Atharah Upanyas
(0)
Author:
Rajendra YadavPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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दो दशक से भी अधिक समय गुज़र जाने के बावजूद आज ‘अठारह उपन्यास’ की प्रासंगिकता बनी हुई है तो इसके कुछ ख़ास कारण हैं। इसमें एक प्रतिष्ठित कथा-लेखक की प्रतिक्रियाएँ-भर नहीं हैं, अपने समय की कतिपय महत्त्वपूर्ण कृतियों को परखने की विशिष्ट समीक्षा-दृष्टि भी मौजूद है। एक सर्जक की रचना-दृष्टि से लैस समीक्षा इस अर्थ में अलग होती है कि वह रचना और उसकी प्रक्रिया से जुड़े तमाम पहलुओं पर भी पूरी संलग्नता से विचार करती है। इस रूप में राजेन्द्र यादव सुमित्रानन्दन पंत, अज्ञेय और मुक्तिबोध के क्रम में एक ज़रूरी समीक्षा लेकर आते हैं। ‘अठारह उपन्यास’ के बहाने दरअसल यहाँ राजेन्द्र यादव एक नई समीक्षा-दृष्टि लेकर उपस्थित हुए हैं। उनकी यह समीक्षा-दृष्टि, उस समय की कथा-समीक्षा के सिर्फ़ तत्कालीन या फौरी सरोकारों और मूल्यांकन कर डालने की सीमा में बँधे होने और व्यक्तिगत राय या पसन्द बनकर रह जाने के विरोध में ही नहीं, उसके सर्टिफ़िकेट बन जाने और इतिहास-दृष्टि से अछूते रह जाने के कारण भी प्रारम्भ हुई थी। ज़ाहिर है, ऐसे में रचनाकार-समीक्षक राजेन्द्र यादव ने रचना की ज़रूरत के मुताबिक़ नए औज़ारों की तलाश करते हुए कथा-आलोचना में एक नई ही शुरुआत की थी। रचना में प्रवेश के लिए राजेन्द्र जी ने कई-कई युक्तियों का इस्तेमाल तो किया ही है, पत्र-शैली की सीधी-सरल शैली में भी वे रचना-प्रक्रिया तक के इस क्रम में राजेन्द्र यादव स्वयं को भी कुछ इस तरह शामिल कर लेते हैं जैसे अपने रचनाकार को भी वे एक ख़ास दूरी से देख रहे हों। इस पुस्तक के पुनर्प्रकाशन पर यह स्मरण कराना ज़रूरी लगता है कि राजेन्द्र यादव द्वारा की गई ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ की समीक्षा अपने आपमें एक विशिष्ट कुंजी है जिसने भारतीय समाज द्वारा बेहद पारम्परिक ढंग से पढ़े गए इस उपन्यास को न सिर्फ़ नए तरीक़े से समझने में मदद की, बल्कि पाठक को देवकीनन्दन खत्री के अवचेतन तक भी पहुँचा दिया। इसी समीक्षा ने रचनाकार के मनोजगत में झाँकने की ज़रूरत पर भी ध्यान खींचा और याद दिलाया कि जिसे आप चाहने पर भी भौतिक रूप से नष्ट नहीं कर पाते, उसे अपने लिए मानसिक रूप से नष्ट कर डालते हैं।
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दो दशक से भी अधिक समय गुज़र जाने के बावजूद आज ‘अठारह उपन्यास’ की प्रासंगिकता बनी हुई है तो इसके कुछ ख़ास कारण हैं। इसमें एक प्रतिष्ठित कथा-लेखक की प्रतिक्रियाएँ-भर नहीं हैं, अपने समय की कतिपय महत्त्वपूर्ण कृतियों को परखने की विशिष्ट समीक्षा-दृष्टि भी मौजूद है।
एक सर्जक की रचना-दृष्टि से लैस समीक्षा इस अर्थ में अलग होती है कि वह रचना और उसकी प्रक्रिया से जुड़े तमाम पहलुओं पर भी पूरी संलग्नता से विचार करती है। इस रूप में राजेन्द्र यादव सुमित्रानन्दन पंत, अज्ञेय और मुक्तिबोध के क्रम में एक ज़रूरी समीक्षा लेकर आते हैं। ‘अठारह उपन्यास’ के बहाने दरअसल यहाँ राजेन्द्र यादव एक नई समीक्षा-दृष्टि लेकर उपस्थित हुए हैं।
उनकी यह समीक्षा-दृष्टि, उस समय की कथा-समीक्षा के सिर्फ़ तत्कालीन या फौरी सरोकारों और मूल्यांकन कर डालने की सीमा में बँधे होने और व्यक्तिगत राय या पसन्द बनकर रह जाने के विरोध में ही नहीं, उसके सर्टिफ़िकेट बन जाने और इतिहास-दृष्टि से अछूते रह जाने के कारण भी प्रारम्भ हुई थी। ज़ाहिर है, ऐसे में रचनाकार-समीक्षक राजेन्द्र यादव ने रचना की ज़रूरत के मुताबिक़ नए औज़ारों की तलाश करते हुए कथा-आलोचना में एक नई ही शुरुआत की थी। रचना में प्रवेश के लिए राजेन्द्र जी ने कई-कई युक्तियों का इस्तेमाल तो किया ही है, पत्र-शैली की सीधी-सरल शैली में भी वे रचना-प्रक्रिया तक के इस क्रम में राजेन्द्र यादव स्वयं को भी कुछ इस तरह शामिल कर लेते हैं जैसे अपने रचनाकार को भी वे एक ख़ास दूरी से देख रहे हों।
इस पुस्तक के पुनर्प्रकाशन पर यह स्मरण कराना ज़रूरी लगता है कि राजेन्द्र यादव द्वारा की गई ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ की समीक्षा अपने आपमें एक विशिष्ट कुंजी है जिसने भारतीय समाज द्वारा बेहद पारम्परिक ढंग से पढ़े गए इस उपन्यास को न सिर्फ़ नए तरीक़े से समझने में मदद की, बल्कि पाठक को देवकीनन्दन खत्री के अवचेतन तक भी पहुँचा दिया। इसी समीक्षा ने रचनाकार के मनोजगत में झाँकने की ज़रूरत पर भी ध्यान खींचा और याद दिलाया कि जिसे आप चाहने पर भी भौतिक रूप से नष्ट नहीं कर पाते, उसे अपने लिए मानसिक रूप से नष्ट कर डालते हैं।
Book Details
-
ISBN9788171194421
-
Pages223
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हालाँकि ‘नई कहानी’ का प्रारम्भ ‘प्रतीक’ (सम्पादक अज्ञेय) के अगस्त, 1951 के अंक में प्रकाशित राजेन्द्र यादव की कहानी ‘खेल-खिलौने’ से माना जाता है, मगर ‘जहाँ लक्ष्मी क़ैद है’ ‘नई कहानी’ आन्दोलन का अनिवार्य कथा-संग्रह है।
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भूमंडलीकरण कहता है कि उसके तहत हुआ बाज़ारों का एकीकरण लैंगिक रूप से तटस्थ है अर्थात् वह मर्दवादी नहीं है। यह एक ऐसा दावा है जो कभी पुनर्जागरण के मनीषियों ने भी नहीं किया था। भूमंडलीकरण इससे भी एक क़दम आगे जाकर कहता है कि नारीवाद की किसी क़िस्म से कोई ताल्लुक़ न रखते हुए भी उसने स्त्री के सशक्तीकरण के क्षेत्र में अन्यतम उपलब्धियाँ हासिल की हैं। सवाल यह है कि परिवार, विवाह की संस्था, धर्म और परम्परा को कोई क्षति पहुँचाने का कार्यक्रम अपनाए बिना यह चमत्कार कैसे हुआ? स्त्री को प्रजनन करने या न करने का अधिकार नहीं मिला, न ही उसके प्रति लैंगिक पूर्वग्रहों का शमन हुआ, न ही उसे इतरलिंगी सहवास की अनिवार्यताओं से मुक्ति मिली और न ही उसकी देह का शोषण ख़त्म हुआ—फिर बाज़ार ने यह सबलीकरण कैसे कर दिखाया? ख़ास बात यह है कि भूमंडलीकरण ख़ुद को लोकतंत्र का पैरोकार बताता है और बाज़ार की चौधराहट का कट्टर समर्थक होते हुए भी एक सीमा तक राज्य के हस्तक्षेप के लिए गुंजाइश छोड़ता है; लेकिन आधुनिकतावाद के गर्भ से निकली अधिकतर संस्थाओं और विचारों को पुष्ट करनेवाला यह भूमंडलीकरण नारीवाद की उपेक्षा करता है। दरअसल इसका सूत्रीकरण अस्सी और नब्बे के उन दशकों में हुआ जिनमें नारीवाद अपने ही गतिरोधों से जूझ रहा था। इसी ज़माने में भूमंडलीकरण ने आधुनिक विचारधाराओं में सिर्फ़ नारीवाद को ही असफल घोषित किया और इस तरह पूँजीवादी आधुनिकता ने पहली बार पितृसत्ता के ख़िलाफ़ संघर्ष का दायित्व पूरी तरह त्याग दिया। मार्च 2001 में प्रकाशित ‘हंस’ के ‘स्त्री-भूमंडलीकरण : पितृसत्ता के नए रूप’ विशेषांक में यह शिनाख़्त करने की कोशिश की गई थी कि श्रमिकों की एक विशाल फ़ौज के रूप में स्त्री को आत्मसात् करनेवाले भूमंडलीकरण में नर-नारी सम्बन्धों के विभिन्न समीकरण क्या हैं और उसके तत्त्वावधान में स्त्री कितने प्रतिशत व्यक्ति बनी है और कितने प्रतिशत वस्तु। ‘पितृसत्ता के नए रूप : स्त्री और भूमंडलीकरण’ कुछ रचनाओं को छोड़कर उसी अंक का पुस्तक रूप है।
Pitrisatta Ke Naye Roop : Stree Aur Bhumandalikaran
Abhay Kumar Dubey
20% off₹ 299
₹ 239.2
Available
Katha Jagat Ki Baghi Muslim Auratein
- Author Name:
Rajendra Yadav +1
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‘मुसलमान औरत’ नाम आते ही घर की चारदीवारी में बन्द या क़ैद, पर्दे में रहनेवाली एक ‘ख़ातून’ का चेहरा उभरता है। अब से कुछ साल पहले तक मुसलमान औरतों का मिला-जुला यही चेहरा ज़ेहन में महफ़ूज़ था। घर में मोटे-मोटे पर्दों के पीछे जीवन काट देनेवाली या घर से बाहर ख़तरनाक ‘बुर्कों’ में ऊपर से लेकर नीचे तक ख़ुद को छुपाए हुए।
समय के साथ काले-काले बुर्कों के रंग भी बदल गए, लेकिन कितनी बदलीं मुस्लिम औरत या बिलकुल ही नहीं बदलीं! क़ायदे से देखें, तो अब भी छोटे-छोटे शहरों की औरतें बुर्का-संस्कृति में एक न ख़त्म होनेवाली घुटन का शिकार हैं, लेकिन घुटन से बग़ावत भी जन्म लेती है और मुसलमान औरतों के बग़ावत की लम्बी दास्तान रही है। ऐसा भी देखा गया है कि ‘मज़हबी फ़रीज़ों’ से जकड़ी, सौमो-सलात की पाबन्द औरत ने यकबारगी ही बग़ावत या जेहाद के बाज़ू फैलाए और खुली आज़ाद फ़िजा में समुद्री पक्षी की तरह उड़ती चली गई।
लेखन के शुरुआती सफ़र में ही इन मुस्लिम महिलाओं ने जैसे मर्दों की वर्षों पुरानी हुक्मरानी के तौक़ को अपने गले से उतार फेंका था। ये महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं है कि मुस्लिम महिलाओं ने जब क़लम सॅंभाली तो अपनी क़लम से तलवार का काम लिया। इस तलवार की ज़द पर पुरुषों का, अब तक का समाज था। वर्षों की ग़ुलामी थी। भेदभाव और कुंठा से जन्मा, भयानक पीड़ा देनेवाला एहसास था। संग्रह में शामिल कहानियों में इस बात का ख़ास ख़याल रखा गया है कि कहानी में नर्म, गर्म बग़ावत के संकेत ज़रूर मिलते हों। संग्रह की कुछ कहानियाँ तो पूरी-पूरी बगावत का ‘अलम’ (झंडा) लिए चलती नज़र आती हैं, लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं, जहाँ बस दूर से इस एहसास को छुआ भर गया है।
निःसन्देह ये कहानियाँ औरतों की अपने अस्तित्व की लड़ाई की दास्ताँ बयान करती हैं जो तरक़्क़पसन्द पाठकों को बेहद प्रभावित करेंगी।
Andekhe Anjaan Pul
- Author Name:
Rajendra Yadav
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भूरे लोगों के इस भारतीय समाज में स्त्री को कई अपमानजनक परीक्षाओं से गुज़रना पड़ता है। विवाह की पहली शर्त है—उसका गोरा होना। लड़की यदि काली, कुरूप हुई तो अस्वीकार का कोड़ा लहराने लगता है। क्या काली लड़की को सपने देखने का हक़ नहीं है? इस उपन्यास की नायिका निन्नी कालापन और कुरूपता के बावजूद सपनों में निकट के सागर को देखती है, लेकिन निन्नी के छूते ही सपने में बनी बर्फ़ की मूर्ति गल जाती है। जबकि दूर का और लगभग अनजाने दर्शन द्वारा समानता और स्नेह से दिया गया चुम्बन एक पुल बन जाता है। प्रख्यात कथाकार का यह उपन्यास स्त्री-जीवन को समानता की गरिमा देने पर बल देता है।
Mubarak Pahla Kadam
- Author Name:
Sanjeev +1
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पहली नज़र, पहली प्रीति, पहली कृति...ग़रज़ कि किसी भी चीज़ का पहला होना। कितना आह्लादकारी होता है, इस पहले का अनुभव करना। यह अहसास अपने लिए तो रोमांचक होता ही है, औरों के लिए भी कम रोमांचक नहीं होता। कथा साहित्य में पहली कहानी अपने आप में सृजन-संभार के टटकेपन के इसी सुखद अहसास को समोए रहती है। आगे चलकर उस कथाकार के विकास के ग्राफ़ को जानने के लिए भी परिमापन इसी बिन्दु से होता है। इसीलिए कथाकारों के बारे में अक्सर पूछा जाता है कि कौन थी उनकी पहली कहानी, कहाँ प्रकाशित हुई थी और कब? ‘हंस’ में प्रकाशित कथाकारों की पहली कहानियों का यह संचयन इन प्रश्नों का एक विनम्र उत्तर है। यह संचयन इस लिहाज़ से भी महत्त्वपूर्ण है कि इसमें जिन कहानीकारों की कहानियाँ संकलित हैं, उनमें से अधिसंख्य ने बाद में अपनी बुलन्दी के झंडे गाड़े।
Dhol Aur Apne Paar
- Author Name:
Rajendra Yadav
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राजेन्द्र यादव नई कहानी की ज़मीन को हमवार करनेवाले अगली पंक्ति के कथाकारों में एक रहे हैं। शहरी मध्यवर्गीय समाज की वर्गगत विद्रूपताओं, विडम्बनाओं और पीड़ाओं का अत्यन्त प्रामाणिक विश्वसनीय लेखा-जोखा उनके यहाँ मिलता है।
जीवन के दैनिक प्रसंगों में निहित अन्तर्विरोध को उजागर करने के लिए कहानी के शिल्प में भी राजेन्द्र यादव ने अनेक प्रयोग किए हैं। मध्यवर्गीय मनोरचना की जटिल गुत्थियों को खोलने-समझने के लिए यह शायद ज़रूरी भी था।
इस संकलन की कहानियाँ भी स्वातंत्र्योत्तर भारत के मध्यवित्त समाज के भीतर संक्रमण से गुज़र रहे नैतिक मूल्यों, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों, सामाजिक परिस्थितियों तथा इन सबके बीच पैदा हो रही नई दृष्टि को रेखांकित करती हैं।
—डॉ. देवराज।
Ek Duniya : Samanantar
- Author Name:
Rajendra Yadav
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आधुनिक साहित्य की सबसे अधिक सशक्त, जीवन्त और महत्त्वपूर्ण साहित्य विधा—कहानी—को लेकर इधर जो विवाद, हलचलें, प्रश्न, जिज्ञासाएँ और गोष्ठियाँ हुई हैं, उन सभी में कला-साहित्य के नए-पुराने सवालों को बार-बार उठाया गया है। कथाकार राजेन्द्र यादव ने पहली बार कहानी के मूलभूत और सामयिक प्रश्नों को साहस और व्यापक अन्तर्दृष्टि के साथ खुलकर सामने रखा है, देशी-विदेशी कहानियों के परिप्रेक्ष्य में उन पर विचार और उनका निर्भीक विवेचन किया है। कइयों की अप्रसन्नता और समर्थन की चिन्ता से मुक्त, यह गम्भीर विश्लेषण जितना तीखा है, उतना ही महत्त्वपूर्ण भी।
लेकिन उन कहानियों के बिना यह सारा विश्लेषण अधूरा रहता जिनका ज़िक्र समीक्षक, लेखक, सम्पादक, पाठक बार-बार करते रहे हैं; और जिनसे आज की कहानी का धरातल बना है।
निर्विवाद रूप से यह स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी-कहानी का बेजोड़ संकलन और प्रामाणिक ‘हैंड-बुक’ है। यह सिर्फ़ कुछ कहानियों का ढेर या बंडल नहीं है, बल्कि इनके चुनाव के पीछे एक विशेष जागरूक दृष्टि और कलात्मक आग्रह है।
इसीलिए आज की सम्पूर्ण रचनात्मक चेतना को समझने के लिए ‘एक दुनिया : समानान्तर’ अपरिहार्य और अनुपेक्षणीय संकलन है, ऐतिहासिक और समकालीन लेखन का प्रतिनिधि सन्दर्भ ग्रन्थ...
‘एक दुनिया : समानान्तर’ की भूमिका ने कथा-समीक्षा में भीषण उथल-पुथल मचाई है, मूल्यांकन को नए धरातल दिए हैं। यह समीक्षा अपने आप में हिन्दी के विचार-साहित्य की एक उपलब्धि है।
यह नया संस्करण इसकी लोकप्रियता का प्रमाण है।
Ukhde Huye Log
- Author Name:
Rajendra Yadav
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स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज की त्रासदी को यह उपन्यास दो स्तरों पर उद्घाटित करता है—पूँजीवादी शोषण और मध्यवर्गीय भटकाव। आकस्मिक नहीं कि सूरज-सरीखे संघर्षशील युवा पत्रकार के साहस और प्रेरणा के बावजूद उपन्यास के केन्द्रीय चरित्र—शरद और जया जिस भयावह यथार्थ से दूर भागते हैं, उनका कोई गंतव्य नहीं। न वे शोषक से जुड़ पा रहे हैं, न शोषित से।
छठे दशक के पूर्वार्द्ध में प्रकाशित राजेन्द्र यादव की इस कथाकृति को पहला राजनीतिक उपन्यास कहा गया था और अनेक लेखकों एवं पत्र-पत्रिकाओं ने इसके बारे में लिखा था। मसलन, श्रीकान्त वर्मा ने कलकत्ता से प्रकाशित ‘सुप्रभात' में टिप्पणी करते हुए कहा कि “शासन का पूँजी से समझौता है, ग़रीब मज़दूरों पर गोलियाँ चलाकर कृत्रिम आँसू बहानेवाली राष्ट्रीय पूँजी की अहिंसा है। इन सबको लेकर लेखक ने एक मनोरंजक और जीवन्त उपन्यास की रचना की है (और) पूँजीवादी संस्कृति की विकृतियों की अनेक झाँकियाँ दिखाई हैं।” अथवा ‘आलोचना’ में लिखा गया कि “ ‘उखड़े हुए लोग' में जिन लोगों का चित्रण किया गया है, वे एक ओर रूढ़ियों के कठोर पाश से व्याकुल हैं तथा दूसरी ओर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में निरन्तर लुटते रहने के कारण जम पाने में कठिनाई का अनुभव कर रहे हैं। इस दोतरफ़ा संघर्ष में रत उखड़े हुए चेतन मध्यवर्गीय जीवन का एक पहलू प्रस्तुत उपन्यास में प्रकट हुआ है। बौद्धिक विचारणा की दृष्टि से यह उपन्यास पर्याप्त स्पष्ट और खरा है।” या फिर चन्द्रगुप्त विद्यालंकार की यह टिप्पणी कि, “सम्पूर्ण उपन्यास में एक ऐसी प्रभावशाली तीव्रता विद्यमान है, जो पाठक के हृदय में किसी न किसी प्रकार की प्रतिक्रिया उत्पन्न किए बिना न रहेगी और (इसमें) अनुभूति की एक ऐसी गहराई है जो हिन्दी के बहुत कम उपन्यासों में मिलेगी।” कहना न होगा कि इस उपन्यास में लेखक ने “जहाँ एक ओर कथानक के प्रवाह, घटनाचक्र की निरन्तर और स्वाभाविक गति तथा स्वच्छ और अबाध नाटकीयता को निभाया है, वहीं दूसरी ओर उसने जीवन से प्राप्त सत्यों और अनुभूतियों को सुन्दर शिल्प और शैली में यथार्थ ढंग से अंकित भी किया है।”
Aadmi Ki Nigah Mein Aurat
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Rajendra Yadav
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यशस्वी कथाकार-सम्पादक राजेन्द्र यादव की इस किताब में स्त्रियों की मुक्ति की राह में मौजूद अनगिनत गुत्थियों पर लिखे लेखों में अनेक कोणों से विचार किया गया है। बीते लगभग चार दशकों में विभिन्न विचारोत्तेजक मसलों पर स्त्रियों के पक्ष में दी गई दलीलों के साथ-साथ इन लेखों में बार-बार उन पेचीदगियों की तरफ़ भी इशारा किया गया है, जिन पर हमारा रूढ़िबद्ध मन सोचना नहीं चाहता। कहते हैं कि दुनिया अगर चार पहाड़ों के बोझ तले पिस रही है तो औरतों पर पाँच पहाड़ों का बोझ है—पाँचवा पहाड़ पुरुष सत्तात्मक विधान का है। आज जबकि पुनरुत्थानवादी शक्तियाँ भारतीय समाज में बड़े ठस्से के साथ घूम रही हैं, यह छिपा नहीं रह गया है कि धर्म और नैतिकता की आड़ में सबसे ज़्यादा अत्याचार औरतों पर ही हो रहे हैं। भूलना नहीं चाहिए कि धर्म के तालिबान हर युग में औरत की नाकेबन्दी करते आए हैं। इस किताब में दो खंड हैं। पहला खंड स्त्री-दासता के रगो-रेशे उधेड़ते हुए उसके ऐतिहासिक सन्दर्भों की पड़ताल करता है जबकि दूसरे खंड में स्त्री विषयक चुनिन्दा रचनात्मक साहित्य को परत-दर-परत टटोलते हुए उसकी सीमाओं और सम्भावनाओं पर उँगली रखने का जोखिम लिया गया है। पूछने को तो आप पूछ सकते हैं कि यह ‘आदमी की निगाह में औरत’ नाम की किताब भी तो आख़िर एक आदमी की ही लिखी हुई किताब है—एक और पुरुष दृष्टिकोण? जवाब में यही कहना पड़ेगा कि आइए पढक़र देखें...!
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