Gapodi se Gapshap : Kashinath Singh se Samvad
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‘गपोड़ी से गपशप’ विख्यात कथाकार काशीनाथ सिंह के साक्षात्कारों का संकलन है। विविध विधाओं में रचने के बाद भी बहुत कुछ ऐसा है जो अनकहा रह जाता है। कई बार जब लेखक प्रश्नों से घिरता है अथवा जब प्रश्न-प्रतिप्रश्न की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है तब वह अनकहा व्यक्त होने लगता है। प्रस्तुत पुस्तक के सम्पादक पल्लव के अनुसार—कथाकार की बातें कैसी होती हैं? अलबत्ता इससे भी पहले यह पूछना चाहिए कि क्या है जो कहने से रह गया? काशीनाथ सिंह से की गई बातचीतों को सँजोते हुए इन सवालों का उभरना अस्वाभाविक तो नहीं है। कहना चाहिए कि ये बातचीतें बहुधा उनके पाठकों, प्रशंसकों या उनके साहित्य में दिलचस्पी रखनेवाले जिज्ञासुओं के कारण सम्भव हुई। इन बातचीतों का समय भी बहुत व्यापक है। लगभग तीस सालों का सफ़र पूरा करतीं ये मुलाक़ातें अपने स्वभाव में आत्मीय गपशप हैं। लेखक का संकोच और प्रश्नकर्ता की तमाम जिज्ञासाएँ मिलकर बातचीत को उत्तेजक नहीं बनातीं, न ही ये कथाकार के श्रीमुख से निकले आप्त-वचनों का सुसंकलन बन रही हैं। अपितु संशय, आत्मालोचना और जनतांत्रिकता इन संवादों को पठनीय बनाते हैं। लेखक इनमें औपचारिक होने से बचता है और जो कहा है सीधे-बेलाग। पाठक जानते हैं कि काशीनाथ सिंह विचारों को व्यक्त करते समय ‘भाषा को दरेरा’ देते रहते हैं। यही कारण है कि विभिन्न विषयों पर उनकी टिप्पणियाँ व्यापक विमर्शों का आधार बनती रही हैं। यह भी कि इन साक्षात्कारों से गुज़रने के बाद काशीनाथ सिंह के व्यक्तित्व-कृतित्व के प्रति पाठक का दृष्टिकोण संशोधित-परिष्कृत होता है।
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‘गपोड़ी से गपशप’ विख्यात कथाकार काशीनाथ सिंह के साक्षात्कारों का संकलन है।
विविध विधाओं में रचने के बाद भी बहुत कुछ ऐसा है जो अनकहा रह जाता है। कई बार जब लेखक प्रश्नों से घिरता है अथवा जब प्रश्न-प्रतिप्रश्न की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है तब वह अनकहा व्यक्त होने लगता है। प्रस्तुत पुस्तक के सम्पादक पल्लव के अनुसार—कथाकार की बातें कैसी होती हैं? अलबत्ता इससे भी पहले यह पूछना चाहिए कि क्या है जो कहने से रह गया?
काशीनाथ सिंह से की गई बातचीतों को सँजोते हुए इन सवालों का उभरना अस्वाभाविक तो नहीं है। कहना चाहिए कि ये बातचीतें बहुधा उनके पाठकों, प्रशंसकों या उनके साहित्य में दिलचस्पी रखनेवाले जिज्ञासुओं के कारण सम्भव हुई। इन बातचीतों का समय भी बहुत व्यापक है। लगभग तीस सालों का सफ़र पूरा करतीं ये मुलाक़ातें अपने स्वभाव में आत्मीय गपशप हैं। लेखक का संकोच और प्रश्नकर्ता की तमाम जिज्ञासाएँ मिलकर बातचीत को उत्तेजक नहीं बनातीं, न ही ये कथाकार के श्रीमुख से निकले आप्त-वचनों का सुसंकलन बन रही हैं। अपितु संशय, आत्मालोचना और जनतांत्रिकता इन संवादों को पठनीय बनाते हैं। लेखक इनमें औपचारिक होने से बचता है और जो कहा है सीधे-बेलाग।
पाठक जानते हैं कि काशीनाथ सिंह विचारों को व्यक्त करते समय ‘भाषा को दरेरा’ देते रहते हैं।
यही कारण है कि विभिन्न विषयों पर उनकी टिप्पणियाँ व्यापक विमर्शों का आधार बनती रही हैं। यह भी कि इन साक्षात्कारों से गुज़रने के बाद काशीनाथ सिंह के व्यक्तित्व-कृतित्व के प्रति पाठक का दृष्टिकोण संशोधित-परिष्कृत होता है।
Book Details
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ISBN9788126724918
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Pages192
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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‘बातों में बीते दिन’ पुस्तक नामवर सिंह के साक्षात्कारों का संकलन है। इस किताब में शामिल साक्षात्कारों का विषय क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। पेरेस्त्रोइका-ग्लासनोस्त और आधुनिकतावाद से लेकर कविता, कहानी, उपन्यास और निजी जीवन तक। साहित्य और देश-दुनिया की नामवर जी की समझ का एक स्पष्ट प्रतिबिम्ब यहाँ मिलता है। उनकी विश्व-दृष्टि का रूपायन इन साक्षात्कारों में हुआ है। पुस्तक तीन खंडों में बँटी हुई है। मध्यम आकार के और विषय केन्द्रित साक्षात्कार पहले खंड में हैं। दूसरे खंड में रचनाकारों और रचनाओं पर केन्द्रित बातचीत है। प्रेमचन्द, सुमित्रानन्दन पंत, त्रिलोचन और अमृतराय तथा सुमित्रानन्दन पंत की कृति ‘गुंजन’ और कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’—इन साक्षात्कारों के केन्द्र में है। तीसरे खंड में महावीर अग्रवाल द्वारा लिये गए नौ साक्षात्कार हैं जो उनके निजी जीवन से लेकर आलोचना और विविध विषयों से सम्बन्धित हैं। आलोचना लिखित हो या वाचिक—उसके पीछे बुनियादी प्रक्रिया है—पढ़ना, विवेचना, विचारना। तर्क और संवाद। नामवर जी के इन साक्षात्कारों में इसका व्यापक समावेश है। इनसे गुजरते हुए हम महसूस करते हैं कि वह किसी रचना को हमेशा नई और अपनी तरह से पढ़ने की कोशिश करते हैं और इस तरह ‘पढ़ते’ हुए वे लगातार नई तरह से ‘सोचते’ और ‘विचारते’ हुए सामने आते हैं। उनकी वाचिक आलोचना मूल्यांकन की ऊपरी सीढ़ी तक पहुँचती है। निकष बनाती है। प्रतिमानों पर बहस करती है। उसमें ‘लिखित’ की तरह की ‘कौंध’ मौजूद होती है। नहीं होता तो बस पूरापन।
Apne Khawab Ki Tabir Chahti Hoon
- Author Name:
Nasera Sharma
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बकौल नासिरा शर्मा ‘बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद के बाद एक नया हिन्दुस्तान उभरा है, जिसको अभी ठीक से समझा जाना बाक़ी है। पहले भारत ज़मीन के स्तर पर दो फाँक हुआ था, अब विचार और संवेदना के स्तर पर सियासत ने उसे चार फाँक कर दिया है।’ नासिरा शर्मा न सिर्फ़ भारत बल्कि ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और यूरोप की भी सामाजिक-सांस्कृतिक पेचीदगियों की जानकार हैं, और मनुष्यता की स्वाभाविक सकारात्मकता विशेषत: स्त्री सरोकार के प्रति अपनी पक्षधरता के लिए जानी जाती हैं। ‘अपने ख़्वाब की ताबीर चाहती हूँ’ उनके साक्षात्कारों का संकलन है। समकालीन पुरुष पत्रकारों-लेखकों-चिन्तकों, जिनमें देश से बाहर के भी कुछ नाम शामिल हैं, द्वारा लिए गए इन साक्षात्कारों को वे ‘आदम के सवाल हव्वा से’ कहती हैं। इन साक्षात्कारों में हम उनके लेखन से परिचित होते हैं, उनकी स्त्री से भी, और सबसे ज़्यादा उस सजग-चिन्तनशील व्यक्ति से जिसने भौगोलिक और राजनीतिक अर्थों में एक विराट और वैविध्यपूर्ण अनुभव को बहुत नज़दीक से देखा-जिया है। इसीलिए वे जिस विषय पर बात करती हैं, उसमें गहरा आत्मविश्वास और प्रामाणिकता स्पष्ट दिखाई देते हैं। मुस्लिम कठमुल्लावाद और हिन्दू कट्टरता से बराबर लोहा लेती आ रहीं नासिरा जी ने इन वार्ताओं में अनेक ऐसे सवाल उठाए हैं, और अनेक ऐसे सवालों के जवाब भी दिए हैं जिनका गहरा ताल्लुक़ हमारे आज के सामाजिक और राजनीतिक माहौल से भी है। मसलन हिन्दू-मुसलमान के बीच बढ़ाए जा रहे विद्वेष पर वे कहती हैं कि ‘इन सारे जालों को साफ़ करने का काम उतने प्रभावी ढंग से हमारी क़लम नहीं कर पाई जितना राजनेता समाज को काटने और दिलों को बाँटने में कामयाब हुए हैं।’ इस पुस्तक में कुछ सवालों के जवाब में उन्होंने ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रम पर विस्तार से चर्चा की है, और अन्य सामयिक मुद्दों पर भी जिनमें हिन्दी कहानी, साहित्य, दुनियाभर की स्त्री का लेखन और जीवन, बँटवारा, दंगे, भारत में मुस्लिम जीवन आदि शामिल हैं। आज जब हम कई निर्णायक मोर्चों पर किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हैं, एक बड़ी क़लम के ये विचार नि:सन्देह हमें कुछ रौशनी देंगे।
Aansu Aur Raushani : Alok Dhanwa Se Samvad
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Pankaj Chaturvedi
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कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी की पुस्तक ‘आँसू और रौशनी’ दरअस्ल दो कवियन की वार्ता है। यह रूखा-सूखा साक्षात्कार नहीं, वरन् दो संवेदनशील सृजनधर्मियों का संवाद है; जिसमें हम अपने प्रिय साथी कलाकार से वह सब बाँट लेना चाहते हैं, जो हमें रसज्ञ की तरह अभिभूत करता है। आलोकधन्वा जैसे ख़ामोश कवि को थोड़ा-बहुत खोलना भी धैर्य, धृति और साधना की माँग करता है। पंकज ने वे एकान्त क्षण पकड़े, जब आलोक संवाद की सृजन-चेतना में जाग्रत थे। उनकी वह भीगी भावप्रवण आवाज़ इस पुस्तक में सुनाई दे रही है, जो घास के एक तिनके का भी कम्पन पहचान लेती है। पंकज चतुर्वेदी आलोकधन्वा की विह्वलता, वाग्वैभव और तरलता को ज्यों-का-त्यों हम तक लेकर आए हैं इस अनूठी पुस्तक में। संवाद दो कवियों का परस्पर मिलना भी है और खुलना भी। वे जीवन-संग्राम से बच नहीं रहे, उसी में रहते हुए रच रहे हैं। पंकज चतुर्वेदी की युवा उत्कंठाओं को पहचानते हुए आलोकधन्वा उन्हें अपने सृजन-कक्ष की मेज़ तक ले जाकर दिखा देते हैं और कहते हैं, “अच्छे लोग वही हुए, जो अन्याय के ख़िलाफ़ लड़े, उनसे ख़ूबसूरत कोई नहीं है।” एक ऐसे समय में, जब संवाद मन्थर पड़ रहा है, ‘आँसू और रौशनी’ के प्रकाशन का स्वागत है। —ममता कालिया, कथाकार
Aurat Ki Aawaz
- Author Name:
Nasira Sharma +1
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यह सदी जिस आवाज़ में बोल रही है वह औरत की आवाज़ है, यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है। सदियों जिसकी पीड़ा पुरुष-शासित समाज के तमाम आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक ढाँचों की नींव में बिना किसी शिकायत के अपनी बलि देती रही, जिसकी ख़ामोशी पर पुरुषों की वाचाल सभ्यता मानवता की अकेली और स्वयम्भू प्रतिनिधि बनी रही, वह औरत अब बोल रही है। सृष्टि में अपनी हिस्सेदारी का दावा कर रही है। और कहना न होगा कि इससे एक बड़ा बदलाव मनुष्यता के लैंडस्केप में दिखाई देने लगा है। अनेक औरतें हैं जिन्होंने इस बिन्दु तक आने के लिए अपनी क़ुर्बानी दी है, अनेक हैं जिन्होंने अकेले आगे बढ़कर बाक़ी औरतों के लिए लिए कितने ही बन्द दरवाज़ों को खोला है। अनेक हैं जिनका नाम भी हम नहीं जानते। और अनेक हैं जिनके नाम इतिहास के निर्णायक मोड़ों पर उत्कीर्ण हो गए हैं। इस किताब में अलग-अलग देशों की उन औरतों से वार्ताएँ शामिल हैं जिन्होंने अपने दम-ख़म से, अपने इरादों और हिम्मत से ज़िन्दगी में एक मुकाम हासिल किया है, जिनका एक स्पष्ट नज़रिया है, और यह नज़रिया उन्होंने अपने संघर्षों से, अपनी खुली निगाह से कमाया है। इन्हें पढ़ते हुए हमें मालूम होता है कि आज उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ है। पूरी दुनिया और उसके निज़ाम की गहरी समझ भी उनके पास है और उसकी मरम्मत के लिए व्यावहारिक सुझाव भी। वे जानती हैं कि आने वाले समय को कैसा होना चाहिए और कैसा वह नहीं है। पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, इराक़, सीरिया और टर्की से लेकर जापान, रूस, फ़िलिस्तीन, इस्रायल, फ़्रांस, मलेशिया और लन्दन तक की विभिन्न राजनीतिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आने वाली इन महिलाओं से बातचीत की है नासिरा शर्मा ने जिन्हें हम एक सामर्थ्यवान रचनाकार के रूप में जानते हैं, विभिन्न भाषाओं के स्त्री-संवेदी और मानवतावादी साहित्य से भी वे हमें परिचित कराती रही हैं। ये वार्ताएँ साक्षात्कार के प्रचलित फ़्रेम से आगे बढ़कर दरअसल सरोकारों के समान और वैश्विक धरातल पर जाकर किए गए संवाद हैं—इस सदी की औरत की एक मुकम्मल आवाज़।
Puchho Parsai Se
- Author Name:
Harishankar Parsai
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पूछो परसाई से अपने ढंग की एक अनूठी पुस्तक है। हरिशंकर परसाई का रचनात्मक हस्तक्षेप स्थायी, परिवर्तनकारी और बहुआयामी रहा है। उन्होंने अपने साहित्य में समाज के अनेक पक्षों पर मौलिकता के साथ विचार किया है। वस्तुतः उनका समस्त लेखन भाषा, साहित्य और समाज की धरोहर है। यह पुस्तक हरिशंकर परसाई की मनीषा के कई विलक्षण आयाम रेखांकित करती है। प्रश्नोत्तर शैली की परम्परा अति प्राचीन है। पूछो परसाई से इसी परम्परा का आधुनिक संस्करण है। ‘देशबन्धु’ समाचार-पत्र में नियमित रूप से प्रकाशित होनेवाला यह स्तम्भ अत्यन्त लोकप्रिय था। देश के कोने-कोने से जागरूक उत्सुक पाठक अपने प्रिय लेखक परसाई से भाँति-भाँति के प्रश्न पूछते थे। इन प्रश्नों में दुनिया जहान की जाने कैसी-कैसी जिज्ञासाएँ भरी रहती थीं।...और परसाई प्रश्न की प्रकृति के अनुसार सूचनात्मक, विश्लेषणात्मक, तुलनात्मक, व्यंग्यात्मक आदि शैलियों में उत्तर देते थे। यही कारण है कि प्रायः सर्वाधिक समय तक नियमित प्रकाशित होनेवाला यह स्तम्भ आज भी विषय-वैविध्य और ‘बहुआस्वादकता’ का उदाहरण बना हुआ है। पूछो परसाई से में हरिशंकर परसाई की प्रचलित छवि भी एक नया विस्तार पाती है। परसाई की विचारधारा और भावप्रवणता पुस्तक की प्राणशक्ति है। इसमें व्याप्त तार्किकता, सरलता, सहजता और आत्मीयता के दर्शन भी उत्तरों में होते हैं। जाने कितने उकसाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी उन्होंने पूरी सहजता से दिए हैं। उदाहरणार्थ, एक प्रश्न है–‘आपके पास हर प्रश्न का जवाब है। क्या आप अक्ल के जहाज हैं?’ परसाई का उत्तर है–‘मेरे पास हर प्रश्न का जवाब नहीं है। जवाब सही हो, यह भी जरूरी नहीं है। मैं लगातार सीखता जाता हूँ। मामूली आदमी हूँ।’ समग्रतः इस पुस्तक में ज्ञान, प्रेरणा और रोचकता का एक भरा-पूरा संसार पाठकों के लिए सुरक्षित है।
Kaha-Suni
- Author Name:
Doodhnath Singh
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‘इस किताब में दूधनाथ सिंह के चार साक्षात्कार और चार आलोचनात्मक निबन्ध संकलित हैं। साक्षात्कार एक तरह का विशिष्ट शास्त्रार्थ होता है। प्रश्नों के आलोक में यह शास्त्रार्थ लेखक तरह-तरह से करता है। कभी आत्म-मन्थन, आत्म-प्रकाश, कभी अपने समय, समाज, इतिहास, साहित्य, कला आदि पर टिप्पणियाँ और प्रतिक्रियाएँ, कभी मतभेद-सहमति और सौमनस्य, कभी अपनी क्षुब्धता, उदासी या ख़ुशी का इज़हार, कभी अपनी ही आस्थाओं पर प्रश्नचिह्न, कभी कलह, वैमनस्य और फिर प्रेम; कभी गहन विश्लेषण और आत्म-स्वीकृति—एक अच्छे साक्षात्कार में एक कलाकार के विविधवर्णी छटाओं वाले रूप के दर्शन पाठक को होते हैं। इस तरह ‘साक्षात्कार’ तर्क-वितर्क की असमंजसपूर्ण, वक्र भाषा में लिपटा हुआ कलाकार के औचक पकड़े गए चिन्तन का निचोड़ है, एक नए क़िस्म का भाष्य है, आलोचना का एक खिलंदरा राग है। ‘कहा-सुनी’ के चारों आलोचनात्मक निबन्ध लेखक के उपर्युक्त साक्षात्कारों के शास्त्रार्थों का ही फैलाव और वितान हैं। बातों और विचारों की अन्तिम तर्क-सिद्धि, परिणति और समापन हैं। फिर भी आलोचना की विधागत माँग के कारण उनमें तटस्थ और निर्वैयक्तिक विश्लेषण, तर्क-वितर्क के आघात-प्रतिघात, नियमन-अनुशासन यहाँ अधिक हैं। आशा है, यह किताब एक नए बौद्धिक आस्वाद के साथ पढ़ी-गुनी जाएगी।
Sansar Mein Nirmal Verma : Poorvarddh
- Author Name:
Nirmal Verma +1
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इतिहास के भीतर जो घटनाएँ होती है, उनके पीछे कोई बहुत ही (अति पवित्र) सर्वमान्य नियम हो, ऐसा कोई ज़रूरी नही है। यह बोध जब आपको हो जाए तो यह ज़रूरी हो जाता है हम सृष्टि के अर्थ को ईश्वर या इतिहास में न देखकर उसे अपने नैतिक अर्थ में पाएँ, और मनुष्य ख़ुद इस नैतिकता का निर्माण करे। इस पुस्तक में शामिल एक साक्षात्कार में अस्तित्ववाद को लेकर अपने विचार व्यक्त करते हुए निर्मल वर्मा आगे कहते हैं कि उस दर्शन से जो बहुमूल्य चीज़ मैंने अपने लिए पाई वह यह कि ईश्वर और इतिहास से मुक्त होकर, यह आदमी पर निर्भर है कि वह अर्थ और नैतिकता को जन्म दे; क्या सही है, क्या ग़लत है, इसे तय करने की ज़िम्मेदारी वह ख़ुद उठाए। मार्क्सवाद से शुरु हुई अपनी वैचारिक यात्रा में अस्तित्ववाद के प्रति अपने आकर्षण को ज़रूरी क़दम मानते हुए वे इन साक्षात्कारों में अपने लेखक, अपने मनुष्य और अपने नागरिक के गहरे दायित्व बोध को बार-बार रेखांकित करते हैं। नई कहानी आन्दोलन में अपनी भूमिका को लेकर किए गए प्रश्न के जवाब में वे कहते हैं कि मेरी कोशिश सिर्फ़ यही थी कि मैं अपने अनुभवों को कितने प्रामाणिक स्तर पर व्यक्त कर पा रहा हूँ। अपनी रचना प्रक्रिया और लेखकीय नैतिकता के अलावा इन साक्षात्कारों में वे अपने विदेश प्रवास, वहाँ के निर्णायक अनुभवों, साहित्य, कला, विचारधारा और अन्य अनेक ऐसे मुद्दों पर अपनी बात कहते हैं जो आज भी प्रासंगिक और विचारोत्तेजक हैं। इस जिल्द में उनके 1998 से पहले दिए गए साक्षात्कारों को संकलित किया गया है। इसके बाद के साक्षात्कार ‘संसार में निर्मल वर्मा’ के ‘उत्तरार्द्ध’ खंड में संकलित हैं।
Paryavaran Ke Paath
- Author Name:
Anupam Mishra
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''अनुपम मिश्र एक अत्यन्त विनम्र, निरभिमानी व्यक्ति थे जिन्होंने पर्यावरण के क्षेत्र में साधारण और सामुदायिक विवेक और विधि का जैसा अवगाहन किया वैसा आधुनिक टेकनॉलजी के दुश्चक्र में फँसे अन्य पर्यावरणविद् अकसर नज़रन्दाज़ करते रहे हैं। अनुपम जी लगभग ज़िद कर अपनी इस धारणा पर डटे रहे कि साधारण लोग और समुदाय पढ़े-लिखों से ज़्यादा जानता-समझता है और आधुनिकता को अपनी सर्वज्ञता के दम्भ से मुक्त हो सकना चाहिए। उनसे बातचीत का यह संचयन इस अनूठे व्यक्ति के सोच-विचार की नई परतें सहजता से खोलेगा, ऐसा हमारा विश्वास है।" —अशोक वाजपेयी
Antarrashtriya Mudra Kosh ICWA
- Author Name:
V. Srinivas
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भारत के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी द्वारा भारत के आर्थिक इतिहास में महत्त्वपूर्ण पलों का व्यावहारिक विश्लेषण और भावी वैश्विक संकट के समाधान का निर्णय कर सकनेवाले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में बहुपक्षीयता का भविष्य। यह पुस्तक वी. श्रीनिवास भारत सरकार के विशिष्ट अपर सचिव, कार्यकारी निदेशक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व सलाहकार और भारत के वित्तमंत्री के निजी सचिव द्वारा 17 माह के शोध और साक्षात्कार के आधार पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ भारत के संबंधों की अनेक बड़ी घटनाओं का व्यापक विश्लेषण है। इसमें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत की भूमिका का परिदृश्य है। यह भारत के 1966, 1981 और 1991 अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष कार्यक्रमों, 2010 में आई.एम.एफ. से भारत द्वारा स्वर्ण क्रय, जी20 के उदय और विश्व में तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में भारत के उद्भव के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। वी. श्रीनिवास ने अंतिम ऋणदाता के रूप में आई.एम.एफ. की भूमिका, सदस्य देशों के साथ निपटने में असीमित शक्ति की एक संस्था के रूप में आई.एम.एफ. 2008 के बाद वैश्विक वित्तीय संकट में आई.एम.एफ. की वृहत्तर भूमिका और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा में चीन के उदय पर अंतर्दृष्टि प्रदान की है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ भारत के संबंध के परिप्रेक्ष्य में पहले 25 वर्षों पर व्यापक शोध है, जिसके बारे में गहन अध्ययन और शोध करके समस्त जानकारियाँ संकलित की गई हैं, जिन्होंने वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
Jeevan Prabandhan : Kripa Karahu Guru Dev Ki Naain
- Author Name:
Pt. Vijay Shankar Mehta +1
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करोड़ों लोगों के लिए ‘श्रीहनुमान चालीसा’ नित्य परायण का साधन है। कइयों को यह कण्ठस्थ है पर अधिकांश ने यह जानने का प्रयत्न नहीं किया होगा कि इन पंक्तियों का गूढ़ अर्थ क्या है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपना सारा साहित्य प्रभु को साक्षात् सामने रखकर लिखा है। उनका सारा सृजन एक तरह से वार्तालाप है। श्रीहनुमान जी से उनकी ऐसी ही एक निजी बातचीत का एक लोकप्रिय जनस्वीकृत नाम है ‘श्रीहनुमान चालीसा।' आज के मानव के लिए अच्छा, सहज, सरल और सफल जीवन जीने के सारे संकेत हैं इस चालीसा में। ज्ञान के सागर में डुबकी लगाकर, भक्ति के मार्ग पर चलते हुए, निष्काम कार्य–योग को कैसे साधा जाए, जीवन में इसका सन्तुलन बनाती है ‘श्रीहनुमान चालीसा’। जिसे पढ़ने के बाद यह समझ में आ जाता है कि श्रीहनुमान जीवन–प्रबन्धन के गुरु हैं। जीवन–प्रबन्धन का आधार है स्वभाव और व्यवहार। आज के समय में बच्चों को जो सिखाया जा रहा है, युवा जिस पर चल रहे हैं, प्रौढ़ जिसे जी रहे हैं और वृद्धावस्था जिसमें अपना जीवन काट रही है, वह समूचा प्रबन्धन ‘व्यवहार’ पर आधारित है। जबकि जीवन–प्रबन्धन के मामले में ‘श्रीहनुमान चालीसा’ ‘स्वभाव’ पर जोर देती है।
व्यवहार से स्वभाव बनना आज के समय की रीत है, जबकि होना चाहिए स्वभाव से व्यवहार बने। जिसका स्वभाव सधा है, उसका हर व्यवहार सर्वप्रिय और सर्वस्वीकृत होता है। स्वभाव को कैसे साधा जाए, ऐसे जीवन–प्रबन्धन के सारे सूत्र हैं ‘श्रीहनुमान चालीसा’ की प्रत्येक पंक्ति में...
Jeevan Prabandhan : Kripa Karahu Guru Dev Ki Naain
Pt. Vijay Shankar Mehta
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PK Ka Fanda
- Author Name:
Praveen Kakkar
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Embark on a transformative journey with 'PK Ka Fanda: Prerana, Prayas Aur Parinaam', a compelling Hindi book that delves deep into the realms of motivation, effort, and outcomes. This thought-provoking work explores the fundamental principles that drive success and personal growth. Written in accessible Hindi language, the book offers valuable insights into harnessing inner potential and converting aspirations into achievements. Through its engaging narrative, readers will discover practical wisdom about the relationship between inspiration, dedicated effort, and resultant outcomes. Whether you're a student, professional, or someone seeking personal development, this book serves as an illuminating guide to understanding the dynamics of motivation and success. The author masterfully weaves together concepts that help readers understand how proper inspiration (Prerana) combined with sustained effort (Prayas) leads to desired results (Parinaam). Perfect for self-improvement enthusiasts and those looking to enhance their understanding of personal growth principles in Hindi.
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