियावी पात्र है जो घटनाओं को रचता नहीं, बल्कि उनसे जूझने के लिए विवश, है और साथ ही इस सोसाइटी के हाथों इस्तेमाल होने के लिए भी। आज की ‘ब्यूरोक्रेसी’ और अहसानफ़रामोश लोगों पर यह उपन्यास सीधा प्रहार ही नहीं करता, बल्कि छोटे-छोटे वाक्यों के सहारे व्यंग्यात्मक शैली में एक माहौल भी तैयार करता चलता है। विनोद कुमार शुक्ल की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का ही कमाल है कि पूरे उपन्यास को पढ़ने के बाद ज़िन्दगी के अनगिनत मार्मिक तथ्य दिमाग़ में तारीख़वार दर्ज होते चले जाते हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में अनुभव और यथार्थ का पैनापन है, जिसकी मारक शक्ति केवल तिलमिलाहट ही पैदा नहीं करती बल्कि बहुत अन्दर तक भेदती चली जाती है।
Naqqashidar Cabinet
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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सुधा ओम ढींगरा का उपन्यास नक़्क़ाशीदार केबिनेट वर्ष 2016 का अत्यंत सफल उपन्यास है। यह उपन्यास पेपरबैक और ऑडियोबुक में भी उपलब्ध है।
Gawah Gairhazir
- Author Name:
Chandrakishore Jaiswal
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किसुन साह ने जब बिना किसी सिर-फुड़ौव्वल के बेटों के बीच बाँट-बखरा कर दिया तो लोगों ने उन्हें इस बात पर खुश होने को कहा कि अब उनके बुढ़ापे के दिन मौज-मस्ती में कटते रहेंगे। किसुन साह ने भी निर्णय ले लिया कि मौज-मस्ती में दिन काटने के लिए उन्हें अब बूढ़ा भी हो ही जाना चाहिए। लेकिन...। परिवार नामक सुख के टापू की यह कहानी यहीं से शुरू होती है। लोक और ग्रामीण जीवन के मर्मज्ञ कथाकार चन्द्रकिशोर जायसवाल का उपन्यास ‘गवाह गैरहाजिर’ अपनी बहुस्तरीय भाषा-सामर्थ्य के लिए खासतौर पर जाना जाता है। पात्रों की कहानी कहने के साथ ही कथाकार इसमें भारतीय ग्राम्य समाज और उसकी संरचना पर भी टिप्पणियाँ करते चलते हैं जिससे एक तरफ सूक्ष्म पर्यवेक्षण की उनकी क्षमता रेखांकित होती है, तो दूसरी तरफ़ गाँव की गझिन सामाजिक-मानसिक बनावट को समझने में भी मदद मिलती है। उपन्यास की कथा के केन्द्र में किसुन साह हैं—एक स्वाभिमानी और समझदार बुजुर्ग। घर की सम्पत्ति इत्यादि का बँटवारा अपने परिवार में शान्तिपूर्वक करने के बाद वे सबसे छोटे बेटे के साथ रहने का फैसला करते हैं। कुछ दिन वहाँ रहने के बाद जब उन्हें लगता है कि बेटा-बहू का व्यवहार उनके प्रति ठीक नहीं है तो वे घर छोड़कर बाकी जीवन एक मन्दिर में बिताने का फैसला करते हैं, लेकिन परिवार से मोह के चलते यह भी नहीं कर पाते। पारिवारिक सम्बन्धों की महीन अक्कासी के अलावा यह उपन्यास पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी और सम्बन्धों की ऊष्मा के छीजते जाने की मनोवैज्ञानिक पड़ताल भी करता है। समर्थ शिल्प, जीवन्त भाषा और बेधक कथ्य वाला अत्यन्त पठनीय उपन्यास !
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