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वह थोड़ी देर रुका और फिर धीरे-धीरे बोला, ‘‘और कहाँ रखते? मेरी औरत तो बह गई थी न!’’ अचानक उद्विग्नता, आशंका और उत्सुकता साथ-साथ हावी हो उठीं—‘‘तेरी औरत? कहाँ...कैसे? तो क्या वह चिट्ठी...।’’ ‘‘हाँ, भैंस बह गई थी न बाढ़ में। माँ-बाप तो बूढ़े-ठेले ठहरे, सो उसको ढूँढ़ती निकल गई थी। बाढ़ का टाइम था ही, सो लौटते-लौटते नहर का पानी बढ़ आया।’’ ‘‘फिर वही...भैंस और वह, दोनों ही बाढ़ में बह गए थे।’’ ‘‘हाँ, लेकिन भैंस तो बह ही गई, उससे बहुत आसरा था, अब तंगी बहुत हो गई घर में।’’ मैंने अपने को झुठलाते हुए कहा, ‘‘छोड़ो, भैंस का क्या है, दूसरी आ जाएगी, तुम्हारी औरत तो बच गई?’’ वह कुछ नहीं बोला। लेकिन मेरे अंदर से तड़ाक से एक पाशविक सच निकला, नहीं भैंस का बचना ज्यादा जरूरी था। उससे उसके बूढ़े बीमार परिवार को ज्यादा आसरा था। अब तो शायद जीवन भर भैंस खरीदने लायक पैसे भी नहीं जुटा पाएँगे...बैजनाथ या उसके माँ-बाप। —‘भुक्खड़ की औलाद’ शीर्षक कहानी से मानवीय संवेदनाओं को झकझोरकर रख देनेवाली प्रेम, विश्वास, करुणा और विद्रूप के धूपछाँही अहसासों की मर्मस्पर्शी कहानियाँ।
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वह थोड़ी देर रुका और फिर धीरे-धीरे बोला, ‘‘और कहाँ रखते? मेरी औरत तो बह गई थी न!’’
अचानक उद्विग्नता, आशंका और उत्सुकता साथ-साथ हावी हो उठीं—‘‘तेरी औरत? कहाँ...कैसे? तो क्या वह चिट्ठी...।’’
‘‘हाँ, भैंस बह गई थी न बाढ़ में। माँ-बाप तो बूढ़े-ठेले ठहरे, सो उसको ढूँढ़ती निकल गई थी। बाढ़ का टाइम था ही, सो लौटते-लौटते नहर का पानी बढ़ आया।’’
‘‘फिर वही...भैंस और वह, दोनों ही बाढ़ में बह गए थे।’’
‘‘हाँ, लेकिन भैंस तो बह ही गई, उससे बहुत आसरा था, अब तंगी बहुत हो गई घर में।’’
मैंने अपने को झुठलाते हुए कहा, ‘‘छोड़ो, भैंस का क्या है, दूसरी आ जाएगी, तुम्हारी औरत तो बच गई?’’
वह कुछ नहीं बोला। लेकिन मेरे अंदर से तड़ाक से एक पाशविक सच निकला, नहीं भैंस का बचना ज्यादा जरूरी था। उससे उसके बूढ़े बीमार परिवार को ज्यादा आसरा था।
अब तो शायद जीवन भर भैंस खरीदने लायक पैसे भी नहीं जुटा पाएँगे...बैजनाथ या उसके माँ-बाप।
—‘भुक्खड़ की औलाद’
शीर्षक कहानी से मानवीय संवेदनाओं को झकझोरकर रख देनेवाली प्रेम, विश्वास, करुणा और विद्रूप के धूपछाँही अहसासों की मर्मस्पर्शी कहानियाँ।
Book Details
-
ISBN9788194510949
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है।
उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता
वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
Hari Patang Par Hara Patanga
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Varun Grover +1
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Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
Sarkti Parchhaiyan
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Sudha Om Dhingra
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Book
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