Katha Jagat Ki Baghi Muslim Auratein
(0)
Author:
Rajendra YadavPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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‘मुसलमान औरत’ नाम आते ही घर की चारदीवारी में बन्द या क़ैद, पर्दे में रहनेवाली एक ‘ख़ातून’ का चेहरा उभरता है। अब से कुछ साल पहले तक मुसलमान औरतों का मिला-जुला यही चेहरा ज़ेहन में महफ़ूज़ था। घर में मोटे-मोटे पर्दों के पीछे जीवन काट देनेवाली या घर से बाहर ख़तरनाक ‘बुर्कों’ में ऊपर से लेकर नीचे तक ख़ुद को छुपाए हुए।</p> <p>समय के साथ काले-काले बुर्कों के रंग भी बदल गए, लेकिन कितनी बदलीं मुस्लिम औरत या बिलकुल ही नहीं बदलीं! क़ायदे से देखें, तो अब भी छोटे-छोटे शहरों की औरतें बुर्का-संस्कृति में एक न ख़त्म होनेवाली घुटन का शिकार हैं, लेकिन घुटन से बग़ावत भी जन्म लेती है और मुसलमान औरतों के बग़ावत की लम्बी दास्तान रही है। ऐसा भी देखा गया है कि ‘मज़हबी फ़रीज़ों’ से जकड़ी, सौमो-सलात की पाबन्द औरत ने यकबारगी ही बग़ावत या जेहाद के बाज़ू फैलाए और खुली आज़ाद फ़िजा में समुद्री पक्षी की तरह उड़ती चली गई।</p> <p>लेखन के शुरुआती सफ़र में ही इन मुस्लिम महिलाओं ने जैसे मर्दों की वर्षों पुरानी हुक्मरानी के तौक़ को अपने गले से उतार फेंका था। ये महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं है कि मुस्लिम महिलाओं ने जब क़लम सॅंभाली तो अपनी क़लम से तलवार का काम लिया। इस तलवार की ज़द पर पुरुषों का, अब तक का समाज था। वर्षों की ग़ुलामी थी। भेदभाव और कुंठा से जन्मा, भयानक पीड़ा देनेवाला एहसास था। संग्रह में शामिल कहानियों में इस बात का ख़ास ख़याल रखा गया है कि कहानी में नर्म, गर्म बग़ावत के संकेत ज़रूर मिलते हों। संग्रह की कुछ कहानियाँ तो पूरी-पूरी बगावत का ‘अलम’ (झंडा) लिए चलती नज़र आती हैं, लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं, जहाँ बस दूर से इस एहसास को छुआ भर गया है।</p> <p>निःसन्देह ये कहानियाँ औरतों की अपने अस्तित्व की लड़ाई की दास्ताँ बयान करती हैं जो तरक़्क़पसन्द पाठकों को बेहद प्रभावित करेंगी।
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‘मुसलमान औरत’ नाम आते ही घर की चारदीवारी में बन्द या क़ैद, पर्दे में रहनेवाली एक ‘ख़ातून’ का चेहरा उभरता है। अब से कुछ साल पहले तक मुसलमान औरतों का मिला-जुला यही चेहरा ज़ेहन में महफ़ूज़ था। घर में मोटे-मोटे पर्दों के पीछे जीवन काट देनेवाली या घर से बाहर ख़तरनाक ‘बुर्कों’ में ऊपर से लेकर नीचे तक ख़ुद को छुपाए हुए।</p>
<p>समय के साथ काले-काले बुर्कों के रंग भी बदल गए, लेकिन कितनी बदलीं मुस्लिम औरत या बिलकुल ही नहीं बदलीं! क़ायदे से देखें, तो अब भी छोटे-छोटे शहरों की औरतें बुर्का-संस्कृति में एक न ख़त्म होनेवाली घुटन का शिकार हैं, लेकिन घुटन से बग़ावत भी जन्म लेती है और मुसलमान औरतों के बग़ावत की लम्बी दास्तान रही है। ऐसा भी देखा गया है कि ‘मज़हबी फ़रीज़ों’ से जकड़ी, सौमो-सलात की पाबन्द औरत ने यकबारगी ही बग़ावत या जेहाद के बाज़ू फैलाए और खुली आज़ाद फ़िजा में समुद्री पक्षी की तरह उड़ती चली गई।</p>
<p>लेखन के शुरुआती सफ़र में ही इन मुस्लिम महिलाओं ने जैसे मर्दों की वर्षों पुरानी हुक्मरानी के तौक़ को अपने गले से उतार फेंका था। ये महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं है कि मुस्लिम महिलाओं ने जब क़लम सॅंभाली तो अपनी क़लम से तलवार का काम लिया। इस तलवार की ज़द पर पुरुषों का, अब तक का समाज था। वर्षों की ग़ुलामी थी। भेदभाव और कुंठा से जन्मा, भयानक पीड़ा देनेवाला एहसास था। संग्रह में शामिल कहानियों में इस बात का ख़ास ख़याल रखा गया है कि कहानी में नर्म, गर्म बग़ावत के संकेत ज़रूर मिलते हों। संग्रह की कुछ कहानियाँ तो पूरी-पूरी बगावत का ‘अलम’ (झंडा) लिए चलती नज़र आती हैं, लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं, जहाँ बस दूर से इस एहसास को छुआ भर गया है।</p>
<p>निःसन्देह ये कहानियाँ औरतों की अपने अस्तित्व की लड़ाई की दास्ताँ बयान करती हैं जो तरक़्क़पसन्द पाठकों को बेहद प्रभावित करेंगी।
Book Details
-
ISBN9788126715596
-
Pages315
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: संजीव ऐसे अकेले हिन्दी कथाकार हैं जो अपने कथानकों में तथ्यात्मक ‘एक्यूरेसी’ पर किसी समाजशास्त्री की तरह ध्यान देते हैं, उनके लिए शोध करते हैं और उन्हें पात्रों के जीवन्त अनुभव का हिस्सा बनाकर कहानी में लाते हैं। महत्त्वपूर्ण यह कि इस प्रक्रिया में न कहीं उनकी भाषा डगमगाती है, न ही कहानी का खाका असन्तुलित होता है। उनकी कहानियों को पढ़ना जैसे एक सचमुच के समाज को सीधे-सीधे देखना है, उसके प्रामाणिक स्वरूप में। उसकी सामाजिक-राजनीतिक तमाम प्रक्रियाओं के साथ। प्रामाणिकता उनकी विशेषता है जो उनकी भाषा में भी दिखाई देती है। देशज और आंचलिक भाषाओं के शब्दों, वाक्यों का प्रयोग करते हुए भी वे उतने ही सजग रहते हैं जितने कथा-परिवेश से सम्बन्धित अन्य कारकों को कहानी में अंकित करते हुए। उनके अनुभव संसार की परिधि भी आश्चर्यजनक हद तक व्यापक रही है जिसे वे मनुष्यता के गहरे सरोकारों से एक रचनात्मक अन्विति देते हैं। उनके यहाँ न कहीं बिखराव है, न भटकाव, न विचार के स्तर पर, न ही शिल्प के स्तर पर। उनकी कहानियों को केवल रसास्वाद के लिए नहीं, एक अध्ययन की तरह पढ़ा जाता है जिनसे हमारी संवेदनात्मक गहराई के साथ-साथ हमारा ज्ञानात्मक वलय भी विस्तृत होता है।
Do Bahanen
- Author Name:
Charan Singh Pathik
- Book Type:

- Description: चरण सिंह पथिक हिन्दी के उन चुनिन्दा कथाकारों में हैं जिनके यहाँ लेखन की प्रेरणा कोई शैल्पिक कौतुक या नवाचार नहीं, बल्कि कथ्य होता है। वे पूर्णकालीन रूप में गाँव में रहते हैं। इसीलिए वे ग्रामीण जीवन की उन परतों को भी देख लेते हैं जो कोई नागर दृष्टि कितने भी साहित्यिक उद्यम के बावजूद नहीं देख पाती। क्रूरता, वैमनस्य, सहज मानवीयता के प्रति एक मूलबद्ध द्वेष, पर तथा आत्मघाती ईर्ष्या, स्पर्धा, लालसा और जिन-जिन नैतिक मूल्यों को धर्म और ईश्वर स्थापित करते प्रतीत होते हैं, उन सबसे एक परफ़ेक्ट और चालाक ‘इस्केप’ हमारे मौजूदा गाँवों का अपना आविष्कार है। नहीं तो यह कैसे होता कि 'संयुक्त परिवार के स्वर्ग' में किसी एक भाई की शादी साज़िशन और बिना किसी अपराध-बोध के और लगभग एक स्वीकृत सामाजिक ‘नॉर्म’ (बल्कि पुरुषार्थ) के तौर पर न होने दी जाए ताकि उसके हिस्से की ज़मीन-जायदाद बाकी भाइयों को हासिल हो जाए। यह सिर्फ़ एक उदाहरण है, जो पथिक जी की बस एक कहानी का विषय है, लेकिन हमारे ग्रामीण जीवन की नैतिक हक़ीक़त, संयुक्त परिवार की अति-मंडित इकाई और गाँव के हर कोने में विराजे ईश्वर और हर क़दम पर निभाए जानेवाले धर्म के ऐन सामने सम्भव कर दिए गए मनुष्य-विरोध की कितनी सारी परतें इससे खुल जाती हैं! ऐसी दृष्टि तब मुमकिन होती है जब आप पॉलिटिकल करेक्ट बने रहने की स्थायी आत्मवंचना से मुक्त होते हैं। चरण सिंह पथिक के कथाकार की बहुआयामी और बहुस्तरीय मौलिकता उन्हें इस वंचना से परे रखती है, इसीलिए वे वही लिखते हैं जो देखते हैं और वह उसे देखते हैं जो सिर्फ़ वही देख सकता है जो हर क्षण भीतर से नया और ताज़ा हो जाता हो।
Koyale Ki Lakeeren
- Author Name:
Sushma Rajneesh
- Book Type:

- Description: "कोयले की लकीरें" सुषमा रजनीश द्वारा रचित ऐसी ही संवेदनशील कहानियों का संग्रह है, जो जीवन की साधारण प्रतीत होने वाली घटनाओं में छिपी असाधारण सच्चाइयों को उजागर करता है। इन कहानियों में रिश्तों की नाज़ुक डोर है, स्त्री-अनुभवों की गहराई है और समाज के भीतर पलते मौन संघर्षों की सजीव अभिव्यक्ति भी। लेखिका की दृष्टि करुण है, पर दुर्बल नहीं; भावनात्मक है, पर यथार्थ से विमुख नहीं। उनकी भाषा सहज होते हुए भी गहरी चोट करती है और पाठक से सीधे संवाद स्थापित करती है- धीमे स्वर में, पर दृढ़ प्रभाव के साथ। यह संग्रह उन पाठकों के लिए है जो साहित्य में चमक-दमक नहीं, बल्कि सच की तलाश करते हैं; जो कहानियों में मनोरंजन के साथ आत्मचिंतन की संभावना खोजते हैं। यह एक ऐसा संकलन है, जो पढ़े जाने के बाद भी पाठक के भीतर लंबे समय तक चलता रहता है।
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