Delhi Ke Chatkhare
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Author:
Shahid Ahmed DehalviPublisher:
Rekhta PublicationsLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
149
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Available
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दिल्ली शहर के बार-बार उजड़ने और आबाद होने की कहानी इसे अपने आप में एक ख़ास मुकाम अता करती है और इस शहर की कहानियों को दिलचस्प बनाती है| इस किताब में शाहिद अहमद देहलवी ने अपने ख़ास अन्दाज़ में दिल्ली के बाज़ारों, कटरों और मोहल्ले की खिडकियों का बयान किया है| इस किताब को पढ़ते हुए दिल्ली की गलियों में गूँजती फेरी वालों की सदाएँ और उनके टोकरों, देगों और भट्टियों से उठती हुई महक आपके दिल में उतर जाती है| शाहिद साहब की नज़र से दिल्ली को देखना एक पूरी तारीख़ के गवाह होने के बराबर है|
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दिल्ली शहर के बार-बार उजड़ने और आबाद होने की कहानी इसे अपने आप में एक ख़ास मुकाम अता करती है और इस शहर की कहानियों को दिलचस्प बनाती है| इस किताब में शाहिद अहमद देहलवी ने अपने ख़ास अन्दाज़ में दिल्ली के बाज़ारों, कटरों और मोहल्ले की खिडकियों का बयान किया है| इस किताब को पढ़ते हुए दिल्ली की गलियों में गूँजती फेरी वालों की सदाएँ और उनके टोकरों, देगों और भट्टियों से उठती हुई महक आपके दिल में उतर जाती है| शाहिद साहब की नज़र से दिल्ली को देखना एक पूरी तारीख़ के गवाह होने के बराबर है|
Book Details
-
ISBN9789391080822
-
Pages95
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मोहन राकेश के समृद्ध और बहुआयामी व्यक्तित्व के अनेक पक्ष थे, जो शायद किसी एक मित्र के साथ पूरी तरह शेयर नहीं किये जा सकते थे। लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने जिस मित्र के साथ जो पहलू शेयर किया, वह पूरी ईमानदारी के साथ किया। फिर भी, आज इतने समय के बाद भी उनके दोस्त और दुश्मन, प्रशंसक और आलोचक, दर्शक, पाठक और इतिहासकार यही तय नहीं कर पाए कि वह व्यक्ति वास्तव में था क्या? उसके कृतित्व का मूल्य और महत्त्व क्या और कितना है? वह असीम भावुक था या चरम बौद्धिक? अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी अवसरवादी था या तमाम उपलब्धियों के मोहपाश को पल-भर में काटकर किसी नये, अज्ञात और बड़े लक्ष्य की ओर निर्भय आगे बढ़ जानेवाला निरासक्त संन्यासी? मोहन राकेश के अन्तर्विरोधी एवं चौंकानेवाले अप्रत्याशित-अनपेक्षित कारनामों को लेकर उनके दोस्त और दुश्मन समान रूप से सच्चे-झूठे किन्तु चकित करनेवाले क़िस्से, प्रसंग, लतीफ़े, कथा-कहानियाँ, ख़बरें और अफ़वाहें रचते रहे हैं। सत्य और कल्पना तथा हक़ीक़त और फ़सानों से उपजी इस धुंध ने राकेश के जीवनकाल में ही उन्हें एक जीवित किंवदन्ती बना दिया था। ‘कीर्तिशेष : मोहन राकेश’ पुस्तक उन्हें, उनके जटिल व्यक्तित्व को एक नये सिरे से समझने का रास्ता खोलती है। यहाँ आप उनके समकालीनों, सहकर्मियों, मित्रों, सम्पादकों, प्रकाशकों, नाट्य-निर्देशकों, अभिनेताओं, फ़िल्मकारों, आलोचकों, मीडिया-कर्मियों और शिष्यों के संस्मरण पढ़ेंगे। उम्मीद है कि इनसे हम मोहन राकेश के व्यक्तित्व को कुछ बेहतर समझ सकेंगे।
Kala Pani
- Author Name:
Vinayak Damodar Savarkar
- Book Type:

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काला पानी की भयंकरता का अनुमान इसी एक बात से लगाया जा सकता है कि इसका नाम सुनते ही आदमी सिहर उठता है। काला पानी की विभीषिका, यातना एवं त्रासदी किसी नरक से कम नहीं थी। विनायक दामोदर सावरकर चूँकि वहाँ आजीवन कारावास भोग रहे थे, अतः उनके द्वारा लिखित यह उपन्यास आँखों-देखे वर्णन का-सा पठन-सुख देता है। इस उपन्यास में मुख्य रूप से उन राजबंदियों के जीवन का वर्णन है, जो ब्रिटिश राज में अंडमान अथवा ‘काला पानी’ में सश्रम कारावास का भयानक दंड भुगत रहे थे। काला पानी के कैदियों पर कैसे-कैसे नृशंस अत्याचार एवं क्रूरतापूर्ण व्यवहार किए जाते थे, उनका तथ वहाँ की नारकीय स्थितियों का इसमें त्रासद वर्णन है। इसमें हत्यारों, लुटेरों, डाकुओं तथा क्रूर, स्वार्थी, व्यसनाधीन अपराधियों का जीवन-चित्र भी उकेरा गया है। उपन्यास में काला पानी के ऐसे-ऐसे सत्यों एवं तथ्यों का उद्घाटन हुआ है, जिन्हें पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
Parakram
- Author Name:
Dinesh Kandpal
- Book Type:

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"तोलोलिंग की चोटी पर बीस दिन से भारतीय जवान शहीद हो रहे थे। आखिरी हमले की रात वे दुश्मन के बंकर के बेहद करीब पहुँच गए, लेकिन तभी गोलियों की बौछार हो गई। वे घायल थे, लेकिन वापसी उन्हें मंजूर नहीं थी। शरीर से बहते खून की परवाह किए बिना उन्होंने एक ग्रेनेड दागा और कारगिल में भारत को पहली जीत मिल गई। उसके सामने 100 चीनी सिपाही खड़े थे; गिनती की गोलियाँ बची थीं, लेकिन मातृभूमि का कर्ज चुकाते वक्त उसके हाथ नहीं काँपे और उसने युद्ध के मैदान को दुश्मन सिपाहियों का कब्रिस्तान बना दिया। ये भारतीय सेना की वे युद्ध गाथाएँ हैं, जो आप शायद आज तक नहीं जान पाए होंगे। रणभूमि में कान के पास से निकलती गोलियाँ जो सरसराहट पैदा करती हैं, वही कहानी इस किताब में है। बडगाम में मेजर सोमनाथ शर्मा की कंपनी ने कैसे श्रीनगर को बचाया और सियाचिन में पाकिस्तान के किले को किसने ढहाया, इस पराक्रम के हर पल का ब्योरा यह किताब देती है। सन् 1947 से लेकर करगिल तक भारतीय सैनिकों की वीरता की ये वे सच्ची कहानियाँ हैं, जो बताती हैं कि विपरीत हालात के बावजूद कैसे अपने प्राणों की परवाह किए बिना हमारे सैनिकों ने अदम्य साहस और शौर्य दिखाया। यह उस पराक्रम की झलक है, जो युद्धभूमि में दिखा और आज इस पुस्तक के जरिए आप तक पहुँच रहा है। भारतीय जाँबाजों के शौर्य, साहस, निडरता और राष्ट्रप्रेम का जीवंत प्रमाण है यह कृति ‘पराक्रम’, जो पाठकों को न केवल प्रेरित करेगी, वरन् भारतीय सैनिकों के समर्पण के प्रति श्रद्धा से नतमस्तक कर देगी।"
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