Apne Khawab Ki Tabir Chahti Hoon
Author:
Nasera SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 476
₹
595
Available
बकौल नासिरा शर्मा ‘बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद के बाद एक नया हिन्दुस्तान उभरा है, जिसको अभी ठीक से समझा जाना बाक़ी है। पहले भारत ज़मीन के स्तर पर दो फाँक हुआ था, अब विचार और संवेदना के स्तर पर सियासत ने उसे चार फाँक कर दिया है।’ नासिरा शर्मा न सिर्फ़ भारत बल्कि ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और यूरोप की भी सामाजिक-सांस्कृतिक पेचीदगियों की जानकार हैं, और मनुष्यता की स्वाभाविक सकारात्मकता विशेषत: स्त्री सरोकार के प्रति अपनी पक्षधरता के लिए जानी जाती हैं।
‘अपने ख़्वाब की ताबीर चाहती हूँ’ उनके साक्षात्कारों का संकलन है। समकालीन पुरुष पत्रकारों-लेखकों-चिन्तकों, जिनमें देश से बाहर के भी कुछ नाम शामिल हैं, द्वारा लिए गए इन साक्षात्कारों को वे ‘आदम के सवाल हव्वा से’ कहती हैं। इन साक्षात्कारों में हम उनके लेखन से परिचित होते हैं, उनकी स्त्री से भी, और सबसे ज़्यादा उस सजग-चिन्तनशील व्यक्ति से जिसने भौगोलिक और राजनीतिक अर्थों में एक विराट और वैविध्यपूर्ण अनुभव को बहुत नज़दीक से देखा-जिया है। इसीलिए वे जिस विषय पर बात करती हैं, उसमें गहरा आत्मविश्वास और प्रामाणिकता स्पष्ट दिखाई देते हैं।
मुस्लिम कठमुल्लावाद और हिन्दू कट्टरता से बराबर लोहा लेती आ रहीं नासिरा जी ने इन वार्ताओं में अनेक ऐसे सवाल उठाए हैं, और अनेक ऐसे सवालों के जवाब भी दिए हैं जिनका गहरा ताल्लुक़ हमारे आज के सामाजिक और राजनीतिक माहौल से भी है। मसलन हिन्दू-मुसलमान के बीच बढ़ाए जा रहे विद्वेष पर वे कहती हैं कि ‘इन सारे जालों को साफ़ करने का काम उतने प्रभावी ढंग से हमारी क़लम नहीं कर पाई जितना राजनेता समाज को काटने और दिलों को बाँटने में कामयाब हुए हैं।’
इस पुस्तक में कुछ सवालों के जवाब में उन्होंने ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रम पर विस्तार से चर्चा की है, और अन्य सामयिक मुद्दों पर भी जिनमें हिन्दी कहानी, साहित्य, दुनियाभर की स्त्री का लेखन और जीवन, बँटवारा, दंगे, भारत में मुस्लिम जीवन आदि शामिल हैं।
आज जब हम कई निर्णायक मोर्चों पर किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हैं, एक बड़ी क़लम के ये विचार नि:सन्देह हमें कुछ रौशनी देंगे।
ISBN: 9788119133406
Pages: 208
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Jane Sahi +1
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- Description: शाळा ही काही समाजाबाहेर, एखाद्या पोकळीत असणारी गोष्ट नाही. ती समाजातून येते आणि पुन्हा समाजापर्यंतच वाहत जाते. शाळा काही फक्त जीवनाची तयारी नव्हे; ती समाजाच्या सामाजिक, आर्थिक वास्तवाचा अविभाज्य भाग असते. सध्या समाजात एकंदरीतच जे ताण आहेत आणि दडपणं आहेत त्यांनाच शाळांनाही तोंड द्यावं लागत आहे. उदाहरणार्थ, स्पर्धा आणि व्यापारीकरणाच्या वरवंट्याखाली भरडलं जाणं. शाळा ज्या प्रकारे वाढलेल्या दिसतात, तो काही योगायोग नाही; तो समाज, त्याची मूल्यं, त्याच्या अपेक्षा आणि गरजा यांचा तर्कशुद्ध विस्तार किंवा प्रतिबिंब आहे. आपल्या सध्याच्या समाजातली हिंसा, भेदभाव आणि अन्याय यांनीच विविध प्रकारच्या शाळांमधली उतरंडीची व्यवस्था निर्माण केली, अभ्यासक्रमाचे तपशील ठरवले आणि शिक्षणाच्या पद्धती आणि मूल्यमापनाच्या पद्धती ठरवल्या. थोडं नकारात्मक अर्थानं आणि एका दृष्टिकोनातून पाहिलं पण त्या शाळा जीवनापासून अलिप्त नाहीत तर अन्याय आणि असमानता या कठोर वास्तवांचा भाग आहेत. Shikshan Aani Shanti : Jane Sahi , Shobha Bhagwat शिक्षण आणि शांती : जेन साही, शोभा भागवत
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