Shabdon Ka Parlok

(0)

250

₹ 200 (20% off)

Available

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


‘शब्दों का परलोक’ कव‌िता में भाषा-विमर्श है लेकिन विमर्श की शब्दावली में नहीं, कव‌िता की माँ-बोली में। सुरजीत पातर इन कव‌िताओं में हमारी मातृभाषाओं के सामने मौजूद तरह-तरह के संकटों को हर पहलू से परखते हैं। ये कविताएँ बताती हैं कि सिर्फ़ अंग्रेज़ी नहीं, हमारी भाषाओं को हम से भी ख़तरा है। ऐसा भी होता है कि हमारा रोज़ी-रोटी का सवाल ही हमारी भाषा के ख़िलाफ़ काम करने लगता है। एक कविता विस्तार से बताती है कि सरकारी कारिन्दे अपनी ही भाषा के साथ क्या दुर्व्यवहार करते हैं। नई पीढ़ी कैसे अपनी भाषा-बोली और उसके असंख्य शब्दों को भूलती जा रही है, और यह भी कि अपनी भाषा से दूर होना कैसे अपने आत्म से, अपनी संस्कृति, अपने समाज से दूर होना हो जाता है। शासक की भाषा और शासित की भाषा का आपस में क्या रिश्ता बनता है; ये कविताएँ बार-बार पूछती हैं आख़िर यह कैसे हुआ कि हमारी भाषाओं के चाचा-चाची, मामा-मामी और ऐसे ही कितने सम्बन्धसूचक शब्दों की जगह अंग्रेज़ी के अंकल-आंटी आकर बैठ गए, लेकिन अंग्रेज़ी ने हमारी भाषाओं से कुछ नहीं लिया। अपनी भाषा, अपनी भाषा के लेखक-कवि और उनकी किताबें कैसे हमारे वर्तमान में अपनी अहमियत खोती जा रही हैं, यह पीड़ा भी इन कविताओं में बार-बार आती है।

Read more

ISBN
9789360864545
Pages
104
Avg Reading Time
3 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

Piracy Free

Express Delivery

Secure Payment

About the Book

‘शब्दों का परलोक’ कव‌िता में भाषा-विमर्श है लेकिन विमर्श की शब्दावली में नहीं, कव‌िता की माँ-बोली में। सुरजीत पातर इन कव‌िताओं में हमारी मातृभाषाओं के सामने मौजूद तरह-तरह के संकटों को हर पहलू से परखते हैं।
ये कविताएँ बताती हैं कि सिर्फ़ अंग्रेज़ी नहीं, हमारी भाषाओं को हम से भी ख़तरा है। ऐसा भी होता है कि हमारा रोज़ी-रोटी का सवाल ही हमारी भाषा के ख़िलाफ़ काम करने लगता है। एक कविता विस्तार से बताती है कि सरकारी कारिन्दे अपनी ही भाषा के साथ क्या दुर्व्यवहार करते हैं। नई पीढ़ी कैसे अपनी भाषा-बोली और उसके असंख्य शब्दों को भूलती जा रही है, और यह भी कि अपनी भाषा से दूर होना कैसे अपने आत्म से, अपनी संस्कृति, अपने समाज से दूर होना हो जाता है।
शासक की भाषा और शासित की भाषा का आपस में क्या रिश्ता बनता है; ये कविताएँ बार-बार पूछती हैं आख़िर यह कैसे हुआ कि हमारी भाषाओं के चाचा-चाची, मामा-मामी और ऐसे ही कितने सम्बन्धसूचक शब्दों की जगह अंग्रेज़ी के अंकल-आंटी आकर बैठ गए, लेकिन अंग्रेज़ी ने हमारी भाषाओं से कुछ नहीं लिया। अपनी भाषा, अपनी भाषा के लेखक-कवि और उनकी किताबें कैसे हमारे वर्तमान में अपनी अहमियत खोती जा रही हैं, यह पीड़ा भी इन कविताओं में बार-बार आती है।

Book Details

  • ISBN
    9789360864545
  • Pages
    104
  • Avg Reading Time
    3 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

Recommended For You

Customer Reviews

Be the first to write a review...

(0)

0 out of 5

Book

Hurry! Limited-Time Coupon Code

WORDPOWER
* Terms and Conditions applied.

Offers

Best Deal

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit, sed do eiusmod tempor incididunt ut labore et dolore magna aliqua

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit, sed do eiusmod tempor incididunt ut labore et dolore magna aliqua. Ut enim ad minim veniam, quis nostrud exercitation ullamco laboris nisi ut aliquip ex ea commodo consequat.

whatsapp