Mahila Rachnakaron Ki Pravasi Hindi Kahaniyan

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प्रवासी हिन्दी साहित्य का इतिहास पुराना नहीं है। 20वीं शताब्दी के मध्य से प्रवासी साहित्य का आरम्भ माना जाता है। वैसे देखा जाए तो विभिन्न भारतीय वंश के लोग पूर्व में भी विदेशों में गए थे पर उनका उद्देश्य पर्यटन, तीर्थाटन या व्यापार करना मात्र था। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित होने के बाद मज़दूर के रूप में अनेक भारतीयों को सुखद सपने दिखाकर धोखे से जहाज़ों में भरकर विदेशों में ले जाया गया। जहाँ उन्हें बँधुआ मज़दूर के रूप में काम करना पड़ता था। उन्हें अनेक दुखों को सहते हुए नारकीय जीवन जीना पड़ता था। दुखों से मुक्ति पाने तथा श्रम परिहार हेतु वे सभी मज़दूर रामायण, हनुमान चालीसा आदि धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हुए अपने मन को सान्त्वना देते थे। अपने मन के भावों को अभिव्यक्त करने हेतु गीतों, लोकगीतों आदि का मौखिक गान होता था। उनके यही गीत मौखिक साहित्य बने। समयोपरान्त अपनी पीड़ा, दुख को उन्होंने लिखना शुरू किया। कालान्तर में यह साहित्य 'गिरमिटिया हिन्दी साहित्य' के रूप में जाना जाने लगा। सम्पूर्ण प्रवासी हिन्दी साहित्य का अवलोकन करें तो यह बात स्पष्ट दिखाई देती है कि प्रवासी साहित्य की बागडोर महिला रचनाकारों के हाथों में है। इन रचनाकारों की रचनाशीलता ने हिन्दी साहित्य के परिदृश्य को विस्तृत किया है। प्रवासी हिन्दी साहित्य का फ़लक आज काफ़ी विस्तारित हो चुका है।

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5 hrs
Age
18+ yrs
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प्रवासी हिन्दी साहित्य का इतिहास पुराना नहीं है। 20वीं शताब्दी के मध्य से प्रवासी साहित्य का आरम्भ माना जाता है। वैसे देखा जाए तो विभिन्न भारतीय वंश के लोग पूर्व में भी विदेशों में गए थे पर उनका उद्देश्य पर्यटन, तीर्थाटन या व्यापार करना मात्र था। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित होने के बाद मज़दूर के रूप में अनेक भारतीयों को सुखद सपने दिखाकर धोखे से जहाज़ों में भरकर विदेशों में ले जाया गया। जहाँ उन्हें बँधुआ मज़दूर के रूप में काम करना पड़ता था। उन्हें अनेक दुखों को सहते हुए नारकीय जीवन जीना पड़ता था। दुखों से मुक्ति पाने तथा श्रम परिहार हेतु वे सभी मज़दूर रामायण, हनुमान चालीसा आदि धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हुए अपने मन को सान्त्वना देते थे। अपने मन के भावों को अभिव्यक्त करने हेतु गीतों, लोकगीतों आदि का मौखिक गान होता था। उनके यही गीत मौखिक साहित्य बने। समयोपरान्त अपनी पीड़ा, दुख को उन्होंने लिखना शुरू किया। कालान्तर में यह साहित्य 'गिरमिटिया हिन्दी साहित्य' के रूप में जाना जाने लगा।
सम्पूर्ण प्रवासी हिन्दी साहित्य का अवलोकन करें तो यह बात स्पष्ट दिखाई देती है कि प्रवासी साहित्य की बागडोर महिला रचनाकारों के हाथों में है। इन रचनाकारों की रचनाशीलता ने हिन्दी साहित्य के परिदृश्य को विस्तृत किया है। प्रवासी हिन्दी साहित्य का फ़लक आज काफ़ी विस्तारित हो चुका है।

Book Details

  • ISBN
    9789377475024
  • Pages
    152
  • Avg Reading Time
    5 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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