Jharokhe
(0)
Author:
Bhisham SahniPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
125
₹ 100 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
‘झरोखे’ एक छोटे-से परिवार की व्यथा-कथा को प्रस्तुत करनेवाला मार्मिक उपन्यास है। लेखक ने एक छोटे-से बालक की आँखों से उस परिवार में घटनेवाली छोटी-छोटी घटनाओं को देखने और उनका उल्लेख करने की कोशिश की है। एक-एक घटना एक-एक प्रबल संस्कार बनकर आती है और परिवार के बच्चों के भावी चरित्र की रूपरेखा गढ़ती चली जाती है। पारिवारिक जीवन में घटनेवाली घटनाएँ आम तौर पर अल्प और साधारण ही होती हैं, पर संस्कारों के रूप से उनका महत्त्व प्रचंड होता है। इन्हीं अल्प और साधारण लगनेवाली घटनाओं के नीचे ज़िन्दगी करवट लेती रहती है। यही छोटी-छोटी घटनाएँ पात्रों के जीवन में निर्णायक साबित होती हैं और उनकी ज़िन्दगी का रुख़ बदल देती हैं। एक छत के नीचे रहते हुए भी सभी की राहें अलग-अलग हैं। इसकी कथावस्तु में जहाँ एक ओर जीवन के उल्लसित क्षणों का चित्रण है, वहीं उसके दु:ख-दर्द और उसकी निर्मम गति का भी अविस्मरणीय रेखांकन हुआ है।
Read moreAbout the Book
‘झरोखे’ एक छोटे-से परिवार की व्यथा-कथा को प्रस्तुत करनेवाला मार्मिक उपन्यास है। लेखक ने एक छोटे-से बालक की आँखों से उस परिवार में घटनेवाली छोटी-छोटी घटनाओं को देखने और उनका उल्लेख करने की कोशिश की है। एक-एक घटना एक-एक प्रबल संस्कार बनकर आती है और परिवार के बच्चों के भावी चरित्र की रूपरेखा गढ़ती चली जाती है। पारिवारिक जीवन में घटनेवाली घटनाएँ आम तौर पर अल्प और साधारण ही होती हैं, पर संस्कारों के रूप से उनका महत्त्व प्रचंड होता है। इन्हीं अल्प और साधारण लगनेवाली घटनाओं के नीचे ज़िन्दगी करवट लेती रहती है। यही छोटी-छोटी घटनाएँ पात्रों के जीवन में निर्णायक साबित होती हैं और उनकी ज़िन्दगी का रुख़ बदल देती हैं। एक छत के नीचे रहते हुए भी सभी की राहें अलग-अलग हैं। इसकी कथावस्तु में जहाँ एक ओर जीवन के उल्लसित क्षणों का चित्रण है, वहीं उसके दु:ख-दर्द और उसकी निर्मम गति का भी अविस्मरणीय रेखांकन हुआ है।
Book Details
-
ISBN9788171787890
-
Pages131
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Woh Aadmi
- Author Name:
Fazal Tabish
- Book Type:

-
Description:
उपन्यास ‘वो आदमी’ एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक कालखंड का प्रामाणिक दस्तावेज़ है जिसमें भोपाल से सम्बन्धित कथाएँ और किंवदन्तियाँ बहुत ख़ूबी और बिना किसी दिखावे के, बचपन की यादों के साथ, ख़ासतौर पर पिता और परिवार के अन्य सदस्यों की यादें, जो समय के साथ ख़ामोश बदलाव के पात्र भी हैं और साक्षी भी, बुनी गई हैं। सॉमरसेट मॉम का भावार्थ उधार लेकर कहें तो किसी क़ीमती ग़लीचे के रहस्यमय पैटर्न में बुनी गई हैं।
यह उपन्यास दरअसल एक प्लॉट-रहित गाथा है, जो कि शायद ज़िन्दगी की असलियत भी है। इसे पढ़ते एहसास होता है कि बढ़ना और बदलना एक-दूसरे के बिना सम्भव नहीं, और कुछ होने के लिए बहुत सारी कभी रह चुकी चीज़ों का खो जाना ज़रूरी है।
‘वो आदमी’ पाठक को एक ओर जहाँ नॉस्टेल्जिया से भरता है, वहीं दूसरी सतह पर उससे मुक्त होने को सचेत भी करता है। सबसे महत्त्वपूर्ण, यह बताता है कि दुनिया किधर से आ रही है और किस दिशा में बढ़ रही है, और पाठक को अपने भीतर झाँक सकने के साहस के साथ ज़िन्दगी में भागीदारी का न्योता देता है।
Sara Aakash
- Author Name:
Rajendra Yadav
- Book Type:

-
Description:
आज़ाद भारत की युवा-पीढ़ी के वर्तमान की त्रासदी और भविष्य का नक़्शा। आश्वासन तो यह है कि सम्पूर्ण दुनिया और सारा आकाश तुम्हारे सामने खुला है—सिर्फ़ तुम्हारे भीतर इसे जीतने और नापने का संकल्प हो—हाथ-पैरों में शक्ति हो...
मगर असलियत यह है कि हर पाँव में बेड़ियाँ हैं और हर दरवाज़ा बन्द है। युवा बेचैनी को दिखाई नहीं देता कि किधर जाए और क्या करे। इसी में टूटता है उसका तन, मन और भविष्य का सपना। फिर वह क्या करे—पलायन, आत्महत्या या आत्मसमर्पण?
आज़ादी के पचास बरसों ने भी इस नक़्शे को बदला नहीं—इस अर्थ में ‘सारा आकाश’ ऐतिहासिक उपन्यास भी है और समकालीन भी।
बेहद पठनीय और हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासों में से एक ‘सारा आकाश’ चालीस संस्करणों में आठ लाख प्रतियों से ऊपर छप चुका है, लगभग सारी भारतीय और प्रमुख विदेशी भाषाओं में अनूदित है। बासु चटर्जी द्वारा बनी फ़िल्म ‘सारा आकाश’ (हिन्दी) सार्थक कलाफ़िल्मों की प्रारम्भकर्ता फ़िल्म है।
Where Has My Gulla Gone
- Author Name:
Padma Sachdev
- Book Type:

- Description: No Description Available for this Book
Pret Aur Chhaya
- Author Name:
Ilachandra Joshi
- Book Type:

- Description: अज्ञात चेतना का मनोविज्ञान अभी तक शैशव अवस्था से आगे नहीं बढ़ पाया है। यूरोप के मनोवैज्ञानिकों ने इस ओर क़दम बढ़ाया है, पर अभी तक वे प्रारम्भिक सीढ़ी भी तय नहीं कर पाए हैं। मेरे मन में यह दृढ़ विश्वास है कि यह सब विद्वानों का मूलगत विज्ञान भारतीय क्षेत्र में ही चरम उन्नति प्राप्त कर सकेगा। अन्तश्चेतना की रहस्यमयता की ओर भारतीय दार्शनिकों का झुकाव उपनिषदों के युग से लेकर आज तक बराबर जारी रहा है। उपनिषदों के युग में हमने उस अगाध रहस्यमयता का महान आभास पाया है। अब उसी रहस्योन्मुखता की प्रवृत्ति को नया रूप देकर अन्तर्दृष्टि और विवेक से पूर्ण समन्वय से हम भारतीयों को इस तथ्य के अनुसन्धान में जुट जाना होगा कि अज्ञात चेतना के पाताललोक में स्थित अतल नरक के विश्लेषण द्वारा बाह्य-जीवन-तत्त्वों के साथ उन नारकीय (किन्तु मूल) जीवन-तत्त्वों का समुचित समन्वय स्थापित करके मानव-जगत में किन उपायों से आपेक्षिक स्वर्ग की स्थापना की जा सकती है। इस ओर का कोई भी प्रयास, चाहे वह कैसा ही क्षीणतम और असंख्य दोषों से पूर्ण क्यों न हो, उपेक्षणीय नहीं होना चाहिए—स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।
Literary Riaz
- Author Name:
Komal Raichandani
- Book Type:

- Description: This book is an attempt to tenderly delineate the emotions weaved in the form of short narratives, poetry, a letter, a sketch, a review, a dairy entry, a prayer, a play, and a conversation all weaved into one! As each letter passes, there is something new to look at, connect, hear and taste a bit of almost every literary genre! We have a qualm teacher and an emotionally aware student, an allegory of an object RIN and semi-living flower, a childhood reminisce, bio-sketch, a socially awkward theatre artist and an emotionally agile driver, a sweet conversation, letters and their replies, poetry, quotes from General and extraordinary people/things around and a review. Everything is interconnected, and things gradually develop and blossom when it's Z!
Bidhar
- Author Name:
Bhalchandra Nemade
- Book Type:

-
Description:
‘बिढार’ का मतलब है—अपने कन्धे पर अपनी गृहस्थी का बोझ लादे हुए भटकना। इस दिक्-काल से परे की भटकन का मक़सद है, शायद, गौतमबुद्ध की तरह संबोधि प्राप्त करना। अपने आपको, अपनों को, अपनापे को पाना। बिढार के चांगदेव की यह भटकन, भाषा-प्रदेश और काल को लाँघकर सार्वजनीन और बीसवीं शताब्दी के डॉक्यूमेन्ट्स को लेकर सार्वकालिक बन जाती है। यह कहीं भी ख़त्म न होनेवाली भटकन, जिसका प्रारम्भ 1962 में हुआ था, वह ‘बिढार’ (1975), ‘जरीला’ (1977) और ‘झूल’ (1979) को पार कर अब अपने आगे के मुकाम ‘हिन्दू’ की ओर अग्रसर है। यह परकाया प्रवेश करनेवाले एक की आपबीती है जो अपने विस्तार में अनेक को समाहित करने का सामर्थ्य रखती है।
यह मानव-सभ्यता की कैसी विडम्बना है कि सृजन-क्षमता के विनाश को स्वीकार किए बिना मनुष्य
को समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं होती। विपात्र बनो और प्रतिष्ठा प्राप्त करो। सत् (बीइंग) और कर्तृत्व (बिकमिंग) का घोर कुरुक्षेत्र नेमाड़े जी के उपन्यास—‘चतुष्ट्य’ का दहला देनेवाला अन्तःसूत्र है। जीवन के नैतिक और सांस्कृतिक दायित्व की व्यग्रता का भाव नेमाड़े जी के ‘बिढार’ में जिस अभिनिवेश शून्य परन्तु रचनात्मक स्वरूप में पाया जाता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
—रंगनाथ तिवारी
Bas Yu Hi
- Author Name:
Parul Tyagi
- Book Type:

- Description: Hindi Poetry Book
Samidha
- Author Name:
Madhu Soni Madhukunj
- Rating:
- Book Type:

- Description: Madhya Pradesh Ki Prernastrot Mahilaen
Bhishma Pitamah
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

-
Description:
भारतीय पौराणिक इतिहास में भीष्म पितामह-जैसा चरित्र दूसरा नहीं। महान वीर, संकल्पशील और धर्मपरायण होते हुए भी उन्होंने जो जीवन जिया, एक गहरे अवसाद की छाया उस पर सदैव पड़ती रही। कुरुवंशी राजकुमारों के पारस्परिक कलह ने उन्हें आजीवन उद्विग्न रखा, लेकिन कोई भी दारुण स्थिति उन्हें कर्तव्य-पथ से कभी विचलित नहीं कर पाई। अपने विलक्षण जीवन के अनेक मोड़ों पर वे हमें आदर्शों के चरम शिखर पर दिखाई देते हैं।
महाकवि निराला ने भीष्म पितामह के इसी महान चरित्र को इस पुस्तक में शब्दबद्ध किया है। उन्हीं के शब्दों में, “महावीर भीष्म के चरित्र से सब शिक्षाएँ एक साथ मिल जाती हैं। पिता के प्रति पुत्र की कैसी भक्ति होनी चाहिए, माता और विमाता के प्रति उसके क्या कर्तव्य हैं, मनुष्यता का आदर्श क्या हो, शास्त्र-अध्ययन, ब्रह्मचर्य और सरल भाव से जीवन के निर्वाह का फल क्या है, समर-क्षेत्र में क्षत्रिय का आदर्श क्या है, यथार्थ वीरता किसे कहते हैं—इस तरह से मनुष्य के मस्तिष्क में मनुष्यता से सम्बन्ध रखनेवाले जितने प्रश्न आ सकते हैं, उन सबका उत्तर भीष्म के जीवन से मिल जाता है।’’
निश्चय ही यह एक ऐसी पुस्तक है, जो किशोर एवं प्रौढ़—दोनों ही तरह के पाठकों को पसन्द आएगी।
Apne Apne Konark
- Author Name:
Chandrakanta
- Book Type:

-
Description:
अपने-अपने कोणार्क यानी कश्मीर से ओडिशा का सफ़र। कश्मीर की सरसब्ज़ वादी में जन्मी और पली-बढ़ी चन्द्रकान्ता को भारत के अनेक प्रान्तों में रहने-बसने का मौक़ा मिला। लेकिन ओडिशा में बिताए गए छह वर्ष उनकी सर्जनात्मकता के लिए अमूल्य बन गए। उन्होंने वहाँ की जीवन-शैली, लोक-रंगों और परम्पराओं की महक महसूस की है, जिसका जीवन्त प्रमाण है ‘अपने-अपने कोणार्क’।
ओडिशा की संस्कृति धरोहर—पुरी और कोणार्क, जीवन के दो पहलू; सम्पूर्ण जीवन का फ़लसफ़ा यहाँ मौजूद है, जिसे लेखिका ने ऐतिहासिक एवं भौगोलिक परिदृश्य के साथ वर्तमान की सच्चाइयों से जोड़कर देखा है। उपन्यास की नायिका कुनी के माध्यम से उन्होंने आम ओड़िया जन को उसके विगत और वर्तमान के साथ प्रस्तुत किया है। 'मोर गौरव जगन्नाथ' में विश्वास करता आम ओड़िया जन अपने परम्परागत आलोक से मुग्ध, रक्षणशील तथा संस्कारवान भी है और हम सबकी तरह अन्धविश्वासी और रूढ़ मानसिकता से ग्रस्त भी। कुनी इसी रक्षणशील परिवार की बड़ी बेटी है, हज़ारहा दायित्वों की साँकलों में क़ैद, गोकि वह उन्हें साँकलें समझती नहीं। वह अपनी लीक आप बनाती, वक्त की सच्चाइयों के रू-ब-रू होते अपने भीतर को जानने और पाने की कोशिश करती है। ओडिशा की पृष्ठभूमि में वहाँ के इन्द्रधनुषी रंगों को समेटे कुनी की यह कहानी सच की तलाश है।
Apsara Ka Shap
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

-
Description:
स्वातंत्र्योत्तर भारत के शिखरस्थ लेखकों में प्रमुख यशपाल ने अपने प्रत्येक उपन्यास को पाठक के मन-रंजन से हटाकर उसकी वैचारिक समृद्धि को लक्षित किया है। विचारधारा से उनकी प्रतिबद्धता ने उनकी रचनात्मकता को हर बार एक नया आयाम दिया, और उनकी हर रचना एक नए तेवर के साथ सामने आई ! 'अप्सरा का शाप' में उन्होंने दुष्यन्त-शकुन्तला के पौराणिक आख्यान को आधुनिक संवेदना और तर्कणा के आधार पर पुनराख्यायित किया है।
यशपाल के शब्दों में : 'शकुन्तला की कथा पतिव्रत धर्म में निष्ठा की पौराणिक कथा है। ‘महाभारत’ के प्रणेता तथा कालिदास ने उस कथा का उपयोग अपने-अपने समय की भावनाओं, मान्यताओं तथा प्रयोजनों के अनुसार किया है। उन्हीं के अनुकरण में 'अप्सरा का शाप' के लेखक ने भी अपने युग की भावना तथा दृष्टि के अनुसार शकुन्तला के अनुभवों की कल्पना की है। उपन्यास की केन्द्रीय वस्तु दुष्यन्त का शकुन्तला से अपने प्रेम सम्बन्ध को भूल जाना है, इसी को अपने नज़रिए से देखते हुए लेखक ने इस उपन्यास में नायक 'दुष्यन्त' की पुनर्स्थापना की है और बताया है कि नायक ने जो किया, उसके आधार पर आज के युग में उसे धीरोदात्त की पदवी नहीं दी जा सकती।
Match Box 81
- Author Name:
Dr. Lata Kadambari Goel
- Book Type:

- Description: "फास्ट फूड तथा पाउच के जमाने में वक्त की कमी को देखते हुए कहानियाँ भी छोटी-छोटी होनी चाहिए न! बिल्कुल ऐसी कि माचिस की एक डिब्बी में समा जाएँ। इस पुस्तक में लेखिका ने अपने समाजोपयोगी विचारों और भावों को ‘मैच बॉक्स 81’ में डाला है। जरा जलाइए न उसको। कैसी नीली, पीली, लाल, गुलाबी ‘लौ’ छोड़कर अचानक बुझ जाती है वो नन्हीं सी तीली। ऐसी ही नन्हीं-नन्हीं कहानियों की शक्ल लिये ये ‘तीलियाँ’ मतलब कि ये छोटी-छोटी कहानियाँ हैं, जो अपने ज्ञान की रोशनी से पाठकों के जीवन को प्रकाशमान करेंगी। लेखिका ने इन कहानियों के माध्यम से जीवन की छोटी-छोटी, लेकिन महत्त्वपूर्ण समस्याओं को सुलझाने के लिए एक व्यावहारिक ताना-बाना बुनने का कुछ इस प्रकार से प्रयास किया है कि कहानी भीतर तक झकझोर देनेवाला एक सवाल उठाकर खत्म हो जाती है। जीवन के अंधकार से निकलने का एक छोटा सा प्रयास है ये पठनीय कहानियाँ। "
Koi Veerani Si Veerani Hai
- Author Name:
Vijay Mohan Singh
- Book Type:

-
Description:
यह ‘वीरानी’ किसकी है? दिल का, दिमाग़ और पूरे परिवेश का?
...उपन्यास लेकिन
‘वीरानी’ की तलाश नहीं है। तलाश है इस वीराने में अर्थ की। प्रतिभा और परिवेश सब बंजर हो रहे हैं। प्रतिभाएँ या तो कुंठित हो रही हैं या अपनी वहशत में क्रमिक हत्याओं तथा आत्महत्याओं की ओर अग्रसर। एक तीसरा रास्ता है : अपनी चतुर, कुटिल बुद्धि का लिप्सा में लिथड़ा भोगलिप्त उपयोग।यह कथा इन तीनों पथों के पथिकों की एक स्थाली ‘पुलाक् न्याय’ की जानकारी देती है। एक सामूहिक अक्षमता है जो हर कहीं जाकर अवरुद्ध हो जाती है : चाहे वह सफलता का रास्ता हो, सुविधाओं के संसार का या सम्बन्ध, साहचर्य और प्रेम के निर्वाह का।
...आज का आदमी या तो सिनिकल है या ऐसा समझदार जो हर शिकार के बाद एक ताज़ा मछली की तलाश में है लेकिन हर मछली एक मरी हुई मछली है।
...यह एक संस्कृति की कहानी भी है जो कला और प्रचलन में फ़र्क़ करना भूल गई है। यह वीरानी उस विविधता की भी है क्योंकि जितनी विविधता होगी, उतनी ही वीरानी बढ़ेगी। संकेतों, प्रतीकों तथा प्रयोजनार्थ निर्मित नाटकीय कथास्थितियों में मित कथन
को माध्यम बनाकर लिखा गया यह उपन्यास अपने व्यंजनार्थ में ही सब कुछ व्यक्त करने की चेष्टा है। सहज तथा सरल-सी प्रतीत होनेवाली इस कथा में एक काल है जो अपनी बंजरता में विस्तृत होता जा रहा है : एक सामन्ती युग के अवशेष का अन्त तो दूसरी ओर तथाकथित आधुनिक का अनुभव, अनुभूति का स्पर्शहीन अनवरत स्थानान्तरण : क़स्बा, नगर, महानगर तथा परदेश-गमन की दिशाहीन यात्राओं की ओर!इन्हीं सबके इस सर्वव्यापी ‘आइसबर्ग’ के महज़ एक नाखून का रेखांकन है यह। कम से कम दिखने और अधिक से अधिक दिखाने का प्रयास। इसीलिए इसमें सायास कुछ नहीं है : जो है वह दृश्य में। व्याख्याओं, विश्लेषणों तथा स्थापनाओं के रूप में कुछ नहीं! एक व्यक्तिगत, सामूहिक, सामाजिक अथवा सांकृतिक वीरानी अपने बयान में ही व्यक्त हो सकती हैं—व्याख्या या बड़बोलेपन में नहीं।
Andhkar Bela
- Author Name:
Suchitra Bhattacharya
- Book Type:

- Description: कहते हैं, सारा-का-सारा ऑपरेशन प्लान माफिक किया गया। कल दिन भर, रात भर चूँकि धरना पर बैठे लोगों को हिला नहीं पाए, इसलिए भोर-रात बेधड़क लाठियाँ चलाई गईं, बिलकुल अचानक! लोगों को कुत्ते-बिल्ली की तरह दौड़ाते रहने के बाद भी बाबू लोगों का गुस्सा कम नहीं हुआ। जमीन देने को अनिच्छुक लोग अपनी रीढ़ सीधी करके खड़े न हो पाएँ, इसके लिए उन लोगों ने चड़कडाँगा गाँव चुन लिया। पुलिस और गुंडों का गिरोह...हाँ, पुलिस के जत्थे में बाहर के गुंडे भी शामिल थे। उन लोगों ने अचानक ही गाँव पर हमला बोल दिया। घर-द्वार तहस-नहस कर दिया, बच्चे-बूढ़े-जवानों को निर्ममता से पीटा, बहू-बेटियों की इज्जत लूटी। कुछ भी नहीं छोड़ा।’जया ने पूछा, ‘हाँ जी, एक बहुरिया को घसीटते-घसीटते यूँ लात चला रहे थे कि...’ —इसी उपन्यास से जीवन के विविध रंगों—हर्ष, विषाद, उल्लास में रँगा—सामाजिकता की नींव पर मजबूती से खड़ा सशक्त उपन्यास।
Hindu : Jeene Ka Samriddh Kabaad
- Author Name:
Bhalchandra Nemade +1
- Book Type:

- Description: ‘हिन्दू’ शब्द के असीम और निराकार विस्तार के भीतर समाहित, ‘अपने-अपने ढंग’ से सामाजिक रूढ़ियों में बदलती ‘उखड़ी-पुखड़ी’, ‘जमी-बिखरी’ वैचारिक धुरियों, सामूहिक आदतों, ‘स्वार्थों’ और ‘परमार्थों’ की आपस में उलझी पड़ी अनेक बेड़ियों-रस्सियों, सामाजिक-कौटुम्बिक रिश्तों की पुख्तगी और भंगुरता, शोषण और पोषण की एक दूसरे पर चढ़ीं अमृत और विष की बेलें, समाज की अश्मीभूत हायरार्की में ‘साँस लेता-दम तोड़ता जन’, और इस सबके ऊबड़-खाबड़ से राह बनाता समय—मरण-लिप्सा और जीवनावेग की अतलगामी भँवरों में डूबता-उतराता, अपने घावों को चाटकर ठीक करता, बढ़ता काल... देसी अस्मिता का महाकाव्य यह उपन्यास भारत के जातीय 'स्व’ का बहुस्तरीय, बहुमुखी, बहुवर्णी उत्खनन है। यह न गौरव के किसी जड़ और आत्ममुग्ध आख्यान का परिपोषण करता है, न 'अपने’ के नाम पर संस्कृति की रगों में रेंगती उन दीमकों का तुष्टीकरण, जिन्होंने 'भारतवर्ष’ को भीतर से खोखला किया है। यह उस विराट इकाई को समग्रता में देखते हुए चलता है जिसे भारतीय संस्कृति कहते हैं। यह समूचा उपन्यास हममें से किसी का भी अपने आप से संवाद हो सकता है—अपने आप से और अपने भीतर बसे यथार्थ और नए यथार्थ का रास्ता खोजते रास्तों से। इसमें अनेक पात्र हैं, लेकिन उपन्यास के केन्द्र में वे नहीं, सारा समाज है, वही समग्रता में एक पात्र की तरह व्यवहार करता है। संवाद भी, पूरा समाज ही करता है, लोग नहीं। एक क्षरणशील, फिर भी अडिग समाज भीतर गूँजती, और 'हमें सुन लो’ की प्रार्थना करती जीने की ज़िद की आर्त पुकारें। कृषि संस्कृति, ग्राम व्यवस्था और अब, राज्य की आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त नई संरचना—सबका अवलोकन करती हुई यह गाथा—इस सबके अलावा पाठक को अपनी अँतड़ियों में खींचकर समो लेने की क्षमता से समृद्ध एक जादुई पाठ भी है।
Nirvasan
- Author Name:
Akhilesh
- Book Type:

-
Description:
अखिलेश का उपन्यास ‘निर्वासन’ पारम्परिक ढंग का उपन्यास नहीं है। यह आधुनिकतावादी या जादुई यथार्थवादी भी नहीं। यथार्थवाद, आधुनिकतावाद और जादुई यथार्थवाद की ख़ूबियाँ सँजोए असल में यह भारतीय ढंग का उपन्यास है। यहाँ अमूर्त नहीं, बहुत ही वास्तविक, कारुणिक और दुखदायी निर्वासन है। सूत्र रूप में कहें तो यह उपन्यास औपनिवेशिक आधुनिकता/ मानसिकता के कारण पैदा होनेवाले निर्वासन की महागाथा है जो पूँजीवादी संस्कृति की नाभि में पलते असन्तोष और मोहभंग को उद्घाटित करने के कारण राजनीतिक-वैचारिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। जॉर्ज लूकाच ने चेतना के दो रूपों का ज़िक्र किया है : वास्तविक चेतना तथा संभाव्य चेतना। लूकाच के मुताबिक़ संभाव्य चेतना को छूनेवाला उपन्यास वास्तविक चेतना के इर्द-गिर्द मँडरानेवाले उपन्यास से श्रेष्ठ है। कहने की ज़रूरत नहीं, ‘निर्वासन’ इस संभाव्य चेतना को स्पर्श कर रहा उपन्यास है जिसकी अभी सिर्फ़ कुछ आहटें आसपास सुनाई पड़ रही हैं।
आधुनिकता के सांस्कृतिक मूल्यों में अन्तर्निहित विडम्बनाओं का उद्घाटन करनेवाला अपने तरह का हिन्दी में लिखा गया यह पहला उपन्यास है। ‘निर्वासन’ सफलता और उपलब्धियों के प्रचलित मानकों को ही नहीं समस्याग्रस्त बनाता अपितु जीव-जगत के बारे में प्राय: सर्वमान्य सिद्ध सत्यों को भी प्रश्नांकित करता है। दूसरे धरातल पर यह उपन्यास अतीत की सुगम-सरल, भावुकतापूर्ण वापसी का प्रत्याख्यान है। वस्तुत: ‘निर्वासन’ के पूरे रचाव में ही जातिप्रथा, पितृसत्ता जैसे कई सामन्ती तत्त्वों की आलोचना विन्यस्त है। इस प्रकार ‘निर्वासन’ आधुनिकता के साथ भारतीयता की पुनरुत्थानवादी अवधारणा को भी निरस्त करता है।
लम्बे अर्से बाद ‘निर्वासन’ के रूप में ऐसा उपन्यास सामने है जिसमें समाज वैज्ञानिक सच की उपेक्षा नहीं है किन्तु उसे अन्तिम सच भी नहीं माना गया है। साहित्य की शक्ति और सौन्दर्य का बोध करानेवाले इस उपन्यास में अनेक इस तरह की चीज़ें हैं जो वैचारिक अनुशासनों में नहीं दिखेंगी। इसीलिए इसमें समाज वैज्ञानिकों के लिए ऐसा बहुत-कुछ है जो उनके उपलब्ध सच को पुनर्परिभाषित करने की सामर्थ्य रखता है।
कहना अनुचित न होगा कि उपन्यास की दुनिया में ‘निर्वासन’ एक नया और अनूठा प्रस्थान है।
—राजकुमार
Kabuliwale Ki Bangali Biwi
- Author Name:
Sushmita Bandyopadhyay
- Book Type:

-
Description:
“चाहत! चाहत का मतलब समझते हैं आप लोग? एक इनसान को दो वक़्त का खाना देने से ही क्या चाहत होती है? सिर छुपाने के लिए थोड़ी-सी जगह दे देने से ही क्या कर्तव्य ख़त्म हो जाता है? ब्याह कर भाइयों के पास बीवी को छोड़ जाने से ही क्या शौहर के सब दायित्वों का निर्वाह हो जाता है?...दिन-पर-दिन उसके भाई मुझ पर हाथ उठाते हैं...अशोभनीय भाषा में गाली-गलौच करते हैं...माता-पिता तक को गालियाँ देते हैं...”
सुष्मिता बंद्योपाध्याय का दिल दहला देनेवाला आत्मकथात्मक उपन्यास है—‘काबुलीवाले की बंगाली बीवी’।
बंगाली ब्राह्मण परिवार की लड़की का एक अफ़ग़ानी लड़के से प्रेम, फिर विवाह और फिर आठ साल तक अफ़ग़ानिस्तान में यातनाओं का कुचक्र—यही कथाभूमि है इसकी।
इस आत्मकथ्य में जहाँ तालिबानी पृष्ठभूमि की, निरंकुश धार्मिक कट्टरताओं को बेनक़ाब किया गया है, वहीं निरपेक्ष रूप से एक स्त्री की, छोटे बच्चे की तरह अपने घर वापस आने की छटपटाहट को भी मार्मिक अभिव्यक्ति मिली है।
भीतर तक हौला देनेवाला उपन्यास है—‘काबुलीवाले की बंगाली बीवी’।
Swasthaya Prashnottari
- Author Name:
Anil Agrawal
- Book Type:

- Description: आपके शरीर में यकृत (लिवर) क्या कार्य करता है? विटामिन आपके लिए क्यों आवश्यक हैं? मलेरिया से पीड़ित होने पर कौन सी दवा दी जानी चाहिए? क्या आप इन प्रश्नों के उत्तर जानना चाहते हैं? यदि हों, तो आपको इस पुस्तक से मदद मिल सकती हे । एक सामान्य पाठक को ध्यान में रखकर लिखी गई यह पुस्तक आपको मानव शरीर, पौष्टिकता, रोग और उनके उपचार की संपूर्ण जानकारी देती है । इस पुस्तक को पढ़ने के पश्चात् आपको मानव शरीर, स्वास्थ्य व रोगों के विषय में बहुत सी नई जानकारियाँ प्राप्त होंगी ।
Seemayen Tootati Hain
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Book Type:

-
Description:
दुर्गादास को एक हत्या के जुर्म में जनमक़ैद हो गई है। उसके बाद ही मानवीय सम्बन्धों की हत्या के प्रयास और उन सम्बन्धों की सर्वोपरिता की यह कथा शुरू होती है। इसमें जिस बहुरंगी संसार की रचना हुई है, वहाँ वास्तविक संसार जैसा ही उलझाव है। उसकी विशृंखलता में एक ओर कोई तारानाथ पारम्परिक विश्वासों के सहारे व्यवस्था खोजने की कोशिश करता है और उस प्रक्रिया में अपने को खड़ा करने की ताक़त पाता है, दूसरी ओर कोई विमल किसी भी स्थिति के लिए अपने को पहले से तैयार न पाकर सिर्फ़ कुछ होने की प्रतीक्षा करता रहता है। और धर्म, प्रेम और अपराध-जैसी तर्कातीत वृत्तियों में बँधी हुई ज़िन्दगी इस अव्यवस्थित उलझाव से निरन्तर जूझती रहती है। अपराध-कथा के-से प्रवाहवाली यह रचना वास्तव में वृहत्तर जीवन की कथा है जो पाठक को सहज अवरोह के साथ अन्त तक लाते-लाते उसे मानवीय नियति की अप्रत्याशित गहराइयों में उतार देती है।
सुविख्यात उपन्यास ‘राग दरबारी’ की रचना के पाँच साल बाद प्रकाशित होनेवाला श्रीलाल शुक्ल का यह उपन्यास उनकी अन्य कृतियों से सर्वथा भिन्न है और उनकी सर्जनात्मक प्रतिभा के कई ऐसे आन्तरिक स्रोतों का परिचय देता है जिनका उपयोग हिन्दी कथा-साहित्य में प्रायः विरल है।
Basanti
- Author Name:
Bhisham Sahni
- Book Type:

-
Description:
‘झरोखे’, ‘कड़ियाँ’ और ‘तमस’ जैसे तीन विभिन्न आयामी उपन्यासों के बाद ‘बसन्ती’ का आना भीष्म साहनी के निर्बंध कथाकार की एक और सृजनात्मक उपलब्धि है। इस उपन्यास में एक ऐसी लड़की का चित्रण है जो मेहनत-मज़दूरी करने के लिए महानगर में आए ग्रामीण परिवार की कठिनाइयों के साथ-साथ बड़ी होती है; और निरन्तर ‘बड़ी’ होती जाती है।
दिल्ली जैसे महानगर में नए-नए सेक्टर और कॉलोनियाँ उठानेवालों की आए दिन टूटती झुग्गी-बस्तियों में टूटते ग़रीब लोगों, रिश्ते-नातों, सपनों और घरौंदों के बीच मात्र बसन्ती ही है जो साबुत नज़र आती है। वह अपने परिवार, परिवेश और परम्परागत नैतिकता से विद्रोह करती है। यह विद्रोह उसे दैहिक और मानसिक शोषण तक ले जाता है, पर उसकी निजता को कोई हादसा तोड़ नहीं पाता। प्रेमिका और ‘पत्नी’ के रूप में कठिन-से-कठिन हालात को ‘तो क्या बीबी जी’ कहकर उड़ाने और खिलखिलाने में ही जैसे बसन्ती की सार्थकता है। दूसरे शब्दों में वह एक जीती-जागती जिजीविषा है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book