Janam Janam Junoon Mein Hum
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'जनम-जनम जुनूँ में हम" रिआज़ लतीफ़ का तीसरा शेरी मज़मूआ है। इससे पहले उनके दो शेरी मज़मूए—“हिंदसा बे-ख़्वाब रातों का” और “अदम-तराश”—मंज़र-ए-आम पर आ चुके हैं। 1990 के आस-पास अपनी पहचान बनाने वाले उर्दू शायरों में रिआज़ लतीफ़ नुमायां हैं। एक ख़ास तख़्लीक़ी मिज़ाज, नादिर मौज़ूआत, और गैर-रسمी लहजे की बुनियाद पर उनकी शायरी बिल्कुल अलग पहचानी जाती है, जिसकी झलक पढ़ने वालों को इस इन्तिख़ाब में नज़र आएगी।
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'जनम-जनम जुनूँ में हम" रिआज़ लतीफ़ का तीसरा शेरी मज़मूआ है। इससे पहले उनके दो शेरी मज़मूए—“हिंदसा बे-ख़्वाब रातों का” और “अदम-तराश”—मंज़र-ए-आम पर आ चुके हैं। 1990 के आस-पास अपनी पहचान बनाने वाले उर्दू शायरों में रिआज़ लतीफ़ नुमायां हैं। एक ख़ास तख़्लीक़ी मिज़ाज, नादिर मौज़ूआत, और गैर-रسمी लहजे की बुनियाद पर उनकी शायरी बिल्कुल अलग पहचानी जाती है, जिसकी झलक पढ़ने वालों को इस इन्तिख़ाब में नज़र आएगी।
Book Details
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ISBN9789391080587
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Pages109
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Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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साहिर लुधियानवी को जनसाधारण आम तौर पर फ़िल्मों के गीतकार के रूप में ही जानता-पहचानता है। लेकिन तथ्य यह है कि फ़िल्में उनके जीवन में बहुत बाद में आईं, उससे पहले वे एक प्रगतिशील शायर के तौर पर अपनी बड़ी पहचान बना चुके थे। फ़िल्मों ने बस उन्हें रोज़गार दिया जिसके जवाब में उन्होंने फ़िल्मों को कुछ ऐसे अमर उपहार दिए जिन्हें उन्होंने अपने ऊबड़-खाबड़ और गहरी उदासी में बीते जीवन में कमाया था।
एक ऐसे परिवार में पैदा होकर, जिसका शायरी और अदब से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था, और एक ऐसे पिता का पुत्र होकर जिसके साथ उनके सम्बन्ध कभी पिता-पुत्र जैसे नहीं रहे और एक ऐसे समाज में जीकर जिसका सस्तापन, नाइंसाफ़ी और संकीर्णताएँ उनकी उदास आँखों से बचकर निकल नहीं पाती थीं, उन्होंने वह कमाया जिसे भले ही उस वक़्त के आलोचकों ने बहुत मान नहीं दिया, लेकिन जो आम आदमी की यादों में हमेशा के लिए पैठ गया। फ़िल्मों में आने से पहले ही वे अपने समय के सबसे लोकप्रिय और चहेते शायरों में शुमार हो चुके थे।
साहिर की ऐसी कई नज़्में और ग़ज़लें हैं, और गीत भी, जिनमें उन्होंने समाज की आलोचना दो-टूक लहज़े में की है। प्रगतिशील आन्दोलन से जुड़े साहिर की चिन्ताओं में गाँव में भूख और अकाल से जूझ रहे किसानों के दु:ख से लेकर शहरों में भूख के हाथों बिकतीं उन औरतों जिन्हें समाज वेश्या कहता है—तक का दर्द एक जैसी गहराई से आया है, जिसका मतलब यही है कि दु:ख को देखना, जीना और पकड़ना, शायर के रूप में यही उनका एकमात्र कौशल था, और इसी के विस्तार में उन्होंने हर माथे की हर सिलवट को पिरोकर तस्वीर बना दिया।
यह किताब उनकी रचनाओं का समग्र है, अभी तक उपलब्ध उनकी तमाम ग़ज़लों, नज़्मों और गीतों को इसमें इकट्ठा करने की कोशिश की गई है। उम्मीद है दर्द-पसन्द पाठकों को इसमें अपना वह खोया घर मिल जाएगा जो इधर की चमक-दमक में खो गया है।
Mohabbat Na Samaj Hoti Hai
- Author Name:
Wasim Barelvi
- Book Type:

- Description:
This book (Mohabbat Naa Samajh Hotii Hai) brings together such works, where on one hand the hardships of our times are depicted, and on the other, glimpses of the unspoken aspects of Wasim Barelvi’s life can also be found. Wasim Barelvi was born on February 8, 1940, in Bareilly, Uttar Pradesh. He is considered one of the most renowned and admired poets of the present time. His poetry reflects deep emotions and feelings. In his verses, one can see both the pain of clashing Eastern and Western cultures as well as respect for traditions. His poetry also highlights the bitterness of life’s struggles and expresses an inner sorrow over today’s political attitudes.
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Book
जनम-जनम जुनूँ में हम is the third poetic collection by Riaz Latif, a poet who came to prominence around 1990 with an Urdu voice that chose paths the ghazal tradition rarely travelled. Where classical registers lean on formal grace, Latif writes with an informal register—conversational, unpolished by design—and selects subjects that sit outside the familiar emotional repertoire of Urdu verse. This collection follows Hindsa Be-Khwab Raaton Ka and Adam-Tarash, each marking a steady departure from nostalgia and ornament.
What readers encounter here is not the grand claim or the virtuoso flourish, but a poet mapping interior territory: obsession across lifetimes, quiet moral reckonings, the strangeness of persistence. Latif's creative temperament (takhliqi mizaj) refuses to imitate; his language stays close to speech, his images drawn from the unmarked everyday. For readers weary of polished sentiment, this is Urdu poetry that trusts awkwardness and particularity over beauty for its own sake.
यह किताब पढ़ते समय मुझे कैसा अनुभव मिलेगा?
यह संग्रह आपको एक अनौपचारिक, बातचीत जैसे स्वर में ले जाता है जो क्लासिकल उर्दू शायरी की सजावट से अलग है। रिआज़ लतीफ़ की शायरी जुनून, नैतिक उलझनों और रोज़मर्रा की अजीबियत को बिना किसी नाटकीयता के छूती है। यह उन पाठकों को संतुष्ट करेगी जो ईमानदार आवाज़ और असामान्य विषयों की तलाश में हैं।
यह किताब किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?
- जो पाठक परंपरागत ग़ज़ल के दायरे से बाहर जाकर नए विषयों को तलाशना चाहते हैं
- जिन्हें अनौपचारिक, बोलचाल की भाषा में लिखी उर्दू शायरी पसंद है
- जो 1990 के बाद के समकालीन उर्दू काव्य आंदोलन को समझना चाहते हैं
- जो भावनात्मक सजावट से ज़्यादा ईमानदार, असहज सच्चाइयों की कद्र करते हैं
इस किताब के विषय का आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्व क्या है?
1990 के बाद के दशक में उर्दू शायरी ने अपनी भाषा और विषयों को नया रूप दिया। रिआज़ लतीफ़ उस पीढ़ी का हिस्सा हैं जिसने परंपरा को सम्मान देते हुए भी व्यक्तिगत आवाज़ को प्राथमिकता दी। आज के भारत में, जहां पहचान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस जारी है, यह संग्रह दिखाता है कि शायरी कैसे अपनी ज़मीन पर खड़ी रहकर नए रास्ते खोज सकती है।
इस विषय पर रिआज़ लतीफ़ का नज़रिया दूसरे शायरों से कैसे अलग है?
रिआज़ लतीफ़ औपचारिक शिल्प और सजावटी भाषा से बचते हैं। उनकी शायरी में ग़ैर-रस्मी लहजा और नादिर मौज़ूआत (दुर्लभ विषय) प्रमुख हैं। जहां कई शायर रूमानियत या नॉस्टेल्जिया पर टिके हैं, वहीं लतीफ़ आंतरिक द्वंद्व, जुनून और रोज़मर्रा की अजीब सच्चाइयों को बिना किसी भव्यता के प्रस्तुत करते हैं।
यह किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में क्या बचता है?
- यह समझ कि शायरी हमेशा सुंदर होने की ज़रूरत नहीं—वह ईमानदार और असहज भी हो सकती है
- एक अनौपचारिक आवाज़ की याद जो बोलचाल की भाषा में गहरी बातें कह जाती है
- समकालीन उर्दू शायरी की उस धारा का परिचय जो परंपरा से अलग रास्ता चुनती है
- जुनून और नैतिक उलझनों पर एक शांत, विचारशील दृष्टिकोण