Karishmai Kalam
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डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जुलाई 2002 में जब भारत के राष्ट्रपति बने तो एक राजनीतिज्ञ न होने के कारण आम लोगों में शंका थी कि क्या वे सफल राष्ट्रपति बन पाएँगे? क्या वे विशाल भारत राष्ट्र के प्रथम नागरिक के पद के दायित्व का सफल निर्वहन कर पाएँगे? भारत के मिसाइल मैन के रूप में विख्यात देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से विभूषित डॉ. कलाम ने अपने राष्ट्रपतित्व काल में ऐसे तमाम कयासों पर पूर्णविराम लगा दिया। उन्होंने अपनी सौम्यता और संवेदनशीलता से सबको जादू सा कर दिया। एक उन्नत-समर्थ-विकसित भारत के निर्माण के लिए उन्होंने भारत की युवाशक्ति को प्रेरित किया और राष्ट्रकार्य में सकारात्मक योगदान देने के लिए उनका आह्वान किया, जिसने देश का वातावरण ही बदल दिया। भले ही राष्ट्रपति के रूप में डॉ. कलाम का कार्यकाल समाप्त हो गया हो, उनके बारे में जानने की जिज्ञासा सबके मन में लगातार रहती है। डॉ. कलाम के इसी जादुई व्यक्तित्व, सम्मोहन और करिश्मे को पाँच साल उनके सचिव रहे पी.एम. नायर ने ‘करिश्माई कलाम’ में प्रस्तुत किया है।
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About the Book
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जुलाई 2002 में जब भारत के राष्ट्रपति बने तो एक राजनीतिज्ञ न होने के कारण आम लोगों में शंका थी कि क्या वे सफल राष्ट्रपति बन पाएँगे? क्या वे विशाल भारत राष्ट्र के प्रथम नागरिक के पद के दायित्व का सफल निर्वहन कर पाएँगे? भारत के मिसाइल मैन के रूप में विख्यात देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से विभूषित डॉ. कलाम ने अपने राष्ट्रपतित्व काल में ऐसे तमाम कयासों पर पूर्णविराम लगा दिया। उन्होंने अपनी सौम्यता और संवेदनशीलता से सबको जादू सा कर दिया। एक उन्नत-समर्थ-विकसित भारत के निर्माण के लिए उन्होंने भारत की युवाशक्ति को प्रेरित किया और राष्ट्रकार्य में सकारात्मक योगदान देने के लिए उनका आह्वान किया, जिसने देश का वातावरण ही बदल दिया। भले ही राष्ट्रपति के रूप में डॉ. कलाम का कार्यकाल समाप्त हो गया हो, उनके बारे में जानने की जिज्ञासा सबके मन में लगातार रहती है। डॉ. कलाम के इसी जादुई व्यक्तित्व, सम्मोहन और करिश्मे को पाँच साल उनके सचिव रहे पी.एम. नायर ने ‘करिश्माई कलाम’ में प्रस्तुत किया है।
Book Details
-
ISBN9788173156229
-
Pages152
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मनुष्य ने जब समाज व राष्ट्र्र के अस्तित्व तथा महत्त्व कौ मान्यता दी, तो उसके कर्तव्यों और अधिकारों की व्याख्या निर्धारित करने तथा नियमों के अतिक्रमण करने पर दण्ड व्यवस्था करने की भी आवश्यकता उत्पन्न हुई । यही कारण है कि विभिन्न युगों में विभिन्न स्मृतियों की रचना हुई, जिनमें मनुस्मृति को विशेष महत्व प्राप्त है । मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हज़ार पांच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित्त आदि अनेक विषयों का उल्लेख है। ब्रिटिश शासकों ने भी मनुस्मृति को ही आधार बनाकर ' इण्डियन पेनल कोड ' बनाया तथा स्वतन्त्र भारत की विधानसभा ने भी संविधान बनाते समय इसी स्मृति को प्रमुख आधार माना । व्यक्ति के सर्वतोमुखी विकास तथा सामाजिक व्यवस्था को सुनिश्चित रूप देने व व्यक्ति की लौकिक उन्नति और पारलौकिक कल्याण का पथ प्रशस्त करने में मनुस्मृति शाश्वत महत्त्व का एक परम उपयोगी शास्त्र मथ है । वास्तव में मनुस्मृति भारतीय आचार-संहिता का विश्वकोश है, जो भारतीय समाज के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा।
Vedic Log : Unka Itihas Aur Bhugol
- Author Name:
Rajesh Kochhar +1
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क्या ऋग्वेद की रचना अफगानिस्तान में हुई थी? क्या किसी समय घग्गर नदी ही ऋग्वेद में वर्णित महान सरस्वती थी? क्या ऋग्वैदिक जन और हड़प्पा निवासी समान ही थे? क्या राम की अयोध्या भारत में ही थी? प्राचीन भारतीय इतिहास के इन निर्णायक प्रश्नों के उत्तर इस किताब ‘वैदिक लोग’ में मिलते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए विख्यात खगोल-भौतिकीविद राजेश कोचर भाषाविज्ञान, साहित्य, प्राकृतिक इतिहास, पुरातत्व, प्रौद्योगिकी के इतिहास, भू-आकृति विज्ञान और खगोलशास्त्र आदि अनेक क्षेत्रों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण और संश्लेषण करते हैं और इस क्रम में ऐसे कई विरोधाभासों को सुलझाने की कोशिश करते हैं जो पेशेवर इतिहासकारों और पुरातत्वविदों, दोनों को उलझन में डालते आए हैं। यह तर्क देते हुए कि ऋग्वेद के ज़्यादातर हिस्से की रचना दक्षिण अफ़ग़ानिस्तान में (1700 ई.पू. के बाद), ऋग्वैदिक लोगों के पुन्जाल मैदान में प्रवेश करने और गंगा नदी के पूर्व की ओर जाने से भी बहुत पहले हुई, वे दावा करते हैं कि अपने प्रवसन के दौरान वे न सिर्फ अपने अनुष्ठान और भजन इत्यादि, बल्कि नदियों और स्थानों के नाम भी अपने साथ ले गए जिनका प्रयोग उन्होंने अपनी इच्छानुसार किया। हर कदम पर अपनी बात को तर्कों से प्रमाणित करते हुए एक वैज्ञानिक ने इस पुस्तक को ऐसी सरल और सुबोध शैली में लिखा है कि साधारण पाठक भी इसे रुचिपूर्वक पढ़ सकते हैं, इतिहासकारों, पुरातत्वशास्त्रियों और भारतविदों के लिए तो यह काम उल्लेखनीय रहा ही है।
Vishamta : Ek Punarvivechan
- Author Name:
Amartya Sen +1
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नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन की एक दार्शनिक रचना है—‘विषमता’। उनकी कई एक विश्व-प्रसिद्ध पुस्तकों के बीच इस रचना का शुमार उनकी सोच की कुंजी के बतौर होता है। निस्संदेह यह प्रोफेसर सेन की कुछ सर्वाधिक कठिन पुस्तकों में से भी एक है। कठिन यह इस अर्थ में नहीं है कि कोई लंबी-चौड़ी उलझी हुई लफ़्फ़ाज़ी इसमें की गई है, बल्कि इस अर्थ में कि स्वतंत्रता, समानता, विविधता आदि अवधारणाओं का प्रयोग यहाँ इतने व्यापक संदर्भों में हुआ है कि उनका आदी होने में किसी को भी काफी मेहनत करनी पड़ेगी। समानता और स्वतंत्रता के बीच का विवाद इस सदी का एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक विवाद रहा है। शीतयुद्ध के चार दशकों ने तो इसे विश्व राजनीति के केंद्रीय विवाद का ही रूप दे दिया था। इस पुस्तक में प्रोफेसर सेन इस विवाद की तह में जाते हैं। समानतावादियों और स्वतंत्रतावादियों के मतों का विश्लेषण करते हुए प्रोफेसर सेन यह सिद्ध करते हैं कि इन दोनों के बीच विवाद दरअसल इस बात पर है ही नहीं कि मनुष्यों के बीच समानता होनी चाहिए या नहीं। विवाद तो इस बात पर है कि मनुष्यों के बीच समानता किस चीज की होनी चाहिए। इस केंद्रीय प्रश्न ‘समानता किस चीज की?’ का जवाब खोजने के क्रम में प्रोफेसर सेन मनुष्यों के बीच मौजूद भारी विविधताओं को केंद्र में रखते हैं। अपंग व्यक्ति, गर्भवती स्त्री, कालाजार प्रभावित इलाकों में रहनेवाले आदिवासी या स्वेच्छया सारी सुख-सुविधाओं का त्याग कर जनता की सेवा करनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता–सभी उनकी नजर में रहते हैं और मनुष्य की किसी भी गढ़ी-गढ़ाई परिभाषा से वे ठोस रूपाकार वाले मनुष्यों का कुछ खास भला होते नहीं देखते। उनका केंद्रीकरण आमतौर पर भिन्न-भिन्न लक्ष्यों के लिए प्रयास करने की मानवीय स्वतंत्रता पर और खासतौर पर विविध मूल्यों को अर्जित करने की अलग-अलग व्यक्तियों के सामर्थ्य पर है। स्वतंत्रता और समानता को लेकर आपके विचार चाहे जो भी हों और प्रोफेसर सेन के विचारों से उनकी कोई संगति बैठती हो या न बैठती हो पर इसमें कोई संदेह नहीं कि इस विश्लेषण से गुजरने के बाद आपकी सोच का दायरा पहले से बढ़ चुका होगा।
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