Ardhanareeshwar
(0)
Author:
Ramdhari Singh DinkarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
299
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इस पुस्तक के निबन्ध अपने समय के दस्तावेज हैं जिनको पढ़ते दिनकर के वैचारिक-स्रोतों और सन्दर्भों से हम अवगत हो सकते हैं; और जान सकते हैं कि एक युगद्रष्टा साहित्यकार अपने जीवन में अपनी कलम के साथ किस द्वन्द्व-अन्तर्द्वन्द्व के साथ जीता रहा। ‘अर्धनारीश्वर’ दिनकर का वह निबन्ध-संग्रह हैं जिसमें समाज, साहित्य, राजनीति, स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता, अन्तरराष्ट्रीयता, धर्म, विज्ञान के साथ-साथ लेखकों, चिन्तकों, मनीषियों, राजनेताओं के कृतित्व और व्यक्तित्व से जुड़े अनेक पहलुओं का व्यापक परिप्रेक्ष्य में गम्भीरता से आकलन किया गया है और तर्क-सम्मत निष्कर्ष निकाले गए हैं। इस संग्रह का नाम ‘अर्धनारीश्वर’ क्यों रखा गया, इसके बारे में स्वयं लेखक का कहना है कि, '“इसमें ऐसे भी निबन्ध हैं जो मन-बहलाव में लिखे जाने के कारण कविता की चौहद्दी के पास पड़ते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिनमें बौद्धिक चिन्तन या विश्लेषण प्रधान है। इसीलिए मैंने इस संग्रह का नाम ‘अर्धनारीश्वर’ रखा है, यद्यपि इसमें अनुपातत: नरत्व अधिक और नारीत्व कम है।” अतएव स्पष्ट है कि राष्ट्रकवि दिनकर की कविताएँ जिन्हें पसन्द हैं, उन्हें ये निबन्ध भी उनकी सोच-संवेदना के बेहद करीब लगेंगे।
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इस पुस्तक के निबन्ध अपने समय के दस्तावेज हैं जिनको पढ़ते दिनकर के वैचारिक-स्रोतों और सन्दर्भों से हम अवगत हो सकते हैं; और जान सकते हैं कि एक युगद्रष्टा साहित्यकार अपने जीवन में अपनी कलम के साथ किस द्वन्द्व-अन्तर्द्वन्द्व के साथ जीता रहा। ‘अर्धनारीश्वर’ दिनकर का वह निबन्ध-संग्रह हैं जिसमें समाज, साहित्य, राजनीति, स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता, अन्तरराष्ट्रीयता, धर्म, विज्ञान के साथ-साथ लेखकों, चिन्तकों, मनीषियों, राजनेताओं के कृतित्व और व्यक्तित्व से जुड़े अनेक पहलुओं का व्यापक परिप्रेक्ष्य में गम्भीरता से आकलन किया गया है और तर्क-सम्मत निष्कर्ष निकाले गए हैं। इस संग्रह का नाम ‘अर्धनारीश्वर’ क्यों रखा गया, इसके बारे में स्वयं लेखक का कहना है कि, '“इसमें ऐसे भी निबन्ध हैं जो मन-बहलाव में लिखे जाने के कारण कविता की चौहद्दी के पास पड़ते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिनमें बौद्धिक चिन्तन या विश्लेषण प्रधान है। इसीलिए मैंने इस संग्रह का नाम ‘अर्धनारीश्वर’ रखा है, यद्यपि इसमें अनुपातत: नरत्व अधिक और नारीत्व कम है।” अतएव स्पष्ट है कि राष्ट्रकवि दिनकर की कविताएँ जिन्हें पसन्द हैं, उन्हें ये निबन्ध भी उनकी सोच-संवेदना के बेहद करीब लगेंगे।
Book Details
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ISBN9789390625352
-
Pages224
-
Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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चिन्तामणि का यह तीसरा भाग आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अब तक असंकलित ऐसे इक्कीस निबन्धों का अनूठा संग्रह है जो पुरानी पत्रिकाओं में बिखरे रहने और अप्राप्य पुस्तकों की भूमिका के रूप में प्रकाशित होने के कारण प्राय: दुर्लभ रहे हैं। इन निबन्धों में गोरखपुर के ‘स्वदेश’ में प्रकाशित ‘क्षात्रधर्म का सौन्दर्य’ और ‘प्रेमा’ में प्रकाशित ‘प्रेम आनन्द–स्वरूप है’ ऐसे निबन्ध हैं जिनकी जानकारी भी लोगों को नहीं है। ‘हंस’ के आत्मकथा अंक में प्रकाशित ‘प्रेमघन की छाया स्मृति’ भी ऐसा ही निबन्ध है जो लगभग अचर्चित रहा है, जबकि आचार्य के आरम्भिक जीवन की झाँकी के लिए वह अनमोल दस्तावेज़ है। ‘साहित्य’ और ‘उपन्यास’ शीर्षक आरम्भिक निबन्धों से जहाँ शुक्ल जी के एतद्विषयक अनुपलब्ध विचार पहली बार प्रकाश में आते हैं, वहाँ 1909 की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘कविता क्या है’ इसी शीर्षक के सर्वविदित परवर्ती निबन्ध के प्रथम प्रारूप की हैसियत से ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। इसी प्रकार ‘कल्पना का आनन्द’ यद्यपि हाईस्कूल के एक छात्र का अनुवाद है, फिर भी आचार्य शुक्ल के ‘काव्य में प्राकृतिक दृश्य’ तथा ‘रसात्मक बोध के विविध रूप’ जैसे प्रौढ़ निबन्धों के लिए वह नींव का पत्थर है।
भूमिकाओं में यदि ‘विश्व प्रपंच’ की भूमिका आचार्य शुक्ल के जीवन–दर्शन के वैज्ञानिक पक्ष को जानने के लिए अनिवार्य दस्तावेज़ है तो ‘शेष स्मृतियाँ’ की ‘प्रवेशिका’ उनकी ऐतिहासिक अनुसन्धान में रुचि तथा गति के लिए। साहित्य–चिन्तक शुक्ल जी हिन्दी भाषा—मुख्यत: काव्यभाषा की भाषावैज्ञानिक तथा व्याकरणिक समस्याओं में कितनी अन्तर्दृष्टि रखते थे, इसका प्रमाण है ‘बुद्धचरित की भूमिका’ में ब्रजभाषा, अवधी और खड़ी बोली के स्वरूप का व्यतिरेकी विश्लेषण। इन भूमिकाओं के अतिरिक्त दो ऐतिहासिक भाषण भी संकलित हैं जिनसे आचार्य के व्यक्तित्व का एक नया पक्ष सामने आता है। इस प्रकार यह पुस्तक एक चिरकांक्षित आवश्यकता की पूर्ति का सारस्वत प्रयास है, जिसके महत्त्व का आभास सम्पादक की शोधपूर्ण भूमिका से हो सकता है।
Naye Sahitya Ka Saundarya Shastra
- Author Name:
Gajanan Madhav Muktibodh
- Book Type:

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Description:
हिन्दी कविता की धारा में गजानन माधव मुक्तिबोध का हस्तक्षेप जितना निर्णायक रहा, उतनी ही महत्त्वपूर्ण भूमिका आलोचना के पैमानों को तय करने में भी उनकी रही। ‘नये साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ में संकलित आलेखों से आगे के आलोचकों को न सिर्फ़ कविता और साहित्य को समझने की दृष्टि प्राप्त हुई, बल्कि कवियों और रचनाकारों को भी मुक्तिबोध के चिन्तन से एक नया ‘विज़न’ मिला।
‘जनता का साहित्य किसे कहते हैं?’ शीर्षक आलेख में मुक्तिबोध जनधर्मी साहित्य की परिभाषा देते हुए कहते हैं : ‘जनता का साहित्य’ का अर्थ जनता को तुरन्त ही समझ में आनेवाले साहित्य से हरगिज़ नहीं। अगर ऐसा होता तो क़िस्सा तोता-मैना और नौटंकी ही साहित्य के प्रधान रूप होते। साहित्य के अन्दर सांस्कृतिक भाव होते हैं। सांस्कृतिक भावों को ग्रहण करने के लिए, बुलन्दी, बारीकी और ख़ूबसूरती को पहचानने के लिए, उस असलियत को पाने के लिए जिसका नक़्शा साहित्य में रहता है, सुनने या पढ़नेवाले की कुछ स्थिति अपेक्षित होती है। वह स्थिति है उसकी शिक्षा, उसके मन का सांस्कृतिक परिष्कार।...‘जनता का साहित्य’ का अर्थ ‘जनता के लिए साहित्य’ से है।...ऐसा साहित्य जो जनता के जीवन-मूल्यों को, जनता के जीवनादर्शों को प्रतिष्ठापित करता हो, उसे अपने मुक्तिपथ पर अग्रसर करता हो।’
इसी प्रकार साहित्य, साहित्य की प्रासंगिकता, रचना-प्रक्रिया, प्रयोगवादी और नई कविता की प्रकृति, रचना की आवश्यकता और साहित्य के मार्क्सवादी पहलू पर मुक्तिबोध ने नितान्त मौलिक और वस्तुनिष्ठ नज़रिए से विचार किया है।
Mahadevi "Doodhnath Singh"
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description: यह किताब महादेवी की लिखत-पढ़त, उनके चित्रों-रेखांकनों, उनके जीवन-वृत्त और उनके बारे में लेखक की संस्कृतियों के भीतर से उनको समझने की एक निजी कोशिश है। लेखक की निजी संस्मृतियाँ भी महादेवी के कर्तृत्व को व्याख्यायित करने और उसके सारतत्त्व तक पहुँचने की बुनियाद के बतौर हैं। महादेवी का संसार जितना अन्तरंग है, उतना ही बहिरंग। अन्तरंग में दीपक की खोज है और बहिरंग के कुरूप-काले संसार में सूरज की एक किरण की। महादेवी के सम्पूर्ण कृतित्व में अद्भुत संघर्ष है और पराजय कहीं नहीं। इस किताब का हर शीर्षक एक नया अध्याय है और इसका शिल्प आलोचना के क्षेत्र में एक नई सूझ। साहित्य की अन्य विधाओं की तरह ही आलोचना की पठनीयता भी ज़रूरी है। दरअसल किसी कविता, कला, कथा, विचार या लेखक के प्रति सहज उत्सुकता जगाना और उसे समझने का मार्ग प्रशस्त करना ही आलोचना का उद्देश्य है। और यह किताब यही काम करती है। महादेवी के रचनात्मक विवेक को जानने के लिए यह किताब एक समानान्तर रूपक की तरह है। उनकी कविता, गद्य और उनकी चित्र-वीथी—तीनों मिलकर ही महादेवी के सौन्दर्यशास्त्र का चेहरा निर्मित करते हैं। यह किताब इसी चेहरे का दर्शन-दिग्दर्शन है।
Kavya Ki Aatma Aur Aatmiyakaran
- Author Name:
Rameshraaj
- Rating:
- Book Type:

- Description: यह पुस्तक गहन अध्ययन, चिंतन, मनन के उपरांत ठोस प्रमाणों और वैज्ञानिक समझ का समावेश करते हुए लिखी गई है। रागात्मक चेतना को काव्य की आत्मा सिद्ध करते हुए संस्कृत काल से चली आ रही रस, ध्वनि, अलंकार , औचित्य, रीति, सात्विक बुद्धि की काव्य के संदर्भ में इनके आत्मा होने के अस्तित्व मान्यताओं को खारिज कर, यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि इन सबको आलोकित करने वाला एक ही प्राण तत्त्व है - रागात्मक चेतना। यही सच्चे अर्थों में काव्य की आत्मा है। इसी रागात्मक चेतना से रस, ध्वनि, अलंकार, औचित्य, रीति आदि की सत्ता प्रकाशमय होती है। इसी रागात्मक चेतना को आधार बनाकर अति प्राचीन और वर्तमान समय तक सर्वमान्य सिद्धांत साधारणीकरण को असत्य सिद्ध किया है। इस नाते पुस्तक - काव्य की आत्मा और आत्मीयकरण एक शोधपूर्ण वैज्ञानिक प्रमाणों से युक्त अद्भुत, मौलिक, और सुधी शोध कर्त्ताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण कृति है।
Hindi Upanyas Aur Astitvavad
- Author Name:
Veenu Bhalla
- Book Type:

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Description:
अस्तित्ववादी चिंतकों ने बताया कि हमारे प्रत्येक सत्य और प्रत्येक कर्म में मानवीय संदर्भ और मानवीय आत्मपरकता निहित होती है तथा राज्यसत्ता, नौकरशाही, राजनीतिक दल—सभी निर्वैयक्तिक शक्तियाँ इस मानवीय आत्मपरकता को प्रतिबंधित करती रहती हैं।
अस्तित्ववाद ने इस बात पर बल दिया कि यथार्थ और अयथार्थ, आवश्यक और अनावश्यक के अंतर को समझने के लिए व्यक्ति और उसकी आत्मपरकता को प्राथमिकता देने से ही उसके चारों ओर फैली विसंगतियों को कम किया जा सकता है।
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यासों को आलोचकों ने कुंठा, घुटन और अनगढ़ प्रतीक योजनाओं के कारण अस्तित्ववादी उपन्यास की संज्ञा से अभिहित किया है। हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में इस विषय से संबंधित जो शोध हुए हैं उनमें परीक्षण और जाँच कम, स्थापनाएँ अधिक हुई हैं। अस्तित्ववाद के प्रभाव को मानकर चलनेवाले लोगों ने संभवतः इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि हिंदी साहित्य की विधाओं में जो सिचुएशंस दिखाई पड़ती हैं वह अस्तित्ववाद के प्रभाव के कारण हैं अथवा बदलते हुए परिवेश के कारण।
यह पुस्तक अस्तित्ववादी विचारधारा की मूलचेतना 'अस्तित्व' की महत्त्वपूर्ण प्रवृत्तियों के सैद्धांतिक विवेचन की अपेक्षा उसकी सिचुएंशस (स्थितियों) के आधार पर कुछ महत्त्वपूर्ण हिंदी उपन्यासों की विवेचना का प्रयास है।
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