Neeloo Neelima Neelofer
(0)
Author:
Bhishma SahniPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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‘नीलू नीलिमा नीलोफ़र’ प्रेम कहानी है। प्रेम कहानियों में अडचनें उठती हैं, कभी आर्थिक विषमताओं के कारण, कभी जाति-भेद के कारण, कभी पारिवारिक मतभेद के कारण। इस कहानी में भी अवरोध उठते हैं, परस्पर प्रेम के कोमल तन्तुओं को कुचलने के लिए। अन्तर केवल इतना है कि इस प्रेम कहानी में उठनेवाले अवरोध कुछ ऐसे पूर्वग्रह लिए हुए हैं जिनकी जड़ें समाज में बड़ी गहरी हैं, और जिनकी भूमिका कभी-कभी दारुण, भयावह रूप ले लेती है। लेकिन मनुष्य के जीवन में प्रेम की भूमिका निश्चय ही इन पूर्वग्रहों से ऊँचा उठकर, दिलों को जोड़नेवाली, निश्छल, सात्त्विक भूमिका होती है। गहरा, सच्चा, निस्वार्थ प्रेम गहरी मानवीयता से प्रेरित होता है। दूसरी ओर पूर्वग्रहों की भूमिका कभी-कभी तो अमानवीय स्तर पर क्रूर हो जाती है। इन अवरोधों से जूझना एक तरह से अपने परिवेश से जूझना भी है, इस परिवेश में अपने को खोजना भी है, अपने को पहचान पाने का प्रयास भी है। इसी माहौल में उपन्यास के पात्र अपनी जिन्दगी का ताना-बाना बुनते हैं...!
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‘नीलू नीलिमा नीलोफ़र’ प्रेम कहानी है। प्रेम कहानियों में अडचनें उठती हैं, कभी आर्थिक विषमताओं के कारण, कभी जाति-भेद के कारण, कभी पारिवारिक मतभेद के कारण। इस कहानी में भी अवरोध उठते हैं, परस्पर प्रेम के कोमल तन्तुओं को कुचलने के लिए। अन्तर केवल इतना है कि इस प्रेम कहानी में उठनेवाले अवरोध कुछ ऐसे पूर्वग्रह लिए हुए हैं जिनकी जड़ें समाज में बड़ी गहरी हैं, और जिनकी भूमिका कभी-कभी दारुण, भयावह रूप ले लेती है।
लेकिन मनुष्य के जीवन में प्रेम की भूमिका निश्चय ही इन पूर्वग्रहों से ऊँचा उठकर, दिलों को जोड़नेवाली, निश्छल, सात्त्विक भूमिका होती है। गहरा, सच्चा, निस्वार्थ प्रेम गहरी मानवीयता से प्रेरित होता है। दूसरी ओर पूर्वग्रहों की भूमिका कभी-कभी तो अमानवीय स्तर पर क्रूर हो जाती है।
इन अवरोधों से जूझना एक तरह से अपने परिवेश से जूझना भी है, इस परिवेश में अपने को खोजना भी है, अपने को पहचान पाने का प्रयास भी है।
इसी माहौल में उपन्यास के पात्र अपनी जिन्दगी का ताना-बाना बुनते हैं...!
Book Details
-
ISBN9788171789603
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘वाङ्चू’ सुख्यात कथाकार भीष्म साहनी की ग्यारह कहानियों का संग्रह है। इन कहानियों में सोद्देश्यतानिर्वहन के साथ-साथ हृदयग्राही अन्तरंगता और रसमयता दर्शनीय है। इन्हें व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है, किन्तु जीवन-सन्दर्भों के चयन में विविधता रखी गई है जिससे रोचकता और प्रभाव में वृद्धि हुई है। इस प्रसंग में संग्रह की एक कहानी ‘वाङ्चू’—जिसके आधार पर पुस्तक का नामकरण हुआ है—और दूसरी कहानी ‘राधा-अनुराधा’ को ले सकते हैं। पहली में एक विस्थापित चीनी मानस की निरीहता का चित्रण है तो दूसरी, अभावों और यातनाओं में पली एक निम्नवर्गीय किशोरी नायिका के रोमांस की करुण उच्छ्वास-कथा है। ‘ओ हरामजादे’ शीर्षक व्यंग्यात्मक है, किन्तु कहानी प्रवासी भारतीय मानस की पीड़ा की परतों को खोलती है। इसी तरह और-और कहानियाँ मन पर अलग-अलग प्रभाव छोड़ती हैं तथा आज के सामाजिक जीवन की विषमताओं को रेखांकित करती हैं।
Kariyan
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
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भीष्म साहनी ने अपने लेखन में सामाजिक-नैतिक असंगतियों, मध्यवर्ग के दोहरे मानदंडों, परिवार व विवाह संस्थाओं के विरोधाभासों को निशाना बनाया है।
‘कड़ियाँ’ भीष्म साहनी का महत्त्वपूर्ण उपन्यास है। इसकी विषयवस्तु एक ऐसे मध्यवर्गीय परिवार से सम्बन्ध रखती है जो परम्परागत संस्कारों में जकड़ा हुआ है, लेकिन इसका मुख्य कथानक दाम्पत्य जीवन की कड़वाहट और स्त्री की असहाय स्थिति से सम्बन्धित है। एक तरफ़ रूढ़ नैतिक मान्यताएँ हैं जो पति-पत्नी के सम्बन्धों में दरार पैदा कर देती हैं और दूसरी तरफ़ पत्नी की आर्थिक परनिर्भरता है जिसके कारण उसे अनेक मानसिक यंत्रणाओं से गुज़रना पड़ता है।
पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के हिस्से आनेवाली पीड़ाओं और अत्याचारों का अंकन इस उपन्यास में बहुत बारीकी से किया गया है। तनाव और विघटन के क्षणों को उकेरने में लेखक ने विशेष कौशल का परिचय दिया है।
Pali
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
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भीष्म साहनी का यथार्थबोध यद्यपि समाज को कई बार बहुत वेधक दृष्टि से देखता है, लेकिन करुणा से परहेज करते वे कहीं दिखाई नहीं देते। करुणा का उछाल यहाँ इतने स्वाभाविक रूप में आता है कि पाठक गहरी आन्तरिक वेदना से भर उठता है और समाज की न्यायसंगत पुनर्रचना उसे अनिवार्य लगने लगती है। विभाजन की यादों को ताजा करानेवाली कुछ कहानियाँ इस संग्रह (प्रथम प्रकाशन, 1989) में भी हैं जिनमें सबसे प्रमुख है 'पाली’। इस कहानी में करुणा का परिपाक अद्भुत ढंग से मर्मस्पर्शी है। एक छोटा-सा बच्चा पाकिस्तान से भारत आते समय अपने माता-पिता से बिछुड़कर वहीं रह गया, और एक मुस्लिम माँ-बाप का लाड़ला हो गया। पाँच-छह साल बाद उसे वापस अपने माता-पिता के पास भारत ले आया गया। हिन्दू-मुसलमान आदि पहचानों के खोखलेपन को उजागर करती यह कहानी हृदयवान पाठक को बार-बार भिगो जाती है। 'आवाजें’ इस संग्रह की एक और महत्त्वपूर्ण कहानी है जिसमें विभाजन के बाद भारत आए शरणार्थियों के बसने-बढ़ने की प्रक्रिया का वर्णन बहुत दिलचस्प ढंग से किया गया है। घरों की नींव पड़ने से लेकर उनके बहुमंजिला होकर किराए पर चढ़ने तक। संग्रह में कुछ ग्यारह कहानियाँ हैं जो अलग-अलग कोणों से मन और मनुष्य का उत्खनन करती हैं।
Hanoosh
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
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‘हानूश’ भीष्म साहनी का एक ऐसा नाटक है जिसमें कलाकार की सृजन की अदम्य अकुलाहट और उसकी निरीहता को रूपायित किया गया है। धर्म और सत्ता के गठबन्धन के साथ सामाजिक शक्तियों के संघर्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति भी है यह अनमोल नाटक ‘हानूश’। कलाकार के पारिवारिक तनावों का अनूठा अंकन हुआ है ‘हानूश’ में। इस नाटक में एक ऐसे कलकार को केन्द्रीय भूमिका मिली है जो शुरू में ताला बनानेवाला एक सामान्य मिस्त्री है, बाद में उसके दिमाग़ में घड़ी बनाने का विचार उत्पन्न होता है और वह घड़ी बनाने में लग जाता है। विषम परिस्थितियों से जूझता हुआ वह घड़ी बनाने के काम में लगातार सत्रह साल गुज़ार देता है और अन्ततः इस लगन और कड़ी मेहनत के परिणामस्वरूप वह चेकोस्लोवाकिया की पहली घड़ी बनाने में कामयाब होता है। उसकी बनाई गई घड़ी नगरपालिका की मीनार पर लगाई जाती है, लेकिन इतनी बड़ी सफलता के बाद कलाकार को क्या मिलता है? बादशाह कलाकार की आँखें निकलवा लेता है, ताकि वह उस तरह की दूसरी घड़ी नहीं बना सके। चेक-इतिहास की इस छोटी-सी घटना से भीष्म साहनी ने हिन्दी को यह यादगार नाटक सौंपा है जो आज छह दशक बाद भी रंग-प्रेमियों के लिए यथार्थ और आश्चर्य का एक सामंजस्य-सा प्रतीत होता है।
Madhavi
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
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प्रख्यात लेखक भीष्म साहनी का यह तीसरा नाटक ‘माधवी’ महाभारत की एक कथा पर आधारित है। ऋषि विश्वामित्र का शिष्य गालव अपनी शिक्षा समाप्ति के समय गुरु-दक्षिणा देने की हठ करता है और विश्वामित्र उसके हठी स्वभाव से क्रुद्ध होकर आठ सौ अश्वमेधी घोड़े माँग लेते हैं। अश्वमेधी घोड़ों की खोज में भटकता हुआ गालव अन्त में दानवीर राजा ययाति के आश्रम में पहुँचता है। राज-पाट से निवृत्त राजा ययाति गालव की प्रतिज्ञा सुनकर असमंजस में पड़ जाते हैं, किन्तु वे दैवी गुणों से युक्त अपनी एकमात्र पुत्री माधवी को, यह कहकर उसे सौंप देते हैं कि जहाँ कहीं किसी भी राजा के पास आठ सौ अश्वमेधी घोड़े मिलें, उनके बदले वह माधवी को राजा के पास छोड़ दें। माधवी के बारे में कहा गया है कि उसके गर्भ से उत्पन्न बालक चक्रवर्ती राजा बनेगा।
यहीं से माधवी की कथा आरम्भ होती है। अनूठे और मर्मस्पर्शी घटना-चक्र में गुज़रते हुए, इस नाटक के प्रधान पात्र—माधवी, गालव, ययाति, विश्वामित्र और अनेक राजागण अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं, और एक विकट, हृदयग्राही मानवीय स्थिति के परिप्रेक्ष्य में, ये चरित्र नए-नए आयाम ग्रहण करते हैं। इनके केन्द्र में ययाति-कन्या माधवी है, जो लगभग एक अलौकिक मिथकीय परिवेश में रहते-बसते हुए भी अत्यधिक सजीव, सर्वथा प्रासंगिक और आकर्षक बनकर उभरती है।
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