Pratinidhi Kahaniyan : Bhisham Sahni
(3)
Author:
Bhisham Sahni, Bhishma SahniPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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भीष्म साहनी के कथा-साहित्य से गुज़रना अपने समय को बेधते हुए गुज़रना है। हिन्दी के प्रगतिशील कहानीकारों में उनका स्थान बहुत ऊँचा है। यहाँ उनके सात कहानी-संग्रहों से प्राय: सभी प्रतिनिधि कहानियों को संकलित कर लिया गया है। युग-सापेक्ष सामाजिक यथार्थ, मूल्यपरक अर्थवत्ता और रचनात्मक सादगी इन कहानियों के कुछ ऐसे पहलू हैं, जो हमारे लिए किसी भी काल्पनिक और मनोरंजक दुनिया को ग़ैर-ज़रूरी ठहराते हैं। विभिन्न जीवन-स्थितियों में पड़े इनके असंख्य पात्र आधुनिक भारतीय समाज की अनेक जटिल परतों को पाठकों पर खोलते हैं। उनकी बुराइयाँ, उनका अज्ञान और उनके हालत व्यक्तिगत नहीं, सार्वजनीन और व्यवस्थाजन्य हैं। इसके साथ ही इन कहानियों में ऐसे चरित्रों की भी कमी नहीं, जो गहन मानवीय संवेदना से भरे हुए हैं और अपने-अपने यथास्थितिवाद से उबरते हुए एक सार्थक सामाजिक बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों से जुड़कर नया अर्थ ग्रहण करते हैं। वे न तो अपनी भयावह और दारुण दशा से आक्रान्त होते हैं न निराश, बल्कि अपने साथ-साथ पाठकों को भी संघर्ष की एक नई उर्जा से भर जाते हैं।
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भीष्म साहनी के कथा-साहित्य से गुज़रना अपने समय को बेधते हुए गुज़रना है। हिन्दी के प्रगतिशील कहानीकारों में उनका स्थान बहुत ऊँचा है। यहाँ उनके सात कहानी-संग्रहों से प्राय: सभी प्रतिनिधि कहानियों को संकलित कर लिया गया है।
युग-सापेक्ष सामाजिक यथार्थ, मूल्यपरक अर्थवत्ता और रचनात्मक सादगी इन कहानियों के कुछ ऐसे पहलू हैं, जो हमारे लिए किसी भी काल्पनिक और मनोरंजक दुनिया को ग़ैर-ज़रूरी ठहराते हैं। विभिन्न जीवन-स्थितियों में पड़े इनके असंख्य पात्र आधुनिक भारतीय समाज की अनेक जटिल परतों को पाठकों पर खोलते हैं। उनकी बुराइयाँ, उनका अज्ञान और उनके हालत व्यक्तिगत नहीं, सार्वजनीन और व्यवस्थाजन्य हैं। इसके साथ ही इन कहानियों में ऐसे चरित्रों की भी कमी नहीं, जो गहन मानवीय संवेदना से भरे हुए हैं और अपने-अपने यथास्थितिवाद से उबरते हुए एक सार्थक सामाजिक बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों से जुड़कर नया अर्थ ग्रहण करते हैं। वे न तो अपनी भयावह और दारुण दशा से आक्रान्त होते हैं न निराश, बल्कि अपने साथ-साथ पाठकों को भी संघर्ष की एक नई उर्जा से भर जाते हैं।
Book Details
-
ISBN9788126717064
-
Pages172
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description:
इतिहास के जिस मोड़ पर यह कहानी-संग्रह प्रकाशित हुआ था, वह भारत के राजनीतिक-सामाजिक जीवन का सन्धि-काल था। आज़ादी के बाद का पहला दशक, जिसके साल 1957 में यह संग्रह प्रकाशित हुआ। इसी संग्रह में भीष्म जी की सर्वाधिक चर्चित कहानियों में से एक 'चीफ़ की दावत' प्रकाशित हुई, जो मध्यवर्ग की कैरियरिस्ट विडम्बनाओं और पारिवारिक मूल्यों के तेज़ी से बदलने की प्रक्रिया को बारीकी और मार्मिकता से पकड़ने के लिए आज भी प्रासंगिक बनी हुई है। बाद में इसके आलावा भी भीष्म जी की क़लम से ऐसी कहानियों की रचना हुई जो न सिर्फ़ अपनी संरचना, बल्कि अपनी पठनीयता के नज़रिए से भी मील का पत्थर साबित हुई।
इस संग्रह में संकलित कहानियाँ, उन तमाम विशेषताओं को कहीं-न-कहीं रेखांकित करती हैं, जो बीच-बीच में उनकी कालजयी कथा-रचनाओं में एक साथ उपस्थित होती रही हैं। इन कहानियों ने बताया था कि भीष्म जी ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को कहानी की नहीं, अपनी दृष्टि की पहचान बनाया। इसीलिए ये कहानियाँ बावजूद इसके कि लेखक के सोचने का अपना एक अनुशासन है, अपनी नियति की तरफ स्वतंत्र रूप से बढ़ती हैं, और उपदेश के बजाय जीवन को एक नई जगह से देखने का विकल्प सुझाती हैं।
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