Padchihna Bulate Hain
Author:
Devendra SwarupPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 408
₹
510
Unavailable
प्रो. देवेंद्र स्वरूप—इतिहासकार, पत्रकार, अध्यापक, चिंतक, लेखक—72 वर्ष के सार्वजनिक जीवन में हजारों लोगों से संपर्क; सभी से आत्मीय संबंध पर उनमें से कुछ से अधिक प्रभावित। उनके द्वारा लिखे गए कुछ संस्मरणों में किसी व्यक्ति पर ही नहीं, वरन् तात्कालिक परिस्थितियों एवं कालखंड पर भी टिप्पणी होती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की व्यक्तित्व-निर्माण की पद्धति की झलक और इस निर्माणशाला से निकले लोगों द्वारा खड़े किए गए कुछ प्रकल्पों की जानकारी। सामाजिक एवं राष्ट्रीय कार्यों में जीवन खपाने वाली कुछ विभूतियों का परिचय। पठनीय ग्रंथ।
ISBN: 9789390923182
Pages: 312
Avg Reading Time: 10 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: देश की पाँचवीं सबसे बड़ी नदी नर्मदा, अपने अंचल में बसी आबादी के लिए साक्षात् जीवनदायिनी है। इसके विशाल कछार क्षेत्र में फैले वन, वनों में विचरते वन्य प्राणियों और पक्षियों के विविध रूप नर्मदा घाटी को प्रकृति का अनुपम सौन्दर्य प्रदान करते हैं। नर्मदा के जल को विकास के लिए दोहन करने के विचार को पंडित जवाहरलाल नेहरू के उस विकास मॉडल ने आधार प्रदान किया। जिसमें नदियों पर बड़े बाँधों का निर्माण करना प्राथमिकता में सम्मिलित था। लेकिन नर्मदा जल के दोहन के विचार के साथ ही नर्मदा जल बँटवारे का विचार प्रारम्भ हुआ जो कालान्तर में नर्मदा जल विवाद बन गया। विवादों के निराकरण के प्रयासों में जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन हुआ और लम्बे समय तक केन्द्र और सम्बन्धित राज्यों के बीच नर्मदा जल विवाद निराकरण की गतिविधियाँ चलती रहीं। न्यायाधिकरण ने चार राज्यों में जल का बँटवारा, नर्मदा पर परियोजनाओं का निर्माण, जल का उपयोग, जल विद्युत् उत्पादन और अन्य सम्बन्धित विषयों के साथ ही अनेक अन्तरराज्यीय दायित्वों का भी निर्धारण किया। इस सबके बावजूद राज्यों के बीच छोटे-मोटे विवाद और समस्याएँ उठती रहीं, सुलझती रहीं। नर्मदा जल विवाद और परियोजनाओं के विरोध का लम्बा इतिहास है। नर्मदा विवाद, विरोध और विकास के विविध आयामों को प्रस्तुत करने का अब तक कोई समग्र प्रयास नहीं हुआ है। इसको देखते हुए यह आवश्यक प्रतीत हुआ कि नर्मदा और उससे सम्बन्धित विवाद, विरोध और विकास के इतिहास और वर्तमान की सम्पूर्ण जानकारी सरल और समग्र रूप में एक जगह संकलित की जाएँ।
Bharat Mein Bandhua Mazdoor
- Author Name:
Mahashweta Devi
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Description:
देश की जिन गम्भीर समस्याओं पर मुख्यधारा का मीडिया ख़ामोश रहता है और सरकार उदासीन, उनमें बँधुआ मज़दूरों की समस्या भी एक है। सरकारी घोषणाओं में यह समस्या ख़त्म हो चुकी है और मीडिया के लिए इसमें सनसनी नहीं रही। लेकिन समस्या अभी जहाँ की तहाँ है। 1975 में राष्ट्रपति के एक अध्यादेश के ज़रिए औपचारिक तौर पर बँधुआ मज़दूरी पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था, लेकिन देश के लगभग सभी राज्यों में आज भी यह प्रथा बिना किसी रोक-टोक के जारी है। बीच-बीच में सरकारें बँधुआ तौर पर काम कर रहे मज़दूरों की मुक्ति और पुनर्वास का स्वाँग भी रचती हैं, लेकिन मुक्त कराए गए मज़दूरों को पुन: एक नई तरह की बँधुआ मज़दूरी का शिकार होना पड़ा है। न तो उनकी जीविका के लिए पर्याप्त साधन मुहैया कराए गए और न ही शक्तिशाली भूमिपतियों से उनकी हिफ़ाज़त का कोई विश्वसनीय इन्तज़ाम हो पाया।
‘भारत में बँधुआ मज़दूर’ इस समस्या का सर्वांग अध्ययन प्रस्तुत करती है। प्रख्यात बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी यहाँ पूर्णतया एक शोधकर्मी के तौर पर प्रकट हुई हैं, ज़ाहिर है, उत्पीड़ितों-उपेक्षितों के लिए अपनी सर्वज्ञात संवेदना के साथ। शोधकर्म की निर्मम असंलग्नता से बचते हुए, विषय के साथ नितान्त मानवीय लगाव के साथ यह शोध किया गया है।
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