Patariyan
Author:
Bhisham SahniPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections0 Ratings
Price: ₹ 140
₹
175
Available
स्वातंत्र्योत्तर भारत में उभरता नया मध्यवर्ग भीष्म साहनी के कथाकार को लगातार आकर्षित करता रहा। शहरी टापुओं पर भटकते इस नए यात्री की सीमाओं और विडम्बनाओं को उन्होंने कहीं थोड़ी तुर्शी, तो कहीं गहरी हमदर्दी के साथ रेखांकित किया, और मध्यवर्ग के रूप में बसती हुई नई नागरिकता को वृहत्त मानवीय परिप्रेक्ष्य के भूत-भविष्य के सामने रखकर बार-बार जाँचा-परखा भी।
वर्ष 1973 में प्रकाशित इस कहानी-संग्रह की चौदह कहानियों में से कई उनकी इस विशेषता की साक्षी हैं, लेकिन संग्रह की सबसे चर्चित कहानी 'अमृतसर आ गया है...’ की पृष्ठभूमि थोड़ी अलग है। आज़ादी के साथ आई विभाजन की विभीषिका यहाँ फिर अपनी तीव्रता के साथ उपस्थित है। यह कहानी बताती है कि ज़मीन का वह बँटवारा कितनी कड़वाहट के साथ लोगों के दिलों में उतरा, लेकिन फिर भी उन महीन सूत्रों को निस्तेज नहीं कर पाया जो अपनी ज़मीनों से उखड़ने के बाद भी लोगों की साँसों में बसे थे।
शीर्षक कथा 'पटरियाँ’ एक मध्यवर्गीय युवक की कहानी है जिसके रहन-सहन को देखकर रसोइया भी उससे ठीक व्यवहार नहीं करता, लेकिन फिर जब उसका जीवन पटरी पर आने लगता है तो उसके सपने भी जुड़ाने लगते हैं। पठनीय, स्मरणीय, संग्रहणीय कहानियाँ।
ISBN: 9789387462779
Pages: 168
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: बीज-भोजी' किसान आत्महत्या और अभाव से हो रही मौतों की दुखभरी गाथा है। किसान होना किसी व्यक्ति के जीवट की मुकम्मल गवाही है। वह किसान अंत तक जूझता है और अंतत: कर्ज और भूख में दबकर मर जाता है। यह मौत हमारी सभ्यता के मृत होने की मुखर घोषणा है। 'पैमाइश' कहानी एक तरफ गाँव की पतनशीलता का आख्यान है तो दूसरी तरफ दुस्साहसी, स्वच्छंद तथा कर्मठ स्त्री 'संन्यासिन' के डायन में तब्दील होने का लोमहर्षक दस्तावेज़ भी। कोई प्रखर और परिश्रमी स्त्री क्यों गाँव-भर में डायन बताई जाने लगती है, इसके पीछे कौन-सा क्षुद्र स्वार्थ छुपा होता है इसे 'पैमाइश' पढ़कर अच्छी तरह जाना जा सकता है। इसी प्रकार 'एक एकाउण्टेंट की डायरी में मिट्टी की गंध' कहानी का नायक महानगरीय जीवन की तमाम सुख-सुविधाओं को हासिल कर लेने के बावजूद बचपन से प्राणों में घुली मिट्टी की गंध पाने के लिए बदहवास फिरता है, जबकि उसके घर के लोग उसे मिट्टी से दूर रखने की जी-तोड़ कोशिशें करते हैं। 'तर्पण' कहानी गाँव के भीतर ही अपने मन में बसे गाँव को बचाए रखने की असफल कोशिशों को सामने लाती है और यह भी बताती है कि किस तरह शहरीकरण का दैत्य गाँव को गाँव नहीं रहने देने के लिए बेताब है। 'बीज-भोजी' गौरीनाथ का तीसरा कहानी संग्रह है.
Riyaz Aur Anya Kahaniyan
- Author Name:
T. Janakiraman
- Book Type:

- Description: तमिल साहित्य के सुपरिचित हस्ताक्षर टी. जानकीरामन की ये कहानियाँ भारतीय समाज की उन विडम्बनाओं को गहरी समझदारी और बारीकी से अंकित करती हैं जिनसे हम आज भी जूझ रहे हैं। मिसाल के तौर पर संग्रह की पहली ही कहानी ‘रियाज़’। जाति की अमानवीय मौजूदगी इस कहानी में जिस तरह उभरकर आती है एकबारगी चौंका देती है। नीची मानी जाने वाली एक जाति के प्रतिभावान युवक को संगीत सिखाने की इच्छा के कारण मल्ली को जिस तरह गाँव में हर किसी के मज़ाक का पात्र बनना पड़ता है, उसकी नाटकीयता पाठक को हतप्रभ कर देती है। ‘निर्णय’ शीर्षक कहानी सिर्फ़ समाज की, परम्पराओं की और स्त्री की विवशता की नहीं, भावनाओं के एक अबूझ संजाल की कहानी भी है, जो हमें प्रश्नों के एक भाव-विगलित चक्र में छोड़ जाती है। छोटी-छोटी घटनाओं को लेकर लिखी गईं ये कहानियाँ अपने प्रवाह और सूक्ष्म पर्यवेक्षण के चलते अत्यन्त पठनीय बन पड़ी हैं; और कुछ देर के लिए आपको सिर्फ़ अपने दायरे में जैसे सम्मोहित कर लेती हैं। हिन्दी पाठकों के लिए नया आस्वाद और अलग भावभूमि पर रचीं गईं दिलचस्प कहानियाँ।
Bhookh Ke Teen Din
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

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Description:
यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।
‘भूख के तीन दिन’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘भूख के तीन दिन’, ‘शुरफा’, ‘समय’, ‘दीनता का प्रायश्चित्त’, ‘भली लड़कियाँ’, ‘दाग़ ही दाग़’ ‘मॉडर्न’, ‘सीख’, ‘ख़ूब बचे!’, ‘पागल है!’ और ‘आशीर्वाद’।
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