Jo Dooba So Paar
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इस किताब में हिंदुस्तानी सूफ़ी परंपरा के सबसे रोशन चराग़ अमीर ख़ुसरौ के हिंदुस्तानी कलाम और फ़ारसी कलाम शामिल हैं। फ़ारसी ग़ज़लें, सावन, कहमुकरियाँ और दोहों को शामिल किया गया है| सुमन मिश्र 14 अगस्त 1982, बड़हिया, लखीसराय (बिहार) में जन्मे सुमन मिश्र सूफ़ीवाद के गंभीर अध्येता और कवि हैं । वे समय-समय पर विभिन्न ज्ञान-अनुशासनों में सक्रिय रहे हैं; इसमें संगीत का भी एक पक्ष है। यह ध्यान देने योग्य है कि इन सभी स्रोतों ने सूफ़ीवाद के उनके अध्ययन को एक दुर्लभ मौलिकता दी है । उनका काम-काज कुछ प्रतिष्ठित प्रकाशन-स्थलों में प्रकाशित हो चुका है। वह रेख़्ता फाउंडेशन के उपक्रम ‘सूफ़ीनामा’ से संबद्ध है।
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इस किताब में हिंदुस्तानी सूफ़ी परंपरा के सबसे रोशन चराग़ अमीर ख़ुसरौ के हिंदुस्तानी कलाम और फ़ारसी कलाम शामिल हैं। फ़ारसी ग़ज़लें, सावन, कहमुकरियाँ और दोहों को शामिल किया गया है|
सुमन मिश्र 14 अगस्त 1982, बड़हिया, लखीसराय (बिहार) में जन्मे सुमन मिश्र सूफ़ीवाद के गंभीर अध्येता और कवि हैं । वे समय-समय पर विभिन्न ज्ञान-अनुशासनों में सक्रिय रहे हैं; इसमें संगीत का भी एक पक्ष है। यह ध्यान देने योग्य है कि इन सभी स्रोतों ने सूफ़ीवाद के उनके अध्ययन को एक दुर्लभ मौलिकता दी है । उनका काम-काज कुछ प्रतिष्ठित प्रकाशन-स्थलों में प्रकाशित हो चुका है। वह रेख़्ता फाउंडेशन के उपक्रम ‘सूफ़ीनामा’ से संबद्ध है।
Book Details
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ISBN9789394494138
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Pages241
-
Avg Reading Time8 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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ये किताब आधुनिक उर्दू ग़ज़ल के बेमिसाल शायर शकेब जलाली की ग़ज़लों और नज़्मों का संग्रह है। उनकी शायरी एक मुसलसल सफ़र की तरह है जिसमें कुछ मंज़र ख़ुशनुमा हैं तो कुछ हैरत-कुन और कुछ बे-इन्तिहा अफ़सुर्दा। उनके इज़हार की शैली बेहद अनोखी और नायाब है जिसमें क़ुदरत, रात-दिन, जंगल-सेहरा, बहार-ख़िज़ाँ सहित सारे नुमाइन्दा इस्तियारे जलवा-नुमा नज़र आते हैं। ये किताब उर्दू ग़ज़ल के नौजवान पाठकों को काफ़ी पसन्द आएगी।
Jogiya Rang ki Bahar
- Author Name:
Shah Turab Ali Qalandar
- Book Type:

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शाह तुराब अली क़लंदर के फ़ारसी, उर्दू और हिन्दवी कलाम का संग्रह "जोगिया रंग की बहार" पहली बार हिंदी पाठकों के समक्ष आ रहा है, जिस में शाह तुराब द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध कलाम शामिल हैं. इसमें हम्द, ना'त और मंक़बत के अतिरिक्त ग़ज़लें, बसंत, होली, गीत और बाबुल शामिल हैं। किताब का संपादन सुमन मिश्र ने किया है।
Duniya Jise Kehte Hain
- Author Name:
Nida Fazli
- Book Type:

- Description:
निदा फ़ाज़ली उन दिनों से हिन्दी पाठकों के प्रिय हैं, जिन दिनों हिन्दी के पाठक मीर, ग़ालिब, इकबाल फ़िराक़, आदि के अलावा शायद ही किसी नये उर्दू शायर को जानते हों। आठवें दशक के आरम्भ में ही उनके अनेक शेर हिन्दी की लाखों की संख्या में छपने वाली पत्रिकाओं धर्मयुग, सारिका आदि के माध्यम से हिन्दी पाठकों के बीच लोकप्रिय हो चुके थे और अधिकांश हिन्दी पाठक उन्हें हिन्दी का ही कवि समझते थे। 'दुनिया जिसे कहते हैं', में उनकी प्रसिद्ध और प्रतिनिधि ग़ज़लों और नज़्मों को शामिल किया गया है। बहुत-सी रचनाएँ हिन्दी के पाठकों को पहली बार पढ़ने को मिलेंगी। प्रयास किया गया है कि उनकी श्रेष्ठ रचनाओं का एक प्रामाणिक संकलन देवनागरी में सामने आए।
Sahir Samagra
- Author Name:
Sahir Ludhianvi +1
- Book Type:

- Description:
साहिर लुधियानवी को जनसाधारण आम तौर पर फ़िल्मों के गीतकार के रूप में ही जानता-पहचानता है। लेकिन तथ्य यह है कि फ़िल्में उनके जीवन में बहुत बाद में आईं, उससे पहले वे एक प्रगतिशील शायर के तौर पर अपनी बड़ी पहचान बना चुके थे। फ़िल्मों ने बस उन्हें रोज़गार दिया जिसके जवाब में उन्होंने फ़िल्मों को कुछ ऐसे अमर उपहार दिए जिन्हें उन्होंने अपने ऊबड़-खाबड़ और गहरी उदासी में बीते जीवन में कमाया था।
एक ऐसे परिवार में पैदा होकर, जिसका शायरी और अदब से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था, और एक ऐसे पिता का पुत्र होकर जिसके साथ उनके सम्बन्ध कभी पिता-पुत्र जैसे नहीं रहे और एक ऐसे समाज में जीकर जिसका सस्तापन, नाइंसाफ़ी और संकीर्णताएँ उनकी उदास आँखों से बचकर निकल नहीं पाती थीं, उन्होंने वह कमाया जिसे भले ही उस वक़्त के आलोचकों ने बहुत मान नहीं दिया, लेकिन जो आम आदमी की यादों में हमेशा के लिए पैठ गया। फ़िल्मों में आने से पहले ही वे अपने समय के सबसे लोकप्रिय और चहेते शायरों में शुमार हो चुके थे।
साहिर की ऐसी कई नज़्में और ग़ज़लें हैं, और गीत भी, जिनमें उन्होंने समाज की आलोचना दो-टूक लहज़े में की है। प्रगतिशील आन्दोलन से जुड़े साहिर की चिन्ताओं में गाँव में भूख और अकाल से जूझ रहे किसानों के दु:ख से लेकर शहरों में भूख के हाथों बिकतीं उन औरतों जिन्हें समाज वेश्या कहता है—तक का दर्द एक जैसी गहराई से आया है, जिसका मतलब यही है कि दु:ख को देखना, जीना और पकड़ना, शायर के रूप में यही उनका एकमात्र कौशल था, और इसी के विस्तार में उन्होंने हर माथे की हर सिलवट को पिरोकर तस्वीर बना दिया।
यह किताब उनकी रचनाओं का समग्र है, अभी तक उपलब्ध उनकी तमाम ग़ज़लों, नज़्मों और गीतों को इसमें इकट्ठा करने की कोशिश की गई है। उम्मीद है दर्द-पसन्द पाठकों को इसमें अपना वह खोया घर मिल जाएगा जो इधर की चमक-दमक में खो गया है।
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Book
Jo Dooba So Paar assembles the polyphonic voice of Amir Khusrau (1253–1325), the Delhi Sultanate's poet-saint whose verse bridged Farsi courtly tradition and vernacular Hindustani devotion. Curated by Suman Mishr—a Bihar-born scholar whose work draws on musicology and Sufi textual study—this edition presents dohas, sawans, kahmukariyan, and Farsi ghazals side by side, restoring Khusrau's dual linguistic genius. The collection does not translate; it lets both registers speak. Khusrau wrote riddles for lovers, monsoon songs for separation, and mystical couplets that dissolve the boundary between devotion and desire. Mishr's editorial choice preserves the original meters and the mnemonic pulse of oral transmission, making this not an anthology for browsing but a script for recitation and meditation.
यह किताब पाठक को किस तरह का पढ़ने का अनुभव देगी?
यह किताब आपको मध्यकालीन भारतीय भक्ति और शृंगार की आवाज़ों के बीच ले जाती है। अमीर ख़ुसरौ की दोहे, पहेलियाँ, सावन गीत और फ़ारसी ग़ज़लें एक साथ पढ़ना आध्यात्मिक और भावनात्मक द्वंद्व को महसूस करना है। यह किताब मौन पाठ के लिए नहीं, बल्कि स्वर में सुनने और दोहराने के लिए है—इसकी लय स्मृति में रहती है।
यह किताब किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे पढ़ने के लिए क्या अपेक्षा चाहिए?
- जो पाठक सूफ़ी साहित्य, भक्ति काव्य और मध्यकालीन भारतीय संस्कृति में रुचि रखते हैं
- जो फ़ारसी और हिंदुस्तानी दोनों काव्य परंपराओं को एक साथ देखना चाहते हैं
- जो पारंपरिक छंद, लोक गीत और रहस्यवादी भाषा का स्वाद समझते हैं
- धैर्यपूर्वक पढ़ने और कुछ पंक्तियों को बार-बार सुनने की इच्छा आवश्यक है
इस किताब के विषय का भारतीय पाठकों के लिए आज क्या सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्व है?
अमीर ख़ुसरौ ने दिल्ली सल्तनत के दौरान दो भाषाओं और दो विश्वासों को जोड़ा—फ़ारसी दरबारी परंपरा और हिंदुस्तानी लोक भक्ति। आज भी भारत में सांस्कृतिक बहुलता, साझा विरासत और धार्मिक सहिष्णुता के प्रश्न जीवित हैं। ख़ुसरौ का काम याद दिलाता है कि भारतीय आध्यात्मिकता हमेशा सीमाओं को पार करती रही है।
इस विषय पर इस लेखक का नज़रिया क्या विशिष्ट बनाता है?
सुमन मिश्र ने संगीतशास्त्र, सूफ़ीवाद और पाठालोचन के अध्ययन को मिलाकर यह संकलन तैयार किया है। वे अनुवाद नहीं करते—मूल हिंदुस्तानी और फ़ारसी दोनों को साथ रखते हैं। उनका संपादन मौखिक परंपरा की लय और स्मृति-आधारित पाठ को बचाता है, जो आधुनिक संकलनों में अक्सर खो जाता है।
यह किताब पाठक को पढ़ने के बाद भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से क्या देती है?
- भारतीय आध्यात्मिकता की बहुभाषी और बहुस्तरीय परंपरा की गहरी समझ
- प्रेम, वियोग और भक्ति को एक साथ देखने की काव्य दृष्टि
- मध्यकाल के भारत में सांस्कृतिक संश्लेषण और सहिष्णुता का ऐतिहासिक बोध
- कुछ पंक्तियाँ जो स्मृति में रहती हैं और जीवन भर दोहराई जाती हैं