Alava
(0)
₹
350
280 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
अलाव’ युवा संपादक हिमांशु द्विवेदी के लेखों, साक्षात्कारों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि एक निरंतर जागरूक और जलती हुई संवेदनाओं की समसामयिक प्रतिक्रियाओं का संगम भी है। हालाँकि संपादकीयों की भाषा एवं शैली सामान्यत: संतुलित, तार्किक तथा भावुकता से बचती हुई ठंडे चिंतन की भाषा होती है, लेकिन हिमांशु द्विवेदी के इन लेखों, संपादकीयों में तार्किकता एवं गहरे सरोकारों के साथ तीखी अभिव्यक्ति भी है। अभिव्यक्ति के इस तीखे, दो-टूकपन को तरुणाई की विशेषता कहा जा सकता है। प्रस्तुत संग्रह के लेखों में लेखक का प्रिय औजार है समसामयिक घटनाओं और व्यक्तित्वों को पौराणिक संदर्भों में देखने और प्रस्तुत करने की उनकी विशेषता। ‘अलाव’ में संकलित टिप्पणियाँ, जीवन-वृत्त, आलेख एवं साक्षात्कार सुधी पाठक के अंतस को गहरे तक स्पर्श कर पाएँगे, हमारा विश्वास है।
Read moreAbout the Book
अलाव’ युवा संपादक हिमांशु द्विवेदी के लेखों, साक्षात्कारों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि एक निरंतर जागरूक और जलती हुई संवेदनाओं की समसामयिक प्रतिक्रियाओं का संगम भी है। हालाँकि संपादकीयों की भाषा एवं शैली सामान्यत: संतुलित, तार्किक तथा भावुकता से बचती हुई ठंडे चिंतन की भाषा होती है, लेकिन हिमांशु द्विवेदी के इन लेखों, संपादकीयों में तार्किकता एवं गहरे सरोकारों के साथ तीखी अभिव्यक्ति भी है। अभिव्यक्ति के इस तीखे, दो-टूकपन को तरुणाई की विशेषता कहा जा सकता है। प्रस्तुत संग्रह के लेखों में लेखक का प्रिय औजार है समसामयिक घटनाओं और व्यक्तित्वों को पौराणिक संदर्भों में देखने और प्रस्तुत करने की उनकी विशेषता।
‘अलाव’ में संकलित टिप्पणियाँ, जीवन-वृत्त, आलेख एवं साक्षात्कार सुधी पाठक के अंतस को गहरे तक स्पर्श कर पाएँगे, हमारा विश्वास है।
Book Details
-
ISBN9789353220136
-
Pages180
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Bahaav
- Author Name:
Himanshu Dwivedi
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Selected Stories of Rabindranath Tagore
- Author Name:
Purnima Mazumdar
- Book Type:

- Description:
Rabindranath Tagore was a very accomplished poet endowed with supernatural powers of language and expression. He not only wrote poems and songs but also gave music to them. Besides poems, he also wrote essays, memoirs, plays, novels and short stories which were, and still are, appreciated by the old and the young alike. His short stories, which range from innocent, childlike stories like Kabuliwala to detective and social ones, occupy a prominent place in Bangla literature even today. We have tried to present here some of his famous short stories to the best of our ability. Some of these, like Kabuliwala and Samapti (Uphaar in Hindi), have even been made into films. We have tried to maintain the quality and original flavour of these evergreen stories and hope the readers will appreciate and enjoy them.
DAMN HISTORY
- Author Name:
Govind Mishra
- Book Type:

- Description:
What attracted me to Govind’s stories was a strange kind of innocence reflected there. The injured in the story – be it a person, a character or his/her feelings – about whom we don’t know much nor the author tells much, just the feeling of being injured... it comes out with such passion that is seldom seen in other story-writers.” So said Nirmal Verma about Govind Mishra’s short stories. Another prominent short story writer of Hindi, Shailesh Matiyani, opined – ‘Even though writing on both the worlds – the inner and the outer – Govind Mishra saved himself from the dangers of both realism and romanticism. That way, he comes to belong to the tradition of not so much Jainendra, Ajneya or Nirmal Verma but that of Premchand.’ Having created more than a thousand characters in his fiction, Govind Mishra’s portrayal extends from villages to towns, to cities, to metros, and even to foreign milieus. ‘Few writers have such a big range, ' said Srilal Shukla of Rag Darbari fame. ‘Damn History’ attempts to present in English for the first time, representative stories of the author, selected from more than fifteen collections of his short stories in Hindi, 1965 onwards.
Yeh Ram Kaun Hai?
- Author Name:
Neerja Madhav
- Book Type:

- Description:
एक तरफ एक विशाल भारतीय जन-समुदाय अयोध्या, काशी और मथुरा के मंदिरों को लेकर भावुक है, दूसरी तरफ सत्ताधारी वोट बटोरने के चक्कर में इन मंदिरों पर हुए बर्बर आक्रमण और ऐतिहासिक सत्य को सत्य कहने में भी हिचकिचा रहे हैं तथा अल्पसंख्यक हितों की रक्षा के नाम पर एक चोट को सहला-सहला कर कैंसर में बदल देना चाहते हैं। पड़ोसी देशों में पुनरुद्धार या विकास के नाम पर धड़ाधड़ राम, कृष्ण एवं शिव मंदिरों को ढहाया जा रहा है। शीतला माता मंदिर या ढाकेश्वरी माता के मंदिरों का स्थानांतरण किया गया है। ऐसा नहीं कि ये हमले आज ही हो रहें हैं। दरअसल इन हमलों का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। ईश्वर, अल्लाह और गॉड को एक ही परम सत्ता के भिन्न-भिन्न नाम माननेवाला हिंदू अपनी उदारता और विश्वास की व्यापकता के कारण बहुदेववादी भी है, मूर्तिपूजक भी है और साथ ही परम सत्ता की मनोरम अभिव्यक्ति प्रकृति को भी उसी का एक रूप मान पूजता है। यह हिंदू आचार-विचार की व्यापकता है। कण-कण में व्याप्त एक अव्यक्त सत्ता।... मंत्रों और ऋचाओं की ऊर्जा से संपूरित मंदिर और मंदिर क्षेत्र ध्वस्तीकरण अथवा आक्रमण की बारंबारता के बिंदु बने।’’ —इसी संग्रह से ललित निबंधों के माध्यम से जन-जन के हृदय में बसे राम को देखने, जानने और अनुभव करने का एक सर्वथा अनूठा प्रयोग है यह पुस्तक, जो हर आयु वर्ग के पाठकों को समान रूप से रुचिकर लगेगी।
Uth Jaag Musafir
- Author Name:
Viveki Rai
- Book Type:

- Description:
प्रस्तुत संकलन ‘उठ जाग मुसाफिर’ के ललित-निबंधों में पग-पग पर पाठकों को उल्लास-उमंग भरी शब्द-सुगंध का प्रसार मिलेगा, और वह भी वैचारिक छुअन के साथ। सृजित ललित-प्रसार अनुरंजन के साथ-साथ टूटते-बिखरते और सिमटते हताश जनों को जीने के प्रति आश्वस्त करता है। कसौटी है तृप्ति की, जो पाठकों को भरपूर रूप में मिलेगी। देश-काल और जीवन-दर्शन के साथ अपनी कृषि-संस्कृति, अपनी जमीन, गाँव-घर और इनसे जुड़े हुए पर्यावरणीय संदेश, संबंधित चिंतन-मंथन कृति को गंभीरता प्रदान करते हैं। आस्था, सकारात्मक भाव और सुलझाव रचनाओं के केंद्रीय भाव-तत्त्व हैं। इन्हीं के साथ चलकर लेखक अपने प्रिय गाँवों की विस्तार से सुधि लेता है। आकर्षण में विवश होकर पाठक को भी उसके साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलना पड़ता है। आप भी आमंत्रित हैं। विश्वास है कि पठनानंद से आपकी झोली भर जाएगी!
Pratinidhi Hindi-Nibandhkar
- Author Name:
Jyotishwar Mishra
- Book Type:

- Description:
प्रस्तुत पुस्तक 'प्रतिनिधि हिन्दी-निबन्धकार' इस भावना से प्रेरित होकर लिखी गयी है कि हिन्दी के प्रमुख निवन्धकारों की निबन्ध कला का समग्र परिचय एक ही स्थान पर उपलब्ध हो सके। यह पुस्तक प्रथम बार जनवरी, सन् 1975 में प्रकाशित हुई थी। कई संस्करणों के बाद अब पुस्तक के इस नये संस्करण में अनेक उल्लेखनीय नवीन निबन्धकारों को भी सम्मिलित कर लिया गया है। अन्तिम तीन निबन्धकारों- 'दिनकर', हरिशंकर परसाई तथा शरद जोशी का विवेचन डॉ. ज्योतीश्वर मिश्र द्वारा किया गया है। ग्रन्थ में बालकृष्ण भट्ट से लेकर शरद जोशी तक कुल 22 प्रतिनिधि हिन्दी निबन्धकारों और शैलीकारों को स्थान दिया गया है। प्रत्येक निबन्धकार के सम्पूर्ण निबन्ध साहित्य का परिचय, उसके निबन्धों का वर्गीकरण, निबन्धों में व्यक्त विचारधारा, निबन्ध-भाषा, विविध शैली-रूपों तथा निबन्ध साहित्य में उसके स्थान आदि का विवेचन किया गया है। निबन्धकारों के बारे में प्रतिष्ठित आलोचकों के मत भी यथास्थान उद्धृत हैं। आशा है निबन्ध साहित्य के अध्येता इस पुस्तक से लाभान्वित होंगे।
Shiksha Ke Samajik Sarokar
- Author Name:
Kedarnath Pandey
- Book Type:

- Description:
‘शिक्षा के सामाजिक सरोकार’ शिक्षा, शिक्षक, छात्र और विद्यालय पर केन्द्रित वैयक्तिक निबन्धों का संग्रह है। केदारनाथ पाण्डेय की यह पुस्तक साहित्य की कई विधाओं का आस्वाद देती है। यह संस्मरण भी है, यात्रा-वृत्तान्त भी और शिक्षा के सामाजिक सरोकारों का आख्यान भी। शिक्षा के क्षेत्र में एक शिक्षक द्वारा किए गए अभिनव प्रयासों का यह ऐसा वृत्तान्त है, जिसे छात्र, शिक्षक और अभिभावक सभी के लिए पढ़ना ज़रूरी है। केदारनाथ पाण्डेय की इस पुस्तक का मूल स्वर है—सबको शिक्षा, सबको काम। लेखक न सिर्फ़ बच्चों को पढ़ा-लिखा देखना चाहता है बल्कि आम जन के लिए न्याय भी चाहता है। लेखक किसानों के लिए ज़मीन, ग़रीबों के लिए घर और सभी के लिए आशाएँ चाहता है। वह सुन्दर भविष्य का सपना देखता है जो परम्परा और संस्कृति के बिना अधूरा है। समाज की कई कल्पनाएँ, योजनाएँ पुस्तक में स्थान पाती हैं। स्मृतियों को सहेजकर रखने में लेखक माहिर है और उसका यथेष्ट इस्तेमाल इस पुस्तक में किया गया है।
Rajyog
- Author Name:
Swami Vivekanand
- Book Type:

- Description:
योग विद्या के आचार्य कहते हैं कि धर्म का आधार पूर्वकालीन अनुभूतियाँ जरूर हैं, लेकिन धार्मिक होने के लिए इन अनुभूतियों से स्वयं गुजरना अनिवार्य है। सिर्फ कहे हुए का अनुकरण करके कोई धार्मिक नहीं हो सकता। धर्म के सत्यों का जब तक आप स्वयं अनुभव नहीं कर लेते तब तक धर्म की बात करना व्यर्थ है, और उसके नाम पर खून बहाना केवल हिंसा। योग ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हम उन अनुभूतियों को स्वयं अनुभूत और अर्जित कर सकते हैं। विवेकानन्द इसे एक व्यावहारिक और वैज्ञानिक प्रणाली मानते हैं। जिस तरह वैज्ञानिक बाह्य वस्तुओं पर परीक्षण करता है, उसी तरह योग का परीक्षण-स्थल मन है, और उसका साधन भी। यह पुस्तक राजयोग के सिद्धांतों को सरल और सहज भाषा में व्याख्यायित करती है। पुस्तक के पहले भाग में न्यूयॉर्क में छात्रों को योग की शिक्षा देने के लिए स्वामी विवेकानंद ने जो वक्तव्य दिए थे, वे संकलित हैं और दूसरे भाग में पतंजलि के योग सूत्र, उन सूत्रों के अर्थ और उन पर संक्षिप्त टीका शामिल है।
Gyanyog
- Author Name:
Swami Vivekanand
- Book Type:

- Description:
‘ज्ञानयोग’ में स्वामी विवेकानन्द के वेदान्त पर दिए गए विश्लेषणपरक भाषणों को संकलित किया गया है। इनमें कुछ भाषण लंदन में, कुछ अमेरिका में और कुछ अत्यत्र दिए गए थे। उनका मानना था कि व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में वेदान्त निर्णायक रूप में उपयोगी साबित हो सकता है; कि वह मनुष्य के अब तक किए गए चिन्तन का उच्चतम फल है, संसार की समस्त विचार-सरणियों को अन्ततः उसी में विलीन होना है। अत्यन्त सरल और सुगम भाषा में दिए गए इन वक्तव्यों में उन्होंने माया क्या है, मनुष्य का वास्तविक स्वरूप क्या है, माया और ईश्वर की अवधारणा का विकास किस प्रकार हुआ, संसार क्या है, आत्मा का स्वभाव क्या है, अमरत्व क्या है, आदि विषयों पर विचार किया है। विवेकानन्द के चिन्तन की विशेषता ये है कि दर्शन के गूढ़ प्रश्नों पर वे जो भी विचार करते हैं, उसे हमारे भौतिक और वर्तमान जीवन से जोड़ते हुए, उसकी रोशनी में व्याख्यायित करते हुए करते हैं, यह विशेषता इन आलेखों और वक्तव्यों में भी दृष्टिगोचर होती है।
Sangh, Rajneeti Aur Media
- Author Name:
Devendra Swarup
- Book Type:

- Description:
इस ग्रंथ में संगृहीत लेखों का एक भाग संघ की संघटन-साधना की सांस्कृतिक प्रेरणाओं और रचनात्मक प्रवृतियों के उजागर करताहै। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में संघ की कर्मशक्ति ने राष्ट्र-निर्माण के लिए नई संघटनात्मक रचनाएँ खड़ी की । श्रमिक, वनवासी, शिक्षा इत्यिदि क्षेत्रों के साथ-साथ राजनीति के क्षेत्र में भी संघ ने प्रवेश किया। संघ की प्रेरणओं और आदर्शें को स्पष्ट करने के लिए राजनीति के क्षेत्र में संघ के तीन प्रमुख कार्यकताओं यथा-स्व दीनदयाल उपाध्याय नानाजी देशमुख और अठल बिहारी वाजपेयी के अंतर्मन की कुछ झलकियाँ इस संग्रह में प्रस्तुत की जा रही हैं। संपूर्ण क्रांति और आपातकाल विराधी संघर्ष में संघ की रचनात्मक भुमिका के बावजूद संघ को सत्ता-राजनीति के प्रहारों से जूझना पड़ा, इसका समकालीन लेखा-जोखा भी यहाँ दिया गया है। आगे चलकर मीडिया की पूरी दृष्टि अयोध्या आंदोलन और भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक उत्कर्ष पर केंद्रित हो गई । मीडिया स्वयं ही संघ-विराधी राजनीतिक अभियान का हिस्सा बन गया। क्या सचमुच मीडिया में संघ के बारे में इतना अज्ञान था? क्या वह संघ की अभिनव कार्य-प्रणाली को समझने में पूरी तरह असमर्थ था? इस संग्रह के कई लेख मीडिया के संघ के प्रति पूर्वग्रह, अज्ञान और विद्वेष भाव की तथ्यात्मक मीमांसा प्रस्तुत करते हैं। ‘संघ, राजनीति और मीडिया’ में संगृहीत लेखों को स्वाधीन भारत के घटना प्रवाह पर एक रनिंग कमेंट्री कहा जा सकता है। —इस पुस्तक से
Kuchh Bola gaya, Kuchh Likha Gaya
- Author Name:
Subhah Mishra
- Book Type:

- Description:
इस पुस्तक में संगृहीत निबंध दरअसल पारंपरिक निबंधों की संरचना से विद्रोह करते हैं, खासकर ललित निबंधों की मृतप्राय देह से प्रेत जगाने की कोशिश तो ये बिल्कुल ही नहीं हैं। इन निबंधों के सहारे न सिर्फ हमारे समाज, संस्कृति और पूरे समय की पड़ताल की जितनी कोशिश है, उतनी ही उसे नए संदर्भों में देखने-परखने की ललक भी है। इस पुस्तक के अधिकांश निबंध आज के जीवन-यथार्थ को उसके समूचे अर्थ-संदर्भों में प्रकट करते हैं। साथ ही समय की जटिलता और उसकी व्याख्या की अनिवार्यता में संवाद की स्थिति भी निर्मित करने का ये विवेकपूर्ण साहस और प्रयास हैं। 1947 से लेकर आज तक सत्ता और उसके सलाहकारों की भूमिका में उतरे उतावले बुद्धिजीवियों ने इन सबको अप्रासंगिक घोषित करने के लिए भाषा के खिलवाड़ से संस्कृति को सत्ता का हिस्सा बनाने के लिए बहुत ही श्रम के साथ नए मुहावरे गढ़े। ये निबंध इन चालाकियों को भी अनावृत करते हैं। इन निबंधों को पढ़ना अपने समय से संवाद है। —भालचंद्र जोशी
Vichar Ka Kapda
- Author Name:
Anupam Mishra
- Book Type:

- Description:
‘‘क़ायदे से अनुपम मिश्र न लेखक थे, न पत्रकार। वे साफ़ माथे के एक आदमी थे जो हर हालत में माथा ऊँचा और साफ़ रखना चाहते थे। उनकी निराकांक्षा उनकी बुनियादी बेचैनियों को ढाँप नहीं पाती थी। ये बेचैनियाँ ही उन्हें कई बार ऐसे प्रसंगों, व्यक्तियों, घटनाओं, वृत्तियों को खुली नज़र देखने-समझने की ओर ले जाती थीं। उनकी संवेदना में ऐसी ऐन्द्रियता थी कि वे विचार का कपड़ा भी पहचान लेती थीं। कुल मिलाकर अनुपम मिश्र की अकाल मृत्यु के बाद शेष रह गई सामग्री में से किया गया यह संचयन हिन्दी में सहज, निर्मल और पारदर्शी, मानवीय गरमाहट से भरे गद्य का विरल उपहार है। हमें मरणोत्तर अनुपम मिश्र को उनकी भरी-पूरी जीवन्तता में प्रस्तुत करने में प्रसन्नता है।”
—अशोक वाजपेयी
Ardhanareeshwar
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description:
इस पुस्तक के निबन्ध अपने समय के दस्तावेज हैं जिनको पढ़ते दिनकर के वैचारिक-स्रोतों और सन्दर्भों से हम अवगत हो सकते हैं; और जान सकते हैं कि एक युगद्रष्टा साहित्यकार अपने जीवन में अपनी कलम के साथ किस द्वन्द्व-अन्तर्द्वन्द्व के साथ जीता रहा। ‘अर्धनारीश्वर’ दिनकर का वह निबन्ध-संग्रह हैं जिसमें समाज, साहित्य, राजनीति, स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता, अन्तरराष्ट्रीयता, धर्म, विज्ञान के साथ-साथ लेखकों, चिन्तकों, मनीषियों, राजनेताओं के कृतित्व और व्यक्तित्व से जुड़े अनेक पहलुओं का व्यापक परिप्रेक्ष्य में गम्भीरता से आकलन किया गया है और तर्क-सम्मत निष्कर्ष निकाले गए हैं। इस संग्रह का नाम ‘अर्धनारीश्वर’ क्यों रखा गया, इसके बारे में स्वयं लेखक का कहना है कि, '“इसमें ऐसे भी निबन्ध हैं जो मन-बहलाव में लिखे जाने के कारण कविता की चौहद्दी के पास पड़ते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिनमें बौद्धिक चिन्तन या विश्लेषण प्रधान है। इसीलिए मैंने इस संग्रह का नाम ‘अर्धनारीश्वर’ रखा है, यद्यपि इसमें अनुपातत: नरत्व अधिक और नारीत्व कम है।” अतएव स्पष्ट है कि राष्ट्रकवि दिनकर की कविताएँ जिन्हें पसन्द हैं, उन्हें ये निबन्ध भी उनकी सोच-संवेदना के बेहद करीब लगेंगे।
Hindi Nibandh
- Author Name:
Vinod Tiwari
- Book Type:

- Description:
यूजीसी (नेट/जेआरएफ) पाठ्यक्रम पर आधारित हिंदी निबंधों का संग्रह|
Kaha-Suni
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description:
‘इस किताब में दूधनाथ सिंह के चार साक्षात्कार और चार आलोचनात्मक निबन्ध संकलित हैं। साक्षात्कार एक तरह का विशिष्ट शास्त्रार्थ होता है। प्रश्नों के आलोक में यह शास्त्रार्थ लेखक तरह-तरह से करता है। कभी आत्म-मन्थन, आत्म-प्रकाश, कभी अपने समय, समाज, इतिहास, साहित्य, कला आदि पर टिप्पणियाँ और प्रतिक्रियाएँ, कभी मतभेद-सहमति और सौमनस्य, कभी अपनी क्षुब्धता, उदासी या ख़ुशी का इज़हार, कभी अपनी ही आस्थाओं पर प्रश्नचिह्न, कभी कलह, वैमनस्य और फिर प्रेम; कभी गहन विश्लेषण और आत्म-स्वीकृति—एक अच्छे साक्षात्कार में एक कलाकार के विविधवर्णी छटाओं वाले रूप के दर्शन पाठक को होते हैं। इस तरह ‘साक्षात्कार’ तर्क-वितर्क की असमंजसपूर्ण, वक्र भाषा में लिपटा हुआ कलाकार के औचक पकड़े गए चिन्तन का निचोड़ है, एक नए क़िस्म का भाष्य है, आलोचना का एक खिलंदरा राग है। ‘कहा-सुनी’ के चारों आलोचनात्मक निबन्ध लेखक के उपर्युक्त साक्षात्कारों के शास्त्रार्थों का ही फैलाव और वितान हैं। बातों और विचारों की अन्तिम तर्क-सिद्धि, परिणति और समापन हैं। फिर भी आलोचना की विधागत माँग के कारण उनमें तटस्थ और निर्वैयक्तिक विश्लेषण, तर्क-वितर्क के आघात-प्रतिघात, नियमन-अनुशासन यहाँ अधिक हैं। आशा है, यह किताब एक नए बौद्धिक आस्वाद के साथ पढ़ी-गुनी जाएगी।
Zindagi Ki Kitab (A To Z)
- Author Name:
Kalpana Kaushik
- Book Type:

- Description:
पस्तुत पुस्तक में उदीयमान लेखिका के 26 ललित निबंध हैं, जो विभिन्न मानवीय मनोभावों/प्रवृत्तियों पर आधारित हैं। लेखिका ने अपने निबंधों को अंग्रेजी वर्णमाला की ध्वनि के अनुसार अपने लेखों को संयोजित किया है। भरोसा, चतुराई, धैर्य, इच्छाशक्ति, उत्साह, वचनबाध्यता, जुझारूपन, ईमानदारी, करुणा, मंथन, जिंदादिली, संस्कार आदि गुण जहाँ मनुष्य का निर्माण करते हैं, वहीं आशा, हँसी-मजाक, लालसा, जिज्ञासा, उत्साह उसके दैनंदिन व्यवहार का अभिन्न अंग हैं। लेखिका ने शुष्क एवं क्लिष्ट विषयों को रोचक रूप में प्रस्तुत किया और इसके लिए रोचक संस्मरणों की सहायता ली है, ताकि विषय स्पष्ट हो सके और बोझिलता कम हो। जिंदगी में जिंदादिली और खुशी का मार्ग दिखानेवाली एक पठनीय पुस्तक।
Bhasha Ki Khadi
- Author Name:
Om Nishchal
- Book Type:

- Description:
भाषा अभिव्यक्ति का आयुध है, जिसके बिना हम न तो सार्थक बातचीत कर सकते हैं, न लिख-पढ़ सकते हैं। हिंदी-हिंदुस्तानी जिसकी नींव कभी महात्मा गांधी ने रखी, जिसे देश भर में प्रचारित-प्रसारित किया, स्वराज पाने का अचूक हथियार बनाया, वह भारत की राजभाषा बनने के बावजूद अपने हक से वंचित रही है। अरसे तक औपनिवेशिक गुलामी ने हमारे मनोविज्ञान को ऐसी भाषाई ग्र्रंथियों से भर दिया है, जिसमें हमने आजादी के बाद धीरे-धीरे अंग्रेजियत ओढ़ ली और भारतीय भाषाओं समेत हिंदी-हिंदुस्तानी से एक दूरी बनानी शुरू कर दी। किंतु जब-जब हम में राष्ट्रप्रेम जागता है, हम स्वराज्य, हिंदी-हिंदुस्तानी व भारतीय संस्कृति के पन्ने उलटने लगते हैं। कहना न होगा कि भारतीय भाषाओं के बीच पुल बनाने वाली हिंदी आज देश में ही नहीं, पूरे विश्व में किसी-न-किसी रूप में बोली व समझी जाती है। एक बड़ा भौगोलिक क्षेत्रफल हिंदीभाषियों का है, जो देश-देशांतर में फैला है। प्रवासी भारतवंशियों का समुदाय भी हिंदी का हितैषी रहा है तथा इस समुदाय ने विभिन्न देशों में न केवल भाषा का वाचिक स्वरूप बचाकर रखा है, भारतीय संस्कृति के ताने-बाने को भी सुरक्षित व संवर्धित किया है। ‘भाषा की खादी’ जहाँ हिंदी-हिंदुस्तानी के सहज स्वरूप की बात करती है, वहीं संस्कृति के उन धागों के बारे में भी बतियाती है, जिनसे हमारे पर्वों, त्योहारों, बसंत, फागुन व प्रणय के मौसमी अहसासों के ताने-बाने जुड़े हैं। नए बौर की गंध से मह-मह करता फागुन कभी-कभी शब्दों की पालकी पर आरूढ़ होकर आता है। ‘भाषा की खादी’ में यह मह-मह और मंद-मंद बहती पुरवैया के झकोरों की गूँज सुनाई देगी, इसमें संदेह नहीं।
Bharatiya Shiksha
- Author Name:
Rajendra Prasad
- Book Type:

- Description:
‘भारतीय शिक्षा’ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के शिक्षा-सम्बन्धी भाषणों का संकलन है। समय-समय पर दिये गए इन भाषणों का अपना अलग महत्त्व है लेकिन इस पुस्तक में एक साथ उनकी प्रस्तुति से जानने में मदद मिलती है कि एक राष्ट्रनिर्माता के रूप में राजेन्द्र बाबू, देश की शिक्षा-व्यवस्था को किस रूप में देखने के आकांक्षी थे और शिक्षा मात्र के बारे में उनके विचार और अनुभव क्या थे। मसलन, भारत को अपने लिए कैसी शिक्षा-व्यवस्था बनानी चाहिए, शिक्षा का माध्यम क्या होना चाहिए, नारी शिक्षा कैसी होनी चाहिए और वह क्यों आवश्यक है, शिक्षा में विज्ञान का क्या महत्त्व है आदि-आदि। यही नहीं, वे विद्यार्थियों के अधिकारों और कर्तव्यों का तथा विद्यार्थी और राजनीति के पारस्परिक रिश्ते का जिक्र भी करते हैं। कहना न होगा कि देश के प्रथम राष्ट्रपति की लेखनी से निकले ये शब्द किसी भी सुधी पाठक को प्रेरित करने वाले है।
Gandhi Aur Kala Tatha Anya Nibandh
- Author Name:
Raman Sinha
- Book Type:

- Description:
भारतीय कलाओं, उनकी परम्पराओं और भाव-पक्ष पर सुनियोजित ढंग से विचार करने वाली ‘गांधी और कला तथा अन्य निबन्ध’ पुस्तक डॉ. रमण सिन्हा के समय-समय पर लिखे गए निबन्धों और व्याख्यानों का संकलन है। ‘गांधी और कला’ शीर्षक सुदीर्घ निबन्ध इसकी विशेष उपलब्धि है जिसमें कलाओं को लेकर गांधी की दृष्टि और विभिन्न कलाओं में गांधी व उनके विचारों के अंकन को अलग-अलग कोणों से देखा गया है। कलाओं की आन्तरिक परस्परता को भारतीय कला-दृष्टि की विशिष्टता बताते हुए यह पुस्तक उन कला-रूढ़ियों को भी रेखांकित करती चलती है जो वक़्त-वक़्त पर विदेशी लोगों के आगमन के साथ भारत की कला-धारा में समाहित होती रहीं, और उसे नया रूप देती रहीं। मध्यकालीन भारतीय कला और संस्कृति पर विचार करते हुए लेखक कहते हैं कि भारतीय चित्रकला के इतिहास में मुग़ल शैली का उद्भव एक युगान्तरकारी घटना सिद्ध हुई, जिसमें दो संस्कृतियों ने एक-दूसरे के साथ आदान-प्रदान का सम्बन्ध कायम किया तथा देशी का विदेशी के साथ व परम्परा का नवाचार के साथ संवाद बना। ‘तुलसीदास का प्रतिमा-निरूपण’, ‘कविता और राग’ तथा ‘हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत : लौकिक या पारलौकिक?’ आदि निबन्धों के अलावा अभिनय के माध्यम से अपने आत्म का अन्वेषण करनेवाले फ़िल्मकार ऋतुपर्ण घोष पर केद्रित एक आलेख भी इसमें शामिल है जो इस कला-विवेचन को हमारे आज के कला-बोध से जोड़ता है।
Basant Aa Gaya Par Koi Utkantha Nahin
- Author Name:
Vidhyaniwas Mishra
- Book Type:

- Description:
बसन्त आ गया पर कोई उत्कण्ठा नहीं निबंध मन की जिस तरंगायित अभिव्यक्ति का नाम है, श्री विद्यानिवास मिश्र के ये निबंध अत्यन्त सच्चाई और सूक्ष्मता के साथ इसका प्रतिनिधित्व करते हैं। पं. रामचन्द्र शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के बाद हिन्दी निबंध को लोक तत्त्व और परम्परा की गहन अनुभूति से समृद्ध करने वाला तीसरा नाम पं. विद्यानिवास मिश्र का ही है। इन निबंधों में विषय तो मात्र एक 'बहाना' है। उस बहाने से निबंधकार आधुनिक जीवन की भीतरी विसंगतियों को बड़ी सूक्ष्मता से उजागर करता है। उसकी भाषा लोकोन्मुखी होने के साथ-ही-साथ संस्कृत और पाश्चात्य साहित्य के गहरे अध्ययन से अत्यन्त काव्यमयी हो उठी है। भाषा की इस काव्यमयता के भीतर ही जीवन के वे छलछलाते प्रसंग छिपे हैं जो बार-बार निबंधकार को एक 'मुक्त आवेश' की सृष्टि करने को विवश करते हैं। लेखक के व्यक्तित्व और अभिव्यक्ति से सन्निहित यह 'मुक्त आवेश' ही उनके निबंधों को उस नैतिक अनुशासन से समृद्ध करता है जो हर आधुनिक लेखन की पहली शर्त है। आधुनिक हिन्दी साहित्य में जब गद्य की अन्य विधायें आज अधिक प्रमुख और महत्त्वपूर्ण मानी जाने लगी हैं, यह निबंध-संग्रह निबंध-विधा को पुनरुज्जीवित करने का एक महत्त्वपूर्ण और सफल प्रयास है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book