Sangatin Yatra
(0)
Author:
Richa Nagar, SuryabalaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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‘संगतिन-यात्रा’ उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले में दलित और शोषित महिलाओं के हक़ के लिए लड़ती सात ग्राम-स्तरीय महिला-कार्यकर्ताओं की ज़िन्दगी का सफ़रनामा है। नौ लेखिकाओं की क़लम से पिरोया यह सफ़रनामा सात औरतों की निजी डायरियों पर आधारित है। इसमें उन्होंने अपने बचपन, जवानी, शादी-ब्याह और मातृत्व की देहरी से लेकर गाँवों में किए अपने काम तथा उस काम से जुड़े हुए सपनों आदि को बहुत मार्मिकता से लिपिबद्ध किया है। इन कहानियों के माध्यम से लेखिकाओं ने बार-बार हमारा ध्यान उन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढाँचों और प्रक्रियाओं की ओर ले जाने की कोशिश की है, जो लिंग-भेद से जुड़े संघर्षों को जाति, वर्ग, मज़हबी भेदभाव और छुआछूत की ज़ंजीरों में जकड़े रहती हैं। साथ ही इसमें उन जटिलताओं और दिक़्क़तों को भी स्वर देने की भरसक कोशिश हुई है, जो आज के दौर में एनजीओ की दुनिया में गहरे तक पैठ गई हैं, लेकिन जिन पर खुलकर बातचीत करने के लिए ग्राम-स्तरीय कार्यकर्ताओं को बहुत कम मंच मिलते हैं। मंच मिले भी हैं, तो खुलकर कहने-बोलने का साहस जुटाना कठिन होता है। ललित और वैचारिक लेखन के बीच की खाई को पाटते हुए अपनी जुदा-जुदा दुनिया में साँस लेती नौ लेखिकाओं ने जिस अनूठी सामूहिक प्रक्रिया से गुज़रकर इस प्रयास को साँचे में ढाला या एक माला की तरह पिरोया है, उसका सिलसिलेवार बयान इस किताब और चिन्तन को एक नया आयाम और गहराई देता है।
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‘संगतिन-यात्रा’ उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले में दलित और शोषित महिलाओं के हक़ के लिए लड़ती सात ग्राम-स्तरीय महिला-कार्यकर्ताओं की ज़िन्दगी का सफ़रनामा है। नौ लेखिकाओं की क़लम से पिरोया यह सफ़रनामा सात औरतों की निजी डायरियों पर आधारित है। इसमें उन्होंने अपने बचपन, जवानी, शादी-ब्याह और मातृत्व की देहरी से लेकर गाँवों में किए अपने काम तथा उस काम से जुड़े हुए सपनों आदि को बहुत मार्मिकता से लिपिबद्ध किया है।
इन कहानियों के माध्यम से लेखिकाओं ने बार-बार हमारा ध्यान उन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढाँचों और प्रक्रियाओं की ओर ले जाने की कोशिश की है, जो लिंग-भेद से जुड़े संघर्षों को जाति, वर्ग, मज़हबी भेदभाव और छुआछूत की ज़ंजीरों में जकड़े रहती हैं। साथ ही इसमें उन जटिलताओं और दिक़्क़तों को भी स्वर देने की भरसक कोशिश हुई है, जो आज के दौर में एनजीओ की दुनिया में गहरे तक पैठ गई हैं, लेकिन जिन पर खुलकर बातचीत करने के लिए ग्राम-स्तरीय कार्यकर्ताओं को बहुत कम मंच मिलते हैं। मंच मिले भी हैं, तो खुलकर कहने-बोलने का साहस जुटाना कठिन होता है।
ललित और वैचारिक लेखन के बीच की खाई को पाटते हुए अपनी जुदा-जुदा दुनिया में साँस लेती नौ लेखिकाओं ने जिस अनूठी सामूहिक प्रक्रिया से गुज़रकर इस प्रयास को साँचे में ढाला या एक माला की तरह पिरोया है, उसका सिलसिलेवार बयान इस किताब और चिन्तन को एक नया आयाम और गहराई देता है।
Book Details
-
ISBN9788126723553
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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सभ्यता, संस्कृति और शुचिता की बदलती हुई परिभाषाओं के इस दौर में अपने समय को दर्ज करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। ‘सपनों का गणित’ की कहानियाँ अपने समय के इस द्वन्द्व को रेखांकित करती हैं और आत्मचिन्तन तथा आत्मविश्लेषण के लिए हमें प्रवृत्त करती हैं। निर्भीक होना हर दौर में लेखन की बुनियादी शर्त रही है। यह सुखद है कि लेखक अपनी पूरी ताक़त से इन स्थितियों से मुठभेड़ करता है और समस्याओं से कन्नी काटकर निकलने का कोई प्रयास इन कहानियों में नहीं है। इन कहानियों के माध्यम से हम सच...और परोसे जा रहे सच...के अन्तर को भी समझ सकेंगे।
अपेक्षाओं का भंग होना आज एक गम्भीर समस्या है और आम जन हर मोर्चे पर ख़ुद को छला हुआ महसूस कर रहा है। लेखक ने इस पीड़ा को समझा है और अपनी कहानियों के माध्यम से अभिव्यक्ति दी है।
पाठकों और आलोचकों—दोनों की पसंद की कसौटी पर खरा उतरना लेखक के लिए कठिन हो सकता है, लेकिन अपनी कहानियों के माध्यम से राजेन्द्र श्रीवास्तव इस सन्तुलन को साधते हैं। पठनीयता और गुणवत्ता दोनों के मेल से ही यह सम्भव हो सकता है।
Mar Gaya Deepnath
- Author Name:
Chandrakishore Jaiswal
- Book Type:

- Description: चन्द्रकिशोर जायसवाल अपने आसपास के समाज और जीवन को सहज भाव से देखते-पढ़ते हैं, और उसी सहजता से उसके विरोधाभासों की ओर संकेत करते हुए ऐसी कहानी लिखते हैं, जिससे पाठक फ़ौरन जुड़ जाता है। मर गया दीपनाथ कहानी-संग्रह में शीर्षक कथा के अलावा पाँच कहानियाँ और हैं। लगभग सत्तर पृष्ठों में फैली कहानी ‘मर गया दीपनाथ’ हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता को मनोवैज्ञानिक स्तर पर समझने की कोशिश करती है, और उन बड़े मूल्यों को रेखांकित करती है जिनके आधार पर भारत की साझी सामाजिकता आकार ग्रहण करती है। साधारण शैली में असाधारण कहानियाँ रचनेवाले कथाकार चन्द्रकिशोर जायसवाल ने मध्यवर्गीय पारिवारिक जीवन को गहरी संवेदनशीलता के साथ अंकित किया है, साथ ही ग्रामीण जीवन के ऐसे चित्र भी उनके यहाँ मिलते हैं जिनसे स्वातंत्र्योत्तर भारत में विभिन्न स्तरों पर घटित होनेवाले बदलावों के सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक निहितार्थों को समझना आसान हो जाता है। इस संग्रह में शामिल कहानियाँ न सिर्फ़ उनके कथाकार के विभिन्न पक्षों को सामने लाती हैं, बल्कि अपनी पठनीयता और यथार्थबोध के चलते हमारी स्मृति का हिस्सा बन जाती हैं।
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