P. Vidyaniwas Mishra Sanchayita
(0)
Author:
Vidhyaniwas Mishra, Dayanidhi MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
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पंडित विद्यानिवास मिश्र के साहित्य का बहुआयामी विस्तार मुख्यत: निबन्ध-विधा में ही फलीभूत हुआ है। इस विधा में जितना काम उन्होंने किया है और इस विधा से जितना बड़ा काम उन्होंने लिया है, उतना हिन्दी में शायद ही किसी और से सम्भव हुआ हो। देश-दुनिया, सभ्यता-समाज, धर्म-संस्कृति, इतिहास, राजनीति, भाषाशास्त्र, साहित्यशास्त्र, कला समेत सभी कुछ को उन्होंने निबन्ध में समेटा है। एक लेखक के रूप में उन्होंने अपनी निष्ठा सदैव पाठक के प्रति रखी। वह पाठक जिसे उन्होंने बल-विद्या-बुद्धि किसी भी मामले में अपने से घटकर नहीं माना। उनका पाठक उन्हीं की तरह उनके गाँव-घर का है, और अपनी व्याप्ति में पूरे संसार का। उनके निबन्धों में जो व्यक्तित्व व्यंजित हुआ है, वह जितना अपना है, उतना ही उनके पाठक का भी। एक नितान्त गँवई व्यक्तित्व जिसके लिए जीव-जन्तु, नदी, पेड़, पहाड़ ऋतु का भी अपना व्यक्तित्व है। विद्या बोझ न बन जाए, इसके प्रति उनकी प्रतिश्रुति इतनी प्रबल है कि समीक्षा, साहित्येतिहास और काव्यशास्त्र आदि क्षेत्रों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्यों के बावजूद उन्होंने आग्रहपूर्वक अपनी पहचान साहित्य के एक विद्यार्थी की ही बनाए रखी। सच तो यह है कि साहित्य में सैद्धान्तिक ही नहीं, व्यावहारिक स्तर पर भी ‘सहृदय’ को, ‘सामाजिक’ को, ‘सहृदय सामाजिक’ को जो सम्मान पं. विद्यानिवास मिश्र ने, उनके साहित्य-कर्म ने दिया, वह अभूतपूर्व है। उनके समग्र रचना-कर्म से इस संचयन में निबन्धों के अलावा उनके रचना-संसार के अल्पज्ञात और अज्ञात कोने-अँतरों का प्रतिनिधित्व करने का प्रयास भी किया गया है। पाठक यहाँ कविता, काव्यान्तर, ध्वनि-रूपक, व्यंग्य-बन्ध, साक्षात्कार, संवाद, व्याख्या, अनुवाद और उनके पत्र-व्यवहार की भी झलक पा सकेंगे। साथ ही विद्वान सम्पादकगण के अथक परिश्रम से यह भी सम्भव हुआ है कि पंडित जी की विराट निबन्ध-सम्पदा का हर रंग, हर रूप इसमें मुखर हो सके।
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पंडित विद्यानिवास मिश्र के साहित्य का बहुआयामी विस्तार मुख्यत: निबन्ध-विधा में ही फलीभूत हुआ है। इस विधा में जितना काम उन्होंने किया है और इस विधा से जितना बड़ा काम उन्होंने लिया है, उतना हिन्दी में शायद ही किसी और से सम्भव हुआ हो। देश-दुनिया, सभ्यता-समाज, धर्म-संस्कृति, इतिहास, राजनीति, भाषाशास्त्र, साहित्यशास्त्र, कला समेत सभी कुछ को उन्होंने निबन्ध में समेटा है।
एक लेखक के रूप में उन्होंने अपनी निष्ठा सदैव पाठक के प्रति रखी। वह पाठक जिसे उन्होंने बल-विद्या-बुद्धि किसी भी मामले में अपने से घटकर नहीं माना। उनका पाठक उन्हीं की तरह उनके गाँव-घर का है, और अपनी व्याप्ति में पूरे संसार का। उनके निबन्धों में जो व्यक्तित्व व्यंजित हुआ है, वह जितना अपना है, उतना ही उनके पाठक का भी। एक नितान्त गँवई व्यक्तित्व जिसके लिए जीव-जन्तु, नदी, पेड़, पहाड़ ऋतु का भी अपना व्यक्तित्व है।
विद्या बोझ न बन जाए, इसके प्रति उनकी प्रतिश्रुति इतनी प्रबल है कि समीक्षा, साहित्येतिहास और काव्यशास्त्र आदि क्षेत्रों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्यों के बावजूद उन्होंने आग्रहपूर्वक अपनी पहचान साहित्य के एक विद्यार्थी की ही बनाए रखी। सच तो यह है कि साहित्य में सैद्धान्तिक ही नहीं, व्यावहारिक स्तर पर भी ‘सहृदय’ को, ‘सामाजिक’ को, ‘सहृदय सामाजिक’ को जो सम्मान पं. विद्यानिवास मिश्र ने, उनके साहित्य-कर्म ने दिया, वह अभूतपूर्व है।
उनके समग्र रचना-कर्म से इस संचयन में निबन्धों के अलावा उनके रचना-संसार के अल्पज्ञात और अज्ञात कोने-अँतरों का प्रतिनिधित्व करने का प्रयास भी किया गया है। पाठक यहाँ कविता, काव्यान्तर, ध्वनि-रूपक, व्यंग्य-बन्ध, साक्षात्कार, संवाद, व्याख्या, अनुवाद और उनके पत्र-व्यवहार की भी झलक पा सकेंगे। साथ ही विद्वान सम्पादकगण के अथक परिश्रम से यह भी सम्भव हुआ है कि पंडित जी की विराट निबन्ध-सम्पदा का हर रंग, हर रूप इसमें मुखर हो सके।
Book Details
-
ISBN9788126727728
-
Pages516
-
Avg Reading Time17 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘गांधी का सैंतालीस’ यानी आज़ादी के साल में गांधी की कथा। वैसे तो यह कहानी गांधी के जीवन के आख़िरी साल की है, जो अक्टूबर, 1946 में उनकी नोआखाली यात्रा से शुरू होती है और वहाँ से बिहार, दिल्ली, कलकत्ता और फिर दिल्ली आकर जनवरी, 1948 में उनकी शहादत के साथ ख़त्म होती है। मगर यह उनके आख़िरी साल का रोज़नामचा नहीं है, यह उनकी आख़िरी लड़ाई की कहानी है। डायरेक्ट एक्शन के बाद भारत में साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए, जो बँटवारे के फ़ैसले पर मुहर लगने के बाद और बढ़ गए। इन दंगों ने लाखों की जान ली और करोड़ों को विस्थापित होने के लिए मजबूर कर दिया। उस समय एक गांधी ही थे, जो नफ़रत की इस आग को बुझाने में लगे थे। उन्हें बस एक ही चिन्ता थी कि इस देश की आत्मा कैसे बचे; वह देश जो पिछले तीस साल से अहिंसक तरीक़े से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, आज़ादी के ठीक पहले हिंसा से भर उठा था। लोग अपने पड़ोसियों के ख़ून के प्यासे हो गए थे। इस लड़ाई में 77 साल के गांधी ने अपना सब कुछ झोंक दिया—नंगे पाँव यात्रा करते, पीड़ितों के ज़ख़्मों पर मरहम लगाते, उनके हृदय में साहस भरते और दंगाइयों को सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करने के लिए प्रेरित करते हुए। उन्होंने संवाद, साहस और प्रेम के औज़ारों से यह लड़ाई लड़ी और अपने आख़िरी हथियार शहादत के ज़रिये इस महान लक्ष्य को हासिल किया। यह भी कहना ज़रूरी है कि यह कहानी गांधी के जीवन के इस सर्वश्रेष्ठ दौर की गौरवगाथा भर नहीं है। कोशिश की गई है कि यह कहानी हमारे सामने एक बोधपाठ की तरह खुले ताकि हम देख सकें कि क्या गांधी की इस आख़िरी लड़ाई के तौर-तरीक़ों में कुछ ऐसा भी है जिसे हम आज के भारत में प्रयोग कर सकें!
RSS : Kaya Aur Maya
- Author Name:
Devanura Mahadeva +1
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अब सौ साल का हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दरअसल है क्या? इसकी काया के पीछे छुपी माया क्या है? अब जबकि संघ से जुड़ी एक पार्टी सत्ता पर मज़बूती से क़ाबिज़ है, यह भारत को किस दिशा में ले जा रहा है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके ग़ौरतलब जवाब देवनूर महादेव ने आर.एस.एस. : काया और माया में दिए हैं। मिथकों को आधुनिकता के और लोकवार्ताओं को गहरी राजनीतिक अन्तर्दृष्टि के बरअक्स रखकर देखने-परखने से हासिल इन जवाबों को पेश करते हुए, अपने ख़ास अन्दाज़ में वे पाठकों से आग्रह करते हैं : जब आर.एस.एस. का मायावी दानव भेष बदलकर हमारे दरवाज़े पर आता है, तब हमें उसकी बातों में नहीं आना चाहिए। ‘आज नक़द कल उधार’ की तर्ज़ पर हमें भी ग्रामवासियों की तरह अपने दरवाज़ों पर ‘नाले बा’ (कल आना) लिख देना चाहिए! कन्नड़ सहित अनेक भाषाओं में बिक्री के कीर्तिमान बना चुकी यह असाधारण किताब सांस्कृतिक आलोचना और ऐतिहासिक व्याख्या के साथ-साथ राजनीतिक कार्रवाई का आह्वान भी है।
Loktantra Ki Chaukidari
- Author Name:
Steven Levitsky and Daniel Ziblatt +1
- Book Type:

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लोकतंत्र कैसे ख़त्म होता है? अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए हम क्या कर सकते हैं? इतिहास हमें क्या सिखाता है? इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र जितना ख़तरे में है, पहले कभी नहीं रहा। समूचे इतिहास से सबक लेते हुए—चिली में पिनोशे की ख़ूनी सत्ता से लेकर चुपचाप ढहते तुर्की में एर्दुआं की सरकार तक—हार्वर्ड के प्रोफ़ेसर स्टीवेन लेवित्सकी और डेनियल ज़िब्लाट यह समझाते हैं कि लोकतंत्र क्यों नाकाम हो जाते हैं, ट्रम्प जैसे नेता कैसे उसे नष्ट करते हैं और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए हम में से हर एक व्यक्ति क्या कर सकता है। विशेषज्ञों की राय जो भी लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिन्तित है उसे यह सहज, सरल किताब पढ़नी चाहिए। जो चिन्तित नहीं हैं, उन्हें तो ज़रूर पढ़नी चाहिए। दारोन एसेमोगलू ‘व्हाई नेशंस फ़ेल’ के लेखक और 2024 के नोबेल पुरस्कार विजेता लेवित्सकी और ज़िब्लाट ने कितनी कुशलता से यह दलील रखी है कि हम सबको इस देश के रुझानों पर चिन्तित होना चाहिए, अमेरिकी संविधान का ज़बर्दस्त प्रशंसक होने के नाते मेरे लिए यह पढ़ना हताशाजनक था। ‘यह यहाँ नहीं हो सकता’ वाली धारणा लेवित्सकी और ज़िब्लाट के विश्लेषण में नहीं टिकती...क्या शानदार लिखा है। डेनियल डब्ल्यू. ड्रेज़नर ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ उत्कृष्ट, विद्वत्तापूर्ण, पठनीय, चिन्ताजनक और सन्तुलित निक कोहेन ‘ऑब्ज़र्वर’
Manushya Aur Paryavaran
- Author Name:
S. Irfan Habib +2
- Book Type:

- Description:
विगत दशकों में पारिस्थितिकी और उससे जुड़े मसलों के प्रति विशेष रुचि दिखाई पड़ी है, ख़ास तौर पर जलवायु-परिवर्तन को लेकर होनेवाली बहसों के सन्दर्भ में इस तरफ़ सुधीजन का ज़्यादा ध्यान गया है। लेकिन पारिस्थितिकी का विमर्श सिर्फ़ जलवायु तक सीमित नहीं है। इसमें जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधों के साथ मनुष्य के रिश्तों के अलावा मनुष्य जाति के सम्मुख प्रकृति द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों का अध्ययन भी शामिल होता है। इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य के साथ इस पुस्तक में पारिस्थितिकी के इतिहास को देखा-समझा गया है।
‘भारत का लोक इतिहास’ परियोजना के तहत प्रकाशित यह पुस्तक भी इस श्रृंखला की अन्य कड़ियों की तरह गहन अध्ययन और प्रामाणिक सामग्री पर आधारित है। मूल स्रोतों के उद्धरणों तथा पारिस्थितिकी, पर्यावरण विज्ञान, वन विज्ञान तथा प्राकृतिक इतिहास पर विशेष टिप्पणियों से समृद्ध इस पुस्तक में विषय से सम्बन्धित अन्य उपयोगी ग्रन्थों का उल्लेख भी किया गया है जिससे पाठक और अधिक लाभान्वित होंगे।
सूचनाओं की सटीकता को बरकरार रखते हुए, पुस्तक को अतिरिक्त तकनीकी विवरणों से मुक्त रखा गया है ताकि इतिहास के छात्रों के अलावा यह सामान्य पाठकों के लिए भी रुचिकर सिद्ध हो।
Prarthna-Pravachan : Vols. 1-2
- Author Name:
Mohandas Karamchand Gandhi
- Book Type:

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त्मा गांधी की हत्या दिल्ली में उनके प्रार्थना-सभा में जाते हुए हुई थी। लेकिन इस पर कम ध्यान दिया गया है कि गांधी जी ने प्रार्थना-सभा के रूप में अपने समय और स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान एक अनोखी नैतिक-आध्यात्मिक और राजनैतिक संस्था का आविष्कार किया था। थोड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज भी यानी गांधी जी के सेवाग्राम छोड़े 70 से अधिक बरसों बाद भी वहाँ हर दिन सुबह-शाम प्रार्थना-सभा होती है : उसमें सभी धर्मों से पाठ होता है जिनमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी आदि शामिल हैं। दुनिया में, जहाँ धर्मों को लेकर इतनी हिंसा-दुराव-आतंक का माहौल है वहाँ कहीं और ऐसा धर्म-समभाव हर दिन नियमित रूप से होता हो, लगता या पता नहीं है। प्रार्थना-सभा में अन्त में गांधी जी बोलते थे। उनके अधिकांश विचार इसी अनौपचारिक रूप में व्यक्त होते थे। उनका वितान बहुत विस्तृत था। उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित करना हमारे लिए गौरव की बात है। इसलिए भी रज़ा गांधी को भारत का बुद्ध के बाद दूसरा महामानव मानते थे। —अशोक वाजपे
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