Prasangvash : Sahitya Aur Samaj ki Chand Bahasen
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Author:
Pranay KrishnaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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यह पुस्तक ऐसे लेखों का संग्रह है जो पिछली एक चौथाई सदी से कुछ अधिक समय में भिन्न-भिन्न प्रसंगों तथा अवसरों पर लिखे गए हैं। इन लेखों के विषय नए-पुराने सभी तरह के हैं, लेकिन उन पर चली बहसें नितान्त समकालीन होने के चलते लेखों का सम्बन्ध भी समकालीन वैचारिक परिवेश से है-राजनीति, समाज और साहित्य के अनेक सवाल व्याख्या, पुनर्व्याख्या, दुर्व्याख्या की अनिवार्य प्रक्रियाओं से गुजरते हैं- व्याख्या की राजनीति में हस्तक्षेप ही इन लेखों का मुख्य मकसद है।<br>पुस्तक के कई लेख पहले भाषण के रूप में सामने आए, बाद को प्रकाशित होने के बाद लेख बन गए। सभी लेख जिन पत्रिकाओं में, जिस साल प्रकाशित हुए, उनका उल्लेख हर लेख के आखीर में कर दिया गया है, भाषणों के सन्दर्भ भी इसी प्रकार दर्ज हैं, कुछेक ऐसे भाषण भी है, जो लेख रूप में प्रकाशित नहीं हुए थे।
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यह पुस्तक ऐसे लेखों का संग्रह है जो पिछली एक चौथाई सदी से कुछ अधिक समय में भिन्न-भिन्न प्रसंगों तथा अवसरों पर लिखे गए हैं। इन लेखों के विषय नए-पुराने सभी तरह के हैं, लेकिन उन पर चली बहसें नितान्त समकालीन होने के चलते लेखों का सम्बन्ध भी समकालीन वैचारिक परिवेश से है-राजनीति, समाज और साहित्य के अनेक सवाल व्याख्या, पुनर्व्याख्या, दुर्व्याख्या की अनिवार्य प्रक्रियाओं से गुजरते हैं- व्याख्या की राजनीति में हस्तक्षेप ही इन लेखों का मुख्य मकसद है।<br>पुस्तक के कई लेख पहले भाषण के रूप में सामने आए, बाद को प्रकाशित होने के बाद लेख बन गए। सभी लेख जिन पत्रिकाओं में, जिस साल प्रकाशित हुए, उनका उल्लेख हर लेख के आखीर में कर दिया गया है, भाषणों के सन्दर्भ भी इसी प्रकार दर्ज हैं, कुछेक ऐसे भाषण भी है, जो लेख रूप में प्रकाशित नहीं हुए थे।
Book Details
-
ISBN9789348229403
-
Pages224
-
Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Description:
सामाजिक आन्दोलनों और साहित्य में बहुजन अवधारणा को लेकर इधर के वर्षों में चर्चा तेज हुई है। देश भर में बहुजन साहित्य पर केन्द्रित आयोजन स्वत:स्फूर्त ढंग से हो रहे हैं जिनमें बड़ी संख्या में लोग भागीदारी कर रहे हैं। ये आयोजन हिन्दी पट्टी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दक्षिण भारत राज्यों में भी हो रहे हैं। बहुजन साहित्य की अवधारणा कई स्तरों पर विचरोत्तेजक है। लेकिन सही मायने में यह प्रगतिशील, जनवादी और दलित साहित्य का विस्तार है और उनका स्वाभाविक अगला मुकाम भी।
तीन खंडों में विभाजित यह किताब बहुजन साहित्य के इतिहास और दर्शन से परिचय करवाती है तथा इस पर आधारित व्यावहारिक आलोचना की एक बानगी भी प्रस्तुत करती है।
किताब का पहला खंड बहुजन साहित्य की अवधारणा पर केन्द्रित है, इसमें इसकी सैद्वान्तिकी के विविध पहलुओं पर विमर्श है। दूसरा खंड इसके इतिहास से परिचित करवाता है। तीसरे खंड में बहुजन आलोचना की बानगी प्रस्तुत की गई है।
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