Ek Hi Vrint Par Kitne Phool

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Author:

Joy Goswami

Language:

Hindi

Category:

Poetry

350

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जय गोस्वामी की कविताएँ उस जगह ले जाती हैं, जहाँ जीवन की मामूली-सी घटनाएँ भी अचानक असाधारण अर्थ ग्रहण करने लगती हैं। प्रेम और विरह, स्वप्न और स्मृति, प्रकृति और महानगरीय जीवन, सुख और क्षति—उनकी कविता इन सबको एक ऐसी काव्य-दृष्टि में रूपान्तरित करती है, जिसमें मनुष्य अपने समूचे अन्तर्विरोधों के साथ दिखाई देता है। बांग्ला के इस महत्त्वपूर्ण कवि की पहचान उनकी अनोखी कल्पनाशीलता, अप्रत्याशित बिम्बों और ऐसी भाषा से बनती है, जो बातचीत की सहजता से शुरू होकर अर्थ की गहराइयों तक पहुँचती है। उनके यहाँ पुरानी कथाएँ, लोक-स्मृतियाँ और सांस्कृतिक संकेत किसी बीते हुए संसार के अवशेष नहीं, बल्कि आज के जीवन को देखने के नए कोण बन जाते हैं। इसी कारण उनकी कविता परिचित भी लगती है और विस्मित भी करती है। उनकी कविता का एक उल्लेखनीय पक्ष उसका तीखा सामाजिक विवेक और प्रतिरोधधर्मी तेवर है। असमानता और विभेद, साम्प्रदायिकता और सामाजिक वर्चस्व, आर्थिक शोषण तथा मनुष्य को हाशिए पर धकेलने वाली व्यवस्थाओं के विरुद्ध उनका स्वर मुखर है। वे आधुनिकता के खोखले प्रदर्शन और उसके आडम्बरपूर्ण दावों पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं। किन्तु यह प्रतिरोध किसी नारे या वैचारिक घोषणापत्र का रूप नहीं लेता; वह जीवनानुभव के भीतर से उभरता है और इसी कारण अधिक मारक बन जाता है। हिन्दी पाठकों के लिए प्रस्तुत यह संग्रह ‘एक ही वृंत पर कितने फूल’ जय गोस्वामी को केवल एक दूसरी भाषा के कवि के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे रचनाकार के रूप में सामने लाता है जिसकी कविता भाषाई सीमाएँ पार कर सीधे मनुष्य तक पहुँचती है। यह चयन उनके काव्य के अनेक रंगों से परिचित कराने के साथ उस बेचैन, स्वप्नशील और जिद्दी मनुष्य के पास ले जाता है, जो उनकी कविता के केन्द्र में लगातार साँस लेता रहता है।

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ISBN
9789377370978
Pages
220
Avg Reading Time
7 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

जय गोस्वामी की कविताएँ उस जगह ले जाती हैं, जहाँ जीवन की मामूली-सी घटनाएँ भी अचानक असाधारण अर्थ ग्रहण करने लगती हैं। प्रेम और विरह, स्वप्न और स्मृति, प्रकृति और महानगरीय जीवन, सुख और क्षति—उनकी कविता इन सबको एक ऐसी काव्य-दृष्टि में रूपान्तरित करती है, जिसमें मनुष्य अपने समूचे अन्तर्विरोधों के साथ दिखाई देता है। बांग्ला के इस महत्त्वपूर्ण कवि की पहचान उनकी अनोखी कल्पनाशीलता, अप्रत्याशित बिम्बों और ऐसी भाषा से बनती है, जो बातचीत की सहजता से शुरू होकर अर्थ की गहराइयों तक पहुँचती है। उनके यहाँ पुरानी कथाएँ, लोक-स्मृतियाँ और सांस्कृतिक संकेत किसी बीते हुए संसार के अवशेष नहीं, बल्कि आज के जीवन को देखने के नए कोण बन जाते हैं। इसी कारण उनकी कविता परिचित भी लगती है और विस्मित भी करती है।
उनकी कविता का एक उल्लेखनीय पक्ष उसका तीखा सामाजिक विवेक और प्रतिरोधधर्मी तेवर है। असमानता और विभेद, साम्प्रदायिकता और सामाजिक वर्चस्व, आर्थिक शोषण तथा मनुष्य को हाशिए पर धकेलने वाली व्यवस्थाओं के विरुद्ध उनका स्वर मुखर है। वे आधुनिकता के खोखले प्रदर्शन और उसके आडम्बरपूर्ण दावों पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं। किन्तु यह प्रतिरोध किसी नारे या वैचारिक घोषणापत्र का रूप नहीं लेता; वह जीवनानुभव के भीतर से उभरता है और इसी कारण अधिक मारक बन जाता है।
हिन्दी पाठकों के लिए प्रस्तुत यह संग्रह ‘एक ही वृंत पर कितने फूल’ जय गोस्वामी को केवल एक दूसरी भाषा के कवि के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे रचनाकार के रूप में सामने लाता है जिसकी कविता भाषाई सीमाएँ पार कर सीधे मनुष्य तक पहुँचती है। यह चयन उनके काव्य के अनेक रंगों से परिचित कराने के साथ उस बेचैन, स्वप्नशील और जिद्दी मनुष्य के पास ले जाता है, जो उनकी कविता के केन्द्र में लगातार साँस लेता रहता है।

Book Details

  • ISBN
    9789377370978
  • Pages
    220
  • Avg Reading Time
    7 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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