Nainitala Nainitala
(0)
Author:
Pushpesh PantPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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आदमी ही शहर में नहीं बसता, शहर भी आदमियों में बसते हैं। दरअसल, हरेक आदमी की अपनी ज़मीन और जड़ें होती हैं, जिनसे वह ताउम्र आज़ाद नहीं होना चाहता; भले ही ज़िन्दगी की भागमभाग—उसकी मर्ज़ी से या उसके चाहे बिना—उसे उनसे कितना भी दूर कर दे। बेदख़ली के बावजूद वह अपनी ज़मीन को दिल में आबाद कर लेता है और इस तरह अपनी जड़ों को ज़िन्दा रखता है। ‘नैनीताला नैनीताला’ किताब इस सचाई का शिद्दत से अहसास कराती है, जिसमें पुष्पेश पन्त ने नैनीताल का ऐसा रससिक्त बखान किया है जो इस पहाड़ी शहर से उनके अपने रिश्ते का बयान तो है ही; अनगिनत लोगों, इमारतों, दुकानों, सड़कों, ढलानों, चढ़ाइयों, गाड़ियों, सूर्योदय, सूर्यास्त समेत तमाम तरह के नज़ारों के हवाले से उतना ही पुख़्ता शहरनामा भी है। उनका निजी भी इस किताब में जाने-देखे-सुने लोगों के क़िस्सों के साथ मिलकर एकमेक हो गया है। गागर में सागर की मानिन्द नैनीताल का भूगोल, इतिहास, संस्कृति, समाज, आर्थिकी सब कुछ अपने भीतर समेटे हुए; जितना संस्मरण उतनी ही शहरगाथा! ग़ौर से देखें तो इसमें एक झलक उस हिन्दुस्तान की भी दिख जाएगी जिसकी बुनियाद बेशक सुदूर अतीत में पड़ गई थी लेकिन जो आज़ादी के आसपास शक्ल ले रहा था और उसके बाद के एक-दो दशक में मुकम्मल हुआ। यादों का सफ़रनामा!
Read moreAbout the Book
आदमी ही शहर में नहीं बसता, शहर भी आदमियों में बसते हैं। दरअसल, हरेक आदमी की अपनी ज़मीन और जड़ें होती हैं, जिनसे वह ताउम्र आज़ाद नहीं होना चाहता; भले ही ज़िन्दगी की भागमभाग—उसकी मर्ज़ी से या उसके चाहे बिना—उसे उनसे कितना भी दूर कर दे। बेदख़ली के बावजूद वह अपनी ज़मीन को दिल में आबाद कर लेता है और इस तरह अपनी जड़ों को ज़िन्दा रखता है।
‘नैनीताला नैनीताला’ किताब इस सचाई का शिद्दत से अहसास कराती है, जिसमें पुष्पेश पन्त ने नैनीताल का ऐसा रससिक्त बखान किया है जो इस पहाड़ी शहर से उनके अपने रिश्ते का बयान तो है ही; अनगिनत लोगों, इमारतों, दुकानों, सड़कों, ढलानों, चढ़ाइयों, गाड़ियों, सूर्योदय, सूर्यास्त समेत तमाम तरह के नज़ारों के हवाले से उतना ही पुख़्ता शहरनामा भी है। उनका निजी भी इस किताब में जाने-देखे-सुने लोगों के क़िस्सों के साथ मिलकर एकमेक हो गया है।
गागर में सागर की मानिन्द नैनीताल का भूगोल, इतिहास, संस्कृति, समाज, आर्थिकी सब कुछ अपने भीतर समेटे हुए; जितना संस्मरण उतनी ही शहरगाथा!
ग़ौर से देखें तो इसमें एक झलक उस हिन्दुस्तान की भी दिख जाएगी जिसकी बुनियाद बेशक सुदूर अतीत में पड़ गई थी लेकिन जो आज़ादी के आसपास शक्ल ले रहा था और उसके बाद के एक-दो दशक में मुकम्मल हुआ।
यादों का सफ़रनामा!
Book Details
-
ISBN9789360867713
-
Pages184
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: बिहार के ग्राम जलालपुर, जिला मुजफ्फरपुर (वर्तमान वैशाली) में जन्मे बैकुंठ सुकुल उन स्वतंत्रता सेनानियों में थे, जो गुमनामी के अंधेरों में रहे हैं। उन्हें मुजफ्फरपुर के सत्र न्यायाधीश ने भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के प्रसिद्ध मुकदमे के इकबालिया गवाह फणीन्द्रनाथ घोष की हत्या के आरोप में फाँसी की सजा सुनाई थी। बंगाल और लाहौर सहित विभिन्न जगहों के 91 सरकारी गवाहों की सुनवाई में सुकुल जी के द्वारा 50 बचाव पक्ष के गवाहों को पेश करने के आग्रह को अस्वीकार कर दिया गया। बैकुंठ सुकुल को सजा सुनाते समय सत्र न्यायाधीश उन तीन निर्णायकों से असहमत रहा जिन्होंने बैकुंठ सुकुल को दोषी नहीं पाया बल्कि बहुमत छोड़कर एक निर्णायक से सहमत रहते हुए फैसला सुनाया गया और 14 मई,1934 को बैकुंठ नाथ सुकुल को फाँसी दे दी गई। यह पुस्तक तत्कालीन राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में शहीद बैकुंठ सुकुल के मुकदमे की कार्यवाहियों को प्रामाणिकता से प्रस्तुत करती है। 24 फरवरी, 1934 का वह पत्र भी इस पुस्तक में शामिल में किया गया है, जो मुजफ्फरपुर के सत्र न्यायाधीश ने पटना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को लिखा था। उस पत्र में स्पष्ट किया गया था कि ‘बैकुंठ सुकुल द्वारा माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष बचाव वकील खड़ा करने का कोई अर्थ नहीं है।’ साथ ही यहाँ ‘लाहौर षड्यंत्र’ के मुकदमे के फैसले से जुड़े दस्तावेज भी हैं जो सुखदेव और उनके साथियों द्वारा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध किया गया था। इन दस्तावेजों के अतिरिक्त इस पुस्तक में जहाँ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन गतिविधियों का खुलासा किया गया है, वहीं बिहार की राष्ट्रीय राजनीति में भूमि,जातियों, समुदाय और शिक्षा की सापेक्ष भूमिका पर प्रकाश भी डाला गया है।
Kuchh Yaden, Kuchh Baten
- Author Name:
Amarkant
- Book Type:

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Description:
इस पुस्तक में हिन्दी के शीर्षस्थ कथाकार अमरकान्त के संस्मरणों, आलेखों तथा साक्षात्कारों को संकलित किया गया है जो अत्यन्त दिलचस्प एवं महत्त्वपूर्ण हैं। इन रचनाओं में एक बड़े लेखक की परिवेश तथा सृजन-सम्बन्धी परिस्थितियों और संघर्ष-कथा के साथ, उन अग्रजों एवं साथी लेखकों को आदर और आत्मीयता के साथ याद किया गया है जिनसे उन्हें प्रेरणा, प्रोत्साहन और स्नेह मिला।
यहाँ प्रगतिशील आन्दोलन तथा नई कहानी आन्दोलन की वे घटनाएँ, बहसें और विवाद भी हैं, जिनसे कभी साहित्य जगत् हिल गया था। परन्तु अमरकान्त जी ने इन आन्दोलनों की विशेषताओं और उपलब्धियों के साथ, उनके अन्तर्विरोधों तथा दुर्बलताओं का तर्क-सम्मत विश्लेषण भी प्रस्तुत किया है और परिवर्तित समय में कहानी तथा प्रगतिशील लेखन की नई भूमिका को भी रेखांकित किया है।
इन रचनाओं के बीच कहानी लेखन की ओर प्रेरित करनेवाले अमरकान्त जी के शिक्षक बाबू राजेश प्रसाद तथा डॉ. रामविलास शर्मा हैं। इनके साथ भैरवप्रसाद गुप्त, प्रकाशचन्द्र गुप्त, शमशेर, मोहन राकेश, अमृत राय, रांगेय राघव, नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, शेखर जोशी आदि के अनूठे संस्मरण भी हैं। निश्चय ही प्रत्येक हिन्दी लेखक तथा साहित्य-प्रेमी पाठक के लिए यह जानना ज़रूरी है कि साहित्य-इतिहास के इन प्रतिष्ठित रचनाकारों के सम्बन्ध में अमरकान्त क्या सोचते हैं।
मूल्यांकन की नई दृष्टि, हिन्दी के कथा-परिदृश्य पर डाली गई रोशनी और जीवन्त कथा-शैली के कारण यह संकलन जहाँ साहित्यिक कृति के रूप में उत्कृष्ट है, वहीं ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह मूल्यवान भी।
M.K. Gandhi An Autobiography
- Author Name:
M.K. Gandhi
- Book Type:

- Description: Mohandas Karamchand Gandhi 2 October 1869 – 30 January 1948) was an Indian lawyer, anti-colonial nationalist, and political ethicist, who employed nonviolent resistance to lead the successful campaign for India's independence from British Rule, and in turn inspired movements for civil rights and freedom across the world. The honorific Mahātmā (Sanskrit: "great-souled", "venerable"), first applied to him in 1914 in South Africa, is now used throughout the world. Born and raised in a Hindu family in coastal Gujarat, western India, Gandhi trained in law at the Inner Temple, London, and was called to the bar at age 22 in June 1891. After two uncertain years in India, where he was unable to start a successful law practice, he moved to South Africa in 1893 to represent an Indian merchant in a lawsuit. He went on to stay for 21 years. It was in South Africa that Gandhi raised a family, and first employed nonviolent resistance in a campaign for civil rights. In 1915, aged 45, he returned to India. He set about organising peasants, farmers, and urban labourers to protest against excessive land-tax and discrimination. Assuming leadership of the Indian National Congress in 1921, Gandhi led nationwide campaigns for easing poverty, expanding women's rights, building religious and ethnic amity, ending untouchability, and above all for achieving Swaraj or self-rule. Gandhi's vision of an independent India based on religious pluralism was challenged in the early 1940s by a new Muslim nationalism which was demanding a separate Muslim homeland carved out of India. In August 1947, Britain granted independence, but the British Indian Empire was partitioned into two dominions, a Hindu-majority India and Muslim-majority Pakistan
Jayee Rajguru: Khurda Vidhroh ke Apratim Krantikari
- Author Name:
Bijay Chandra Rath
- Book Type:

- Description: "प्रखर देशभक्ति, अटूट विश्वास और अदम्य साहस उनके चरित्र की पहचान थी। वे कभी मृत्यु से नहीं डरे और अपने जीवन को उन्होंने मातृभूमि को भेंट कर दिया था। उनकी मृत्यु अमरता की ओर एक कदम था। वे कोई और नहीं, शहीद जयकृष्ण महापात्र उपाख्य जयी राजगुरु हैं, जो ओडिशा में खोर्र्धा राज्य के राजा के राजगुरु थे, जिन्होंने सन् 1804 में इतिहास को बदलने का साहस किया। यह उल्लेखनीय है कि खोर्र्धा भारत के अंतिम स्वतंत्र क्षेत्र ओडिशा का तटीय राज्य था, जो 1803 में अंग्रेजों के हाथों में आया था। तब तक शेष भारत पहले ही ब्रिटिश शासन के अधीन आ चुका था। संयोग से अगले वर्ष, यानी 1804 में ओडिशा के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था, जो ओडिशा में ‘पाइक विद्रोह’ की शुरुआत थी। खोर्र्धा विद्रोह-1804 के नाम से ख्यात यह विद्रोह वास्तव में कई मायनों में एक जन-विद्रोह का रूप ले चुका था। भारतीय स्वतंत्रता के इस प्रारंभिक युद्ध के नायक जयकृष्ण महापात्र थे, जो कि शहीद जयी राजगुरु (1739-1806) के रूप में अधिक लोकप्रिय हुए। इस महान् जननेता और स्वतंत्रता सेनानी का जीवन निस्स्वार्थ बलिदान, अदम्य साहस और अप्रतिम देशभक्ति की गाथा है, जिसे सन् 1806 में अंग्रेजों द्वारा किए गए क्रूर कृत्य के साथ समाप्त कर दिया गया। उनका शानदार नेतृत्व, तीक्ष्ण कूटनीति और राज्य का सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन के लिए उनका योगदान राष्ट्रीय इतिहास में प्रेरक है। यह दुर्भाग्य है कि राष्ट्र की स्मृति में उन्हें उचित स्थान प्राप्त नहीं हुआ है। —श्रीदेब नंदा, अध्यक्ष, शहीद जयी राजगुरु न्यास"
Mahamanav Mahapandit
- Author Name:
Kamla Sankrityayan
- Book Type:

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Description:
'महामानव महापण्डित’ शीर्षक यह कृति भारतीय साहित्य के अप्रतिम क्रान्तिधर्मी रचनाकार राहुल सांकृत्यायन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित है। लेकिन इसका महत्त्व सिर्फ़ यही नहीं है, बल्कि यह भी है कि राहुल-व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को उनकी ही अन्तरंग आँखों ने देखा और लेखा है। ज़ाहिर है, कमला सांकृत्यायन की क़लम से लिखे गए ये संस्मरणात्मक और मूल्यांकनपरक लेख एक गहरी आत्मीयता से तो आप्लावित हैं ही, अपनी पारदर्शिता में भी विशिष्ट हैं। आकस्मिक नहीं कि पुस्तक के नाम में पहले 'महामानव’ शब्द है और फिर 'महापण्डित’।
पुस्तक में कुल पन्द्रह लेख हैं। इनमें से कुछ तो राहुल जी के लेखकीय, बौद्धिक कर्म का विवेचन करते हैं और कुछ उनके स्वभाव, पारिवारिक जीवनचर्या एवं रुचियों आदि को उजागर करते हैं। ऐसा करते हुए इन लेखों में जो श्रद्धाभाव है, उसके साथ एक प्रकार की नि:संगता भी है, जिससे यह कृति अनावश्यक भावुकता से मुक्त रह सकी है।
कहने की आवश्यकता नहीं कि इस पुस्तक से गुजरते हुए पाठकगण राहुल जी को अपने बहुत निकट महसूस कर सकेंगे।
Kalam's Family Tree: Ancestral Legacy of Dr. A.P.J. Abdul Kalam
- Author Name:
Dr. A. P. J. M. Nazema Maraikayar +1
- Book Type:

- Description: "This book is an intimate memoir written by A.P.J. Abdul Kalam’s niece, who is closely connected to him and the family. The book offers a rare glimpse into the family life and ancestral roots of India’s beloved “Missile Man.’ The book was originally written in Tamil and later translated in English and Hindi. It takes you to Dr. Kalam’s humble beginnings in Rameshwaram, Tamil Nadu, where the young Kalam’s curiosity and thirst of knowledge were nurtured within the embrace of a close-knit Muslim family. From the sacrifices of his parents to the wisdom imparted by his grandparents, the book celebrates the indelible impact of family on his journey to becoming the President of India. It emphasises on the cultural and religious roots that he inherited from different generations. It mainly reflects how historical events, wars, societal changes, economic conditions, etc., had an effect on his personality. The book is a tribute to the power of heritage, perseverance and the pursuit of knowledge values that resonated deeply within the Kalam lineage."
Pao Bhar Jeere Main Brahmbhoj
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

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Description:
समकालीन संस्कृति और हिन्दी साहित्य के पिछले दशकों के दृश्य में जो कुछ व्यक्ति बेहद सक्रिय और उतने ही विवादास्पद रहे हैं, उनमें अशोक वाजपेयी निश्चय ही एक हैं। जहाँ उनके जीवट, साहस, बेबाकी और अदम्यता की व्यापक सराहना होती रही है वहीं उन्हें समाज-विरोधी, नीचट कलावादी, अभिजात, आत्मकेन्द्रित आदि भी कहा जाता रहा है। अशोक वाजपेयी की कविता आज लिखी जा रही अधिकांश कविता का प्रतिपक्ष है, अपनी ज़िद पर अड़ी कविता। उनकी आलोचना का वितान बहुत व्यापक है : वे कविता, विश्व कविता, साहित्य-चिन्तन से लेकर शास्त्रीय और समकालीन कलाओं का साधिकार विश्लेषण और आकलन करने में समर्थ रहे हैं। युवा प्रतिभा का, फिर वह शास्त्रीय संगीत या नृत्य हो, ललित कलाएँ हों या रंगमंच या लोककलाएँ, अशोक वाजपेयी जैसा उन्नायक बिरला ही होगा लेकिन उन पर हिन्दी की युवतम प्रतिभा को दुर्लक्ष्य करने का आरोप लगता रहता है। अपने समय की सभी प्रमुख बहसों में उनकी हिस्सेदारी रही है और वे इस समय हिन्दी के सबसे प्रखर और विचारोत्तेजक वक्ता माने जाते हैं। उन पर कभी भी कटूक्ति करने से न चूकने का इल्ज़ाम लगता रहता है। हमेशा हँसमुख, मददगार अशोक वाजपेयी अपने गुट के अथक समर्थक माने जाते हैं। बेहद यारबाश होने के बावजूद अशोक वाजपेयी के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष यह है कि वे ऐकान्तिक अवसाद से घिरे रहते हैं। पिछली अधसदी में हिन्दी अंचल में सबसे अधिक संस्कृति सम्बन्धी संस्थाओं के निर्माता और उनमें से अनेक के सफल संचालक अशोक वाजपेयी को सांस्कृतिक ज़ार कहा जाता रहा है।
यह पुस्तक अशोक वाजपेयी के अन्तरंग का आत्मीय, सटीक और मुखर दस्तावेज़ है। इसके गद्य में उनकी कविता की गरमाहट और आलोचना की तीक्ष्णता का ऐसा संयोग है जो उन्हें हमारे समय का समर्थ और साक्षी गद्यकार भी सिद्ध करता है।
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