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Sangatin Yatra

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‘संगतिन-यात्रा’ उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले में दलित और शोषित महिलाओं के हक़ के लिए लड़ती सात ग्राम-स्तरीय महिला-कार्यकर्ताओं की ज़िन्दगी का सफ़रनामा है। नौ लेखिकाओं की क़लम से पिरोया यह सफ़रनामा सात औरतों की निजी डायरियों पर आधारित है। इसमें उन्होंने अपने बचपन, जवानी, शादी-ब्याह और मातृत्व की देहरी से लेकर गाँवों में किए अपने काम तथा उस काम से जुड़े हुए सपनों आदि को बहुत मार्मिकता से लिपिबद्ध किया है। इन कहानियों के माध्यम से लेखिकाओं ने बार-बार हमारा ध्यान उन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढाँचों और प्रक्रियाओं की ओर ले जाने की कोशिश की है, जो लिंग-भेद से जुड़े संघर्षों को जाति, वर्ग, मज़हबी भेदभाव और छुआछूत की ज़ंजीरों में जकड़े रहती हैं। साथ ही इसमें उन जटिलताओं और दिक़्क़तों को भी स्वर देने की भरसक कोशिश हुई है, जो आज के दौर में एनजीओ की दुनिया में गहरे तक पैठ गई हैं, लेकिन जिन पर खुलकर बातचीत करने के लिए ग्राम-स्तरीय कार्यकर्ताओं को बहुत कम मंच मिलते हैं। मंच मिले भी हैं, तो खुलकर कहने-बोलने का साहस जुटाना कठिन होता है। ललित और वैचारिक लेखन के बीच की खाई को पाटते हुए अपनी जुदा-जुदा दुनिया में साँस लेती नौ लेखिकाओं ने जिस अनूठी सामूहिक प्रक्रिया से गुज़रकर इस प्रयास को साँचे में ढाला या एक माला की तरह पिरोया है, उसका सिलसिलेवार बयान इस किताब और चिन्तन को एक नया आयाम और गहराई देता है।

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‘संगतिन-यात्रा’ उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले में दलित और शोषित महिलाओं के हक़ के लिए लड़ती सात ग्राम-स्तरीय महिला-कार्यकर्ताओं की ज़िन्दगी का सफ़रनामा है। नौ लेखिकाओं की क़लम से पिरोया यह सफ़रनामा सात औरतों की निजी डायरियों पर आधारित है। इसमें उन्होंने अपने बचपन, जवानी, शादी-ब्याह और मातृत्व की देहरी से लेकर गाँवों में किए अपने काम तथा उस काम से जुड़े हुए सपनों आदि को बहुत मार्मिकता से लिपिबद्ध किया है।

इन कहानियों के माध्यम से लेखिकाओं ने बार-बार हमारा ध्यान उन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढाँचों और प्रक्रियाओं की ओर ले जाने की कोशिश की है, जो लिंग-भेद से जुड़े संघर्षों को जाति, वर्ग, मज़हबी भेदभाव और छुआछूत की ज़ंजीरों में जकड़े रहती हैं। साथ ही इसमें उन जटिलताओं और दिक़्क़तों को भी स्वर देने की भरसक कोशिश हुई है, जो आज के दौर में एनजीओ की दुनिया में गहरे तक पैठ गई हैं, लेकिन जिन पर खुलकर बातचीत करने के लिए ग्राम-स्तरीय कार्यकर्ताओं को बहुत कम मंच मिलते हैं। मंच मिले भी हैं, तो खुलकर कहने-बोलने का साहस जुटाना कठिन होता है।

ललित और वैचारिक लेखन के बीच की खाई को पाटते हुए अपनी जुदा-जुदा दुनिया में साँस लेती नौ लेखिकाओं ने जिस अनूठी सामूहिक प्रक्रिया से गुज़रकर इस प्रयास को साँचे में ढाला या एक माला की तरह पिरोया है, उसका सिलसिलेवार बयान इस किताब और चिन्तन को एक नया आयाम और गहराई देता है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2012
Weight
148 grams
ISBN-13
9788126723553
Pages
144
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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