Pitrisatta Ke Naye Roop : Stree Aur Bhumandalikaran
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भूमंडलीकरण कहता है कि उसके तहत हुआ बाज़ारों का एकीकरण लैंगिक रूप से तटस्थ है अर्थात् वह मर्दवादी नहीं है। यह एक ऐसा दावा है जो कभी पुनर्जागरण के मनीषियों ने भी नहीं किया था। भूमंडलीकरण इससे भी एक क़दम आगे जाकर कहता है कि नारीवाद की किसी क़िस्म से कोई ताल्लुक़ न रखते हुए भी उसने स्त्री के सशक्तीकरण के क्षेत्र में अन्यतम उपलब्धियाँ हासिल की हैं। सवाल यह है कि परिवार, विवाह की संस्था, धर्म और परम्परा को कोई क्षति पहुँचाने का कार्यक्रम अपनाए बिना यह चमत्कार कैसे हुआ? स्त्री को प्रजनन करने या न करने का अधिकार नहीं मिला, न ही उसके प्रति लैंगिक पूर्वग्रहों का शमन हुआ, न ही उसे इतरलिंगी सहवास की अनिवार्यताओं से मुक्ति मिली और न ही उसकी देह का शोषण ख़त्म हुआ—फिर बाज़ार ने यह सबलीकरण कैसे कर दिखाया? ख़ास बात यह है कि भूमंडलीकरण ख़ुद को लोकतंत्र का पैरोकार बताता है और बाज़ार की चौधराहट का कट्टर समर्थक होते हुए भी एक सीमा तक राज्य के हस्तक्षेप के लिए गुंजाइश छोड़ता है; लेकिन आधुनिकतावाद के गर्भ से निकली अधिकतर संस्थाओं और विचारों को पुष्ट करनेवाला यह भूमंडलीकरण नारीवाद की उपेक्षा करता है। दरअसल इसका सूत्रीकरण अस्सी और नब्बे के उन दशकों में हुआ जिनमें नारीवाद अपने ही गतिरोधों से जूझ रहा था। इसी ज़माने में भूमंडलीकरण ने आधुनिक विचारधाराओं में सिर्फ़ नारीवाद को ही असफल घोषित किया और इस तरह पूँजीवादी आधुनिकता ने पहली बार पितृसत्ता के ख़िलाफ़ संघर्ष का दायित्व पूरी तरह त्याग दिया। मार्च 2001 में प्रकाशित ‘हंस’ के ‘स्त्री-भूमंडलीकरण : पितृसत्ता के नए रूप’ विशेषांक में यह शिनाख़्त करने की कोशिश की गई थी कि श्रमिकों की एक विशाल फ़ौज के रूप में स्त्री को आत्मसात् करनेवाले भूमंडलीकरण में नर-नारी सम्बन्धों के विभिन्न समीकरण क्या हैं और उसके तत्त्वावधान में स्त्री कितने प्रतिशत व्यक्ति बनी है और कितने प्रतिशत वस्तु। ‘पितृसत्ता के नए रूप : स्त्री और भूमंडलीकरण’ कुछ रचनाओं को छोड़कर उसी अंक का पुस्तक रूप है।
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भूमंडलीकरण कहता है कि उसके तहत हुआ बाज़ारों का एकीकरण लैंगिक रूप से तटस्थ है अर्थात् वह मर्दवादी नहीं है। यह एक ऐसा दावा है जो कभी पुनर्जागरण के मनीषियों ने भी नहीं किया था। भूमंडलीकरण इससे भी एक क़दम आगे जाकर कहता है कि नारीवाद की किसी क़िस्म से कोई ताल्लुक़ न रखते हुए भी उसने स्त्री के सशक्तीकरण के क्षेत्र में अन्यतम उपलब्धियाँ हासिल की हैं। सवाल यह है कि परिवार, विवाह की संस्था, धर्म और परम्परा को कोई क्षति पहुँचाने का कार्यक्रम अपनाए बिना यह चमत्कार कैसे हुआ? स्त्री को प्रजनन करने या न करने का अधिकार नहीं मिला, न ही उसके प्रति लैंगिक पूर्वग्रहों का शमन हुआ, न ही उसे इतरलिंगी सहवास की अनिवार्यताओं से मुक्ति मिली और न ही उसकी देह का शोषण ख़त्म हुआ—फिर बाज़ार ने यह सबलीकरण कैसे कर दिखाया?
ख़ास बात यह है कि भूमंडलीकरण ख़ुद को लोकतंत्र का पैरोकार बताता है और बाज़ार की चौधराहट का कट्टर समर्थक होते हुए भी एक सीमा तक राज्य के हस्तक्षेप के लिए गुंजाइश छोड़ता है; लेकिन आधुनिकतावाद के गर्भ से निकली अधिकतर संस्थाओं और विचारों को पुष्ट करनेवाला यह भूमंडलीकरण नारीवाद की उपेक्षा करता है। दरअसल इसका सूत्रीकरण अस्सी और नब्बे के उन दशकों में हुआ जिनमें नारीवाद अपने ही गतिरोधों से जूझ रहा था। इसी ज़माने में भूमंडलीकरण ने आधुनिक विचारधाराओं में सिर्फ़ नारीवाद को ही असफल घोषित किया और इस तरह पूँजीवादी आधुनिकता ने पहली बार पितृसत्ता के ख़िलाफ़ संघर्ष का दायित्व पूरी तरह त्याग दिया।
मार्च 2001 में प्रकाशित ‘हंस’ के ‘स्त्री-भूमंडलीकरण : पितृसत्ता के नए रूप’ विशेषांक में यह शिनाख़्त करने की कोशिश की गई थी कि श्रमिकों की एक विशाल फ़ौज के रूप में स्त्री को आत्मसात् करनेवाले भूमंडलीकरण में नर-नारी सम्बन्धों के विभिन्न समीकरण क्या हैं और उसके तत्त्वावधान में स्त्री कितने प्रतिशत व्यक्ति बनी है और कितने प्रतिशत वस्तु। ‘पितृसत्ता के नए रूप : स्त्री और भूमंडलीकरण’ कुछ रचनाओं को छोड़कर उसी अंक का पुस्तक रूप है।
Book Details
-
ISBN9788126719679
-
Pages22
-
Avg Reading Time1 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारत 1991 में जैसे ही आर्थिक सुधारों और भूमंडलीकरण की डगर पर चला, वैसे ही इस देश के मध्यवर्ग को एक नया महत्त्व प्राप्त हो गया। नई अर्थनीति के नियोजकों ने मध्यवर्ग को ‘शहरी भारत’ के रूप में देखा जो उनके लिए विश्व के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक था। एक सर्वेक्षण ने घोषित कर दिया कि यह ‘शहरी भारत अपने आप में दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देश के बराबर है।’ लेकिन, भारतीय मध्यवर्ग कोई रातोंरात बन जानेवाली सामाजिक संरचना नहीं थी। उपभोक्तावादी परभक्षी के रूप में इसकी खोज किए जाने से कहीं पहले इस वर्ग का एक अतीत और एक इतिहास भी था। भारत के मध्यवर्ग की अजीब दास्ताँ में पवन कुमार वर्मा ने इसी प्रस्थान बिन्दु से बीसवीं शताब्दी में मध्यवर्ग के उद्भव और विकास की विस्तृत जाँच-पड़ताल की है। उन्होंने आज़ादी के बाद के पचास वर्षों को ख़ास तौर से अपनी विवेचना का केन्द्र बनाया है। वे आर्थिक उदारीकरण से उपजे समृद्धि के आशावाद को इस वर्ग की मानसिकता और प्रवृत्तियों की रोशनी में देखते हैं। उन्होंने रातोंरात अमीर बन जाने की मध्यवर्गीय स्वैर कल्पना को नितान्त ग़रीबी में जीवन-यापन कर रहे असंख्य भारतवासियों के निर्मम यथार्थ की कसौटी पर भी कसा है।
मध्यवर्ग की यह अजीब दास्ताँ आज़ादी के बाद हुए घटनाक्रम का गहराई से जायज़ा लेती है। भारत-चीन युद्ध और नेहरू की मृत्यु से लेकर आपातकाल व मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने की घोषणा तक इस दास्ताँ में मध्यवर्ग एक ऐसे ख़ुदग़र्ज़ तबक़े के रूप में उभरता है जिसने बार-बार न्यायपूर्ण समाज बनने के अपने ही घोषित लक्ष्यों के साथ ग़द्दारी की है। लोकतंत्र और चुनाव-प्रक्रिया के प्रति मध्यवर्ग की प्रतिबद्धता दिनोंदिन कमज़ोर होती जा रही है। मध्यवर्ग ऐसी किसी गतिविधि या सच्चाई से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता जिसका उसकी आर्थिक ख़ुशहाली से सीधा वास्ता न हो। आर्थिक उदारीकरण ने उसके इस रवैये को और भी बढ़ावा दिया है।
पुस्तक के आख़िरी अध्याय में पवन कुमार वर्मा ने बड़ी शिद्दत के साथ दलील दी है कि कामयाब लोगों द्वारा समाज से अपने-आपको काट लेने की यह परियोजना भारत जैसे देश के लिए ख़तरनाक ही नहीं, बल्कि यथार्थ से परे भी है। अगर भारत के मध्यवर्ग ने दरिद्र भारत की ज़रूरतों के प्रति अपनी संवेदनहीनता ज़ारी रखी तो इससे वह भरी राजनीतिक उथल-पुथल की आफ़त को ही आमंत्रित करेगा। किसी भी राजनीतिक अस्थिरता का सीधा नुकसान मध्यवर्ग द्वारा पाली गई समृद्धि की महत्त्वाकांक्षाओं को ही झेलना होगा।
Shah Aur Maat : Sujata Ki Diary
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Rajendra Yadav
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‘शह और मात’ दूसरे प्यार की जटिल और कटु कहानी है, जहाँ अपराध-भावना से पीड़ित प्रत्येक पात्र अपना पुनरान्वेषण करता है और अन्त में अपने को एक यंत्रणादायक भ्रान्ति और छलना से घिरा पाता है।
उपन्यास की भाषा अपनी ताज़गी, अभिव्यंजना और शक्ति के लिए बार-बार प्रशंसित हुई है। इस उपन्यास को पढ़ना एक अद्भुत—लेकिन बेहद आत्मीय—अनुभव से गुज़रना है, जो अपने को देखने की नई दृष्टि देता है।
‘शह और मात’...एक शुद्ध मनोवैज्ञानिक उपन्यास है, इसमें दो व्यक्तियों के प्रति तीसरे व्यक्तित्व (यानी सुजाता) की प्रतिक्रियाओं का वर्णन है। अचरज की बात यह है कि देशकाल की स्थितियों से प्रायः कोई मदद न लेते हुए भी लेखक इस उपन्यास को इतना नाटकीय और सजीव बना देता है! सुजाता की उदय से सम्बद्ध दिलचस्पी क्रमशः अधिक तीखी और गहरी होती जाती है। यह दिलचस्पी बहुत कुछ बौद्धिक क़िस्म की है, उपन्यास की नाटकीयता भी एक ख़ास तरह का बौद्धिक मनोवैज्ञानिक विनोद करती है। उपन्यास की नाटकीयता और रोचकता का एकमात्र रहस्य उसकी मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता एवं यथार्थ की अनुकारिता है। उपन्यास का प्रत्येक पन्ना रोचक है।
—डॉ. देवराज
Katha Jagat Ki Baghi Muslim Auratein
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Rajendra Yadav +1
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‘मुसलमान औरत’ नाम आते ही घर की चारदीवारी में बन्द या क़ैद, पर्दे में रहनेवाली एक ‘ख़ातून’ का चेहरा उभरता है। अब से कुछ साल पहले तक मुसलमान औरतों का मिला-जुला यही चेहरा ज़ेहन में महफ़ूज़ था। घर में मोटे-मोटे पर्दों के पीछे जीवन काट देनेवाली या घर से बाहर ख़तरनाक ‘बुर्कों’ में ऊपर से लेकर नीचे तक ख़ुद को छुपाए हुए।
समय के साथ काले-काले बुर्कों के रंग भी बदल गए, लेकिन कितनी बदलीं मुस्लिम औरत या बिलकुल ही नहीं बदलीं! क़ायदे से देखें, तो अब भी छोटे-छोटे शहरों की औरतें बुर्का-संस्कृति में एक न ख़त्म होनेवाली घुटन का शिकार हैं, लेकिन घुटन से बग़ावत भी जन्म लेती है और मुसलमान औरतों के बग़ावत की लम्बी दास्तान रही है। ऐसा भी देखा गया है कि ‘मज़हबी फ़रीज़ों’ से जकड़ी, सौमो-सलात की पाबन्द औरत ने यकबारगी ही बग़ावत या जेहाद के बाज़ू फैलाए और खुली आज़ाद फ़िजा में समुद्री पक्षी की तरह उड़ती चली गई।
लेखन के शुरुआती सफ़र में ही इन मुस्लिम महिलाओं ने जैसे मर्दों की वर्षों पुरानी हुक्मरानी के तौक़ को अपने गले से उतार फेंका था। ये महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं है कि मुस्लिम महिलाओं ने जब क़लम सॅंभाली तो अपनी क़लम से तलवार का काम लिया। इस तलवार की ज़द पर पुरुषों का, अब तक का समाज था। वर्षों की ग़ुलामी थी। भेदभाव और कुंठा से जन्मा, भयानक पीड़ा देनेवाला एहसास था। संग्रह में शामिल कहानियों में इस बात का ख़ास ख़याल रखा गया है कि कहानी में नर्म, गर्म बग़ावत के संकेत ज़रूर मिलते हों। संग्रह की कुछ कहानियाँ तो पूरी-पूरी बगावत का ‘अलम’ (झंडा) लिए चलती नज़र आती हैं, लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं, जहाँ बस दूर से इस एहसास को छुआ भर गया है।
निःसन्देह ये कहानियाँ औरतों की अपने अस्तित्व की लड़ाई की दास्ताँ बयान करती हैं जो तरक़्क़पसन्द पाठकों को बेहद प्रभावित करेंगी।
Rajendra Yadav Rachanawali : Vols. 1-15
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Rajendra Yadav +2
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राजेन्द्र यादव आज़ाद हिन्दुस्तान की दहलीज़ पर तैयार खड़ी नौजवान पीढ़ी के उस समुदाय के सदस्य हैं जिसकी मानसिकता 20वीं सदी के तीसरे-चौथे-पाँचवें दशक में विश्वव्यापी निराशा और मोहभंग में संरचित हुई है। दहलीज़ पर खड़ी आज़ाद, नौजवान पीढ़ी के इस समुदाय के लिए विचार, दर्शन, रणनीति, भविष्य की संरचना, आगामी का नक़्शा—सब कुछ एक भिन्न विवेक और नए तर्क के सहारे गढ़ा जाना है। उसकी मंशा में नई शुरुआत अतीत के साथ सम्पूर्ण विच्छेद से होनी है।
राजेन्द्र यादव के रचनात्मक उपक्रम की अन्तर्वस्तु यही विचार है जो नई दुनिया की रचना का मूलाधार है। यह ‘कैंड़े’ के आदमी का काम है; गुर्दा चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो यह एक विरल पराक्रम है। अपनी पीढ़ी के रचनाकारों में राजेन्द्र यादव विशेषत: अपने विचार को उसकी तार्किक संगति की आख़िरी हद तक ले जा सकने की क्षमता से लैस दिखाई देते हैं। उनके उपन्यासों में ऐसे ही किसी जड़ीभूत पारिवारिक-सामाजिक-राजनीतिक आग्रहों के उच्छेदन का अभियान छेड़ा गया है। रचनावली के खंड 1 से 5 तक में संकलित उपन्यास इसकी गवाही देते हैं।
राजेन्द्र जी ने अपने लेखन का प्रारम्भ कविताओं से किया। परन्तु बाद में 1945-46 की इन आरम्भिक कविताओं को महत्त्वहीन मानकर नष्ट कर दिया। बाद में लिखी उनकी कविताएँ 'आवाज़ तेरी है' नाम से 1960 में ज्ञानपीठ प्रकाशन से प्रकाशित हुईं। इनके अतिरिक्त राजेन्द्र यादव की कुछ कविताएँ अभी तक अप्रकाशित हैं। रचनावली का पहला खंड उनके इसी आरम्भिक लेखन को समर्पित है। जिसमें एक तरफ़ उनकी प्रकाशित-अप्रकाशित कविताएँ हैं और दूसरी तरफ़ ‘प्रेत बोलते हैं’ और ‘एक था शैलेन्द्र’ जैसे प्रारम्भिक उपन्यास। दूसरे खंड में ‘उखड़े हुए लोग’ तथा ‘कुलटा’, तीसरे खंड में ‘सारा आकाश’, ‘शह और मात’, ‘अनदेखे अनजान पुल’ और चौथे खंड में ‘एक इंच मुस्कान’ तथा ‘मंत्रविद्ध’ जैसे उपन्यास शामिल हैं। रचनावली का पाँचवाँ खंड राजेन्द्र जी के अधूरे-अप्रकाशित उपन्यासों को एक साथ प्रस्तुत करता है। अधूरे होने के कारण इन सबको एक ही खंड में शामिल किया गया है।
Waqt Hai Ek Break Ka
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Rajendra Yadav +2
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टी.वी. आज हमारे जीवन में जितनी गहराई तक उतर चुका है, उससे दुगुनी गहराई उसने शायद पतन की दिशा में हासिल कर ली है। वैचारिक शून्यता, दिशाहीनता, समाज की मूलभूत चिन्ताओं से निरपेक्ष रहने की आदत और सबसे ऊपर स्वयं को ईश्वर का स्थानापन्न मानने का ढीठ आत्मविश्वास। सस्ती अपराध कथाएँ, हत्याएँ, बलात्कार, भूत-प्रेत, अमीरों की लिजलिजी भावुक कहानियाँ, क्रिकेट और चटखारेदार राजनीति। लगभग यही सब है जो टी.वी. हमें चौबीसों घंटे दे रहा है। और यह सब जिस कारख़ाने में बनता है, या कहें कि जहाँ इसे परोसने लायक़ बनाया जाता है, वहाँ क्या होता है, परदे के परे के उस रहस्यलोक में कौन, कैसे और क्यों इन सिरकटे सपनों की कठपुतलियाँ नचा रहा है—इस किताब में शामिल कहानियाँ यही बताती हैं।
जनवरी 2007 में प्रकाशित ‘हंस’ के विशेषांक ‘ख़बर चैनलों में पहली बार’ के लिए विभिन्न अग्रणी चैनलों में काम कर रहे पत्रकारों ने अपनी आपबीती को आधार बनाकर ये कहानियाँ लिखी थीं। बेशक, सभी कहानियाँ कलात्मक शर्तों पर खरी नहीं उतरतीं लेकिन इनके माध्यम से छोटे परदे के भीतरी सच की जो छवियाँ सामने आई हैं, वे हौलनाक हैं। इनसे हमें पता चलता है कि किस तरह देश की श्रेष्ठ पत्रकार प्रतिभाएँ सिर्फ़ अपनी जगह सुरक्षित रखने के लिए एक-दूसरे को छुरा भोंकने में जुटी हैं, कैसे अकल्पनीय तनख़्वाहों का जाल उन्हें अपनी माया में बुन चुका है, और कैसे रचनात्मकता के नाम पर उनके पास सिर्फ़ ये छटपटाहट ही बची है जो इन कहानियों में प्रकट हुई है।
Sara Aakash
- Author Name:
Rajendra Yadav
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आज़ाद भारत की युवा-पीढ़ी के वर्तमान की त्रासदी और भविष्य का नक़्शा। आश्वासन तो यह है कि सम्पूर्ण दुनिया और सारा आकाश तुम्हारे सामने खुला है—सिर्फ़ तुम्हारे भीतर इसे जीतने और नापने का संकल्प हो—हाथ-पैरों में शक्ति हो...
मगर असलियत यह है कि हर पाँव में बेड़ियाँ हैं और हर दरवाज़ा बन्द है। युवा बेचैनी को दिखाई नहीं देता कि किधर जाए और क्या करे। इसी में टूटता है उसका तन, मन और भविष्य का सपना। फिर वह क्या करे—पलायन, आत्महत्या या आत्मसमर्पण?
आज़ादी के पचास बरसों ने भी इस नक़्शे को बदला नहीं—इस अर्थ में ‘सारा आकाश’ ऐतिहासिक उपन्यास भी है और समकालीन भी।
बेहद पठनीय और हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासों में से एक ‘सारा आकाश’ चालीस संस्करणों में आठ लाख प्रतियों से ऊपर छप चुका है, लगभग सारी भारतीय और प्रमुख विदेशी भाषाओं में अनूदित है। बासु चटर्जी द्वारा बनी फ़िल्म ‘सारा आकाश’ (हिन्दी) सार्थक कलाफ़िल्मों की प्रारम्भकर्ता फ़िल्म है।
Teen Bahanein
- Author Name:
Anton Chekhav +2
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"तुम कहते हो, जीवन सुन्दर है...ठीक है, लेकिन उसके सुन्दर लगने से ही क्या होता है। हम तीनों बहनों के लिए अभी तक के जीवन में क्या सुन्दर है? जैसे पौधे को दीमक खा जाती है, उसी तरह हम तीनों जीवन के हाथों में घुटती रही हैं...अरे लो, मैं तो रोने भी लगी—मुझे रोना नहीं चाहिए..." "मुझे लगता है कि मनुष्य के पास एक आस्था होनी चाहिए, या और कुछ नहीं तो उसे कोई विश्वास और आस्था खोज लेनी चाहिए, वर्ना उसकी जिंदगी सूनी और खोखली हो जाएगी।...आदमी को मालूम तो होना चाहिए कि उसकी जिंदगी का अर्थ क्या है..." "प्यारी बहनों, हमारे जीवन का अन्त यहीं नहीं हो जाएगा। हम लोग जीवित रहेंगी, यह संगीत कैसा आनन्ददायक, कैसा सुखद है कि मन होता है, थोड़ी देर और चलता रहे, ताकि हम जान लें कि हम किसलिए ज़िन्दा हैं, हमें पता चल जाए कि हम दु:ख क्यों भोग रही हैं।" "काश, जो कुछ हमने जिया है, वह सिर्फ़ ज़िन्दगी का रफ़-ड्राफ़्ट होता और इसे फ़ेयर करने का एक अवसर हमें और मिलता।" चेख़व की रचनाओं की आत्मीयता, करुणा और ख़ास क़िस्म की निराश उदासी (लगभग आत्मदया जैसी) मुझे बहुत छूती है। मैं उसके प्रभाव से लगभग मोहाच्छन्न था। उसी श्रद्धा से मैंने इन नाटकों को हाथ लगाया था। रूसी भाषा नहीं जनता था, मगर अधिक से अधिक ईमानदारी से उसके नाटकों की मौलिक शक्ति तक पहुँचाना चाहता था। इसलिए तीन अंग्रेज़ी अनुवादों को सामने रखकर एक-एक वाक्य पढ़ता और मूल को पकड़ने कि कोशिश करता। आधार बनाया मॉस्को के अनुवाद को। बाद में सुना, अनुवादों को पाठकों ने पसन्द किया, अनेक रंग-संस्थानों और रेडियो इत्यादि ने इन्हें अपनाया, पाठ्यक्रम में भी उन्हें लिया गया। —राजेन्द्र यादव
Anya Se Ananya
- Author Name:
Prabha Khetan
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भारतीय-साहित्य की विलक्षण बुद्धिजीवी डॉ. प्रभा खेतान दर्शन, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, विश्व-बाज़ार और उद्योग-जगत की गहरी जानकार थीं और सबसे बढ़कर थीं—सक्रिय स्त्रीवादी लेखिका। उन्होंने विश्व के लगभग सारे स्त्रीवादी लेखन को घोट ही नहीं डाला, बल्कि अपने समाज में उपनिवेशित स्त्री के शोषण, मनोविज्ञान, मुक्ति के संघर्ष पर विचारोत्तेजक लेखन भी किया। और उसी क्रम में उन्होंने लिखी यह आत्मकथा—‘अन्या से अन्यया’। ‘हंस’ में धारावाहिक रूप से प्रकाशित इस आत्मकथा को जहाँ एक बोल्ड और निर्भीक आत्मस्वीकृति की साहसिक गाथा के रूप में अकुंठ प्रशंसाएँ मिलीं, वहीं बेशर्म और निर्लज्ज स्त्री द्वारा अपने आपको चौराहे पर नंगा करने की कुत्सित बेशर्मी का नाम भी दिया गया...। महिला उद्योगपति प्रभा खेतान का यही दुस्साहस क्या कम था कि उन्होंने मारवाड़ी पुरुषों की दुनिया में घुसपैठ की। कलकत्ता चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स की अध्यक्ष बनीं। एक के बाद एक उपन्यास और वैचारिक पुस्तकों का लेखन किया। वही प्रभा ‘अन्या से अनन्या’ में एक अविवाहित स्त्री, विवाहित डॉक्टर के धुआँधार प्रेम में पागल है। दीवानगी की इस हद को पाठक क्या कहेंगे कि प्रभा डॉ. सर्राफ़ की इच्छानुसार गर्भपात कराती है और खुलकर अपने आपको डॉ. सर्राफ़ की प्रेमिका घोषित करती है। स्वयं एक अत्यन्त सफल, सम्पन्न और दृढ़ संकल्पी महिला परम्परागत ‘रखैल’ का साँचा तोड़ती है, क्योंकि वह डॉ. सर्राफ़ पर आश्रित नहीं है। वह भावनात्मक निर्भरता की खोज में एक असुरक्षित निहायत रूढ़िग्रस्त परिवार की युवती है। प्रभा जानती थीं कि वह व्यक्तिगत रूप से ही असुरक्षित नहीं है, बल्कि जिस समाज का हिस्सा है, वह भी आर्थिक और राजनैतिक रूप से उतना ही असुरक्षित उद्वेलित है। तत्कालीन बंगाल का सारा युवा-वर्ग इस असुरक्षा के विरुद्ध संघर्ष में कूद पड़ा है और प्रभा अपनी इस असुरक्षा की यातना को निहायत निजी धरातल पर समझना चाह रही हैं...एक तूफ़ानी प्यार में डूबकर...या एक बुर्जुआ प्यार से मुक्त होने की यातना जीती हुई...। इस तरह देखें तो प्रभा खेतान की यह आत्मकथा अपनी ईमानदारी के अनेक स्तरों पर एक निजी राजनैतिक दस्तावेज़ है—बेहद बेबाक, वर्जनाहीन और उत्तेजक...।
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