Akhir Bole Kyon Nahi Aap

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‘आखिर बोले क्यों नहीं आप’ संग्रह न केवल अपने समय की गवाही देता है, बल्कि उसकी चुनौतियों की शिनाख्त करते हुए, उनसे दो-दो हाथ करने का उपक्रम भी करता है। इन कविताओं में मेहनतकशों के जीवन की तमाम झाँकियाँ है और उनकी मुक्ति में ही मानवता की मुक्ति की अपरिहार्यता का विश्वास भी। कवि का दृढ़ विश्वास है कि अपने दुःख में डूबने की जगह जन-जन की पीड़ा को अपना बनाकर, उसे दूर करने के संघर्ष में लगकर ही दुनिया सुन्दर बनती है। कवि का मुख्य स्वर इंसानियत के पैमाने से भारतीय लोकतंत्र, राष्ट्र-राज्य, धर्मसत्ता और पूँजीवादी व्यवस्था की मार्मिक आलोचना और नागरिक कर्तव्य का राजनैतिक स्वर है, लेकिन इसके बीच ही आत्मसाक्षात्कार की कविताएँ भी हैं, प्रकृति, प्रेम और परिवार भी बराबर विद्यमान है, साथ ही कवि का जिया हुआ उसका प्यारा शहर इलाहाबाद भी जिसे उसने देश के साथ बदलते देखा और अनुभव किया है। हमारे समय और सभ्यता के परस्पर-संघर्षी स्वरों, चित्रों से संवलित, देश-काल के शर से बिंधी इस संग्रह की तमाम मार्मिक कविताएँ नागरिकों, युवाओं, मित्रों, संस्कृतिकर्मियों, परिजन, सहयोद्धाओं को सम्बोधित हैं—जीवन के प्रति अदम्य निष्ठा और प्रेम, मानवता की अन्तिम विजय के प्रति आस्थावान, जो निश्चय ही पाठकों के जीवन-विवेक में बहुत कुछ जोड़ती हुई, उनके मानस की गहराइयों में गूँजती रहने में समर्थ हैं। —प्रणय कृष्ण

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ISBN
9789377475055
Pages
176
Avg Reading Time
6 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

‘आखिर बोले क्यों नहीं आप’ संग्रह न केवल अपने समय की गवाही देता है, बल्कि उसकी चुनौतियों की शिनाख्त करते हुए, उनसे दो-दो हाथ करने का उपक्रम भी करता है। इन कविताओं में मेहनतकशों के जीवन की तमाम झाँकियाँ है और उनकी मुक्ति में ही मानवता की मुक्ति की अपरिहार्यता का विश्वास भी। कवि का दृढ़ विश्वास है कि अपने दुःख में डूबने की जगह जन-जन की पीड़ा को अपना बनाकर, उसे दूर करने के संघर्ष में लगकर ही दुनिया सुन्दर बनती है।

कवि का मुख्य स्वर इंसानियत के पैमाने से भारतीय लोकतंत्र, राष्ट्र-राज्य, धर्मसत्ता और पूँजीवादी व्यवस्था की मार्मिक आलोचना और नागरिक कर्तव्य का राजनैतिक स्वर है, लेकिन इसके बीच ही आत्मसाक्षात्कार की कविताएँ भी हैं, प्रकृति, प्रेम और परिवार भी बराबर विद्यमान है, साथ ही कवि का जिया हुआ उसका प्यारा शहर इलाहाबाद भी जिसे उसने देश के साथ बदलते देखा और अनुभव किया है।

हमारे समय और सभ्यता के परस्पर-संघर्षी स्वरों, चित्रों से संवलित, देश-काल के शर से बिंधी इस संग्रह की तमाम मार्मिक कविताएँ नागरिकों, युवाओं, मित्रों, संस्कृतिकर्मियों, परिजन, सहयोद्धाओं को सम्बोधित हैं—जीवन के प्रति अदम्य निष्ठा और प्रेम, मानवता की अन्तिम विजय के प्रति आस्थावान, जो निश्चय ही पाठकों के जीवन-विवेक में बहुत कुछ जोड़ती हुई, उनके मानस की गहराइयों में गूँजती रहने में समर्थ हैं।

—प्रणय कृष्ण

Book Details

  • ISBN
    9789377475055
  • Pages
    176
  • Avg Reading Time
    6 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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